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9/25/2021

सीखने/अधिगम के स्थानांतरण का अर्थ, प्रकार, सिद्धांत, महत्व

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सीखने या अधिगम के स्थानांतरण का अर्थ (adhigam ka sthanantaran kya hai)

adhigam ka sthanantaran arth paribhasha prakar siddhant mahatva;सीखने या अधिगम की प्रक्रिया एक गतीशील प्रक्रिया है। एक परिस्थिति मे सीखा हुआ काम दूसरी परिस्थिति मे सहायक होता हैं। इस प्रकार एक अनुभव से दूसरा अनुभव होता है और यह सीखने की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है। जब एक परिस्थिति मे सीखा हुआ काम दूसरी परिस्थिति के काम मे सीखने मे सहायक होता है तो उसे हम सीखने का स्थानांतरण या प्रशिक्षण का स्थानांतरण कहते हैं। 

शिक्षा शब्दकोष के अनुसार," जब कोई व्यक्ति किसी उद्दीपक के प्रति प्रतिक्रिया करता हैं, अधिगम अथवा सीखना शुरू हो जाता है। जब अधिगम के विशेष अनुभव व्यक्ति की योग्यता को प्रभावित करते हैं तथा उनका रूप भिन्न होता है, तो वह क्रिया अधिगम-स्थानांतरण के रूप मे स्वीकारी जाती हैं। 

डीज के अनुसार," सीखने का स्थानांतरण तब होता है, जब एक कार्य का सीखना या निष्पादन दूसरे कार्य के सीखने या निष्पादन में लाभ या हानि पहुँचाता हैं।"  

विश्लेषण 

उपर्युक्त परिभाषाओं का अगर हम विश्लेषण करे, तो निम्न विशेषताएं स्पष्ट होती हैं-- 

1. स्थायी सीखना 

जब हम कोई कार्य सीखते है तो हमारे मस्तिष्क में चिन्ह अंकित हो जाते है, जो समयानुसार जाग्रत होकर व्यवहार अथवा क्रिया को सरल बनाते हैं। अधिगम का स्थानांतरण सीखने के स्थायित्व पर निर्भर करता हैं। अतः सीखना स्थायी होना स्थानांतरण के लिए आवश्‍यक हैं। 

2. स्थिति का चयन 

अधिगम मे स्थानांतरण स्थिति चयन पर निर्भर करती हैं। थार्नडाइक ने अपने प्रयोगों से स्पष्ट कर दिया है कि जो व्यक्ति सही प्रतिचारों का चयन करके अभ्यास करते हैं, वे सीखने मे जल्दी उन्नति करते है। यही स्थिति सीखने के स्थानांतरण में भी होती है। जब व्यक्ति अपने पहले के अनुभवों में से सही को छाँट कर प्रयोग करता है, तो सीखने में स्थानांतरण होता हैं। इसी को स्थिति का चयन कहते हैं। 

3. प्रभाव 

सीखने में स्थानांतरण उसी समय स्पष्ट होता हैं, जब सीखने मे उन्नति होती है। इस प्रभाव के अंतर्गत अर्जित ज्ञान, प्रशिक्षण तथा आदतों आदि के प्रभाव सम्मिलित है, जिससे सीखने मे स्थानांतरण सकारात्मक अथवा नकारात्मक तरह से प्रतिपादित होता हैं।

सीखने या अधिगम के स्थानांतरण की परिभाषा (adhigam ka sthanantaran ki paribhasha)

सीरेन्स के अनुसार," स्थानांतरण परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, प्रशिक्षण और आदतों का किसी दूसरी परिस्थिति में स्थानांतरण किए जाने की चर्चा करता हैं। 

क्रो व क्रो के अनुसार," सोचने की आदतें, अनुभव या कुशलता के ज्ञान को सीखने के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने का नाम अधिगम का स्थानांतरण कहलाता हैं।

सीखना या अधिगम स्थानांतरण के प्रकार (adhigam ka sthanantaran ke prakar)

अधिगम स्थानांतरण तीन प्रकार का होता हैं-- 

1. सकारात्मक स्थानांतरण 

यह वह स्थानांतरण होता है जिसमे एक काम को सीखना या प्रशिक्षण दूसरे काम को सीखने को सरल बना देता है। उदाहरण के लिए बालक को भूगोल का ज्ञान होने से वह इतिहास को भी इच्छी तरह समझ सकता हैं। 

2. नकारात्मक स्थानांतरण 

जब पूर्व मे सीखा हुआ काम दूसरे काम के सीखने मे बाधक हो तो वह नकारात्मक स्थानांतरण कहलाता है। इस प्रकार के स्थानांतरण का उदाहरण इस प्रकार दिया जा सकता है कि बच्चे से 'पुस्तक' का बहुवचन 'पुस्तकें' सीख लिया है और वह 'भेड़' का बहुवचन 'भेड़े' बताता है। नकारात्मक स्थानांतरण को आदत मे हस्तक्षेप भी कहा जाता हैं। 

3. शुन्य स्थानांतरण 

जब एक कार्य का प्रशिक्षण दूसरे कार्य को सीखने में न तो सहायता करता है और न ही बाधा उत्पन्न करता है तो उसे शुन्य स्थानांतरण कहते हैं। लेकिन इस प्रकार का स्थानांतरण क्रियात्मक रूप में नही होता।

अधिगम या सीखने के स्थानांतरण के सिद्धांत (adhigam ka sthanantaran siddhant)

सीखने में स्थानांतरण के स्वरूप को स्थापित करने वाले सिद्धांतों को हम दो भागे में विभक्त सकते हैं-- 

(अ) स्थानांतरण के प्राचीन सिद्धांत

सीखने के स्थानांतरण के प्राचीन सिद्धांतों में' मानसिक शक्तियों का सिद्धांत' तथा 'औपचारिक मानसिक प्रशिक्षण' के सिद्धांत शामिल है। मानसिक शक्तियों के सिद्धांत के बारे में गेट्स तथा अन्य ने लिखा है," अवधान, स्मृति, कल्पना, तर्क, इच्छा, स्वभाव, कभी-कभी चरित्र तथा अन्य गुण मानसिक शक्तियों के रूप में होते हैं। यह सभी शक्तियाँ एक-दूसरे से स्वतंत्र होती। इसलिए इनको स्वतंत्र रूप में सक्षम बनाया जा सकता है।" 

उपर्युक्त विचार से यह निष्कर्ष निकलता है कि मानसिक प्रक्रियाएं अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं तथा वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में समर्थ हैं। अत: इनका प्रशिक्षण सीखने में स्थानांतरण को बढ़ावा देता है। 

इसी तरह से औपचारिक मानसिक प्रशिक्षण के सिद्धांत के बारे में गेट्स तथा अन्य ने लिखा है," मानसिक शक्तियों को प्रशिक्षण के द्वारा समान तथा समग्र रूप में किसी भी परिस्थिरि में कुशलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है।"

उपर्युक्त विचार से स्पष्ट होता है कि अवधान, स्मृति आदि मानसिक शक्तियों को किस भी क्षेत्र में प्रशिक्षण दिया जाये, तो सीखने में स्थानांतरण होता है। 

आज इन प्राचीन सिद्धांत का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि ये वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं । शिक्षा के क्षेत्र में आज निरीक्षण तथा परीक्षण का इतना प्रयोग बढ़ गया है कि हर सिद्धांत का वैज्ञानिक मापदंड बन चुका हैं।

(ब) अधिगम या सीखने के स्थानांतरण के आधुनिक सिद्धांत

सीखने के आधुनिक सिद्धांत विभिन्न प्रयोगों के आधारों पर गठित हैं। इनमें

थॉर्नडाइक, जड तथा बागले आदि के सिद्धांत आते हैं। इन सिद्धांतों के महत्व को देखते हुए हम प्रत्येक का विस्तार से वर्णन करेंगे--

1. थॉर्नडाइक का सिद्धांत 

थॉर्नडाइक महोदय ने सीखने अथवा अधिगम के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। आपने स्थानांतरण के सिद्धांत को समरूप तत्वों का सिद्धांत नाम दिया हैं। इस समरूप सिद्धांत का वर्णन हम निम्न तरह से करते हैं--

समरूप तत्वों के सिद्धांत का अर्थ

थॉर्नडाइक ने सीखने के प्रयोगों में पाया कि बिल्ली अपने पूर्व अनुभवों का प्रयोग सीखने में करती है । इसलिए जब व्यक्ति संचित अनुभवों में से नवीन सीखने हेतु समरूप तत्वों को छाँट लेता है तथा उनका प्रयोग करके नवीन कार्य को शीघ्र सीख लेता है, तो इसे समरूप तत्वों का सिद्धांत कहा जाता है। सरलीकरण के रूप में कहा जा सकता है कि नवीन कार्य तथा संचित अनुभवों में से समान तत्वों को छाँट लेना ही सीखने में उन्नति करता है, जैसे-- दर्शनशास्त्र का ज्ञान मनोविज्ञान के सीखने में मदद देता है। 

स्थानांतरण कैसे हो ? 

थॉर्नहाइक ने स्थानांतरण को सीखने तथा बुद्धि पर निर्भर माना है। जब सीखना स्थायी होगा तथा बुद्धि के प्रयोग से हम समरूप तत्वों का चयन कर लेंगे, स्थानांतरण आसानी से होगा। अगर हम सीखने के ज्ञान को चयन करने में सफल नहीं होते हैं, तो उसका स्थानांतरण संभव नहीं हो सकता है। अतः शिक्षक को शिक्षा देते समय छात्रों के संचित ज्ञान को जाग्रत कर देना चाहिए, ताकि वे स्थानांतरण के द्वारा जल्दी सीख सकें। 

2. सी.एच. जड का सिद्धांत

आपने सीखने में स्थानांतरण पर प्रयोग किये तथा एक नवीन सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इसको ' सामान्यीकरण का सिद्धांत ' कहा जाता है। 

सामान्यीकरण का अर्थ

बालक अपने विकास के साथ-साथ विभिन्न अनुभव अर्जित करता है। यह अनुभव मिलकर एक निष्कर्ष निकालते हैं, जिसे नियम अथवा सिद्धांत का नाम दिया जाता है। भविष्य में वह इसका प्रयोग सामान्य जीवन की समस्याओं को सुलझाने में करता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया को सामान्यीकरण कहते हैं, जैसा कि गेट्स तथा अन्य ने लिखा है," विशिष्ट परिस्थितियों में समान विशेषताएं अथवा सिद्धांत या संबंध स्थापना की प्रक्रिया सामान्यीकरण होती है।" 

स्थानांतरण कैसे हो?

व्यक्ति सीखते समय ज्ञान की क्रमबद्धता, आदतों तथा मनोवृत्तियों को धारण करता है। जब वह अन्य परिस्थितियों में सीखता है, तो वह इनका प्रयोग करके सीखने को सरल बना लेता है। यानी वह संचित ज्ञान, आदतों, मनोवृत्तियों आदि के आधार पर बनाये गये नियमों का व्यवहार में पालन करके नवीन कार्य को सीखता है। अत: जिस व्यक्ति के पास जितने ज्यादा सामान्य सिद्धांत होंगे वह उतना ही उनका स्थानांतरण नवीन सीखने में कर सकेगा। 'जड' महोदय ने 1908 में एक प्रयोग द्वारा इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया । आपने दो दलों (लड़कों) को निशाना लगाने हेतु तैयार किया। जब वे एक विशेष गहराई पर निशाना लगाने में सफल हो गये, तब निशाने की गहराई को बदल दिया गया। जो लड़के किरण की वक्र रेखा के नियमों को समझ गये थे, उन्होंने निशाने की गहराई को बदलने पर  भी सही निशाना लगाया, पर जो इस नियम से परिचित नहीं थे, वे निशाना लगाने में असफल हुए। इससे जड़ महोदय ने यह निष्कर्ष निकाला कि स्थानांतरण किसी कार्य के नियमों तथा सिद्धांतों को समझने से एवं उनका सामान्यीकरण करने से होता है। सी. एच. जड ने लिखा है," एक शिक्षक जिसका दृष्टिकोण ज्ञान के क्षेत्र में व्यापक है तथा वह सिर्फ सूचना के माध्यम से एक सत्य का उद्घाटन नहीं करता, वरन् उन सभी संकेतों का ताना-बाना तैयार करता है जो शेष संसार का केन्द्रीभूत सत्य है।"

3. बाग्ले का सिद्धांत 

डब्लू. सी बाग्ले ने सीखने में स्थानांतरण को बहुत ही महत्वपूर्ण माना है। सामान्यीकरण के पीछे तथा समान तत्वों के पीछे आदर्श और मूल्य माने हैं, जो सीखने में स्थानांतरण को सफल बनाते हैं। अत: आपने अपने सिद्धांतों का नाम ' आदर्शों तथा मूल्यो का सिद्धांत रखा है। बच्चों में विकास के साथ-साथ आदर्शों तथा मूल्यों का गठन होता रहता है। अतः वे जीवन भर उनका प्रयोग करते रहते हैं, उदाहरण के लिए बच्चों में अगर स्वच्छता तथा सौंदर्यता का भाव विकसित करना है, तो उन्हें सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक रूप से प्रशिक्षित किया जाये। भविष्य में वे स्वयं अपने इस आदर्श का पालन अपने जीवन में करते रहेंगे। अतः निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि शिक्षा के द्वारा बच्चों में आदर्शों तथा मूल्यों का गठन करना चाहिए, ताकि वे जीवन भर उनका स्थानांतरण करके लाभ उठा सकें।

अधिगम के स्थानांतरण का महत्व (adhigam ka sthanantaran ka mahatva)

छात्र की शिक्षा में अधिगम के अंतरण का विशेष महत्व है। अधिगम के अंतरण से वैज्ञानिक विज्ञान के अनुभवों के आधार पर नवीन समस्याओं का समाधान करते हैं। शक्ति-मनोविज्ञान के समर्थक अधिगम के अंतरण का विशेष महत्व मानते हैं। शक्ति-मनोविज्ञान के समर्थक कहते हैं कि," मस्तिष्क की कोई भी शक्ति हर परिस्थिति में एक जैसा व्यवहार करती है। अगर किसी बालक की स्मरण-शक्ति अच्छी है, तो वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होगा।" 

शक्ति-मनोविज्ञान के समर्थकों का विश्वास है कि जिस तरह व्यायाम के द्वारा शरीर को स्वस्थ बनाया जा सकता है, उसी तरह अध्ययन के द्वारा मानसिक शक्तियों का विकास किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिगम के अंतरण का महत्व इस तरह है--

"लैटिन भाषा के पढ़ने से तर्क, निरीक्षण, तुलना तथा संश्लेषण की शक्ति बढ़ती है। गणित का अध्ययन अवधान बढ़ाता है एवं तर्क शक्ति को विकसित करता है। इसी तरह चरित्र को संकल्प शक्ति को शक्तिशाली बनाने हेतु अध्ययन से श्रेष्ठ और कोई साधन नहीं है।" 

अधिगम के अंतरण के पीछे अनुशासन कार्य करता है। अनुशासन का अर्थ मानसिक शक्तियों का उचित उपयोग है, जो किसी विशेष विधि से कार्य में सफलता प्राप्त करने हेतु होना चाहिए। मनोविज्ञान के जन्म से ही अधिगम उसका केन्द्र बिन्दु रहा है। अधिगम का अंतरण शिक्षण के कार्य को सरल बना देता है। शिक्षक अधिगम के अंतरण के द्वारा ही बालक के भविष्य का निर्माण करता है।

अधिगम स्थानांतरण में विद्यालय और शिक्षाक की भूमिका 

विद्यालय या कक्षा में शिक्षक द्वारा अधिक से अधिक सकारात्मक स्थानांतरण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते है-- 

1. पाठ्यक्रम  

सकारात्मक स्थानांतरण के लिए पाठ्यचर्या उचित प्रकार का होना चाहिए पुराना पाठ्यचर्या सुधार के योग्य हो गया है। वर्तमान पाठ्यक्रम अमनोविज्ञानिक, असगनिमीन बोझिल, कठिन एवं कठोर बन गया है। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए ताकि इसके माध्यम से कक्षा में सीखा हुआ ज्ञान तथा अर्जित की हुई कुशलता, अभिरूचियों आदि वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने मे प्रयोग  लाई जा सके। इस संदर्भ में निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान आवश्यक है-- 

1. पाठ्यक्रम में सभी विषय सामग्री एक इकाई के रूप में दिखाई देनी चाहिए अर्थात एकीकृत पाठ्यक्रम होना चाहिए। विषयों में आपस में सह- संबंध होना चाहिए। 

2. पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों का भौतिक एवं सामाजिक वातावरण के साथ भी सह-संबंध होना चाहिए। 

3. किसी एक विषय को विभिन्न शाखाओं का पारस्परिक सह-संबंध होना चाहिए.

4 . इसी प्रकार किसी एक विषय की एक शाखा के प्रकरणों का आपसी सह संबंध होना चाहिए।

5. पाठ्यक्रम क्रियात्मक एवं उपयोगी होना चाहिए। बालकों की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला पाठ्यक्रम होना चाहिए। 

6. पाठ्यक्रम का संबंध व्यावसायिक रूचियों से संबंधित होना चाहिए। 

7. पाठ्यक्रम के चयन के लिए बालकों को आवश्यक निर्देशन मिलना चाहिए। इस निर्देशन के लिए वैयक्तिक भेदों को ध्यान में रखना अति आवश्यक होता है। 

8. पाठ्यक्रम चयन के लिए दिए जाने वाले निर्देशन में पारिवारिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखना भी अनिवार्य होना चाहिए।

2. शिक्षण विधियां 

सकारात्मक अधिगम स्थानांतरण की अधिकता के लिए उचित शिक्षण विधियों का चयन अति आवश्यक है। पुरानी शिक्षण विधियों में आवश्यक है-- 

1. पुस्तकीय ज्ञान या सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक अनुभवों में उचित समन्वय होना।

 2. पूर्व ज्ञान का नए कार्य के लिए प्रयोग करने के लिए सह-संबंध के सिद्धांत का प्रयोग।

3. शिक्षण के दौरान चार्ट, मॉडलों, मानचित्रों, चित्रों, प्लेक बोर्ड आदि का प्रयोग अधिक-से-अधिक करना चाहिए।

 4. शिक्षण प्रक्रिया में बुद्धिपूर्ण क्रियाओं पर अधिक-से-अधिक बल देना चाहिए। 

5. रटने की पद्धति को निरुत्साहित करना चाहिए। 

6. शिक्षण को रूचिपूर्ण एवं सजीव बनाने के लिए अधिक-से-अधिक उदाहरणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

7. सामान्यीकरण पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। 

8. स्वयं प्रयास करके सीखने की भावना बालकों में पैदा की जानी चाहिए। 

9. समरूप तत्वों के सिद्धांत की मानक स्थानांतरण प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

3. अधिगम के लिए छात्रों की तैयारी 

सकारात्मक स्थानांतरण के लिए अधिगम के लिए छात्रों की तैयारी परम आवश्यक है। इसके लिए स्थानांतरण संभव नहीं है। इस तैयारी में बालक की मानसिक और शारीरिक तैयारी शामिल होती है। इसके लिए बालकों और शिक्षकों में मधुर संबंध का होना अति आवश्यक है। शिक्षकों को बच्चों का विश्वास प्राप्त करना चाहिए। बालक की तैयारी से उसकी रूचियां जाग्रत होती हैं। इससे उनको प्राकृतिक अभिप्रेरणा प्राप्त होती है। बालकों को सीखने के प्रति उचित भाव पैदा किया जाना चाहिए ताकि वह उस अर्जित ज्ञान का उपयोग इसकी परिस्थितियों में ठीक प्रकार से कर सके। बालकों की मानसिक और  शारीरिक तैयारी के बिना अधिगम स्थानांतरण अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सकता है।

4. शिक्षक की ओर से तैयारी 

अधिगम स्थानांतरण के लिए केवल बालकों को ही मानसिक और शारीरिक तैयारी आवश्यक नहीं, शिक्षक की शारीरिक एवं मानसिक तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसके बिना भी सीखने की प्रक्रिया में स्थानांतरण संपूर्ण नहीं हो सकता। आवश्यकता की संकल्प शक्ति और अन्य योग्यताओं के कारण स्थानांतरण प्रभावपूर्ण हो सकता है , अन्यथा नहीं। अतः शिक्षक प्रशिक्षण भी अति आवश्यक है। विशेषकर आज के मनोवैज्ञानिक युग में। 

अतः अध्यापकों को गंभीर होकर कठिन परिश्रम करना चाहिए। उन्हें अपनी योग्यताओं, कौशलों, अनुभवों का अधिक-से-अधिक प्रयोग एवं प्रदर्शन करना चाहिए। शिक्षकों को नकारात्मक स्थानांतरण को नहीं करना चाहिए बल्कि नकारात्मक स्थानांतरण को रोकने का आवश्यक प्रयास करना चाहिए। 

5. उचित आदर्शों का विकास  

स्थानांतरण की प्रक्रिया में आदर्शों का स्थानांतरण सहायक होता है। अत: बालकों में उचित आदर्श विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसे आदर्श शिपुस्तकीय ज्ञान आदि विकसित होकर शिक्षक के अपने व्यवहार, अनुभवों आदि के अनुकरण के परिणाम विकसित होते हैं। इन अनुभवों का जीवन में उपयोग करने की शिक्षा शिक्षाकों द्वारा दी जाना चाहिए। तभी सकारात्मक स्थानांतरण संभव होता है। 

6. स्पष्ट ज्ञान  

शिक्षक जिस विषय को पढ़ा रहा हो या जो कार्य सिखा रहा हो उसका उसे ज्ञान होना चाहिए तभी ज्ञान का स्थानांतरण संभव है। 

7. प्रतिभाशाली बालकों पर विशेष ध्यान

प्रतिभाशाली बालकों की ओर शिक्षकों को विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बुद्धिलब्धि और स्थानांतरण का आपस में गहरा संबंध है। 

8. प्राप्त ज्ञान का प्रयोग 

शिक्षक बालकों को अर्जित ज्ञान से जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग करना भी सिखाए। इसके लिए शिक्षक अधिक-से-अधिक अवसर प्रदान करे। ऐसा करने से भी स्थानांतरण पर्याप्त मात्रा में हो सकते हैं।

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