11/11/2020

जातिवाद के कारण, दुष्परिणाम

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जातिवाद के विकास के कारण (jativad ke karan)

जातिवाद के कारण इस प्रकार है--

1. विवाह संबंधी प्रतिबंध 

जाति अन्तर्विवाही समूह है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जाति समूह मे से ही जीवन साथी का चुनाव करना पड़ता है। इस कारण व्यक्ति अपने जाति सदस्यों को आगे बढ़ाने के अवसर प्रदान करता है, ताकि वे नौकरी तथा अन्य सुविधायें प्राप्त कर सकें।

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2. खान-पान पर प्रतिबंध 

प्रत्येक जाति अपने सदस्यों पर दूसरी जाति के सदस्यों के साथ सामाजिक सहवास तथा खानपान सम्बन्धी प्रतिबंध लागू करती है। इससे व्यक्ति के सुख-दुख मे केवल उसके जाति के सदस्य ही उसके साथ होते है।

3. सामान्य रीति-रिवाज, पूर्वज या व्यवसाय 

जाति का हर सदस्य जाति के दूसरे सदस्यों के साथ इसलिए जुड़ा हुआ है कि उनके रीति-रिवाज एक जैसे है, धार्मिक विचार एक जैसे है, पूर्वज एक थे या व्यवसाय एक है। इन सबसे भी जाति के प्रति वफादारी की भावना पैदा होती है।

4. जजमानी व्यवस्था का विघटन 

जजमानी व्यवस्था के कारण विभिन्न जातियों के बीच आपसी सम्बन्ध स्थापित होते थे। परन्तु इस व्यवस्था के खत्म होने से विभिन्न जातियों के पारस्परिक सम्बन्ध खत्म हुए। इससे जातिवाद के विचारों को प्रोत्साहन मिला।

5. जातीय स्थिति को उच्च करने की इच्छा 

अपनी जाति की स्थिति को उच्च करने की इच्छा के कारण व्यक्ति अपने जाति के सदस्यों को विभिन्न क्षेत्रों मे आगे बढ़ाने का प्रयास करते है, चाहे उनमे योग्यता हो या न हो।

6. वोट की राजनीति 

जातिवाद के विकास मे वोट की राजनीति भी जातिवाद के विकास का एक महत्वपूर्ण कारण है। प्रजातंत्र मे वोट का महत्व है। अतः चुनाव जीतने के लिये जाति का सहारा लिया जा रहा है। जिस क्षेत्र मे जिस जाति की बहुलता है, उस जाति के सदस्य को चुनाव मे टिकट आसानी से मिल जाता है। जातीय भावनाओं को उभारकर जो व्यक्ति चुनाव जीतता है, वह बाद मे अपनी जाति की उन्नति के बारे मे सोचता और कार्य करता है।

7. यातायात एवं प्रचार के साधनों मे वृद्धि 

प्रचार तथा यातायात के साधन भी जातिवाद के विकास का प्रमुख कारण है। पहले सभी व्यक्ति एक दूसरे से बहुत दूर-दूर बसे हुए थे। आवागमन व विचारों के आदान-प्रदान (संचार) के साधन नही थे। इसी कारणवश वे आपस मे संपर्क नही कर पाते थे एवं जातीय भावना से अनभिज्ञ थे लेकिन आवागमन एवं प्रचार के साधनों द्वारा घनिष्ठता तथा संगठन स्थापित हो गए। इसके साथ ही प्रचार के माध्यम से जैसे समाचार-पत्रों तथा अन्य पत्रिकाओं द्वारा जातिवाद को दृढ़ता मिली।

8. जातियों का विभेदीकृत विकास 

पिछ़ड़ी जातियों को स्वतंत्रता के बाद शिक्षा, नौकरी आदि मे प्राथमिकता मिली। इनके लिये शिक्षा और नौकरी मे विभिन्न छूटें भी मिली। इससे कुछ जातियाँ तो अपनी स्थिति उच्च करने मे सफल हुई, लेकिन इसके बाद भी ये जातियाँ विभिन्न क्षेत्रों मे लाभ उठा रही है, जबकि अन्य जातियां अभी भी पिछ़ड़ी हुई है। इस भेदभावपूर्ण नीति के कारण अन्य जातियां भी संगठित हो रही है।

9. जातीय संगठनों का विकास 

जातीय संगठनों का विकास होना जातिवाद का एक प्रमुख कारण है। देश मे जातीय हितों की रक्षा एवं उनकी अभिवृद्धि, जातीय लोगों मे एकता कायम रखने तथा उनकी समस्याओं के समाधान एवं प्रगति को आसान बनाने के उद्देश्य से विशेष रूप से गत सदी के दौरान, देश के क्षेत्रीय, प्रान्तीय व राष्ट्रीय स्तरों पर अनेक जातीय संगठनों का निर्माण हुआ जैसे सर्व-ब्राह्मण परिषद्, क्षत्रिय महासभा, अग्रवाल समाज, माहेश्वरी समाज, कायस्थ सभा आदि।

जातिवाद के प्रभाव या दुष्प्रभाव या दुष्परिणाम 

jaatiwad ke dushparinam;भारतीय समाज पर जातिवाद के दुष्प्रभाव अत्यधिक व्यापक, गंभीर और दूरगामी है। वस्तुतः जातिवाद एक सामाजिक जहर है जिसने भारतीय समाज को इस प्रकार विषाक्त कर दिया है कि उसका इलाज हो पाना कठिन हो गया है। यदि इस जहर को आम जनजीवन से शीघ्र निकाला नही गया तो भारतीय समाज के लिये अपने अस्तित्व को बचा पाना कठिन हो जायेगा। अतीत मे भारतीय समाज की अवनति व पतन के लिये जो भी कारक उत्तरदायी रहे है, उन सभी की संयुक्त भूमिका की तुलना मे अकेले जाति व्यवस्था की भूमिका अधिक उत्तरदायी रही है। आधुनिक युग मे जाति व्यवस्था किन्ही मायनों मे कमजोर हुई है तो किन्ही मायनो मे यह मजबूत भी हुई है। जातिवाद के रूप मे जाति व्यवस्था का जहर सामाजिक जीवन के प्रायः सभी भागों मे फैल गया है और धीरे-धीरे पूरे समाज को बिषाक्त करता जा रहा है। जातिवाद के दुष्प्रभाव या प्रभाव इस प्रकार है--

1. जातिवाद से सामाजिक एकता का कमजोर होना

जातिवाद सामाजिक अलगाव की प्रवृत्ति का परिचायक है। जातिवाद के चलते व्यक्ति की निष्ठा अपनी जाति तक सीमित हो जाती है। वह जातीय हित को सामाजिक हित से श्रेष्ठ समझता है जिसकी वजह से वह उसकी पूर्ति मे जायज या नाजायज ढंग से लगा रहता है। इससे समाज मे सामुदायिक भावना का ह्रास होता है। सामुदायिक भावना के ह्रास से सामाजिक एकता कमजोर होती है। जातिवाद ने सामाजिक एकता के साथ राष्ट्रीय एकता को भी कमजोर किया है।

2. जातिवाद से सामाजिक संगठन को क्षति

जातिवाद के चलते हिन्दू समाज अलग-अलग जाति समूहों मे बँट जाता है। जिसमे हर एक का अपना जीवन ढंग, आदर्श, आराध्य देव व आदर्श पुरुष होता है। 

दूसरें शब्दों मे, हर एक की अपनी उप संस्कृति होती है। परिणामस्वरूप, हिन्दू समाज मे सामूहिक जीवन पद्धति का लोप हो जाता है। अलग-अलग जातियों की जीवन पद्धति मे भिन्नता की वजह से हिन्दू समाज मे आपसी भाईचारे, सहयोग और संगठन का अभाव होता है। फलस्वरूप, हिन्दूओं मे असुरक्षा, अलगाव व एकाकीपन व्याप्त हो जाता है।

3. अयोग्य व्यक्तियों का चयन 

जातिवाद के कारण निर्वाचन के समय व्यक्ति अपनी जाति के अयोग्य व्यक्तियों का निर्वाचन कर डालते है। इससे अयोग्य व्यक्तियों को सरकार मे पहुंचने का अवसर मिलता है तथा प्रशासकीय कार्यों मे बाधा पड़ती है।

4. जातिवाद से भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन 

अयोग्य व्यक्ति जातिवाद के कारण निर्वाचित हो जाते है तथा प्रशासन मे भ्रष्टाचार फैलता है। घूसखोरी, कार्य मे विलंब, अनियमितताएं आदि सभी दुर्बलताएं जातिवाद के आधार पर निर्वाचित अथवा नियुक्त पदाधिकारियों की ही देन है।

5. राष्ट्रीय एकता मे बाधक 

जातिवाद का एक दुष्प्रभाव राष्ट्रीय एकता मे बाधा पड़ना है। जातिवाद के कारण अनेक छोटे-छोटे उपजाति समूह संगठित हो जाते है। इससे व्यक्ति की सामुदायिक भावना अत्यंत संकुचित हो जाती है। यह केवल अपने समूह के हितों के बारे मे और सुख-सुविधाओं के बारे मे ही सोचता है।  यह स्थिति राष्ट्रीय एकता मे बाधक है।

6. गतिशीलता मे बाधक 

जातिवाद के कारण व्यक्ति स्थानीय बंधनों मे जकड़ जाता है। शिक्षा, अधिक धन प्राप्त करने, आदि के लिये बाहर जाना पड़ता है, लेकिन जातिवाद के बंधन उसे ऐसा करने से रोकते है। इस प्रकार गतिशीलता मे जातिवाद बाधक है।

7. योग्य व्यक्तियों मे बेकारी

जातिवाद के कारण अयोग्य व्यक्तियों का निर्वाचन हो जाता है, इससे समाज मे योग्य तथा कुशल व्यक्तियों को आगे बढ़ने का अवसर नही मिलता है। अतः योग्य व्यक्तियों मे बेकारी तथा असंतोष फैलता है।

8. नैतिक पतन 

जातिवाद के कारण व्यक्ति अपनी जाति के सदस्यों को आगे बढ़ाने के लिये हर उचित-अनुचित साधनों का प्रयोग करते है। इससे नैतिक मूल्यों का पतन होता है।

9. राष्ट्रीय विकास मे बाधा 

जातिवाद के कारण समाज विभिन्न भागो मे विभाजित हो जाता है, हर जाती अपनी ही जाति के सदस्यों का भला चाहती है। इससे राष्ट्रीय विकास कार्य मे बाधा पड़ती है।

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