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1/18/2020

1/18/2020

भारत चीन युद्ध, कारण और पराजय के कारण

भारत चीन युद्ध, चीन का भारत पर आक्रमण 

12 जुलाई, 1962 को लद्दाख में गलवान नदी की घाटी की भारतीय सैनिक चौकी को चीन ने अपने घेरे में लिया। अक्टूबर 1962 को चीन सेनाओं ने उत्तर-पूर्वी सीमांत तथा लद्दाख मोर्चे पर एक साथ बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया तथा 21 नवम्बर, 1962 को अचानक एक पक्षीय युध्द विराम की घोषण भी कर दी गई।
आज के इस लेख मे हम भारत-चीन युद्ध के कारण, भारत चीन युद्ध मे भारत की पराजय के कारण और भारत चीन युद्ध के परिणामों को जानेंगे।

चीन द्वारा भारत पर आक्रमण के कारण 

1. चीन विस्तारवादी नीति का समर्थक था तथा इस नीति का प्रदर्शन करना चाहता था।
2. चीन ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व यह अच्छी तरह जान लिया था कि युद्ध में उसी की विजय होगी। वह यह जानता था कि भारत को यह कल्पना भी नही हो सकती कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता हैं।
3. चीन आक्रमण कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करना चाहता था ताकि उसे अधिक शक्तिशाली माना जाए ताकि एशिया में उसका नेतृत्व स्थापित हो जाए।
4. भारत की लोकतांत्रिक पद्धति को सफल न होने देने के लिए उस युद्ध का बोझ लाद देना चाहता था।
5. तिब्बत के प्रति भारतीय नीति से चीन नाराज था। दलाईलामा को शरण देने के कारण वह भारत से नाराज हो गया था।
6. भारत और चीन दोनों की विचारधाराओं मे भिन्नता हैं। चीन एक  साम्यवादी देश है। भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। विचारधारा की इस प्रतिस्पर्धा मे चीन साम्यवादी विचारधार की क्षेष्ठता सिद्ध करना चाहता था।

7. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मे शक्ति प्रदर्शन की इच्छा भारत नवोदित राष्ट्रों का मुख्य वक्ता बन गया था। गुटनिरपेक्षता आन्दोलन के कारण भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी थी। चीन नही चाहता था कि भारत का सम्मान हो अतः उसने भारत को अपमानित करने के लिए ही भारत पर आक्रमण किया।

भारत चीन युद्ध में भारत की पराजय (असफलता) के कारण 

1. भारत की सैनिक शक्ति के प्रति उदासीनता
भारत ने स्वतंत्रता के बाद अपनी रक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंग सेना की और कोई विशेष ध्यान नही दिया। हमारी सीमा के बिल्कुल निकट ही चीन ने बहुत बड़ी मात्रा में सेनाएं और शस्त्र जमा कर लिए थे तथा हवाई अड्डे भी बना लियें थे उसकी गतिविधियों मे बहुत तेजी थी। हमारे प्रधानमंत्री को इसकी गुप्तचर विभाग से लगातार रिर्पोट मिल रही थी परन्तु हमारे प्रधानमंत्री अन्त तक इस बात पर दृढ़ रहे कि चीनियों से हमारा कोई बड़ा युध्द नही होगा।
2. सेना के आधुनिकीकरण पर ध्यान न देना
हमारे देश मे यह निरन्तर धारणा चल रही थी कि भारत गाँधी जी का देश है, वहाँ पर अहिंसा का प्रभाव है, जब तक हम किसी पर आक्रमण नही करते, तो हमारे ऊपर कौन आक्रमण करेगा? इन धारणाओं के कारण हमारी सरकार ने प्रतिरक्षा पर उचित ध्यान नही दिया।
3. सेना में असंतोष
डी.आर.मानकेकर ने लिखा है कि "प्रतिरक्षा मंत्री श्री कृष्णमेनन ने अपनी गलत नीतियों के द्वारा सेना मे असन्तोष उत्पन्न कर दिया। उन्होंने कनिष्ठ अधिकारियों को वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध खड़ा कर दिया।
4. चीन की सुदृढ़ स्थिति 
सन् 1954 से ही चीन युद्ध की तैयारी कर रहा था। उसने अपने नक्शों मे भारतीय सीमा का काफी भाग अपने अधिकार में दिखाया था। भारत की सीमा तक चीन ने पक्की सड़कों का निर्माण कर लिया था। अतः उसे सैनिक सामान तथा रसद पहुँचाने मे कोई कठिनाई नही हुई। भारत की सीमा पर उसके सैनिकों का जबर्दस्त जमाव था। युद्ध की दृष्टि से चीन की स्थिति सुदृढ़ थी। चीन पहाड़ी पर था। वह पहाड़ की ऊँचाईयों से नीचे प्रहार कर सकता था।
चीन को विश्वास था कि सोवियत संघ उसका साथ देगा किन्तु सोवियत संघ तटस्थ रहा तथा चीन पर युद्ध करने के लिए दबाव डारता रहा। मिस्र, यूगोस्लाविया, घाना आदि गुटनिरपेक्षता देशों ने चुप्पी साध ली। पाकिस्तान ने चीन का साथ देते हुए भारत की खुलकर निन्दा की। पूर्वी तथा पश्चिमी देशों ने चीन को सहायता नही दी अतः चीन ने एक पक्षीय युध्द विराम की घोषणा कर दी। भौगोलिक स्थिति, सैन्य तैयारी का आभाव, पड़ोसी देश पर अत्यधिक विश्वास, युद्ध साम्रगी की कमी तथा सैन्य संगठन एवं निर्देशन की अक्षमता, अव्यावहारिकता विदेश नीति के कारण भारत बुरी तरह पराजित हुआ। चीन को अपने उद्देश्यों मे सफलता मिल गई। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र मे यह प्रकट करना चाहता था कि वह युद्ध प्रेमी नही हैं, बाध्य होकर युद्ध करना पड़ा, भारत को पराजित कर उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करना चाहता था।

1/16/2020

1/16/2020

आतंकवाद का अर्थ और परिभाषा (aatankwad ka arth aur paribhasha)

आतंकवाद क्या है? आतंकवाद किसे कहते है 

आतंकवाद एक ऐसा तत्व है जो जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित कर रहा हैं। आधुनिक समय मे आतंकवाद एक राजनीतिक मुद्दे के साथ-साथ एक कानूनी व सैनिक मुद्दा भी बन गया है। यह देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी हैं, किन्तु यह है क्या? आतंकवाद को परिभाषित नहीं किया जा सकता और न ही सभी देश इस सम्बन्ध में एकमत है। यहाँ तक कि विश्व संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ भी आज तक आतंकवाद की सर्वानुमति वाली परिभाषा नहीं दे सकी। इसका कारण है कि जिन हिंसात्मक गतिविधियों को अमेरिका या पश्चिमी राष्ट्र आतंवाद कहते हैं उन्हें उनके समर्थक "जिहाद" "स्वतंत्रता की लड़ाई" "उत्पीड़न व शोषण" के विरुद्ध संघर्ष कहते हैं।

आतंकवाद का अर्थ (aatankwad ka arth) 

शाब्दिक दृष्टि से 'टैरर" शब्द लैटिन भाषा से आया है। इस शब्द से 'व्युत्पन्न' (आतंकवाद) और एक्ट ऑफ टैरिज्य (आतंकवादी कृत्य) अब बहुत प्रचलित हो गए हैं। प्रोफेसर शदुलेस्कू के अनुसार आतंकवाद मूलतः सम्पत्ति तथा जीवन को भारी नुकसान पहुंचाने मे बम तथा ऐसा ही अन्य समर्थ युक्तियों अर्थात् विस्फोट के रूप मे स्वयं को प्रकट करता हैं।

आतंकवाद की परिभाषा (aatankwad ki paribhasha)

ब्रियां एम. जेकिन्स ने आतंकवाद की परिभाषा करते हुए लिखा है कि "हिंसा की धमकी, व्यक्तिगत हिंसात्मक कृत्य और लोगों को आतंकित करने के उद्देश्य से हिंसा का विचार आतंकवाद है।
संक्षेप मे आतंकवाद की अधिक पूर्ण परिभाषा इस प्रकार होगी, अन्तर्राष्ट्रीय कानून के एक पात्र द्वारा दूसरे पात्र के विरुद्ध निष्पादित आतंकवाद कृत्य" इसमे (अ) राज्य (ब) मुक्ति के लिए युद्धरत राष्ट्र, (स) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन द्वारा निष्पादित आतंकवाद कृत्य शामिल होगा।

1/15/2020

1/15/2020

वैश्वीकरण क्या हैं? वैश्वीकरण के गुण और दोष (vaishvikaran kya hai gun aua dosh)

वैश्वीकरण को अनेक नामों से भी पुकारा जाता हैं, यथा भूमण्डलीकरण, जागतीकरण, वैश्वायान, पृथ्वीकरण, वैश्वीकरण आदि। आज हम जानेंगे वैश्वीकरण किसे कहते हैं? वैश्वीकरण क्या है? वैश्वीकरण का अर्थ और वैश्वीकरण के गुण और दोष।

वैश्वीकरण क्या है? (vaishvikaran kya hai) वैश्वीकरण से आशय एवं वैश्वीकरण का अर्थ

एन्थनी गिडिन्स के अनुसार, वैश्वीकरण विश्वव्यापी सामाजिक सम्बन्धों का सघनीकरण है।
वैश्वीकरण वस्तुतः व्यापरिक क्रिया-कलापो विशेषकर विपणन संबंधी क्रियाओं का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना हैं जिसमें संपूर्ण विश्व बाजार को एक ही क्षेत्र के रूप में देखा जाता हैं।
वैश्वीकरण
दूसरे शब्दों में वैश्वीकरण वह प्रक्रिया हैं, जिसमें विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबंधित न रहकर विश्व बाजारों में निहित तुलनात्मक लागत सिद्धांत के लाभों को प्राप्त करने सफल हो जाता हैं। साधारण शब्दों मे वैश्वीकरण का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना।

वैश्वीकरण के गुण और दोष (vaishvikaran ke gun aur dosh)

वैश्वीकरण के गुण (लाभ) एवं महत्व 

1. नवीन तकनीकों का आगमन 
वैश्वीकरण द्वारा विदेशी पूँजी के निवेश मे वृद्धि होती है एवं नवीन तकनीकों का आगमन होता हैं, जिससे श्रम की उत्पादकता एवं उत्पाद की किस्म में सुधार होता है।
2. जीवन-स्तर में वृद्धि
वैश्वीकरण से जीवन-स्तर मे वृद्धि होती है, क्योंकि उपभोक्ता को पर्याप्त मात्रा मे उत्तम किस्म की वस्तुयें न्यूनतम मूल्य पर मिल जाती हैं।
3. तीव्र आर्थिक विकास
वैश्वीकरण से प्रत्येक राष्ट्र को अन्य राष्टों से तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान का अवसर मिलता हैं तथा विदेशी पूँजी की विनियोग बढ़ता है। इससे अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास होता हैं।
4. विदेशी व्यापार में वृध्दि 
आयात-निर्यात पर लगे अनावश्यक प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते है तथा संरक्षण नीति समाप्त हो जाने से विदेशी व्यापार मे पर्याप्त वृध्दि होती हैं।

5. स्वस्थ औधोगिक विकास
वैश्वीकरण से औधोगिक क्षेत्र मे कई शासकीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाधायें दूर हो जाती है तथा विदेशी प्रतियोगिता का सामना करने के लिए देशी उधोग अपने को सक्षम बनाने का प्रयास करते हैं।
6. विदेशों में रोजगार के अवसर
वैश्वीकरण से एक देश के लोग दूसरे देश में रोजगार प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।
7. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि
जब वैश्वीकरण अपयाना जाता है,तो आर्थिक सम्बन्धों मे तो सुधार होता ही है, साथ ही राजनीतिक सम्बन्ध भी सुधरते हैं। आज वैश्वीकरण के कारण भारत के अमेरिका, जर्मनी एवं अन्य यूरोपीय देशो से सम्बन्ध सुधर रहे हैं।

वैश्वीकरण के दोष (हानियाँ) एवं दुष्परिणाम 

1. आर्थिक असन्तुलन
वैश्वीकरण के गुण कारण विश्व मे आर्थिक अन्तुलन पैदा हो रहा है। गरीब राष्ट्र अधिक गरीब एवं अमीर राष्ट्र अधिक सम्पन्न हो रहे हैं। इसी प्रकार देश मे भी गरीब एवं अमीर व्यक्तियों के बीच विषमता बढ़ रही हैं।
2. देशी उधोगों का पतन
वैश्वीकरण के कारण स्थानीय उधोग धीरे-धीरे बन्द होते जा रहे हैं। विदेशी माल की प्रतियोगिता के सामने देशी उधोग टिक नही पाते हैं। उनका माल बिक नही पाता है या घाटे मे बेचना पड़ता है। यही कारण है कि देश मे कई उधोग बन्द हो गये है या बन्द होने की कगार पर हैं।

3. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व 
विश्व के औधोगिक जगत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (मल्टी नेशनल) का प्रभुत्व एवं शिकंजा बढ़ता जा रहा है। ये बड़ी-बड़ी कम्पनियां स्थानीय उधोगों को निगलती जा रही है एवं स्थानीय उधोग या तो बन्द हो रहे है या इनके अधीन जा रहे है जैसे-कोका कोला कम्पनी ने भारत के थम्सअप, लिम्का के उत्पादन को अपने अधीन कर लिया हैं।
4. बेरोजगारी में वृद्धि 
वैश्वीकरण के कारण विदेशी माल मुक्त रूप से भारतीय बाजारों मे प्रवेश कर गया है। परिणामस्वरूप स्थानीय उधोग बन्द हो रहे है एवं बेरोजगारी बढ़ रही हैं। देश मे औधोगिक श्रमिकों की संख्या घट रही हैं।

5. राष्ट्र प्रेम की भावना को आघात 
वैश्वीकरण राष्ट्र प्रेम एवं स्वदेश की भावना को आघात पहुँचा रहा है। लोग विदेशी वस्तुओं का उपभोग करना शान समझते है एवं देशी वस्तुओं को घटिया एवं तिरस्कार योग समझते हैं।
6. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का दबाव 
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व, गैट आदि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव में सरकारे काम कर रही हैं। हितों की अवहेलना करके सरकार को इनकी शर्तें माननी पड़ती हैं। भारत जैसे राष्ट्र को अपनी आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय नीतायां इन संस्थाओं के निर्देशों के अनुसार बनानी पड़ रही हैं।
1/15/2020

नि:शस्त्रीकरण क्या हैं? प्रकार और आवश्यकता के कारण (nishastrikaran kya hai, prakar, avashayakta)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का kailash Education में आज के इस लेख मे हम नि:शस्त्रीकरण पर चर्चा करने जा रहें है जिसमे हम जानेंगे नि:शस्त्रीकरण क्या हैं? नि:शस्त्रीकरण का अर्थ, नि:शस्त्रीकरण के प्रकारों के बारें में और नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के कारण भी जानेंगे।

नि:शस्त्रीकरण क्या हैं? (nishastrikaran kya hai)नि:शस्त्रीकरण का अर्थ 

नि: शस्त्रीकरण एक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य हथियारों के अस्तित्व और उनकी प्रकृति से उत्पन्न कुछ विशिष्ट खतरों को कम करना हैं। नि:शस्त्रीकरण से हथियारों की सीमा निर्धारित करने व उन पर नियंत्रण करने की ध्वनि निकलती है।
नि:शस्त्रीकरण
नि:शस्त्रीकरण का लक्ष्य आवश्यकत रूप से नि:शस्त्र कर देना नहीं वरन् इस समय जो हथियार पाये जाते हैं उनके प्रभाव को घटा देना हैं। नि:शस्त्रीकरण कार्यक्रम को कुछ विचारकों द्वारा "शस्त्र नियंत्रण" की संज्ञा दी गई हैं। उनका मत है कि नि:शस्त्रीकरण की जगह यह शब्द ज्यादा उपर्युक्त है, क्योंकि नि:शस्त्रीकरण के अनुसार किसी भी राष्ट्र के पास किसी भी प्रकार के हथियारों का न होना हैं। पूर्ण नि:शस्त्रीकरण वर्तमान में कोई भी राष्ट्र नहीं चाहता हैं क्योंकि आत्मरक्षा, आन्तरिक व्यवस्था तथा उस प्रत्याशित बाह्रा आक्रमण से रक्षा के लिये अपने दायित्व पूर्ति हेतु कुछ सैन्य बल तो आवश्यक हैं।

नि:शस्त्रीकरण के प्रकार (nishastrikaran ke prakar)

द्वितीय विश्वयुद्ध मे अपार जनहानि के बाद विश्व के प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा सताए जा रही हैं। यही अतः नि:शस्त्रीकरण को महत्व दिया जा रहा हैं। स्वरूप की दृष्टि से इसके निम्न प्रकार है। 
1. सामान्य नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में सभी राष्ट्र या कम से कम सभी बड़ी शस्तियाँ सहभागी होती हैं।
2. परिमाणात्मक नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में सभी या अधिकांश प्रकार के हथियारों मे कमी लायी जाती है। 
3. परम्परागत नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण के अन्तर्गत परम्परागत हथियारों पर रोक या प्रतिबन्ध लगाया जाता है। 
4. परमाणु नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण के तहत् परमाणु हथियारों को कम या समाप्त किया जाता हैं।
5. गुणात्मक नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण में कुछ खास प्रकार के आक्रामक हथियारों को कम या समाप्त किया जाता है। 
6. समग्र नि:शस्त्रीकरण 
इस श्रेणी के नि:शस्त्रीकरण मे सभी श्रेणी के सभी प्रकार से हाथियारों को प्रतिबन्धित कर दिया जाता हैं। इसे  पूर्ण नि:शस्त्रीकरण कहा जाता हैं।

नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के कारण (nishastrikaran ki avashyakta)

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व के दो भाग-साम्यवादी, गैर साम्यवादी या पश्चिमी शक्ति मे बँट गया और दोनों के बीच की प्रतिस्पद्धा ने नि:शस्त्रीकरण को आगे बढ़ाने से रोका। दोनों ही पक्ष एक दूसरे से अधिक शक्तिशाली होने, विश्व पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी होने तथा एक दूसरे को पीछे धकेलने के लिय परमाणु शस्त्रों को बढ़ाने की होड़ मे लग गए। महाशक्तियों की इस प्रतिस्पर्धा से भी नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता को बल मिला और अन्तर्राष्ट्रीय समाज में शस्त्रों को समाप्त करने या कम करने के प्रयास में लग गया। नि:शस्त्रीकरण की मुख्य रूप से आवश्यकता विश्व में शान्ति को बनाये रखने और युद्ध को रोकने के लिए आवश्यक हैं। लेकिन प्रश्न यह हैं कि नि:शस्त्रीकरण के लिये प्रयास क्यों कियें जायें? नि:शस्त्रीकरण की आवश्यकता के निम्न कारण स्पष्ट हैं।
1. आर्थिक एवं लोक कल्याणकारी कार्यों के लिये
शस्त्रों की होड़ करते हुए उनके निर्माण पर जो व्यय विभिन्न राष्ट्रों द्वारा किया जा रहा है, यदि वही व्यय समाज के आर्थिक एवं लोक कल्याणकारी कार्यों पर किया जाये तो शायद विश्व मे किसी मनुष्य को भूखा न सोना पड़े और न वस्त्रों की में ठण्ड से अपनी जान देना पड़े।
2. विश्व मे शांति स्थापना के लिये 
यह माना जाता है कि नि:शस्त्रीकरण की धारणा विश्व मे शांति स्थापना मे सहायक सिद्ध हो सकती हैं क्योंकि शस्त्रों का विकास देश को सैनिक दृष्टि देते हैं यह दृष्टि युद्ध की सम्भावना को बढ़ावा देती हैं। 
3. आणविक संकट से बचने के लिये
वर्तमान मे यदि आणविक युद्ध से विश्व को सुरक्षित रखना है तो नि:शस्त्रीकरण ही उसका एकमात्र रास्ता है। शस्त्रों पर रोक लगाने या कम करने से यद्यपि आक्रमणों को पूर्णतः समाप्त तो नही किया जा सकता पर उनको सीमित जरूर किया जा सकता हैं।
4. नैतिक वातावरण के लिए
नि:शस्त्रीकरण नैतिक वातावरण के लिए भी आवश्यक है। युद्ध के नैतिक अनौचित्य मे विश्वास रखने वाले विचारकों का मत है कि शस्त्र रखने का अर्थ है युध्द की मौन स्वीकृति और यह मौन स्वीकृति युध्द को बल देती है।

1/13/2020

1/13/2020

success quotes in hindi

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का kailash Education में। आज मैं आपके लिए लेकर आया हूं success quotes in hindi सफलता पर विचार। हमारी जिन्दगी में अनेक इसे अवसर आते है जब हमें motivation की जरूरत पड़ती। आज मे आपके लिए कुछ ऐसे सर्वश्रेष्ठ success quotes लेकर आया हूं कि अगर आप इसमें से किसी एक विचार को भी अपनी जिन्दगी में उतार (follow) कर ले तो आपकी जिन्दगी बदल सकती हैं। इसलिए मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं कि आप केवल इन विचारों को पढ़े ही नही बल्कि इन्हें अपनी जिन्दगी में भी उतार लें। तो चलिए आइये पढ़ते हैं बिना किसी देरी के success quotes सफलता पर विचार।

success quotes in hindi (सफलता पर विचार)

जब दुनिया कहे की तेरा कुछ नही हो सकता तो वही सही समय होता हैं अपना दुनिया को अपनी औकात दिखाने का।
हमारा डर ही हमारे fail होने का सबसे बड़ा कारण हैं।
success quotes
जब कदम लड़खड़ा जाए तो हौसला साथ देता है,
और जब दुनिया मुँह फेर ले तो खुदा साथ देता हैं।
success quotes
काम की तलाश में है नकारा नही हैं वो, हार की आदत तो हैं उसे लेकिन अब तक हारा नही हैं वो।।
किस्मत तो जुएँ मे आजमाई जाती है, कामयाबी के लिए तो महेनत पर ही विश्वास करना होगा।
success quotes

हमेशा याद रखिए हर एक सफलता की शुरुआत मैं कर सकता हूँ "
से ही होती हैं।
success quotes
आज तक कौन सिखा है बातों से,
सबको सिखने के लिए हादसा जरूरी हैं।
सब्र रखों बूरे दिन का भी बूरा दिन आता हैं।
success quotes
हर दिन अच्छा हो यह जरूरी नही है,
लेकिन हर दिन कुछ अच्छा जरूर होता हैं।

अगर ठान लो तो कुछ भी करना असंभव नही हैं।
अपना स्वाभाव हमेशा उस दिये की तरह रखे जो उस बादशा के महल मे भी उतनी ही रोशनी देता है,
जितनी वह उस गरीब के घर मे देता हैं।
success quotes
मुकम्मल कहाँ हुई जिन्दगी किसी की आदमी कुछ खोता ही रहा हैं कुछ पाने के लिए।
कभी शक्ल पर मत जाओं रफ्तार हमेशा खून मे हुआ करती हैं।

जिन्दगी पैदा हुई हैं अभी आयी है क़यामत नही,
बदल डालो अपने जज़्बातों को यहाँ उनकी किमत नही।

अगर आप अपनी किस्मत को आजमाते-आजमाते थक गये है तो कभी खुद को आजमागर देखिऐ परिणाम बहुत बेहतर होगा।
success quotes
अगर आपको नशा ही करना हैं तो मेहनत का करों।
काम की तलाश में है लेकिन नकारा नही हैं वो,
हार की आदत तो हैं उसे लेकिन हारा नही हैं वो।
success quotes
झुठी शान के परिंदे ही ज्यादा फड़फड़ाते है,
तरक्की के बाज की उड़ान मे कभी आवाज नही होती।
शुक्रिया और सब्र करना सिखों जिन्दगी मे कभी किसी के मोहताज नही रहोंगे।
जिन्ह लोगों से किसी को उम्मीद नही होती वही लोग कमाल करते हैं।
success quotes
हजारों उलझनें राहों में और कोशिशें बेहिसाब इसी का नाम है जिंदगी चलते रहिये जनाब।

जो किसी के समझायें नही समझता हैं उसको फिर समय समझता हैं।
चमत्कार केवल उन्हीं लोगो के लिए होता है,
जो कभी हार नही मानते हैं।
आते हैं दिन हर किसी के बेहतर जिन्दगी के समंदर मे हमेशा तुफान नही रहते।
success quotes
हमेंशा अपने सपनों को पूरा करने के लिए काम करें और फिर देखना एक दिन आप सफल हो जाओंगें।
वक्त के साथ खुद को बदलना सिखयें अपनी मजबूरियों को मत कोसिएं।
अपने सपनों की उड़ान कभी किसी से पुछ कर न भरें।
success quotes
जो ठोकर खा कर भी ना संभले तो,

मुसाफिर का नसीब, वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज निभा ही दिया हैं।
जिद्द बनों जो लिखा नही नसीब में उसे हासिल करना सिखों।
success quotes
कभी कुछ नया पाने के लिये वो मत खो देना जो पहले से ही तुम्हारा हैं।
कुछ लोग हमेशा किस्मत को ही दोष देते है लेकिन वे कभी यह नही सोचते की बीच हमने ही बोया हैं।
जो इंसान अपनी सोच नही बदल सकता वह कभी कुछ नही बदल सकता।
success quotes
अपने जिन्दगी मे इतने व्यस्त हो जाओं की आपको उदास करने का भी वक्त न मिले।

अगर आपने कभी गलती नही की तो आपने कभी कुछ नया करने की कोशिश नही की।
success quotes
जब आप थक जाए तो आराम कर लें, लेकिन कभी रूके नही।
सबसे बड़ा गुरू ठोकरें होती हैं, खातें जाएंई और सिखते जाएंई।
success quotes
अपने मिशन में कामयाब होने के लिए आपकों अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना चाहिए।

गलत तरीके के साथ काम कर सफल होने से बेहतर हैं, कि आप सही तरीके के साथ काम कर असफल हो जाएँ।
तो दोस्तों कैसे लगें आपकों यह success quotes in hindi नीचें comment कर जरूर बताएं।
1/13/2020

शीत युद्ध का अर्थ और उत्पत्ति के कारण (sheet yudh ke karan)

शीत युद्ध क्या हैं?

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व दो गूटों- पूँजीवादी गुट व साम्यवादी गुट मे बंट गया। पूँजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरीका व साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था। ये दो महाशक्तियों और उनके आपसी सम्बन्धों की अभिव्यक्ति का नाम शीत युद्ध था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोनों महाशक्तियों में वैमनस्य और कटुता बढ़ती गई। दोनों महाशक्तियों में राजनीतिक प्रभुत्व के लिए राजनीतिक प्रचार का संग्राम छिड़ गया। यह एक ऐसा युद्ध था, जिसका रणक्षेत्र मानव मस्तिष्क था।

शीत युद्ध का अर्थ 

एन.एन.धर के के मत में " शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एवं रूस के मध्य क्रमशः विकसित उन कटु सम्बन्धों को कहा जाता है जिनके कारण दोनों राष्ट्र परस्पर प्रतिद्वंदी बनकर तीसरे विश्व युद्ध के लिये सम्बध्द हो गये थे।
शीत युद्ध का रणक्षेत्र मानव मस्तिष्क था। वास्तव में शीत युद्ध, नरसंहार और उसके पड़ने वाले प्रभाव से बचने तथा युध्द के लक्ष्य को प्राप्त करने की नवीन कला थी जिसमें कागज के गोलों, पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों तथा रेडियो के प्रचार साधनों से लड़ा जाने वाला युद्ध था। शीत युद्ध सोवियत संघ-अमेरिका आपसी सम्बन्धों की वह स्थिति थी जिसमे दोनों पक्ष शान्तिपूर्ण राजनयिक सम्बन्ध रखते हुए भी परस्पर शत्रुभाव रखते थे तथा शस्त्र-युद्ध के अतिरिक्त अन्य सभी उपायों से एक-दूसरे की स्थिति और शक्ति को निरन्तर दुर्बल करने का प्रयत्न करते थे। वस्तुतः शीत-युद्ध एक प्रचारात्म युद्ध था जिसमें एक महाशक्ति दूसरे के खिलाफ घृणित प्रचार का सहारा लेती थी।

शीत-युद्ध की उत्पत्ति कारण 

द्वितीय विश्वयुद्ध मे अमेरिका, सोवियत संघ तथा ब्रिटेन एक साथ थे, लेकिन युद्ध के खत्म होने के पहले ही सोवियत संघ का अमेरीका और ब्रिटेन से मतभेद शुरू हो गया था।
शीत युद्ध के प्रारंभ होने के निम्न कारण इस प्रकार हैं।
1. अणुबम का अविष्कार 
शीत युद्ध प्रारंभ होने का एक एक बहुत बड़ा कारण अमेरिका द्वारा अणुबमों का निर्माण था जिसे उसने हिरोशिमा और नागासाकी पर विध्वंस  के लिए प्रयुक्त किया था। अमेरिका द्धारा अणुबम अनुसंधान बहुत समय पहले से ही चल रहा था। इसकी जानकारी उसने ब्रिटेन को तो दी थी, किन्तु सोवियत संघ से यह रहस्य छिपाकर रखा। इससे सोवियत संघ व पश्चिमी राष्ट्रों की मित्रता में दरार पड़ गई।
2. बर्लिन की नाकाबन्दी
सोवियत संघ द्वारा लंदन प्रोटोकोल का उल्लंघन करते हुए 1948 मे बर्लिन की नाकाबन्दी कर दी जिससे पश्चिम बर्लिन व पश्चिमी जर्मनी के बीच सभी यातायात के रास्ते (सड़क, जल और रेल) बन्द हो गये। पश्चिमी राष्ट्रों ने सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ की उपरोक्त कार्यवाही की शिकायत करते हुए इसे शांति के लिए खतरा बताया।
3. साम्यवादी आन्दोलन
शीत युद्ध की उत्पत्ति के कुछ विचारकों के मत मे सोवियत संघ की 1917 की साम्यवादी क्रांति रही।
4. हित संघर्ष
शीत युद्ध वस्तुतः राष्ट्रीय हितों का संघर्ष था। द्वितीय महायुद्ध के उपरांत अनेक मुद्दों पर सोवियत संघ और अमेरिका के स्वार्थ आपस मे टकराते थे।
5. पश्चिम द्वारा सोवियत विरोधी प्रचार अभियान
युध्दकाल मे ही पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा सोवियत संघ के विरोधी वक्तव्य दिये जा रहे थे। उसकी शासन व्यवस्था को तानाशाही सरकार का लेबल भी दे दिया गया जिससे सोवियत संघ के मन में वैमनस्य बढ़ता गया।
6. शक्ति संघर्ष
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति शक्ति-संघर्ष की राजनीति है। विश्व मे जो भी परम शक्तिशाली राष्ट्र है उनमें प्रधानता के लिए संघर्ष होना अनिवार्य होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ तथा अमेरिका ही दो शक्तिशाली राज्यों के रूप में उदय हुए, अतः इनमें विश्व-प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आपसी संघर्ष होना अनिवार्य था।

1/09/2020

1/09/2020

मानव अधिकार का अर्थ, परिभाषा और रक्षा की आवश्यकता

मानवाधिकार आयोग 

आर्थिक और सामाजिक परिषद् द्वारा 1946 में स्थापित मानवाधिकार आयोग महासभा को मानवाधिकारों से सम्बंधित मुद्दों पर अपने प्रस्ताव, सिफारिशें और जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करता हैं। इस आयोग में 53 सदस्य देश शामिल हैं। इन देशों को 3 बर्ष की अविधि के लिए चुना जाता हैं। इस आयोग की हर साल 6 सप्ताह के लिए जिनेवा में बैठक आयोजित की जाती हैं। आर्थिक और सामाजिक परिषद् ने 1946 में इस आयोग की मदद के लिए एक उप-आयोग गठित किया था जिसका काम अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव को रोकना और उनका संरक्षण करना हैं। 
आज हम इस लेख मे मानव अधिकार का अर्थ, मानव अधिकार की परिभाषा और मानव अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता जानने वाले हैं।

मानव अधिकार का अर्थ 

मानवाधिकार या मानव अधिकार की परिभाषा करना सरल नही है। किन्तु इसे नकारा भी नही जा सकता हैं। मानव समाज में कई स्तर पर कई विभेद पाए जाते हैं। भाषा, रंग मानसिक स्तर, प्रजातीय स्तर आदि, इन स्तरों पर मानव समाज में भेदभाव का बर्ताव किया जाता हैं। " इन सबके बावजूद कुछ अनिवार्यताएँ सब समाजों मे समान हैं। यही अनिवार्यता मानव अधिकार है जो एक व्यक्ति को मानव होने के कारण मिलना चाहिए।
मानवाधिकार क्या हैं
मानवाधिकार 
मानवाधिकार व्यक्ति के वे अधिकार है जिनके बिना मानव अपने व्यक्तितव के पूर्ण विकास के बारे में सोच भी नही सकता, जो कि मानव में मानव होने के फलस्वरूप अन्तर्निहित हैं। मानवाधिकार वे अधिकार हैं, जो एक मानव होने के नाते निश्चित रूप से मिलने चाहिए। मानवाधिकार की विभिन्न विद्वानों द्धारा निम्नलिखित परिभाषा इस प्रकार हैं---

मानवाधिकार की परिभाषा 

आर. जे. विसेट के अनुसार "मानव अधिकार वे अधिकार है जो प्रत्येक व्यक्ति को मानव होने के कारण प्राप्त हैं। इन अधिकारों का आधार मानव स्वभाव में निहित है।"
डेविड. सेलबाई के अनुसार "मानव अधिकार संसार के समस्त व्यक्ति को प्राप्त है, क्योंकि यह स्वयं मे मानवीय हैं, वे पैदा नही किये जा सकते, खरीद या संविदावादी प्रक्रियाओं से मुक्त होते है।"
ए. ए. सईद के अनुसार " मानव अधिकारों का सम्बन्ध व्यक्ति की गरिमा से है एवं आत्म-सम्मान भाव जो व्यक्तिगत पहचान को रेखांकित करता है तथा मानव समाज को आगे बढ़ाता हैं।
मानवाधिकारों की रक्षा की आवश्यकता 
मानवाधिकार प्रकृति द्वारा प्रदत्त अधिकार है, इसलिए समय तथा परिस्तिथियों मे परिवर्तन में होने पर भी अधिकारों के स्वरूप में विशेष परिवर्तन नही होता हैं। मानवाधिकारों को स्वाभाविक अधिकार भी कहा जाता हैं। अर्थात् कुछ अधिकार मानवीय स्वभाव का अंग बन जाते हैं। अधिकारों से व्यक्ति को स्वतंत्रता की गारंटी मिलती हैं, शोषण और अत्याचारों से मुक्ति मिलती है तथा समाज मे ऐसे वातावरण का जन्म होता है जिस वातावरण मे व्यक्तित्व विकास के समुचित अवसर सभी को प्राप्त होते हैं।
अधिकारों के बिना सभ्य समाज की कल्पना हम नही कर सकते। निम्न मुद्दों के द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा की आवश्यकता अधिक स्पष्ट की जा सकती-----

मानवाधिकारों की रक्षा की आवश्यकता 

1. मानवाधिकारों की रक्षा राज्य का दायित्व है, इसलियें नियंत्रण संस्था के रूप मे राज्य का कर्तव्य होगा कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करे। 
2. व्यक्ति के भौतिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक विकास के लिये अधिकार आवश्यक होते हैं। अधिकारों के बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व गुणों का विकास नही कर सकता। 
3. प्राकृतिक अधिकारों से मानवाधिकारों की व्यवस्था उत्पन्न हुई है, इसलिये मानवाधिकार नैतिकता पर आधारित है। उनका उल्लंघन प्रकृति और समस्त मनुष्य जाति के विरूद्ध किया गया अपराध माना जाता है। इस अपराध से बचने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा करना सभी का कर्तव्य हैं। 
4. मानवाधिकार शासक वर्ग की सत्ता पर नियंत्रण रखते हैं। फलस्वरूप शासक वर्ग मनमाने तरीके से शासन नही कर सकता। 
5. मानव हितों के लिये मानवाधिकारों  की रक्षा करना जरूरी है।
6. मानवाधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी नियंत्रण रखते हैं। फलस्वरूप व्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक एवं सामाजिक सत्ता के बीच उचित सन्तुलन बनाये रखना तथा स्वेच्छारिता, अन्याय-अत्याचार और अराजकता पर नियंत्रण रखना सम्भव होता है। 
7. मानवाधिकारों से बहुसंख्यक वर्ग की तानाशाही पर रोक लगाना और अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की रक्षा करना सम्भव होता हैं। 
8. मानवाधिकार व्यक्ति-हितों का समाज हितों के स्थान उचित तालमेल करते हैं इसलिए विषमता पर आधारित समाज में मानवाधिकार महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
9. अन्य प्राणियों से मनुष्य प्राणी की अलग पहचान और श्रेष्ठता बनाये रखने के लिये मानवाधिकार और उनकी रक्षा जरूरी है। 
10. मानवाधिकार समानता के सिद्धांत पर आधारित होते है, इसलिये मनुष्य द्वारा निर्मित विशेषाधिकार, भेदभाव तथा असमानता समाप्त करना और समानता पर आधारित समाज की रचना करना मानवाधिकारों का मुख्य कार्य है, अतः उनकी रक्षा करना आवश्यक हैं।
11. मानवाधिकारों का महत्व स्वयंसिद्ध है। राजनीतिक प्रेरणा और आर्थिक सुरक्षा के लिये उनका उपयोग किया जा सकता है।
12. समाज व्यवस्था के मूल्य तथा उनकी प्राथमिकता निर्धारित करते समय अन्य लोगों के अधिकारों को हानि नही हो इस हेतु मानवाधिकार बाधक प्रभाव का काम करते हैं।
हम उम्मीद करते हैं कि आपको मानवाधिकार का अर्थ, परिभाषा और मानव अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता क्यों जरूरी है समझने में कोई परेशानी नही आई होगी। अगर इस लेख से सम्बंधित आपका कोई सवाल हैं तो नीचे comment कर जरूर बताएं।