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9/26/2021

ज्ञान का निर्माण क्या हैं?

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ज्ञान का निर्माण क्या हैं? 

प्रायः विद्यालयों में विद्यार्थी तथा सूचना का पुनरूत्पादन करना सिखाते हैं जिसमें स्मृति की ही प्रधानता रहती हैं। किन्तु मात्र स्मृति नहीं छात्रों में समीक्षात्मक समझ, चिंतन, तर्क, विश्लेषण, व्याख्या, संश्लेषण, वर्गीकरण, मूल्यांकन आदि कौशल भी उच्च शैक्षणिक अध्ययन व अनुसंधान हेतु जरूरी होती हैं। इन कौशलों का उपयोग तथा विकास ज्ञान प्राप्ति व ज्ञान के स्थानांतरण में न होकर ज्ञान की खोज मे परिलक्षित होता हैं। 

अधिगम के निर्माणवाद के सिद्धांत के अनुसार अधिगम एक क्रियाशील प्रक्रिया है जिसमें अधिगमकर्ता उनके स्वयं के वर्तमान व पुराने ज्ञान तथा अनुभवों पर आधारित कई अवधारणों, विचारों तथा ज्ञान का निर्माण करते हैं। ज्ञान प्राप्त करने या ज्ञान के पुनरूत्पादन करने के स्थान पर ज्ञान निर्मित किया जाता हैं। वस्तुतः ज्ञान एक स्थिर वस्तु का संप्रत्यय नहीं है बल्कि ज्ञान के बारे में व्यक्ति के स्वयं के अनुभव उसे नए रूपों मे निर्मित करते रहते हैं। उदाहरणा से यह तथ्य स्पष्ट होगा। कक्षा 10 वीं के एक विद्यार्थी ने कहीं 'एक पुस्तक की आत्मकथा' पर निबंध पढ़ा। उसने यह ज्ञान प्राप्त किया कि आत्मकथा लेखन की शैली कैसी होती हैं। लगभग इसी निबंध के पैटर्न पर उसने 'एक कलन की आत्मकथा' पर निबंध रचना की। यह सीखे ज्ञान का पुनरूत्थान था। परन्तु यह ज्ञान का निर्माण नहीं था। अपने पुनरूत्पादन से उत्साहित होकर उसने विद्यालयीन पत्रिका में प्रकाशनार्थ "भारत माता की आत्मकथा" की रचना का संकल्प किया तथा इस हेतु विभिन्न सूचनाएं, तथ्य, ऐतिहासिक सत्यों की खोज छात्र ने विभिन्‍न इतिहास की पुस्तकों से की। उसने भारत नाम क्यों पड़ा? पूर्व में भारत महादेश का विस्तार कहाँ तक था? भारत में आर्य कहाँ से आए थे? सिंधु घाटी सभ्यता कितनी विकसित थी? भारत पर किन-किन विदेशी जातियों ने राज्य किया? भारत अंग्रेजी दासता से कब मुक्त हुआ और कैसें? देश का विभाजन तथा स्वतंत्रता के बाद भारत में कौन-कौन सी समस्याएं आई कौन से संकट आए? छात्र ने इंटरनेट पर भी इतिहास का अध्ययन किया। इस खोज अर्थ के उपरांत उसने "भारत माता की आत्मकथा" निबंध की स्वयं रचना की। उसकी यह खोज, ज्ञान की गहराई से जाकर तथ्य ज्ञान करने की पहल, परिश्रम ज्ञान की रचना या निर्माण का उदाहरण हैं। 

रूसी सामाजिक निर्माणवाद के प्रशंसा व्यगोत्स्की के ज्ञान के निर्माण को इस प्रकार रूपायित किया हैं-- 

1. ज्ञान को परावर्तित अमूर्तता के द्वारा निर्मित किया जाता हैं। 

2. इसे क्रियाशील तथा भागितापूर्ण अधिगम के रूप में निर्मित किया जाता हैं। 

3. यह इस मान्यता पर आधारित है कि अधिगम स्थिर तथा अन्तर्निहित नहीं होता बल्कि वह निरन्तर विकसित होता हैं। 

4. अधिगमकर्ता निष्क्रिय रूप से अर्थ को स्वीकार करने के स्थान पर क्रियाशील रूप से अर्थ को निर्मित करता हैं। 

उक्त दिये गये उदाहरण में छात्र के पास भारत के इतिहास की अमूर्त धारणा थी। उसने स्वयं की भागिता व सक्रियता से अधिगम की खोज की। भारत पर राज्य करने वाली विदेशी जातियों को उसने निष्क्रिय रूप से स्वीकार न कर गहराई में जाकर तथ्यानसंधान किये। इस प्रकार ज्ञान की रचना में वह सफल हुआ। सक्रिय रूप से स्वयं की गहन मानसिक शक्तियों के उपयोग से ज्ञान का निर्माण संभव होता हैं।

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