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10/02/2021

सृजनात्मकता का अर्थ, परिभाषा, तत्व

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srijnatmakta arth paribhasha visheshta tatva;सृजनात्मकता मानव के क्रियाकलापों तथा निष्पत्ति हेतु जरूरी हैं। सृजनात्मकता का अर्थ वैज्ञानिक के कायाकल्प से नही हैं। यह किसी भी क्रिया में पायी जाती है। किसी भी कार्य या व्यवसाय में सृजनात्मकता के दर्शन होते हैं। 

बिने के अनुसार," एक व्यक्ति लकड़ी से मनचाही कलात्मक वस्तु बना सकता हैं। चित्रकार मनचाहे रंगों से चित्र की सजीवता प्रकट कर सकता हैं। इसी मूर्तिकार एवं वास्तुविद् भी अपनी कलाओं की छाप छोड़ते हैं। यही तो सृजनात्मकता हैं।" 

सृजनात्मकता का अर्थ (srijnatmakta kya hai)

सृजनात्मकता का अर्थ हैं- "सृजनात्मकता" अंग्रेजी भाषा के शब्द "Creativity" का हिन्दी रूपांतरण हैं। भार्गव इलस्ट्रेटेड डिक्शनरी के अनुसार "Creativity" शब्द का अर्थ हैं By way of creation जिसका हिन्दी शब्दानुसार होता हैं-- ," उत्पादन से।" इस तरह क्रिएटिवटी शब्द का हिन्दी पर्याय हुआ "उत्पादन से संबंधित।" इसके समानार्थी अन्य शब्द भी हैं जैसे- विधायका। भारत सरकार के तकनीकी शब्द कोष में क्रियोटिविटी का हिन्दी अनुवाद सृजनशीलता अंकित किया हुआ हैं। प्रायः मनोविज्ञान की पुस्तकों और प्रयोग में सृजनशीलता के स्थान पर सृजनात्मकता शब्द का ही प्रयोग किया जाता हैं। अतः यहाँ पर भी सृजनात्मकता का ही प्रयोग किया हैं।

सृजनात्मकता की परिभाषा (srijnatmakta ki paribhasha)

राॅबर्ट फ्रास्ट के अनुसार," मौलिकता क्या हैं? यह मुक्त साहचर्य है। जब कविता की पंक्तियाँ या उसके विचार आपको उद्वेलित करते हैं। साधारणीकरण के लिए बाध्य करते हैं। यह दो वस्तुओं का संबंध होता हैं, परन्तु साहचर्य को देखने की कामना आप नही करते, आप तो उसका आनंद उठाते हैं।" 

स्टेन के अनुसार," जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो जो किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी मान्य हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता हैं।" 

जेम्स ड्रेवर के अनुसार," अनिवार्य रूप से किसी नयी वस्तु का सृजन करना है। रचना, विस्तृत अर्थ में जहाँ पर नये विचारों का संग्रह हो वहाँ पर प्रतिभा का सृजन (वह अनुकृत न होकर स्वयं प्रेरित हो) जहाँ पर मानसिक सृजन का आह्रान न हो।" 

सी. वी. गुड के अनुसार," सृजनात्मकता वह विचार है जो किसी  समूह में विस्तृत सांतत्य का निर्माण करता हैं। सर्जनात्मकता के कारक हैं-- साहचर्य आदर्शात्मक, मौलिकता, अनुकूलता, सांतत्य लोच एवं तार्किक विकास की योग्यता।" 

सृजनात्मकता की विशेषताएं 

इन परिभाषाओं के आधार पर सर्जनात्मकता की निम्नलिखित विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं-- 

1. सृजनात्मकता मौलिक या नवीन न हो। 

2. सृजनात्मकता कार्य उपयोगी हो। 

3. सृजनात्मकता को समान मान्यता मिलनी चाहिए। 

4. सृजनात्मकता कार्य में दो या अधिक वस्तुओं, तथ्यों आदि के संयोग से नवीनता का सृजन होना चाहिए। 

5. सृजनात्मकता कार्य द्वारा व्यक्ति की प्रतिभा का विकास होना जरूरी हैं।

सृजनात्मकता के तत्व 

सृजनात्मकता का विकास करने वाले निम्न तत्व हैं-- 

1. सृजनात्मकता स्तर  

यह चिंतन सरल तथा यांत्रिक होता है। जिस चिंतन में प्रत्याशी रहती है उसे अभिसारी चिंतन कहते हैं। अभिसारी चिंतन मूल्यांकन के साथ-साथ सृजनात्मकता शक्तियों का तीसरा पक्ष है। व्यक्ति में परिस्थिति की पुनर्व्यवस्था होना जरूरी है। इसे कार्यात्मक स्थिरता भी कहते हैं। सृजनात्मकता के अध्ययन के लिए दोनों ही तरह के चिंतनों का परीक्षण किया जाता है। 

2. बौद्धिक स्तर  

सृजनात्मक शक्ति के लिए उच्च बुद्धि लब्धि (I.Q.) आवश्यक है। नवीन मौलिक एवं परंपरागत ढंग से हर कार्य करने का साहस सिर्फ उच्च लब्धि के छात्रों में ही होता है लेकिन इसके अतिरिक्त निम्न बुद्धि लब्यि के व्यक्ति भी सृजनशील हो सकते हैं।

3. मापन योग्य व्यवहार  

सृजनात्मकता का यह महत्वपूर्ण तत्व है। इसका पता मापना के उन व्यवहारों से चलता है जो वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं वैध विधि से मापे जा सकें। जिन व्यवहारों को उक्त विधियों से नहीं मापा जा सकता उनका अध्ययन असंभव है। 

4. मौलिकता एवं नवीनता  

सृजनात्मकता के लिए मौलिकता एवं नवीन ढंग से कार्य करने की योग्यता नितांत आवश्यक है। अगर परंपरागत ढंग से हटकर नवीन कार्य करने का साहस बालक में विद्यमान है तो वह सृजनात्मकता की सीमा में आयेगा। 

5. माध्यम 

सृजनात्मकता का कोई न कोई माध्यम अवश्य होना चाहिए। चिंतन, लेखन, वाचन, तर्क, कल्पना, अध्यापन एवं अन्य किसी क्रिया के माध्यम से अगर कोई बालक अपनी सृजनात्मक शक्ति का प्रदर्शन करता है तो वह सृजनात्मकता होगी।

6. साहस

साहस भी सृजनात्मकता का महत्वपूर्ण तत्व है। अगर किसी बालक में नये ढंग से कार्य करने का ढंग, असफलताओं में न घबराने का साहस एवं समाज की रूढ़ियों व परंपराओं को परिवर्तित करने का साहस नहीं है तो मौलिकता की उत्पत्ति नहीं हो सकती। 

7. सामाजिक स्वीकृति  

सृजनशीलता या सृजनात्मकता वह स्थिति है जिसके अंतर्गत किसी बालक के विचारों या कार्यों को समाज मान्यता दे दे। जैसे एक जेबकट अपनी नवीन शैली से जेब काट सकता है पर उसे समाज क्षमा नहीं करता। अत: उसे समाज द्वारा मान्यता मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए समाज द्वारा प्रतिष्ठित एवं मान्य कार्य ही सृजनात्मक कहलाते हैं। 

8. प्रवीणता 

कोई बालक अथवा व्यक्ति उस समय तक सृजनात्मक कार्य नहीं की कर सकता जब तक कि उसे अपने विषय में प्रवीणता प्राप्त न हो। प्रवीणता का अर्थ- दक्षता। दक्षता की स्थिति में वह मौलिक या नवीन कार्य पूर्ण नही कर पायेगा। अपूर्ण स्थिति में हम उसे सृजनात्मकता नहीं कहेंगे।

यह भी पढ़े; सृजनात्मकता का महत्व, सिद्धांत

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