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11/09/2019

11/09/2019

संस्कृतिकरण का अर्थ और विशेषताएं

संस्कृतिकरण की अवधारणा का प्रतिपादन प्रोफेसर एम.एन. श्री निवास ने किया है। इस अवराधारणा के माध्यम से उन्होंने भारतीय संरचना एवं संस्तरण मे होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया हैं। परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो निरन्तर गतिशील रहती है। 

संस्कृतिकरण का अर्थ (sanskritikaran ka arth)

संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई अन्य जनजाति अथवा समूह किसी उच्च और द्विज जाति की दिशा अपने रीति-रिवाज कर्मकांड विचारधारा और जीवन पद्धति को बदल लेते हैं।
संस्कृतिकरण का अर्थ
श्रीनिवास ने लिखा है कि " संस्कृतिकरण का अर्थ सिर्फ नवीन प्रथाओं व आदतों को ग्रहण करना ही नही वरन पवित्र तथा लौकिक जीवन से संबंधित नये विचारों एवं मूल्यों को भी प्रकट करना है जिनका वितरण संस्कृत के विशाल साहित्य मे बहुधा देखने को मिलता है। कर्म, धर्म पाप, पुण्य, संसार, मोक्ष आदि संस्कृत के कुछ अत्यन्त लोकप्रिय आध्यात्मिक विचार हैं। 
श्री निवास से स्पष्ट किया है कि उच्च जाति का अनुसरण करके निम्न जाति अपने सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयत्य करती है और इसी को संस्कृतिकरण कहा जाता हैं।

संस्कृतिकरण की विशेषताएं (sanskritikaran ki visheshta)

1. प्रक्रिया का होना
संस्कृतिकरण की पहली विशेषता यह है कि संस्कृतिकरण एक प्रक्रिया है और धारणा गतिशील रहती हैं।
2. उच्च जातियों का अनुकरण
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मे निम्न हिन्दू जाति व अन्य समूह या जनजाति उच्च जाति के प्रभाव की दशा मे अपने रीति-रिवाज, कर्मकांड और विचारधाराओं मे परिवर्तन लाते हैं।
3. परिवर्तन
संस्कृतिकरण का सम्बन्ध परिवर्तन से होता है क्योंकि बिना परिवर्तन के संस्कृतिकरण नही हो सकता।
4. सार्वभौमिक प्रक्रिया
संस्कृतिकरण सार्वभौमिक प्रक्रिया है यह प्रक्रिया सभी जगह अर्थात् विशव के सभी समाजों मे पाई जाती हैं।
5. सामाजिक जीवन के अनुकूलन 
संस्कृतिकरण को सामाजिक जीवन को अनुकूल करने वाली कला कहा जा सकता है। क्योंकि संस्कृतिकरण की इस प्रक्रिया मे निम्न जाति अपने सामाजिक जीवन को उच्च जाति के अनुरूप बनाने का प्रयत्य करती है जिसका यह अनुसरण करती हैं।
6. हिन्दू जाति तक सीमित नही
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया हिन्दू जाति तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जनजाति और अर्द्ध-जनजाति मे गतिशील होती हैं।
7. तटस्थ अवधारणा
संस्कृतिकरण मे अच्छाई अथवा बुराई  का कोई तत्व निहित नही होता क्योंकि हम किसी भी जाति के अनुकरण करने को यह नही कह सकते की वह उन्नत करने का प्रयास अच्छा है या बुरा है। संस्कृतिकरण एक तटस्थ अवधारणा हैं।

11/08/2019

11/08/2019

प्रकार्य का अर्थ और परिभाषा

प्रकार्य का अर्थ (prakary ka arth)

समाजिक इकाइयों के वे कार्य जिनके द्वारा सामाजिक व्यवस्था और सन्तुलन या समाज मे संगठन बनाए रखने में जो अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करतें है उसे प्रकार्य कहा जाता है।
हमारा समाज सामाजिक सम्बन्धों से बनी एक अत्यन्त ही जटिल व्यवस्था है। इस व्यवस्था मे प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित पद या स्थान होता हैं और प्रत्येक व्यक्ति से यह आशा की जाती है की वह अपने पूर्व-निश्चित स्थान पर रहते हुए पूर्व-निर्धारित कार्यो को करता रहें।
प्रकार्य का अर्थ
जब समाज के सदस्य अपनी स्थिति के अनुरूप समाज के सदस्यों के कार्यों का सम्पादन करते है तो समाज मे सन्तुलन देखने को मिलता हैं। सामाजिक संरचना मे प्रत्येक इकाई की एक निश्चित स्थिति होती है और उसी के अनुसार भूमिका निर्धारित होती हैं। इकाइयों के द्वारा संपादित ऐसी भूमिकाएं जिनसे संरचना मे संतुलन आता है प्रकार्य कहलाती हैं। प्रकार्य का सम्बन्ध सामाजिक संरचना से होता है। प्रकार्य के अर्थ को और अच्छी तरह से जानने के लिए हम विभिन्न विद्वानों द्धारा दी गई प्रकार्य पर परिभाषाओं को जानेंगे।

प्रकार्य की परिभाषा (prakary ki paribhasha)

हेरी एम. जानसन के अनुसार " कोई भी आंशिक संरचना उपसमूह का एक प्रारूप भूमिका सामाजिक मानदण्ड या सांस्कृतिक मूल्य का वह योगदान है जिसे वह सामाजिक व्यवस्था के एक अथवा अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देता है, उसे प्रकार्य कहा जाता हैं।
प्रकार्य की परिभाषा
एल.ए. कोजर के अनुसार " प्रकार्य किसी सामाजिक क्रिया का परिणाम है जो किसी संरचना तथा उसके निर्माणक अंगो के अनुकूलन और सामंजस्य मे सहायक होता है।
मैलिनोवस्की के अनुसार
" प्रकार्य का अभिप्राय हमेशा किसी आवश्यकता को सन्तुष्ट करना है, इसमें भोजन करने की सरल क्रिया से लेकर संस्कारों को सम्पन्न करने तक की सभी जटिल क्रियाएं शामिल हैं।
मर्टन के अनुसार
"प्रकार्य वे अवलोकित परिणाम है जो की सामाजिक व्यवस्था के अनुकूलन या सामंजस्य को बढ़ातें है।"
दुर्खीम के अनुसार " किसी सामाजिक तथ्य का प्रकार्य सदैव किसी सामाजिक उद्देश्य के साथ उसके सम्बन्ध में खोजना चाहिए।"
जाॅनसन के अनुसार " किसी भी आंशिक संरचना जैसे एक उप समूह भूमिका सामाजिक सामान्यक अथवा सांस्कृतिक मूल्य या उप व्यवस्था की एक या अधिक सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति मे योग देने वाला कार्य प्रकार्य कहलाता हैं।

11/07/2019

11/07/2019

अहिंसा पर गांधी जी के विचार

महात्मा गाँधी जी का व्यक्तित्व बहुमुखी था और उनके विचारों का केन्द्रीय बिन्दु " सत्य और अहिंसा रहा हैं। महात्मा  गाँधी जी अहिंसा को एक व्यापक वस्तु मानते थे। उनका मानना था की अहिंसा व्यक्तिगत लाभ के बजाय समस्त विश्व को लाभ पहुंचाती हैं। आज हम इस लेख मे महात्मा गाँधी के अहिंसा सम्बन्धि विचारों को जानेंगे। गाँधी जी एक ऐसे सामाजिक विचारक थे जिन्होंने भारतीय आदर्शों और मूल्यों की आधुनिक परिप्रेक्ष्य मे विवेचना की और यह सिध्द कर दिया कि वे भारतीय आदर्श और मूल्यों समाज के सशक्त विवेचना करने मे समर्थ हैं।

अहिंसा पर गांधी जी के विचार

गाँधी जी कहते है की "अहिंसा कायर का कवच नही हैं अपितु यह बहादुरी का उच्चतम गुण है।" गाँधी जी का मानना था कि जो व्यक्ति हिंसा की राह पर चलते है वे विनाश की ओर बढ़ते है और जो अहिंसा के पथ पर चलते है वे परम सत्य की प्राप्ति करते है तथा दूसरो को भी सत्य से परिचित कर बातें हैं। गाँधी जी कहते है की लालची और कायर व्यक्ति कभी भी अहिंसा का पुजारी नही हो सकता।
निभर्भीकता के बिना सच्ची अहिंसा प्राप्त करना असंभव है। अहिंसा शूरवीरों का आभूषण है एक शुरवीर ही अहिंसा का पुजारी हो सकता है। जो मनुष्य सशक्त होकर भी बल का प्रयोग न करे दण्ड देने की शक्ति होने पर भी क्षमा कर दे वही अहिंसा का उपासक है।
अहिंसा का अर्थ
अहिंसा का सामान्य अर्थ हैं "किसी की हिंसा न करना, किसी भी प्राणी को मानसिक या शारीरिक चोट न पहुंचाना, मार-पीट न करना आदि।"
गांधी जी के अहिंसा पर विचार
गाँधी जी का मानना था कि "अहिंसा प्रेम का पर्यायवाची है।"  गाँधी जी का कहना था की सभी व्यक्तियों और जीवधारियों के साथ प्रेम का व्यवहार किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी का विश्वास था कि प्रेम मे वह शक्ति है जिसकी मदद से असंभव को भी संभव किया जा सकता हैं।
गाँधी जी ने कहा है " अहिंसा का अर्थ  प्रेम का समुद्र और बैर भाव का त्याग है। अहिंसा मे सफल होने के लिए लगन का आवश्यक है यदि लगन नही होगी तो व्यक्ति मे अहिंसा के लिए उत्कंठा और उतावलापन नही होगा। इसलिए हमेशा व्यक्ति को साहस, लगन और धैर्य के साथ अहिंसा के सिध्दान्तों का पालन करना चाहिए। अहिंसा मे दिनता, भीरूता बिल्कुल न हो और डरकर भागना भी नही होना चाहिए। अहिंसा मे दृढ़ता, वीरता, तथा निश्चलता होनी चाहिए।
हमारे जीवन मे कभी-कभो कुछ ऐसी परिस्थितियां भी बन जाती है जिनमें बाध्य होकर कुछ न कुछ हिंसा करनी ही पड़ती है। इसलिए गाँधी जी कहते है कि "जिस प्रकार अपने रोगी के शरीर पर रोगी की भलाई के लिए चाकू चलाना चिकित्सक ( डाॅक्टर ) के लिए हिंसा का कार्य नही बल्कि विशुद्ध रूप से अहिंसा का पालन है, उसी प्रकार किन्हीं अनिवार्य परिस्थिति मे एक व्यकि को उससे भी आगे बढ़ने की और पीड़ित के कष्ट निवारण हेतु उसे मार डालने तक की जरूरत हो सकती हैं। उदाहरण के दौर पर किसी ऐसा व्यक्ति को ले लिजिए जिसे को भयानक रोग है और वह हर पल तड़प रहा है और उसे ठीक करने का कोई इलाज नही है वहा पर यह बात लागू होती है।

अहिंसा के स्वरूप 

1. नकारात्मक अहिंसा
किसी भी प्रकार से किसी भी जीवधारी को कष्ट न पहुंचाना नकारात्मक अहिंसा हैं।
2. सकारात्मक अहिंसा
सभी से प्रेम करना सकारात्मक अहिंसा हैं।
3. कायरो की अहिंसा
जब कोई व्यक्ति किसी के डर से अत्याचारों को बर्दाश्त करता है तो उसे कायरो की अहिंसा कहा जाता हैं।
4. दुर्बलों की अहिंसा
नीति के अनुसार कार्य करना दुर्बलों की अहिंसा हैं।
5. वीरों की अहिंसा
शक्तिशाली होते हुए भी अपनी शक्ति का प्रयोग न करना दण्ड के अधिकारी होते हुए भी क्षमा कर देना वीरों की अहिंसा के अन्तर्गत आता है।

11/06/2019

11/06/2019

कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त

कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त 

कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिध्दान्त को समाजशास्त्र मे सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैं। मार्क्स ने समाज मे पाये जाने वाले वर्ग-भेद को अपनी विवेचना का प्रमुख आधार माना हैं। मार्क्स ने लिखा है कि आदिम साम्यवादी युग में किसी प्रकार के वर्ग नही थे। सभी व्यक्ति समान आकांक्षाओं और आवश्यकताओं से प्रेरित थे। इन आकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति समान कार्यों का सम्पादन करते थे। इसके बाद दासत्व, सामन्त और पूँजीवादी युगों मे निरन्तर वर्ग बने रहे और इन वर्गों मे स्वार्थ भेद के कारण निरन्तर संघर्ष होते रहें।
कार्ल मार्क्स
मार्क्स ने लिखा है कि सम्पूर्ण समाज अधिकाधिक दो महान समूहों मे विभाजित हो रहा है, एक-दूसरे का प्रत्यविरोधी करते हुए, बुर्जूआ और सर्वहार दो महान वर्गो में हैं।

वर्ग संघर्ष का जन्म 

कार्ल मार्क्स का कहना था कि समाज में दो वर्ग हमेशा से ही रहे हैं और दोनों मे से एक वर्ग शोषक और दूसरा शोषित वर्ग रहा हैं। दासत्व युग मे एक वर्ग दास बनकर और दूसरा वर्ग स्वामी बनकर इस प्रकार सान्तवादी युग मे सामन्त वर्ग और दूसरा कृषकों का वर्ग। आधुनिक युग पूंजीवादी और श्रमिक वर्ग हैं। पूंजीवादी श्रमिकों का शोषण करते हैं। कार्ल मार्क्स कहता कहता है की प्रत्येक युग मे एक वर्ग शक्तिशाली और दूसरा वर्ग शोषित व निर्बल रहा है। पूंजीवादी मजदूरों के श्रम को कम मूल्य मे खरीद लेते है और उनके श्रम से कम मूल्य पर अधिक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इस प्रकार शोषित वर्ग के अत्याचारों से परेशान होकर शोषित वर्ग मे असन्तोष फैल जाता है और वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। 
 कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि पूँजीपति और सर्वहार वर्ग के बीच संघर्ष होगा तो इस संघर्ष मे सर्वहार वर्ग की विजय सुनिश्चित होगी। जब पूँजीपति श्रमिकों के शोषण मे व्यस्त हो जाते है तो श्रमिक वर्ग को विवश होकर क्रांति और संघर्ष का सहारा लेना पड़ता हैं। उसने यह भी लिखा है कि अगर पूँजीपतियों के हाथ से सत्ता को छीनना है तो इसके लिए श्रमिक वर्ग को सशस्त्र खूनी क्रांति करना अनिवार्य होगा। 

वर्ग संघर्ष के कारण 

जब पूँजीपति अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाता है तो इसमे आन्तरिक असंगतियां उत्पन्न हो जाती है। आन्तरिक असंगतियों के परिणामस्वरूप पूंजीवादी मजदूरों की उपेक्षा करके अधिक से अधिक धन कमाने में लिप्त हो जाते है। वर्ग संघर्ष का मुख्य कारण मार्क्स ने पूँजीपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण किया जाना माना है। पूँजीपति श्रमिकों से कड़ी मेहनत कर बाते है और उन्हे उसका उचित मूल्य नही देते। पूंजीवादी श्रमिकों के श्रम को कम मूल्य मे खरीद कर वस्तु का अधिक उत्पादन कर उन्हे अधिक दाम मे बेचते है और उसका मुनाफा अपनी जेब मे ही रखते है और श्रमिकों को केवल वे मजदूरी मात्र ही देते है। यही वर्ग संघर्ष का कारण है।
मार्क्स के मतानुसार राज्य, व्यक्ति की प्रगति मे सबसे बड़ी बाधा है। किसी भी समाज मे जब तक राज्य और वर्गों का अस्तित्व रहेगा वह समाज कभी भी प्रगति नही कर सकेगा वहां रहने वाली जनता को कभी भी न्याय और संरक्षण नही नहीं मिलेगा। जब किसी भी समाज में एक वर्ग का जन्म होता है तो उसी समाज मे उस वर्ग का प्रतिद्वंदी दूसरा वर्ग भी जन्म लेता हैं।

10/31/2019

10/31/2019

अगस्त काॅम्टे का तीन स्तरों का नियम

तीन स्तरों का नियम सामाजिक विचारधारा के क्षेत्र में ऑगस्त काॅम्टे का एक महत्वपूर्ण योगदान हैं। ऑगस्त काॅम्टे एक सामाजिक विज्ञान की स्थापना करना चाहता था। इस लेख मे हम ऑगस्त काॅम्टे के तीन स्तरों के नियम व्याख्या करेंगे।

अगस्त काॅम्टे का तीन स्तरों का नियम 

तीन स्तरों के नियम के सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए ऑगस्त काॅम्टे ने लिखा है कि "हमारी प्रत्येक अवधारणाएं" हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक तीन विभिन्न सैध्दान्तिक दशाओं से होकर जाती हैं-
1. आध्यात्मिक अथवा काल्पनिक
2. तात्विक अथवा गुणात्मक
3. वैज्ञानिक या सकारात्मक
इस प्रकार ऑगस्त काॅम्टे ने मानव मस्तिष्क और सामाजिक संगठन के विकास को तीन अवस्थाओं से होकर गुजार हैं। तीन स्तरों का नियम मानव के सामाजिक चिन्तन की अथवा सोच-विचार की तीन अवस्थाएं हैं।
तीन स्तरो का नियम

ऑगस्त काॅम्टे के अनुसार तीन स्तर का नियम 

1. धार्मिक अवस्था
इसे मानव चिन्तन की प्रारम्भिक अवस्था माना गया हैं। यह मानव चिन्तन की वह अवस्था है, जिसमे मानव की बुद्धि का बहुत ही कम विकास होता हैं। इस स्तर पर जो भी घटित होता है जैसे बाढ़, बर्षा, सर्दी-गर्मी, भूकंप, तुफान, दिन-रात का होना, कोई बिमारी, स्नेह-प्रेम का होना आदि। इसका कारण मानव दैवी शक्ति या अलौकिक तत्वों को मानता है। काॅम्टे ने लिखा हैं", धार्मिक अवस्था सृष्टि की अनिवार्य प्रकृति की समस्त घटनाओं के आदि और अन्तिम कारणों संक्षेप मे सम्पूर्ण ज्ञान की खोज करने मे मानव मस्तिष्क यह मान लेता है कि समस्त घटनाचक्र अलौकिक प्राणियों की तात्कालिक क्रिताओं का परिणाम होता हैं।
हम कह सकते है की धार्मिक अवस्था  मे मानव प्रेत्यक घटना के पिछे किसी अलौकिक या दैवीय शक्ति के होने की ही बात सोचता है। काॅम्टे के अनुसार इस धार्मिक अवस्था की तीन उप-अवस्थाएं होती हैं --
(a) प्रेतवाद
इस अवस्था मे मानव के विचार रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास मे जकड़े हुए होते है। आदिम समाजो मे धर्म की उत्पत्ति के सम्बन्ध माना गया सिध्दान्त का अत्यधिक महत्व है। इस अवस्था मे मानव आत्मा और प्रेतआत्मा मे विश्वास करता है वह जादू-टोना जैसी आदि चीजों को मानता हैं।
(b) बहुदेवतावाद
इस विकास की प्रक्रिया मे जब मानव का मस्तिष्क कुछ और विकसित होने लगता है तो उसने अपने आप को प्रेतो से घिरा हुआ पाया और वह धार्मिक शक्तियों से घबरा कर इससे छुटकारा पाने का उपाय ढूंढने लगा। इस अवस्था मे मानव का चिन्तन संदेह एवं भय से परिपूर्ण होने लगता हैं इसे मे वह देवताओं की पूजा श्रध्दावश नही अपितु भयवश करता है।
यह भी पढ़े;  ऑगस्त काॅम्टे का जीवन परिचय
(c) एकेश्वरवाद
धार्मिक अवस्था के विकास की तीसरी और अन्तिम इस अवस्था को काॅम्टे एकेश्वरवाद का नाम देते हैं। इस अवस्था मे मानव का चिन्तन मानव के विचार केन्द्रीत होने लगते हैं। इस अवस्था मे मानव सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माता एवं संहारक एक ही ईश्वर को मानने लगता हैं।
2. तात्विक अवस्था 
इसे सामाजिक विकास की भावनात्मक या अमूर्त अवस्था के नाम से भी जाना जाता हैं। यह धार्मिक एवं प्रत्यक्षवाद के मध्य की अवस्था होती हैं। इसे हम प्रथम अवस्था का संशोधन भी कह सकते हैं। इस अवस्था मे मनुष्य का मस्तिष्क विकसित हो जाता है साथ ही उसमे तर्क-शक्ति का भी विकास होने लगता है। इस स्तर पर उसके मन मे अनेक सवाल उठने लगते है जैसे" ईश्वर कैसा दिखता है? वह कहाँ है? क्यों है? ये शंकाए उसके विचारों मे उठने लगती हैं। इस स्तर पर मानव रूढ़िवादिता एवं अन्धविश्वास से दूर हटने लगता हैं। काॅम्टे के अनुसार" मस्तिष्क यह मान लेता है कि अलौकिक शक्तियों की अपेक्षा अमूर्त शक्तियों यथार्थ सत्ता सभी जवों में अन्तर्निहित और समस्त घटनाचक्र को उत्पन्न करने की शक्ति रखता हैं।"
3. प्रत्यक्षत्मक अवस्था या वैज्ञानिक 
काॅम्टे ने चिन्तन की तीसरी और अन्तिम इस अवस्था को प्रत्यक्षात्मक या विज्ञानिक अवस्था का नाम दिया है हम जिस वस्तु को जो जिस रूप मे है उसी रूप मे देखते है उसे वैज्ञानिक चिन्तन कह जाता हैं। इस अवस्था या वैज्ञानिक के नाम मे सिर्फ उन्ही तथ्यों को स्वीकार किया जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते है। इस स्तर पर मानव का मस्तिष्क पूर्णतया विकसित हो जाता है इस अवस्था मे मनुष्य भौतिक घटनाओं  को बुध्दि की सहायता से सोचने का प्रयास करता हैं। काॅम्टे के अनुसार "अन्तिम प्रत्यक्षात्म अवस्था मे मानव का मस्तिष्क निरपेक्ष धारणाओं विश्व की उत्पत्ति एवं लक्ष्य तथा घटनाओं के कारणों की व्यर्थ खोज का त्याग कर देता हैं तथा उनके नियमों अर्थात् अनुक्रम तथा समरूपता के स्थिर सम्बन्धों के अध्ययन मे लग जाते है।
प्रत्यत्मक अवस्था मे मस्तिष्क दैवीय धारणाओं, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उद्देश्य घटनाओं के कारणो की खोज आदि व्यर्थ बातों की खोज को छोड़ देता है और इन घटनाओं के अनुक्रम और समानताओं के निश्चित सम्बन्धों मे लग जाता हैं।

10/27/2019

10/27/2019

ऑगस्त काॅम्टे का जीवन परिचय

फ्रान्स के प्रतिभाशाली अगस्त काॅम्टे को समाजशास्त्र का पिता कहा जाता हैं। ऑगस्त काॅम्टे के पूर्व अनेक ऐसे विचारक हुए थे जिन्होंने समाज सुधार की योजना का स्वप्नलोक देखा था लेकिन उन्होंने ऐसी योजना बनाई थी जो धरती पर कम और आकाश पर अधिक लागू होती है। काॅम्टे ने समाजशास्त्र  को एक व्यवस्थित विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया हैं।
ऑगस्त काॅम्टे  मानसिक दृष्टि से अत्यन्त ही परिश्रम करते थे। उनकी मृत्यु 5 सितम्बर 1857 को हो गई थी लेकिन उनका मानसिक शरीर और उनके विचार आज भी जीवत है और शदियों तक जीवित रहेगी।
ऑगस्त काॅम्टे का फोटो

ऑगस्त काॅम्टे का जीवन परिचय

काॅम्टे का जन्म 19 जनवरी 1798 ई. मे हुआ था। उनक जन्म मौन्टपीलियर नामक स्थान में पर हुआ था। काॅम्टे के माता-पिता कैथोलिक धर्म के कट्टर समर्थक थे। काॅम्टे बचपन से ही विभिन्न विलक्षणताओं से परिपूर्ण थे। काॅम्टे प्राचीन सत्ता और परम्पराओं के विरोधी थे। काॅम्टे के विचार अपने पिता के विचारों से मेल नही खाते थे। काॅम्टे की गणित मे रूचि थी।  उनका अध्ययन योजना के अनुसार होता था  जैसे कब और कितना और कितने समय तक पढ़ना हैं। उनमे बचपन से ही कुशल नेतृत्व की क्षमता थी। वह विधार्थी जीवन मे मेधावी छात्र हुआ करते थे। 1818 ई. मे सन्त साइमन के सम्पर्क में आये थे जिसका उन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।
ऑगस्त काॅम्टे जीवन परिचय
लेकिन वह 6  बर्ष तक ही उनके साथ रहे काॅम्टे ने अपने विचारक साइमन पर यह आरोप लगाया की वह ढ़ोगी और पाखण्डी हैं। काॅम्टे का कहना था की वह उनके विचारो का शोषण कर अपने नाम से स्वंय उनका प्रयोग करता था। इस कारण दोनो के सम्बन्ध आपस मे समाप्त हो गए। काॅम्टे का विवाह 1825 मे कोरोलिन मेसिन से हुआ लेकिन दोनो के मध्य गहन मत-भेद होने के कारण 17 बर्ष बाद सन् 1842 मे विवाह-विच्छेद भी हो गया। ऑगस्त काॅम्टे के आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नही थी उनके पास आजीविका का कोई भी साधन नही था। काॅम्टे के जीवन मे ऐसे भी अनेक दिन आए जब उन्हे भोजन तक नही मिला। वह अपनी परेशानियों के चलते अपना मानसिक सन्तुलन तक खो बैठे थे। जिसके चलते उन्हें एक बार पानी में डूबकर आत्हत्या करने का तक प्रयास किया था। आगे चलकर सन् 1830 मे उनकी पुस्तक 'पाॅजिटिव फिलासफी' का पहला भाग प्रकाशिक हुआ इस पुस्तक मे छः भाग है जिसका अन्तिम भाग 1942 मे प्रकाशिक किया गया था। इस पुस्तक के प्रकाशित होने से उनकी ख्याति चारो ओर फैलने लगी। इस पुस्तक  के कारण उन्हे पालिटेक्निक स्कूल मे विधार्थियों के निरीक्षण का पद प्राप्त हो गया था। इस प्रकार अब उनकी आर्थिक स्थित मे थोड़ा  सुधार आ गया था। काॅम्टे अपनी पुस्तकों की राॅयल्टी नही लिया करते थे उनका मामना था कि लेखन के बदले पैसा लेना उचित नही हैं।
काॅम्टे जितने अच्छे और महान दार्शनिक थे उतने ही वह भावुक भी थें। काॅम्टे  ने जीवन भर संघर्ष किया और आर्थिक कठिनाइयों से हमेशा जूझते रहें। उनके अपने विवाहिक जीवन मे कोई भी सुख नही मिला। वह हमेशा आर्थिक तंगी से भी जूझते रहे वह निन्तर साम्यवाद और परम्परात्मक धर्म का विरोध भी करते रहें। उनका पूरा जीवन दुःखो और यातनाओं से भरा हुआ बिता अन्त मे उन्हे कैंसर ने भी घेर लिया जिसके कारण केवल 59 वर्ष की आयु मे ही 1857 को उनकी मृत्यु हो गई।

10/24/2019

10/24/2019

सामाजिक संगठन का अर्थ और परिभाषा

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का समाजशास्त्र में सामाजिक संगठन की बात सर्वप्रथम ऑगस्ट काम्टे ने की थी। उन्होंने समाज में संगठन का आधार एक मत को माना। आज के इस लेख में हम सामाजिक संगठन के अर्थ और परिभाषा के बारें चर्चा करेंगे।
सामाजिक संगठन का अर्थ

सामाजिक संगठन का अर्थ

समाज का निर्माण करने वाली विभिन्न इकाइयों में पाये जाने वाले प्रकार्यात्मक सम्बन्ध के आधार पर होता है। समाज में इन इकाइयों की अपनी एक निश्चित स्थिति होती है। इनकी स्थिति के अनुसार ही कार्यों को निर्धारित किया जाता है। जब ये इकाइयां अपने निर्धारित कार्यों के अनुसार क्रियाशील रहती हैं तो समाज में संगठन दिखायी देता है और इसी को सामाजिक संगठन कहा जाता है।
सामाजिक संगठन व्यक्तियों का ऐसा संग्रह है जिनके सम्मिलित उद्देश्य होते है। सदस्यों के बीच कार्य का बँटवारा होता है, संगठन के कुछ निश्चित नियम होते हैं जिनके आधार पर व्यक्ति पर व्यक्ति अपनी भूमिका का निर्वाह करते है।
समाज का निर्माण करने वाली अनेक इकाइयां होती हैं। उनके निश्चित पद तथा कार्य होते हैं। ये इकाइयां अपने निश्चित पदों के अनुसार कार्य करती है। यदि ये इकाइयां अपने निश्चित पदों के अनुसार कार्य करती रहती है तो समाज मे व्यवस्था बनी रहती है।

सामाजिक संगठन की परिभाषा

रेडक्लफ ब्राउन के अनुसार परिभाषा; दो या दो से अधिक व्यक्तियों की क्रिया की वह व्यवस्था सामाजिक संगठन कहलाती है जिसमें सामूहिक क्रियाएं संभव होती है।
ऑगबर्न तथा निमकाॅफ के अनुसार परिभाषा; "एक संगठन विभिन्न कार्यों को करने वाले विभिन्न अंगों की एक सक्रिय सम्बध्दता है।
आर. एच. लोवी के अनुसार परिभाषा; "समाज में व्यक्तियों और गतिविधियों का सुसंगत संग्रह ही सामाजिक संगठन है।
जोंस के अनुसार; " सामाजिक संगठन वह व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज के विभिन्न अंग परस्पर और संपूर्ण समाज में एक अर्थ पूर्ण तरीके से जुड़े होते है।
तो दोस्तो इस लेख मे हमने जाना सामाजिक संगठन क्या है? सामाजिक संगठन या इस लेख से सम्बन्धित आपका किसी भी प्रकार का कोई विचार है तो नीचे comment कर जरूर बताए।