8/09/2020

प्रतिस्पर्धा क्या है? परिभाषा एवं विशेषताएं

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प्रतिस्पर्धा क्या है? प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) का अर्थ (pratispardha kiya hai)

pratispardha meaning in hindi;प्रतिस्पर्धा अथवा प्रतियोगिता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सीमित साधन, वस्तु अथवा पद को पाने के लिए दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ प्रयास करते है।
प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता को एक असहगामी सामाजिक प्रक्रिया माना गया है। इसका कारण यह है कि प्रतिस्पर्द्धियों मे कम या अधिक मात्रा मे एक-दूसरे के प्रति कुछ ईर्ष्या-द्वेष के भाव पाये जाते है। प्रत्येक दूसरों को पीछे रखकर स्वयं आगे बढ़ना चाहता है, अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। अत्यधिक या अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा समाज मे संगठन को ठेस पहुँचाती है और उसे विघटन की ओर ले जाती है, परन्तु साथ ही प्रतिस्पर्धा व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों को प्रगति करने, आगे बढ़ने तथा अपनी स्थिति को ऊंचा उठाने की प्रेरणा भी देती है। कुशलतापूर्वक निरन्तर प्रयत्न करते रहने को प्रोत्साहित करती है, कार्य को उत्तमता के साथ पूरा करने मे मदद देती है।
आगे जानेंगे प्रतिस्पर्धा की परिभाषा और प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की विशेषताएं।
प्रतिस्पर्धा क्या है?

अकोलकर ने प्रतिस्पर्धा का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि वह (प्रतिस्पर्धा) दो या अधिक व्यक्तियों अथवा समूहों के मध्य धन, प्रस्थिति, सम्मान, लोकप्रियता, शक्ति या प्रभाव को दूसरे के बजाय, अधिक प्राप्त करने के लिए होने वाली दौड़ है। प्रतिस्पर्धा उस समय होती है जब इच्छित वस्तु की मात्रा सीमित होती है।
गिलिन और गिलिन ने सामाजिक प्रक्रियाओं के दो रूपों चर्चा की है। सहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएं और असहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएं। प्रतिस्पर्धा को उन्होंने सहयोगी सामाजिक प्रक्रिया माना। प्रतिस्पर्धा उस समय घटित होती है जब समाज मे मनुष्यों को मनचाही स्थिति मे वांछित वस्तु अथवा पद प्राप्त नही हो पाता।

प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की परिभाषा (pratispardha ki paribhasha)

ग्रीन के अनुसार " प्रतिस्पर्धा मे दो या अधिक व्यक्ति या समूह समान लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करते है जिसको कोई भी दूसरों के साथ बांटने के लिए न तो तैयार होता है और न ही इसकी अपेक्षा की जाती है।
बोगार्डस के अनुसार " प्रतिस्पर्धा किसी ऐसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए एक प्रकार की होड़ है जो इतनी मात्रा मे नही पायी जाती जिससे की माँग की पूर्ति हो सके।"
मैक्स बेवर के अनुसार " प्रतिस्पर्धा शांति पूर्ण संघर्ष है। "
फेयरचाइल्ड के अनुसार " सीमित वस्तुओं के उपयोग या अधिकार के लिए किया जाने वाला प्रयत्न प्रतिस्पर्धा है। "
बीसेंज और बीसेन्ज के अनुसार " दो या अधिक व्यक्तियों के द्वारा समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयत्न को प्रतिस्पर्धा कहते है, जिसके सब हिस्सेदार नही बन सकते क्योंकि वे समान लक्ष्य सीमित है।"
गिलिन और गिलिन के अनुसार " प्रतिस्पर्धा वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसमे प्रतिद्वंद्वी व्यक्ति या समूह किसी जनता के समर्थन तथा प्राथमिकता के माध्यम से लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करते है और उस व्यक्ति या समूह को अपने हितों के समर्थन मे अनुरोध करते है न की अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा या इसके भय का प्रयोग। "

प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) की विशेषताएं (pratispardha ki visheshta)

1. प्रतिस्पर्धा समाज मे दो या दो से अधिक व्यक्तियों, समूहों के मध्य होने वाली होड़ है जिसमे व्यक्ति अथवा समूह नियबध्द तरीके से निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करते है।
2. प्रतिस्पर्धा मे किसी तीसरे पक्ष का होना आवश्यक है जिसके समर्थन को प्राप्त करने का प्रयत्न दोनों पक्षों के द्वारा किया जाता है। दो व्यक्तियों के लिए तीसरा पक्ष ग्राहक, दो प्रेमियों के लिए वह युवती जिसका प्रेम पाने के दोनों लालायित है और परीक्षार्थियों के लिए परीक्षक है।
3. प्रतिस्पर्धा समाज मे वस्तुओं/पदों की सीमित मात्रा होने कारण होती है, क्योंकि उन वस्तुओं अथवा पदों को सभी प्राप्त करना चाहते है। यहि कारण है कि मैक्स बेवर ने प्रतिस्पर्धा को शांतिपूर्ण संघर्ष माना।
4. प्रतिस्पर्धा असहयोगी सामाजिक प्रक्रिया का एक स्वरूप है क्योंकि व्यक्ति इसमे एक दूसरे का सहयोग नही करते। लेकिन गिलिन और गिलिन ने इसे सहयोग सामाजिक प्रक्रिया माना है।
5. प्रतिस्पर्धा एक विशेषता यह है कि यह सामान्यतः एक अवैयक्तिक क्रिया होती है। आई.ए.एस. या आर.ए.एस. या माध्यमिक बोर्ड की परीक्षाओं मे बैठने वाले परीक्षार्थियों की संख्या हजारों-लाखों मे होती है, जो अपने-अपने तरीके से परिक्षा की तैयारी करते है और जिन्हें एक-दूसरे के बारे मे कोई जानकारी साधारणतः नही होती। प्रतिस्पर्धा करने वाले एक-दूसरे से अपरिचित होते हुए भी नियमों के अनुसार लक्ष्य-प्राप्ति की कोशिश करते रहते है, परन्तु कई बार प्रतिस्पर्धा करने वाले व्यक्तियों मे सीधा तथा वैयक्तिक सम्पर्क भी होता है, उदाहरण के रूप मे, एक ही स्थान या नागर के दो व्यापारियों या उद्योगपतियों के बीच पायी जाने वाली प्रतिस्पर्धा।
6. प्रतिस्पर्धा सार्वभौमिक प्रक्रिया है। प्रत्येक समाज मे प्रत्येक समय मे प्रतिस्पर्धा किसी न किसी रूप मे पायी जाती रही है ऐसा कोई समाज नही जहाँ जितने व्यक्ति उतनी वस्तुएं, उतनी मात्रा मे रोजगार उपलब्ध हो अतः माँग और पूर्ति मे असंतुलन सभी समाजों मे पाया जाता है।अतः प्रतिस्पर्धा भी सार्वभौमिक प्रक्रिया है।
7. प्रतिस्पर्धा अचेतन प्रक्रिया है। प्रतिस्पर्धा व्यक्ति एक दूसरे के प्रयत्नों के प्रति जागरूक नही होते है। प्रतिस्पर्धा मे संलग्न व्यक्ति अपने प्रयत्नों के प्रति जागरूक रहते है पर सभी प्रतियोगियों के बारे मे जागरूक नही रहते। अतः प्रतिस्पर्धा पर अचेतन प्रक्रिया है।
7. प्रतिस्पर्धा की एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रतिस्पर्धा मे अहिंसात्मक तरीके से लक्ष्य प्राप्ति का प्रयत्न किया जाता है। जहां संघर्ष मे हिंसा या हिंसा की धमकी का सहारा लिया जाता है, वहां प्रतिस्पर्धा मे अहिंसात्मक तरीकों पर जोर दिया जाता है।
8. प्रतिस्पर्धा एक निरन्तर प्रक्रिया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे प्रतिस्पर्धा हर समय पायी जाती है।
9. प्रतिस्पर्धा जन्मजात प्रवृत्ति नही बल्कि यह सांस्कृतिक रूप से प्रतिमानित प्रक्रिया है। इसकी मात्रा सामाजिक संरचना एवं सामाजिक मूल्यों से निर्धारित होती है।
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