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9/18/2021

व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक

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व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक 

vyaktitva ko prabhavit karne wale karak;किसी का भी व्यक्तित्व दो प्रकार के कारकों से प्रभावित होता हैं, ये हैं-- जैविकीय कारक तथा वातावरणी कारक। इन दोनों प्रकार के कारकों की अन्तर्क्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्तित्व का विकास होता हैं। 

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अतः इन्हें व्यक्तित्व के निर्धारक भी कहा जाता हैं। व्यक्तित्व को प्रभावित करने करने वाले जैविकीय और वातावरणीय कारकों को विस्तृती वर्णन निम्नलिखित हैं-- 

(अ) जैविकीय कारक 

प्रत्येक व्यक्ति एक अनुठी शारीरिक रचना के रूप में जन्म लेता हैं। जन्म के समय वह अनेक शारीरिक विशेषताओं से युक्त होता है जो उसके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष बनाती है। इन शारीरिक गुणों के कारढ वह व्यक्ति जन्म से लेक मृत्यु तक अन्य लोगों से भिन्न रहता हैं। व्यक्ति का रंग, रूप, कद, काठी, भार एवं स्वास्थ्य काफी सीमा तक जन्म के समय ही वंशानुक्रम के द्वारा निर्धारित हो जाते हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात व्यक्ति के शारिरिक अथवा जैविकीय गुणों के द्वारा उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के विकास पर प्रभाव डालना है। व्यक्ति का स्नायुमण्डल एवं अन्तःस्त्रावी ग्रंथियाँ भी उसके व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करती हैं। अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ हारमोन छोड़ती हैं। थायरायड, पिट्यूटरी, थाइमस, एण्डरनल आदि अन्तः स्त्रावी ग्रंथियों के द्वारा छोड़े जाने वाले हारमोन्स की मात्रा आवश्यकता से कम या ज्यादा होने पर शरीर का समुचित विकास नही हो पाता है जिससे संपूर्ण व्यक्तित्व परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से प्रभावित होता हैं। स्त्रायुमंडल भी व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं का संचालन काफी हद तक स्नायुमण्डल के सुचारू ढंग से कार्य करने पर ही निर्भर करता हैं। विभिन्न प्रकार के स्नायुविक रोग जैसे हकलाना, तुतलाना, हिस्टीरिया, बहरापन आदि व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करते हैं। लिंगभेद, बुद्धि, मूल प्रवृत्तियाँ, विशिष्ट योग्यताएँ जैसे जैविकीय कारक भी व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव डालते हैं। 

(ब) वातावरणीय कारक 

वातावरणीय कारकों के अंतर्गत व्यक्ति के वातावरण से संबंधित समस्त कारक आ जाते हैं। वातावरण को दो भागों में बांटा जा सकता हैं-- भौतिक वातावरण व सामाजिक वातावरण। भौतिक वातावरण से तात्पर्य जलवायु, भूमि,  कृषि, उपज तथा अन्य भौतिक संसाधनों की उपलब्धता आदि से हैं। भौतिक वातावरण के कारण व्यक्ति की कद-काठी, रंग-रूप, स्वास्थ्य, रहन-सहन की आदतों में काफी अंतर आ जा जाता हैं। माँ के द्वारा गर्भ धारण करने के साथ ही गर्भस्थ शिशु पर अपने चारों ओर के वातावरण का प्रभाव पड़ना प्रारंभ हो जाता है। माँ के द्वारा ली गई खुराक, मादक द्रव्य, किया गया श्रम व माँ की संवेगात्मक स्थिति का गर्भस्थ शिशु पर जो प्रभाव पड़ता है वह आने वाले वर्षों में भी बना रहता हैं। जन्म के उपरांत व्यक्ति के घर, गांव व शहर के भौतिक वातावरण का प्रभाव व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता हैं। 

सामाजिक वातावरण से अभिप्राय व्यक्ति को उपलब्ध सामाजिक अन्तर्क्रिया का गुणवत्ता तथा संभावना से हैं। इसके अंतर्गत परिवार, पड़ोस, विद्यालय, जनसंचार साधन, धर्म तथा संस्कृति आदि आते हैं। मनोवैज्ञानिकों की मान्यता हैं कि सामाजिक वातावरण का प्रभाव जैविकीय वातावरण से कहीं अधिक व्यापक होता हैं। इसलिए सामाजिक कारकों की विस्तृत चर्चा जरूरी प्रतीत होती हैं। व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख सामाजिक कारक निम्नलिखित हैं-- 

1. परिवार 

परिवार के विभिन्न सदस्यों के व्यक्तित्व और उनकी परस्पर अन्तर्क्रिया का बालक के व्यक्तित्व पर जन्म से ही प्रभाव पड़ना प्रारंभ हो जाता हैं। बालक जन्म से ही एक सामाजिक प्राणी होता है तथा सबसे पहले वह अपने परिवारजनों के संपर्क में आता हैं। अतः पारिवारिक पृष्ठभूमि का उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही हैं। माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य परिवारजनों यहाँ तक कि घर के नौकर आदि के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं, लाड़-दुलार, तिरस्कार, ईर्ष्या, द्वेष आदि का प्रभाव बालक पर पड़ता हैं। परिवार में कलह होने या परिवार की संघर्षपूर्ण जीवन शैली तथा परिवारजनों की प्रवृत्तियाँ, महत्वाकांक्षा, रूचि, दृष्टिकोण, क्षमता और आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक स्थिति आदि भी बालक के व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। 

2. पास-पड़ोस 

जैसे-जैसे बालक का विकास होता जाता है उसका सामाजिक दायरा बढ़ता जाता हैं। बालक अपने आस-पड़ोस के व्यक्तियों तथा अन्य बालकों से संपर्क स्थापित करता हैं। इन सभी व्यक्तियों का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता हैं। सामाजिक अनुकरण के द्वारा वह अनेक बातें सीखता हैं। साथियों के साथ खेल-खेल में बालक अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व, वाक्कौशल, सामाजिकता जैसे अनेक गुण सीख लेता हैं। 

3. आर्थिक स्थिति 

परिवार की आर्थिक स्थिति का भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव पड़ता हैं। आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवार के बच्चों में हीन-भावना तथा भग्नाशा उत्पन्न हो जाती हैं। गरीब परिवारों के बच्चे परिस्थितिजन्य कारणों की वजह से चोरी, झूठ बोलना, चरित्र पतन व अन्य अनेक अनैतिक कार्यों के आदी हो जाते हैं। 

4. विद्यालय 

विद्यालय को व्यक्तित्व के विकास का एक औपचारिक केंद्र माना जाता हैं। विद्यालय में बालक के द्वारा प्राप्त और अन्य अनुभव व्यक्तित्व के विकास में सार्थक भूमिका अदा करते हैं। विद्यालय में छात्रों को अपना शैक्षिक, नैतिक, सामाजिक, शारीरिक, बौद्धिक, संवेगात्मक तथा मानसिक विकास करने के अवसर प्रदान किये जाते हैं, जिससे वे अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण सर्वोत्तम विकास कर सकें। शैक्षिक कार्यक्रमों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं, खेल-कूद, अभिनय, सांस्कृतिक आयोजनों आदि में भाग लेने से छात्रों में अनुशासन, नेतृत्व, समूह, भावनाओं, आत्म-अभिव्यक्ति, स्वाभिमान जैसे गुणों का विकास संभव होता हैं। 

5. जनसंचार माध्यम 

वर्तमान युग में जनसंचार साधनों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रेडियों, दूरदर्शन, चलचित्र, पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र जैसे जनसंचार के साधन जीवन के समस्त पक्षों को प्रभावित कर रहे हैं। मानव व्यक्तित्व भी इनके प्रभाव से अछूता नही हैं। जनसंचार को विभिन्न साधन मानव व्यक्तित्व को प्रायः अप्रत्यक्ष रूप से किन्तु काफी हद तक अधिक-से-अधिक प्रभावित करते हैं। इनमें वर्णित विभिन्न कथानकों, अभिनेताओं के व्यवहारों व पोशाकों, रीति-रिवाजों, दृष्टिकोणों, जीवन शैली आदि का बालक अन्धानुकरण करते हैं। 

6. धर्म व संस्कृति 

व्यक्तित्व के विकास मे धर्म व संस्कृति का भी योगदान रहता है। प्रत्येक धर्म की अपनी कुछ मूलभूत मान्यतायें होती हैं जिन्हें उस धर्म के अनुयायी दिल तथा दिमाग से स्वीकार करते हैं और उन्हीं के अनुरूप कार्य करते हैं। मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारों, गिरजागरों में जाकर सुने धार्मिक प्रवचनों का प्रभाव भी व्यक्तित्व पर पड़ता हैं। सांस्कृतिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों के प्रति आस्था का भाव भी बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करता हैं। गुरूभक्ति, आज्ञापालन, देशप्रेम, दयाभाव, आदरभाव, कर्तव्यनालन, सहनशीलता, ईमानदारी जैसे गुण बालक काफी हद तक अपने धर्म व संस्कृति से सीखता हैं। 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि व्यक्ति के विकास में जैविकीय तथा वातावरणीय दोनों ही प्रकार के कारकों का योगदान रहता हैं। वंशानुक्रम व वातावरण दोनों की अन्तर्क्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्तित्व का निर्माण होता हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि बालक के व्यक्तित्व के संतुलित विकास के लिए जैविकीय तथा वातावरणीय दोनों ही प्रकार के कारकों पर पर्याप्त ध्यान दिया जायें।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी
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