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10/07/2021

स्मृति का अर्थ, परिभाषा, तत्व/स्वरूप

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स्मृति का अर्थ (smriti kya hai)

smriti arth paribhasha tatva svarup;ऐसी मान्यता हैं कि प्राणी जो कुछ सीखता है उसकी छाप (Impression) मस्तिष्क में बनती हैं। इन छापों को स्मृति चिन्ह (Memory trace) कहा जाता हैं। इसे 'न्यूरोग्राम' (Neurogram or Engram) भी कहते हैं (Munn, 1967)। स्मृति या सीखी गई सामग्री या कार्यों का पुनर्स्मरण स्मृति चिन्हों पर ही निर्भर करता हैं। इन्हें स्पष्ट करते हुए हिलगार्ड इत्यादि (Hilgard et. al., 1975) ने लिखा हैं," स्मृति चिन्ह कों तंत्रिका तंत्र में होने वाले उस अनुमानित परिवर्तन के रूप में जाना जाता हैं जो अधिगम करने एवं प्रत्याह्रान के समय तक बना रहता हैं।" 

ऐसा माना जाता हैं कि स्मृति, धारणा या पुनर्स्मरण के लिए 'स्मृति चिन्हों' का सक्रिय रहना आवश्यक हैं। यदि ये कमजोर या धूमिल पड़ते हैं, तो सीखी गई बातों का विस्मरण होने लगता हैं। 

स्मृति की परिभाषा (smriti ki paribhasha)

स्मृति एक प्रकार की संज्ञानात्मक या मानसिक प्रक्रिया हैं एबिंगहास ने इसको पुनरूत्पादक स्मृति (Reproductive memory) के नाम से संबोधित किया। बार्टलेट ने इसे पुर्नसंरचनात्मक स्मृति (Reconstructive memory) के नाम से संबोधित किया हैं। अलग-अलग विद्वानों ने स्मृति को अलग-अलग रूपों में परिभाषित किया हैं-- 

रायबर्न के अनुसार," अपने अनुभवों को संचित रखने और उनको प्राप्त करने के कुछ समय बाद चेतना के क्षेत्र में पुनः लाने की जो शक्ति हममें होती हैं, उसी को स्मृति कहते हैं।"

स्टाउट महोदय के अनुसार," स्मृति वह प्रक्रिया हैं, जिसके माध्यम से पुराने विचार फिर से जागृत हो जाते हैं।" 

मैक्डूगल के अनुसार," घटनाओं की उसी रूप में कल्पना करना जिस रूप में उन्हें पूर्वकाल में अनुभव किया गया तथा उन्हें अपने उसी अनुभव के रूप में पहचानना ही स्मृति हैं।" 

इस परिभाषा के अनुसार किसी किसी घटना के पूर्व संचित अनुभव को पुनः उसी रूप में पहचानना स्मृति हैं। 

वुडवर्थ के अनुसार," एक बार सीखी गयी क्रिया का पुनः स्मरण स्मृति हैं।" 

बेरन के शब्दों में," व्यक्ति की संज्ञानात्मक व्यवस्था की सूचना का संकलन और पुनरोत्पादन ही स्मृति हैं। 

हिलगर्ड तथा एटकिंसन के शब्दों में," स्मरण करने का अर्थ होता हैं। वर्तमान समय में उन प्रतिक्रियाओं को प्रदर्शित करना जिनको व्यक्ति ने पहले कभी सीखा था।" 

ब्रूनो के अनुसार," स्मृति वह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया हैं जिसमें सूचना का कूटसंकेतन, संचयन एवं पुनरूद्धार सन्निहित होता हैं।" 

प्राइस इत्यादि के अनुसार," अतीत के पूर्वानुभव एवं विचारों को पुनर्सृजित या पुनरोत्पादित करने की मस्तिष्क की योग्यता स्मृति हैं।" 

विभिन्न परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि स्मृति एक ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूर्वानुभवों, विचारों या सीखी गई सामग्रियों के अनुभव को चेतना में लाने में सहायता मिलती हैं। हम पूर्वानुभवों को पुनः सृजित करते हैं या उन्हें पुनरोत्पादित करते हैं ताकि वर्तमान परिस्थिति में उनसे लाभ उठा सकें, समयोजन स्थापित कर सकें और आवश्यकतानुसार उनका प्रदर्शन कर सकें। स्मृति प्रक्रिया एक अत्यन्त लाभदायक प्रक्रिया हैं। इसी के कारण हमें अपने पूर्वानुभव याद रहते हैं। स्मृति के अभाव में जीवन निरर्थक एवं बोझ-सा बन सकता हैं। यदि हमें कुछ याद ही न रहे तो वह स्थिति कितनी विचित्र-सी हो जायेगी। उपर्युक्त परिभाषाओं तथा विवेचनों के आधार पर स्मृति के बारे में निम्‍नलिखित निष्कर्ष दिये जा सकते हैं-- 

1. स्मृति एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया हैं।

2. यह स्मृति चिन्हों (Memory traces) पर निर्भर होती हैं। 

3. अधिगम या अनुभव के परिणामस्वरूप तंत्रिता-तंत्र में जो परिवर्तन होता हैं, वही स्मृति का आधार बनता हैं।

4. स्मृति द्वारा पूर्वानुभव या पूर्व में सीखी गई बातें चेतना में लायी जाती हैं। 

5. पूर्वानुभव को पुनः सृजित या पुनरोत्पादित करना स्मृति हैं। 

6. स्मृति में कूटसंकेत (Coding), संचयन (Storage) एवं पुनरूद्धार (Retrieval) की प्रक्रियाएँ सन्निहित होती हैं। 

7. स्मृति द्वारा पूर्वानुभवों या पूर्व के ज्ञानों को वर्तमान परिस्थिति में प्रयुक्त किया जाना संभव हो पाता हैं।

स्मृति के तत्व या स्वरूप (smriti tatva ya svarup)

जैसा कि स्मृति की परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति एक जटिल मानसिक प्रक्रिया हैं। यह क्रिया अनेक क्रियाओं का सम्मिश्रण रूप होती हैं। अतः इसके स्वरूप को समझने के लिये इसके विभिन्न अंगों को समझना भी आवश्‍यक हैं। 

उक्त परिभाषाओं के अनुसार स्मृति की क्रिया के चार मुख्य अंग हैं-- सीखना, धारणा, पुनर्स्मरण तथा पहचान। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित हैं-- 

1. सीखना 

जैसा कि वुडवर्थ की स्मृति की परिभाषा से स्पष्ट है कि, " पूर्व में सीखे गये कार्य को पुनः याद करना ही स्मृति हैं।" अतः सीखना स्मृति का प्रथम प्रमुख अंग हैं। सीखने के अभाव में अनुभव का संचय संभव नहीं और अनुभव के संचय के बिना स्मृति की क्रिया संभव नहीं, इस कारण स्मृति की क्रिया के लिए 'सीखना' क्रिया अनिवार्य हैं। 

2. धारणा 

धारणा एक मानसिक क्षमता पर आधारित क्रिया हैं। कुछ बालक किसी पाठ को जल्दी याद कर लेते हैं,  कुछ बहुत देर से याद कर पाते हैं। धारणा के स्तर भेद का कारण अनेक तत्व हैं। इन तत्वों के द्वारा ही धारणा की क्रिया होती हैं। 

3. पुनर्स्मरण 

जब अतीत के अनुभव चेतना में आते हैं, तब उन्हें पुनर्स्मरण की संज्ञा दी जाती हैं। पुनः स्मरण की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें अतीत के अनुभव जैसे वे होते है वैसे ही चेतना में नहीं आते। उनमें से अनेक तत्व छूट जाते हैं तथा केवल मुख्य-मुख्य अंश ही स्मृति में आते हैं। कुहलमन ने पुनर्स्मरण की क्रिया के विषय में कहा कि," पुनर्स्मरण मूल अनुभव की बिल्कुल वैसी की वैसी ही नकल नहीं होती। वस्तुतः यह पुनर्रचना नहीं बल्कि एक रचना मात्र है जो एक ऐसे कल की रचना हैं, जो मूल वस्तु के पूर्व अनुभव के आधार पर स्वीकृत कर ली जाती हैं तथा पूर्व प्रत्यक्षीकरण की रचना से बहुत भिन्न होती हैं। इस प्रकार पुनर्स्मरण पूर्व अनुभवों को याद करने की क्रिया हैं। 

पुनर्स्मरण के आधार 

पुनः स्मरण के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं-- 

(अ) विचारों का साहचर्य

कभी-कभी विचारों के साथ उनसे सम्बद्ध अन्य बातों का भी स्मरण आ जाता हैं। उदाहरणार्थ ताजमहल के साथ शाहजहाँ का, लंका के साथ रावण तथा महाभारत के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण हो आता हैं। विचारों के साहचर्य के तीन मुख्‍य कारण होते हैं-- 

1. समानता 

दो वस्तुओं की पारस्परिक समानता से एक को देखते ही दूसरे का स्मरण हो जाता हैं। जैसे-- अहिंसा का नाम लेते हैं तो इस सिद्धांत के प्रतिपादक महात्मा गाँधी तथा भगवान महावीर का नाम स्मरण आ जाता हैं। 

2. विपरीतता 

एक-दूसरे के विपरीत किन्तु प्ररस्पर संबंधित अनुभव भी कुछ स्मरण कराते हैं। जैसे किसी बदमाश को देखकर सज्जन की याद आती हैं। 

3. सहचारिता

जब दो विषयों का अनुभव एक साथ हो जाता है तो उसमें से एक का स्मरण होने पर दूसरा भी याद आ जाता हैं। इसे सहचारिता कहते हैं। 

(ब) मानसिक तत्परता 

मानसिक तत्परता से अभिप्राय विचारपूर्वक स्मरण करने से हैं। जिस अनुभव को पुनःस्मरण करने के लिये व्यक्ति मानसिक रूप से तत्पर होता हैं, वह क्रिया या अनुभव तुरंत पुनः स्मृति में आ जाता हैं। अतः पुनर्स्मरण के लिये मानसिक तत्परता भी प्रभावशाली तत्व हैं। 

(स) संवेग 

संवेग भी पुनर्स्मरण को प्रभावित करते हैं। यदि संवेग अनुकूल होता हैं तब उसका पुनर्स्मरण आसानी से हो जाता हैं। उदाहरणार्थ, परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर परिवार के अन्य दिवंगत व्यक्तियों का पुनर्स्मरण हो जाता हैं। यह पुनर्स्मरण शोक के संवेग के परिणामस्वरूप ही होता हैं। इसमें विशेष बात यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संवेग की अनुकूल अनुभूतियों का ही इस अवस्था में पुनः स्मरण होता हैं, विपरीत का नहीं। जैसे, विवाहादि के समय किसी की मृत्यु का स्मरण नहीं होता और मृत्यु के समय किसी उत्सव का स्मरण नहीं होता अर्थात् रोमांच के संवेग द्वारा रोमांचक पुनःस्मरण और शोक के संवेग द्वारा शोकायुक्त पुनः स्मरण होता हैं। 

4. पहचानना 

स्मृति की प्रक्रिया का समापन पहचान से होता हैं। स्मृति में याद, धारणा और पुनर्स्मरण द्वारा यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि विषय क्या हैं? जब यह निश्चित हो जाता है कि चेतना में आने वाला विषय यह है तब उसे पहचान कहा जाता हैं। इस प्रकार स्मृति विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हुई पहचान पर अपना वृत्त पूर्ण करती हैं। स्मृति की प्रक्रिया द्वारा 'प्रतिमा' हमारे मस्तिष्क में बन जाती हैं किन्तु जब प्रक्रिया का वृत्त पूर्ण हो जाता हैं तो प्रतिमा स्पष्ट हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति हमारे सम्मुख आता हैं तब व्यक्ति की आकृति हमारे मस्तिष्क में बन जाती हैं, हम सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति को कहीं देखा है या इससे कहीं मिले हैं। हम विभिन्न प्रकार से उसके विषय में घटनाओं का स्मरण करके उस पर विचार करते हैं तब उनका पुनर्स्मरण करके अंत में निश्चित हो जाता है कि उसे कहाँ देखा हैं या उससे कहाँ भेंट हुई हैं। व्यवहार के अंदर भी हम देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति काफी समय बाद हमें मिलता है और हम उसकी ओर अन्जान से बने देखते हैं तब वह व्यक्ति अनायास ही कह उठता हैं कि क्या आपने मुझे 'पहचाना' नहीं? यह कहने का उसका अभिप्राय उसकी 'प्रतिमा' के स्पष्ट न होने से ही होता हैं, तब यकायक हम भी कह उठते हैं कि अरे पहचान लिया कि आप अमुक व्यक्ति हैं, यह उसकी स्मृति के लिए पूर्णता का सूचक होता हैं। पहचान के निम्नलिखित तीन रूप हैं-- 

(अ) निश्चित पहचान 

जब हम किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से पहचान लेते हैं तथा उससे संबंधित घटनाओं का भी हमें स्पष्ट स्मरण हो आता हैं तब इसको निश्चित पहचान कहते है। 

(ब) अनिश्चित पहचान 

जब हमारे सामने कोई व्यक्ति या वस्तु आती है और उसके लिये स्पष्ट पहचान नहीं बना पाते यानि की हम यह तो पहचान लेते हैं कि यह व्यक्ति अपना परिचित हैं किन्तु उसके संबंधित स्मरण हमें स्पष्ट नहीं हो पाति तब यह अनिश्चित पहचान होती हैं। 

(स) असत्य पहचान 

जब हम किसी व्यक्ति को पहचानने में असत्य निर्णय ले लेते हैं तब वह असत्य पहचान होती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति हमारे सामने आता हैं और हम किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसकी स्मृति को जोड़कर उसे वही समझ लेते हैं तब यह असत्य पहचान होती हैं। 

मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में स्मृति के अंग के रूप में होने वाली पहचान निश्चित पहचान होती हैं, शेष दोनों भ्रम के क्षेत्र में आती हैं। अतः निश्चित पहचान ही पहचानना क्रिया का मनोविज्ञानिक रूप हैं।

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