11/07/2020

विवाह विच्छेद का अर्थ, कारण, प्रभाव

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विवाह विच्छेद या तलाक का अर्थ 

vivah vichchhed in hindi;कानूनी तौर पर वैवाहिक संबंधों का खत्म हो जाना ही विवाह विच्छेद कहलाता है। इस दृष्टि से विवाह विच्छेद वैवाहिक जीवन के विघटन की अंतिम स्थिति है क्योंकि वैवाहिक तथा परिवारिक जीवन के पूर्णतया असफल होने के पश्चात विवाह विच्छेद की जरूरत पड़ती है। 

हिन्दु समाज मे विवाह विच्छेद 

हिन्दू समाज मे विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता रहा है और यह विश्वास किया जाता रहा है कि विवाह संबंध ईश्वर द्वारा पूर्व निश्चित होता है, इसलिये जीवन मे इस संबंध को तोड़ने का अधिकार व्यक्ति को नही है, किन्तु व्यवहार मे इसका पूरी तरह से पालन शायद ही किसी युग मे किया गया हो? मध्यम व निम्न जातियों मे परित्याग और पुनर्विवाह तो सदा से प्रचलित रहा है, भले ही उच्च जातियों मे इसका प्रचलन कम रहा हो। यद्यपि स्मृतिकारों एवं शास्त्रकारों ने इसे प्रोत्साहित नही किया है तथापि विशेष परिस्थितियों मे इसकी अनुमति अवश्य प्रदान की है अधिकांश ने इस मामले मे पुरूष को स्त्री की तुलना मे अधिक अधिकार प्रदान किये है। कतिपय शास्त्रों ( विशेष रूप से परवर्ती धर्मशास्त्रों ) ने तो पत्नी के जीवित रहते हुए पुरूष को दूसरी शादी करने का अधिकार दिया है, किन्तु पत्नी को भले ही पति द्वारा उसका परित्याग कर दिया गया हो तब भी उसे दूसरे पुरुष से विवाह करने की अनुमति नही दी है। वैसे नारद एवं पाराशर स्मृतियों मे पति के नपुंसक होने, लापता होने, मरने संन्यासी होने या जाति च्युत होने पर पत्नी को दूसरे पुरूष से विवाह करने की अनुमति दी गई है। यद्यपि मनु ने अनेक विषयों मे पुरूष को स्त्री की तुलना मे वरीयता प्रदान की है तथापि उनका माननि है कि पति के नपुंसक, पागल अथवा संक्रामक रोग से पीड़ित होने पर यदि पत्नी उसका परित्याग कर देती है तो उसे दोषी नही ठहराया जाना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार यदि पति पत्नी मे नही बनती है और वे एक दूसरे से शत्रुता व घृणा करते है तो उनके बीच संबंध विच्छेद को मान्य किया जाना चाहिए। 

मुस्लिम समाज मे विवाह विच्छेद या तलाक 

मुस्लिम समाज मे विवाह व्यवस्था संबंधी मान्यताओं के अंतर्गत तलाक अति सरल था। इसमे विशेषरूप से पुरूषों को तलाक के अधिक अवसर उपलब्ध थे। यदि यह कहा जाये कि मुस्लिम समाज मे तलाक के मामले मे स्त्रियों की तुलना मे पुरूषो को बहुत कुछ एकाधिकार था तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। इसके चलते मुस्लिम समाज मे पुरूषो द्वारा स्त्रियों को तलाक देना एक आम बात हो गई थी। मुस्लिम विवाह व्यवस्था सम्बधी इस विसंगति को दूर करने अर्थात् विवाह विच्छेद को नियमित करने के लिये विधान की आवश्यकता महसूस की गई। परिणामस्वरूप मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 अस्तित्व मे आया। 

मुस्लिम समाज मे तलाक दो प्रकार का होता है--

1. मौखिक तलाक

2. लिखित तलाक या तलाकनामा।

विवाह विच्छेद के पक्ष मे तर्क 

1. समानता का अधिकार 

वर्तमान मे स्त्रियों को सभी क्षेत्रों मे समान अधिकार दिये गये है। संविधान भी लिंग के आधार पर भेदभाव का विरोध करता है। अतः विवाह के क्षेत्र मे भी स्त्रियों को पुरुषों के समान विवाह विच्छेद का अधिकार होना चाहिए।

2. स्त्रियों एवं बच्चों की सुरक्षा के लिये 

एकाकी परिवार मे यदि पति दुराचारी होता है तो पत्नी और बच्चों की दुर्दशा होती है। उनका कोई सहारा नही होता है। ऐसी स्थिति मे उनकी रक्षा के लिए विवाह विच्छेद का अधिकार पत्नी को भी होना चाहिये।

3. वैवाहिक समस्याओं के निराकरण हेतु

बाल विवाह, बेमेल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध, दहेज प्रथा आदि प्रचलित समस्याओं के निराकरण हेतु विवाह विच्छेद आवश्यक है।

विवाह विच्छेद के विपक्ष मे तर्क 

1. संस्कृति के विरूद्ध 

विवाह विच्छेद हमारी प्राचीन संस्कृति के अनुकूल नही है, क्योंकि विवाह संपन्न होने पर वर तथा कन्या का संबंध भारतीय संस्कृति के अनुसार जन्म जन्मातर का मिलन है। यह ऐसा अटूट बंधन है जिसे तोड़ा नही जा सकता। 

2. बच्चों की समस्या 

विवाह विच्छेद हो जाने से कभी-कभी परित्यक्ता के बच्चों के लालन पालन की समस्या खड़ी हो जाती है, क्योंकि इससे बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान नही दिया जाता तथा वे बाल अपराधी बन जाते है।

3. परिवारिक संगठन के विरूद्ध 

पारिवारिक संगठन के दृष्टिकोण से भी विवाह विच्छेद उचित नही है, क्योंकि विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाने पर पत्नी अपने संपत्ति संबंधी अधिकार की मांग करने लगती है, जिससे पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा होने पर संगठन का भी बंटवारा हो जाता है या संगठन कमजोर पड़ जाता है।

विवाह विच्छेद की उच्चदर के कारण 

1. तलाकों की धार्मिक छूट या धर्म के प्रभाव का कम होना 

जापान या मिस्त्र मे तलाको की उच्च दर का प्रमुख कारण यह है कि वहां तलाक पर किसी प्रकार का धार्मिक बंधन नही है।

2. तलाक की वैधानिक छूट 

वर्तमान मे तलाक कानून मे सुधार कर उन्हें उदार बनाया जा रहा है। इंग्लैंड मे इसी कारण से तलाको की संख्या मे पर्याप्त वृद्धि हुई है। तलाको मे आने वाला खर्च (कोर्ट आदि का) बहुत कम होता है।

3. औद्योगिकरण की वृद्धि 

कारखाना उत्पादन पद्धति महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, सेवाओ का व्यापारीकरण आदि औद्योगीकरण के ही परिणाम है। इन परिणामों के फलस्वरूप औद्योगिकृत देशो मे तलाको की संख्या बढ़ती जा रही है।

4. नगरीयकरण 

नगरीयकरण औद्योगिकरण ही से संबंधित है एवं औद्योगिकरण का ही परिणाम है। नगरो मे बाहरी व्यक्तियों या पड़ोसियों का एक दूसरे के व्यवहारों पर सामाजिक नियंत्रण कम रहता है अर्थात् जनमत का भय नही रहता। यही कारण है कि नगरीय क्षेत्रों मे तलाकों की संख्या अधिक रहती है।

5. जन्म नियंत्रण 

जिनकी संताने है ऐसे दंपत्तियों मे तलाक कम होते है। उन दंपत्तियों मे तलाक अधिक होते है जिनकी संताने नही होती।

6. भौगोलिक गतिशीलता मे वृद्धि 

एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने से स्थानीय समूहों का जो प्रभाव रहता है, वह नही रह पाता। ऐसी स्थिति मे पति-पत्नियों को तलाक लेने मे शर्म या संकोच का का अनुभव नही होता।

7. उच्च सामाजिक गतिशीलता

लंबमान गतिशीलता भी तलाक की दर मे वृद्धि करती है क्योंकि दंपत्ति नये वातावरण की नई स्थितियों से अनुकूलन नही कर पाते। यदि एक कर लेता है तो दूसरा उसके समक्ष अनुकूलन करने मे अपने को पीछे पाता है।

8. जनसंख्या की विभिन्नता

सांस्कृतिक सामाजिक विभिन्नता वाले पति पत्नियों मे शीघ्र तलाक की प्रवृत्ति पाई जाती है। 

विवाह विच्छेद या तलाक के प्रभाव या दुष्परिणाम 

तलाक का मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है। इससे पति-पत्नि जीवन भर चलने वाली चिक-चिक व कलह, जो चाहे उनकी बेमेल प्रकृति, पारस्परिक अविश्वास, हीनता की भावना, रूचियों, मूल्यों आदि मे भिन्नता व संघर्ष आदि किसी या किन्ही कारणों से हो, समाप्त हो जाता है। इससे दोनो को राहत मिलती है। साथ ही, परिवार का अशांत व कलहपूर्ण वातावरण समाप्त होता है। पति व पत्नी दोनों नये सिरे से अपना जीवन, व्यक्तित्व व रोजगार सँवारने के लिए स्वतंत्र होते है किन्तु अधिकांशतया तलाक से पति व पत्नी दोनो की स्थितियों पर बूरा असर पड़ता है। तलाकशुदा पुरूष को जहाँ पुनर्विवाह मे कठिनाई आती है, वहीं तलाकशुदा स्त्री का पुनर्विवाह तो और भी मुश्किल हो जाता है। अधिकांश प्रकरणों मे तलाकशुदा व्यक्तियों के प्रति समाज का रवैया सहानुभूतिपूर्ण नही होता। विशेष रूप से तलाकशुदा स्त्री को तो लोग अच्छी नजरों से नही देखते और कदम-कदम पर उसे लोगो के ताने सहने पड़ते है। तलाक से बच्चों की परवरिश मे भी कठिनाई आती है। कई बार तलाकशुदा स्त्री हीनभावना का शिकार हो जाती है और उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। 

ऐसा बहुत ही कम पाया जाता है कि जब स्त्री पुरुष दोनो ही तलाक चाहते हो। प्रायः दो मे से एक पक्ष तलाक चाहता है और दूसरे को अपनी अनिच्छा के बावजूद भी तलाक का सामना करना पड़ता है। वह अवस्था बड़ी विचित्र होती है जब दोनों मे एक यह समझता है कि मुझमें ही कोई ऐसी कमी है जिसके कारण ही दूसरे के जीवन मे आनंद और सफलता नही आ पायी है। जिस व्यक्ति को अयोग्य बताया जाता है उसकी आत्मा और गौरव को ठेस लगती है जिससे उसको नयी परिस्थितियों के अनुकूल होने मे कठिनाई का सामना करना पड़ता है। परिवार मे बच्चों के लिए माता पिता, प्रेम, स्नेह, और सुरक्षा के भंडार होते है। किसी भी परिवार मे तलाक के बालको की मन:स्थिति पर अचानक चोट सी लगती है जो बालक के बढ़ते हुए व्यक्तित्व के लिए घातक होती है।

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