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10/06/2021

प्रत्यक्षीकरण का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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प्रत्यक्षीकरण का अर्थ (pratyakshikaran kya hai)

pratyakshikaran arth paribhasha visheshta;प्रत्यक्षीकरण ज्ञान की दूसरी सीढ़ी हैं। सबसे पहले वस्तु द्वारा उत्तेजना उत्पन्न होने पर संवेदना होती हैं। संवेदना का हमारे प्राचीन अनुभवों से कोई संबंध नही होता और न ही संवेदना द्वारा वस्तु का पूरा ज्ञान प्राप्त हो पाता हैं। इस प्रकार संवेदना ज्ञान की पहली सीढ़ी होती हैं। जब हम किसी वस्तु को देखता हैं, सुनते हैं, स्पर्श करते है अथवा सूँघते है पर यह निर्णय नही कर पाते कि यह वस्तु क्या हैं? तब तक वह संवेदना होती हैं किन्तु जब हम उस वस्तु के विषय में एक निश्चित निर्णय की स्थिति में होते हैं तथा हम यह पहचान लेते हैं कि, यह पैन्सिल हैं, यह अमुक व्यक्ति की आवाज हैं, यह अमुक पुष्प की गंध है आदि, तब यह प्रत्यक्षीकरण होता हैं। 

इस प्रकार प्रत्यक्षीकरण व्यक्ति के पूर्व अनुभव पर निर्भर करता हैं क्योंकि जब तक यह पूर्व ज्ञान नहीं होगा कि जिस वस्तु की संवेदना हुई हैं, वह क्या हैं? तब तक उसके विषय में निर्णय नहीं दिया जा सकता। जिस व्यक्ति ने कभी गुलाब के फूल की खुशबु का अनुभव ही नही किया वह उसकी खुशबु का संवेदना के द्वारा प्रत्यक्षीकरण नही कर सकता। 

उदाहरणार्थ, एक कमरे में चार व्यक्ति बैठे हैं। उन्हें किसी आवाज की संवेदना हुई। यह संवेदना चारों व्यक्तियों को समान रूप से होगी किन्तु इस आवाज के विषय में केवल वही व्यक्ति निर्णय देने में समर्थ होगा जिसने उस पूर्ण आवाज का श्रवण करके उसकी पहचान स्थापित की होगी। अतः अनुभव के आधार पर एक ही उद्दीपक के विषय में भिन्न-भिन्न मत हो सकते हैं किन्तु ऐसी स्थिति में केवल उसी व्यक्ति के मत को प्रत्यक्षीकरण कहा जायेगा जो अपने पूर्व के अनुभव के आधार पर निश्चित निर्णय देगा। इस प्रकार प्रत्यक्षीकरण की क्रिया में पूर्व अनुभव एवं स्मृति मुख्य तत्व हैं। 

अतः हम कह सकते हैं कि प्रत्यक्षीकरण एक जटिल प्रक्रिया हैं। इस प्रक्रिया में संवेदना, पूर्व अनुभव एवं स्मृति के अलावा मानसिक तत्परता, समय, स्थानीय लक्षण, गति संवेदनायें एवं विभिन्न अर्द्धचेतन संस्कार भी सहायक तत्व हैं। 

प्रत्यक्षीकरण की परिभाषा (pratyakshikaran ki paribhasha)

फोर्गंस के अनुसार," प्रत्यक्षीकरण वातावरण में सूचना प्राप्त करने का प्रक्रम हैं।" 

स्टेगनर के अनुसार," इन्द्रियों के द्वारा बाह्रा वस्तु अथवा घटना का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया को प्रत्यक्षीकरण कहते हैं।" 

मेकडूगल के अनुसार," प्रत्यक्षीकरण वर्तमान वस्तुओं का चिन्तन हैं। एक वस्तु तब तक वर्तमान है जब तक कि उससे आने वाला उत्तेजक हमारी इन्द्रियों को प्रभावित करता हैं।"

स्टेगनर के अनुसार," इन्द्रियों के द्वारा बाह्रा वस्तु अथवा घटना का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया को प्रत्यक्षीकरण कहते हैं।"

काॅलिन्स एवं ड्रेवर के अनुसार," प्रत्यक्षीकरण एक वस्तु अथवा परिस्थिति को समझना हैं जो एक या और सभी ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करता हैं।" 

जेम्स के शब्दों में," प्रत्यक्षीकरण विशेष रूप से उन भौतिक पदार्थों की चेतना हैं, जो ज्ञानेन्द्रियों के सामने रहते हैं।" 

वुडवर्थ के अनुसार," ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पदार्थ वस्तुगत तथ्यों को जानने की क्रिया प्रत्यक्षीकरण हैं।" 

बोरिंग एवं अन्य विद्वान," उत्तेजक से क्रिया के बीच की श्रृंखला में प्रत्यक्षीकरण पहली कड़ी हैं।" 

इस प्रकार प्रत्यक्षीकरण के सामान्य परिचय एवं विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा दी गई उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रत्यक्षीकरण एक मानसिक जटिल प्रक्रिया हैं, जो वस्तुओं के उद्दीपक द्वारा उत्पन्न उत्तेजना से प्रारंभ होकर उसके निर्णय की स्थिति पर समाप्त होती हैं। उनमें ज्ञानेन्द्रियों की उत्तेजना मस्तिष्क तक पहुँचती हैं, मस्तिष्क उस उत्तेजना को ग्रहण करता हैं तथा पूर्व अनुभव की स्मृति के आधार पर उस संवेदना पर अपना निर्णय देता हैं, यही प्रत्यक्षीकरण होता हैं।

प्रत्यक्षीकरण की विशेषताएं (pratyakshikaran ki visheshta)

प्रत्यक्षीकरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-- 

1. संवेदन पर आधारित 

प्रत्यक्षीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो संवेदन पर आधारित होती हैं। 

2. एकता एवं संगठन 

प्रत्यक्षीकरण में संवेदनाएँ भिन्न-भिन्न न होकर एक संगठित रूप मे होती हैं। उदाहरण के लिए आम का प्रत्यक्षीकरण उसके रंग, आकार, गंध, स्पर्श आदि के संगठन के आधार पर होता हैं। 

3. अवधान तथा चयन प्रक्रिया 

व्यक्ति उन्हीं उद्दीपकों का चयन करता हैं और उस पर अपना अवधान केन्द्रित करता हैं जो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। 

4. मानसिक गतिविधि 

प्रत्यक्षीकरण मस्तिष्क की गतिविधि हैं यह एक ऐसा मानसिक प्रत्युत्तर होता हैं जो वातावरण में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होता हैं। 

5. दृढ़ता 

व्यक्ति जब प्रत्यक्षीकरण करतार है तो इसके अंतर्गत आने वाली वस्तु उसके लिए सार्थक हो जाती हैं तथा सार्थक वस्तु पर व्यक्ति का अवधान शीघ्र चला जाता हैं। 

6. प्रतीकों का प्रयोग 

प्रत्यक्षीकरण प्रतीक का प्रयोग करता हैं। 

7. प्रत्यक्षीकरण में पुनः स्मरण 

प्रत्यक्षीकरण में साहचर्य पाया जाता हैं। जब व्यक्ति किसी उद्दीपक का प्रत्यक्षीकरण करता है तो उसे उद्दीपक से संबंधित बातों का पुनः स्मरण हो जाता हैं। उदाहरण के लिए आम का प्रत्यक्षीकरण करते समय उसके स्वादिष्ट मीठेपन का पुनः स्मरण हो जाता हैं। 

इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षीकरण एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है जिसमें वह उद्दीपक द्वारा उत्पन्न संवेदना में वह पूर्व अनुभव के आधार पर अर्थ जोड़ दिया जाता हैं। अतः उद्दीपक को अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया ही प्रत्यक्षीकरण हैं।

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