3/29/2022

वृद्ध किसे कहते हैं? वृद्धजनों की समस्याएं, समाधान हेतु सुझाव

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प्रश्न; वृद्ध व्यक्ति कौन हैं? इनकी प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए। 

अथवा" भारत में वृद्धों की समस्याओं पर एक निबंध लिखिए। 
अथवा" वृद्ध किसे कहते हैं? वृद्धजनों की पारिवारिक, आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को समझाइए। 
अथवा" वृद्धों या बुजुर्गों को पारिभाषित कीजिए। वृद्धजनों की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर--

वृद्ध किसे कहते हैं? (vridh vyakati kon hote hai)

जन्म से मृत्यु तक मानव का जीवन शारीरिक विकास की एक प्रक्रिया है। जो कुछ पूर्व निर्धारित चरणों से होकर गुजरता है। ये चरण है: शैशव अवस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवा अवस्था, वयस्क या प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था जिसमे जन्म (या गर्भधारण) से लेकर किशोरावस्था तक की प्रक्रिया तीव्र विकास या निर्माण की प्रक्रिया है। यह विकास, निर्माण एवं संग्रहण का दौर है। युवावस्था मे विकास प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है और प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचते लगभग थम जाती है। युवा अवस्था से प्रौढ़ावस्था तक का दौर जैविक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टियों से उत्पादन, दायित्व निर्वाह या जो कुछ पूर्व मे संचित या संग्रहित किया गया है, उसे लौटाने या खर्च करने का दौर है। वृद्धावस्था जीवन प्रक्रिया का अंतिम चरण है। यह शारीरिक एवं सामाजिक दृष्टि से ह्रास का दौर है जिसमे व्यक्ति न केवल शारीरिक व मानसिक दृष्टि से कमजोर होता जाता है अपितु सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से शक्ति हीन व संदर्भ हीन भी होता जाता है।
किस आयु को वृद्धता की पहचान का आधार माना जाये, यह बहुत कुछ हद तक जीवन की गुणवत्ता व स्वास्थ्य की दशा पर निर्भर करता है। वैसे कई देशों मे 65 वर्ष की आयु के ऊपर के व्यक्ति को वृद्ध कहा जाता है। जहां तक भारत का सवाल है हम इस बात को ध्यान मे रख सकते है कि किस आयु को सरकार सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारित करती है। अर्थात् किस आयु को पूरा करने पर वह कर्मचारी को शारीरिक व मानसिक दृष्टि से सेवा के लिये उपयोगी न मानते हुए उसे सेवानिवृत्त कर उसकी पिछली सेवाओ के उपलक्ष्य मे गुजारे के लिये उसे पेंशन अदा करती है। इस दृष्टि से हम देखते है कि पहले यह आयु 55 वर्ष थी। आगे चलकर इसमे वृद्धि की गई और यह 58 वर्ष हो गई। वर्तमान मे यह आयु 60 वर्ष है। इसलिए वर्तमान मे इसे वृद्धावस्था की पहचान का विश्वसनीय आधार माना जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी मानना है कि 60 वर्ष की आयु से आगे की ओर बढ़ाव जनसंख्या के बुजुर्गियत या वृद्धावस्था की ओर गमन की पहचान है। अतः वृद्ध से यहाँ हमारा आशय उस व्यक्ति से है जिसने 60 बर्ष की आयु पार कर ली है। इस दृष्टि से साठ वर्ष तक की आयु के व्यक्तियों की पहचान नई पीढ़ी और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की पहचान पुरानी पीढ़ी के रूप मे की जा सकती है।

वृद्धों की समस्याएं (vridho ki samasya)

वृद्धों की समस्याएं इस प्रकार से है--

1. शारीरिक दुर्बलता
आयु बढ़ने के साथ व्यक्ति का शरीर शिथिल होने लगता है। इन्द्रियाँ कमजोर होने लगती है। आँखो से दिखना कम हो जाता है। कान से कम सुनाई पड़ने लगता है। दाँत कमजोर हो जाते है। शरीर को शक्ति व गति प्रदान करने वाले प्रमुख संस्थान जैस पाचन संस्थान, रक्त, परिभ्रमण संस्थान, स्वशन संस्थान आदि कमजोर पड़ने लगते है। शरीर मे अनेक बीमारियां जैसे रक्तचाप मे व्यक्तिक्रम, ह्रदय रोग, डायबिटिज, जीर्ण रोग, स्पाण्डलायटिस, जोड़ो का दर्द, गठिया, प्रोस्टेट ग्लैण्ड का बढ़ना, अस्थना आदि आ जाती है। व्यक्ति की कार्यशक्ति घट जाती है।
2. मानसिक रोग
अस्वस्थता, शरीरिक क्षीणता व मानसिक रोग बहुत कुछ साथ-साथ चलते है। शरीर के कमजोर पड़ने के बाद बुढ़ापे की अनुभूति ही व्यक्ति मे मानसिक निराशा का संचार करती है। वृद्ध व्यक्ति शारीरिक रूप से ही नही अपितु मानसिक रूप से भी अपने को बहुत असहाय महसूस करता है। बुढ़ापे की मानसिकता और निरूपायता के अहसास से उसके मन मे हताशा घर करने लगती है जिससे उसमे संवेगात्मक अस्थिरता उत्पन्न होती है। उसकी स्मरण शक्ति कमजोर पड़ने लगती है। शारीरिक कार्यक्षमता घटने और सामाजिक उपयोगिता कम होने के साथ वृद्ध व्यक्ति को अनेक मानसिक चिन्ताएँ घेर लेती है जिससे उसकी नींद कम हो जाती है और वह मानसिक थकावट महसूस करने लगता है। 
3. अकेलेपन की समस्या 
भारत में औद्योगीकरण तथा नगरीकरण में वृद्धि होने के कारण जैसे-जैसे संयुक्त परिवारों की जगह केन्द्रक परिवारों की संख्या में वृद्धि होना आरंभ हुई, परिवार के युवा सदस्य विवाह के बाद अपने माता-पिता के साथ रहना नहीं चाहते।  फलस्वरूप जिस आयु में व्यक्ति को अपने बच्चों से सबसे अधिक सहायता और संरक्षण की आवश्यकता होती हैं, उस आयु में वे स्वयं को अकेला और निराश्रित महसूस करने लगते है। यदि वृद्ध पति और पत्नी में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तो व्यक्ति अपने दुःख-दर्द को किसी दूसरे से बाँटने की स्थिति में ही नही रह जाता। अकेलेपन की यह भावना वृद्धावस्था में मानसिक तनावों का एक प्रमुख कारण हैं। अनेक युवा जो अपने माता-पिता को विदेश ले जाकर उन्हें घरेलू नौकरों से भी बद्तर जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य कर देते हैं, उससे वृद्धजनों के पारिवारिक शोषण का स्वयं ही अनुमान लगाया जा सकता हैं।
4. आर्थिक असुरक्षा की स्थिति
वृद्ध लोगों को प्रया: आर्थिक सुरक्षा संबंधी तनाव का भी सामना करना पड़ता है। पारिवारिक आय कम होने से परिवार के लोग बुजुर्गों को प्रायः भार स्वरूप देखने लगते है।
5. संयुक्त परिवार के अभाव की समस्या
बुजुर्ग जनो को संयुक्त परिवार के अभाव की समस्या का भी सामना करना पड़ता है। संयुक्त परिवार मे वृद्धावस्था, बीमारी आदि के समय सुरक्षा प्रदान की जाती है, वही एकाकी परिवार मे व्यक्ति अपने परिश्रम से प्राप्त फल पर निर्भर रहकर वृद्धावस्था अथवा बीमारी के समय अपनी जीविका चलाता है।
6. उचित देखभाल की समस्या
जिस परिवार मे कई सदस्य होते है, वहां तो बड़े बुजुर्गों की देखभाल ठीक तरह से हो जाती है, लेकिन एकाकी परिवार की स्थिति मे जब घर के सदस्य चले जाते है, तो अक्सर बुजुर्ग लोगों की देखभाल करने वाला कोई नही होता है, इससे उन्हें कभी-कभी बड़ी बाधा का सामना करना पड़ता है।
7. मनोरंजन की समस्या
परम्परागत रूप से परिवार में विभिन्न उत्सवों और समारोहों के आयोजन से वृद्ध सदस्यों को अपने नाते-रिश्तेदारों से मिलने का अवसर मिल जाता था। पड़ोसियों और मित्रों के बीच भी वृद्धों की दिनचर्या सरलता से पूरी हो जाती थी। आज उत्सवों और समारोहों की जगह परिवार में टेलीविजन ही मनोरंजन का एकमात्र साधन रह गया हैं। देखने और सुनने की शक्ति कमजोर हो जाने के कारण वृद्धजन टेलीविजन का भी अपनी इच्छानुसार उपयोग नहीं कर पाते। बच्चों के अध्ययन के नाम पर उनके माता-पिता के द्वारा भी वृद्धजनों के लिए टेलीविजन की सुविधा देना आवश्यक नहीं समझा जाता। इस प्रकार से वृद्धजनों के अकेलेपन में और भी वृद्धि हो जाती हैं।

वृद्धों की समस्या का समाधान या वृद्धावस्था की समस्याओं को सुलझाने के लिये सुझाव

विश्व तथा भारतीय जनांकिकी का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि वृद्धों की जनसंख्या मे निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इससे इस तथ्य से इंकार नही किया जा सकता कि आगे आने वाले दिनों मे जनसंख्या के अनुपात मे वृद्ध अधिक होते जाएँगे। स्वाभाविक तौर पर इनकी समस्याओं मे वृद्धि होगी। इस दृष्टि से यह आवश्यक है कि वृद्धों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास किए जाएँ। वृद्धों की समस्याओं के समाधान हेतु निम्न प्रयास किये जा सकते है--

1. भारत मे संयुक्त परिवार व्यवस्था वृद्धों को सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक सुरक्षा प्रदान करती रही है। अतः इसके विघटन को रोकने के लिये प्रयास किये जाने चाहिये।

2. परम्परागत भारतीय समाज मे सामुदायिक जीवन वृद्धों को उनकी किसी भी समस्या का एहसास नही होने देता था। अतः ऐसे सामुदायिक जीवन को पुनः मजबूत करने के उपाय किये जाने चाहिये।

3. वृद्धों के लिये स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए।

4. वृद्धों की समस्या के समाधान हेतु यह भी बहुत ही जरूरी है की हम वृद्धवस्था को जीवन की अनिवार्यता के रूप मे स्वीकार करे, न कि बोझ के रूप मे।

5. समय समय पर वृद्धों के लिये विशेष आयोजन जैसे-- सामान्य ज्ञान या खेल प्रतियोगितायें और कार्यशालाओं का आयोजन आदि किया जाना चाहिये।

6. सरकार की ओर से वृद्धों के लिये "वृध्द होम" स्थापित करने चाहिए जिनमे समुचित सुविधायें हो। ऐसी संस्थाओं को सरकार की ओर से सहायता दी जानी चाहिये।

7. वृद्धों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के लिये नि:शुल्क व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही वरिष्ठ नागरिकों के लिये बहुत कम प्रीमियम पर स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था शुरू की जानी चाहिए।

8. वृद्धावस्था पेंशन योजना की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।

9. शिक्षित वृद्धों के अनुभवों का लाभ प्रौढ़ शिक्षा जैसी योजनाओं के लिया जाना चाहिए एवं अंशकालीन रोजगार दिये जाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे वृद्धजन व्यस्त रहें।

10. वृद्धों के लिये पारिवारिक माहौल की व्यवस्था की जानी चाहिए। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने वृद्ध सदनों एवं पालनाघरों को मिलाकर एक ही स्थान पर संचालित करने की योजना बनाई है जिससे वृद्धजनों को बच्चों की गतिविधियों का आनन्द मिल सके और वे जीवन रस का सम्पूर्ण आनंद ले सके।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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