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10/02/2021

ज्ञान की अवधारणा

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ज्ञान की अवधारणा  

gyan ki avdharna;शिक्षा की दृष्टि से यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि 'ज्ञान' है क्या? क्योंकि इस बारे में सभी दार्शनिक एवं विद्वान एकमत है कि शिक्षा का प्रमुख और शाश्वत उद्देश्य 'ज्ञान' प्रदान करना है। यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि सत्य की वास्तविकता को ज्ञान से अलग नहीं किया जा सकता। अगर सत्य का ज्ञान नहीं होता तो उस 'सत्य' का अस्तित्व ही कहाँ है? इसीलिये तत्व मीमांसा के साथ ज्ञान मीमांसा अभिन्न रूप से जुडी हुई है। भारतीय दर्शन में ब्रह्म (सत्य) और ज्ञान में कोई अन्तर नहीं माना गया है। जैमिनी में मीमांसा दर्शन में कहा गया है कि सत्य स्वयं प्रकाशित है। इस दृष्टि से ज्ञान की उत्पत्ति अपने आप होती है। वह मनुष्य के मन में स्वयं उद्भासित होता है, क्योंकि सत्य और ज्ञान एक ही हैं। ऐसे ज्ञान को ईश्वरीय ज्ञान अर्थात् सत्य द्वारा प्रदत्त माना जाता है। वेद ज्ञान को इसीलिये अपौरुषेय कहा गया है अर्थात् ज्ञान को ईश्वर ने प्रदान किया है। ऋषियों के मन में ज्ञान अपने आप उपजा, जिसे उन्होंने मन्त्र रूप में बताया। ज्ञान की यह अवधारणा शिक्षा के मूल को नष्ट नहीं करती, तो कमजोर अवश्य बना देती है।  शिक्षा ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रयास है और प्रयास से ज्ञान प्रदान नहीं किया जा सकता है। यह बात कई बार अनुभव से प्रमाणित भी हो जाती है। बहुत से लोगों ने पहले शिक्षा नहीं प्राप्त की, पहले उनके मन में ज्ञान उत्पन्न हुआ और फिर उन्होंने दूसरों को शिक्षा दी। बड़े-बड़े सन्तों और धर्म-प्रवर्तकों ने ऐसा ही मान भी लिया जाये तो शिक्षा का आधार कमजोर नहीं बनता। ज्ञान का महत्व ही क्या है? उसकी उपयोगिता ही क्या रही? यदि वह दूसरों तक पहुंचाया नहीं जाता। समाज के लिये ज्ञान की उपयोगिता शिक्षा ही सिद्ध करती है।

ज्ञान सूक्ष्म है या स्थूल? यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। शिक्षा में कार्यरत अध्यापक और छात्र दोनों के मन में जानकारी के रूप में वर्तमान ज्ञान सूक्ष्म है। दूसरी ओर पुस्तकों में वर्णित भाषा में लिखा हुआ ज्ञान स्थूल है। यह वैसे ही है जैसे नमक पानी में घुलकर अदृश्य हो जाता है, परन्तु बड़े ढेले के स्थूल रूप में दिखायी देता है। इसलिये शिक्षा में पुस्तक का महत्व है। ज्ञान के एक अन्य स्वरूप के विषय में चर्चा शिक्षा की दृष्टि से उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी अन्य चर्चायें, वह यह है कि ज्ञान कहाँ तक सक्रिय है और कहाँ तक 'निष्क्रिय'? सक्रिय ज्ञान वह है जिसका हम उपयोग करते हैं। इसलिये जब शिक्षक पाठ-योजना बनाता है तो उसके सामने एक लक्ष्य यह रहता है कि पढ़ाते समय वह कौन-सी स्थितियाँ पैदा करे जिससे छात्र प्राप्त ज्ञान का उपयोग कर सके? कहा गया है कि 'ज्ञानं भारं क्रियां बिना' अर्थात् प्रयोग के अभाव में ज्ञान एक बोझा है। 

ज्ञान के दो पक्ष और हैं- प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान। प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जिसे मनुष्य स्वयं अपने जीवन में अपनी ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से प्राप्त करता है। भारतीय चार्वाक मत इस प्रकार के ज्ञान को ज्ञान मानता है, क्योंकि इस मत के अनुसार जो जगत् हमारे सामने है वही सत्य है। वर्तमान यथार्थवाद दार्शनिक और वैज्ञानिक भी प्रत्यक्ष ज्ञान को सत्य ज्ञान मानते हैं। परोक्ष ज्ञान वह है जो हमें दूसरों से उनको कथन द्वारा या पुस्तकों द्वारा प्राप्त होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान ताजा और परोक्ष ज्ञान बासी है। शिक्षा में दोनों प्रकार के ज्ञान का महत्व है। भारतीय न्याय दर्शन में भी प्रत्यक्ष ज्ञान को 'प्रमा' और परोक्ष ज्ञान को 'अप्रमा' कहा गया है। इनके अलग-अलग लक्षण भी बताये गये हैं। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि ज्ञान और अज्ञान का भेद कैसे समझा जाये? मीमांसा दर्शन में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान की विवेचना है। इन सभी विवेचनों में सिद्ध होता है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य यह है कि छात्रों को ज्ञान का स्वरूप समझाया जाये ताकि वे विभिन्न प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जायें। ज्ञान की अवधारणा को स्पष्ट करते हुये एक वाद-बिन्दु यह उठाया जाता है कि ज्ञान का स्वरूप क्या बदलता रहता है या वह अपरिवर्तनीय है? यह बिन्दु भी उलझन भरा है। ज्ञान में शामिल तथ्य, विचार, प्रत्यय, नियम और निष्कर्ष आदि ज्ञान के तथ्य है अर्थात् जब अध्यापक छात्रों को ज्ञान प्रदान करता है तो इन सभी तत्वों को बताता और समझाता है। अब प्रश्न है कि ज्ञान के यह तत्व बदलते रहते हैं या नहीं। इसमें सन्देह नहीं कि ज्ञान के कुछ तत्व नहीं बदलते या यूँ कहें कि इतने अधिक काल में बदलते हैं कि उनका बदलाव अनुभव में नहीं आता। अनेक तथ्य, प्रत्यय और नियम लगभग नहीं बदलते। ज्ञान के यह तत्व शिक्षा के लिये महत्वपूर्ण हैं। बहुत से जीवन-मूल्य नहीं बदलते। शिक्षा छात्रों के मन में उनके प्रति आस्था पैदा करती है। यह उसका दायित्व है। इसके विपरीत ज्ञान के कुछ तत्व परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। वैज्ञानिक खोजों से ज्ञान में परिवर्तन आता है। शिक्षक प्राचीन काल में बताता था कि सूर्य प्रातःकाल चलना आरम्भ करता है और संध्या को अपनी यात्रा समाप्त करता है, परन्तु अब छात्रों को यह बताया जाता है कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है। पुराना ज्ञान अज्ञान था। चलती हुई रेलगाड़ी में हमें दिखायी देता है कि पेड़ चल रहे हैं , लेकिन चलती रेलगाड़ी है। पृथ्वी की गति का ज्ञान बाद में हुआ, इसलिये भूगोल की शिक्षा में परिवर्तन आया। शिक्षा को ज्ञान के तत्वों में आने वाले परिवर्तनों पर दृष्टि रखनी होगी। प्रगतिशील शिक्षा के समर्थक ड्यूवी ने ज्ञान को अनुभव की सतत् पुनर्रचना कहा है। विद्यालयों के पाठ्यक्रम थोड़ी-थोड़ी अवधि के बाद बदले जाने चाहिये। सत्य के अन्वेषण से जो नये नियम और सिद्धान्त प्रकाश में आते हैं, वे ज्ञान के स्थूल रूप में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। 

ज्ञान की अवधारणा के अन्तिम विवेचन में एक बात कह देना जरूरी है। वह यह है कि 'ज्ञान' क्या केवल अनुभूति (Aurenes) मात्र है। मेरे पास में गेंद रखी है, मुझे प्रथम अनुभूति हुई कि गेंद एक वस्तु है। फिर मैं ध्यान से उसे देखता हूँ। उसका रंग, आकार दिखायी देता है, फिर छूता हूँ और उसे लुढ़काता हूँ, यह गेंद की रचना, उत्पत्ति और यहाँ तक कि उसे ब्रह्माण्ड का लघु रूप होने के बारे में जानता हूँ। तब यह स्थिति सम्भवतः ज्ञान की होगी। इस दृष्टि से ज्ञान हाथ की हथेली पर रखे हुये आँवले के समान बन जाता है। ऐसा ज्ञान प्राप्त होने पर हम कहते हैं कि हमारे ज्ञान-चक्षु खुल गये। शरीर की आँख सब कुछ नहीं देख सकती, परन्तु ज्ञान-चक्षु से असलियत की गहराई भी देखी जा सकती है। इस प्रकार से ज्ञान के कई स्तर हो जाते हैं। शिक्षा का काम ज्ञान के तीनों स्तरों में ले जाना है। संसार की सतही जानकारी को शिक्षा कहना उपयुक्त न होगा। शिक्षा यदि हमारे ज्ञान-चक्षु खोल दे तो वह कल्याणकारी बन सकती है। यदि इस कसौटी पर भारत की वर्तमान शिक्षा को कसा जाये तो उसका खोखलापन प्रकट हो जाता है। इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा छात्र को केवल कुछ सूचनात्मक तथ्य देती है, ज्ञान नहीं। इसके भीषण परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं।

यह भी पढ़े; ज्ञान का अर्थ, प्रकार, स्त्रोत

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