3/11/2022

समाजीकरण का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, उद्देश्य

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समाजीकरण का अर्थ (samajikaran kya hai)

Samajikaran arth paribhasha visheshta uddeshy;समाजीकरण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक जैविक प्राणी मे सामाजिक गुणों का विकास होता है और वह सामाजिक प्राणी बनता है। इस प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति समाज और संस्कृति के बीच रहकर विभिन्न साधनों के माध्यम से सामाजिक गुणों को सीखता हैं, अतः इसे सीखने की प्रक्रिया भी कहते हैं। समाजीकरण द्वारा संस्कृति, सभ्यता तथा अन्य अनगिनत विशेषताएं पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती है और जीवित रहती है।
समाज से बाहर व्यक्ति व्यक्ति नही हैं। समाज से पृथक वह असहाय है। समाज से दूर होकर वह चल-फिर नही सकता, बोल-चाल नही सकता। समाज के अभाव मे व्यक्ति का जीवन यदि असम्भव नही तो कठिन एवं दूभर अवश्य है, किन्तु समाज कोई ऐसा जादुई करिश्मा नही कर देता कि जन्म लेते ही बच्चा चलने-फिरने लगे, बोलने-चालने लगे, समझने-समझाने लगे। ऐसा तो सामूहिक जीवन के दौरान जीवन पर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रिया के द्वारा सम्भव होता है। इस प्रक्रिया को समाजीकरण कहते है।

समाजीकरण की परिभाषा (samajikaran ki paribhasha)

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई सामाजीकरण की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं--

ग्रीन के अनुसार, " समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्म एवं व्यक्तित्व को प्राप्त करता हैं।
फिचर के शब्दों में "समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को स्वीकार करता है और उसके साथ अनुकूलन करता हैं।
गिलिन व गिलिन के अनुसार, " समाजीकरण से आश्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा एक व्यक्ति समाज के एक क्रियाशील सदस्य के रूप मे विकसित होता हैं, समूह की कार्यप्रणालियों से समन्वय करता है, उसकी परम्पराओं का ध्यान रखता है और सामाजिक स्थितियों मे व्यवस्थापन करके अपने साथियों के प्रति सहनशक्ति की भावना विकसित करता है।"
प्रो. ए. डब्ल्यू. ग्रीन के अनुसार," लोकसम्मत व्यवहारों को सीखने की प्रक्रिया का नाम सामाजीकरण हैं।" ।फिशर के अनुसार," सामाजीकरण वह प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है और उनमें अनुकूलन करना सीखता हैं।" 
कुक के अनुसार," समाजीकरण की प्रक्रिया का परिणाम यह होता है कि बालक सामाजिक दायित्व को स्वयं ग्रहण करता हैं तथा समाज के विकास में योग देता हैं।" 
किम्बाल यंग के अनुसार," समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रवेश करता है तथा समाज के विभिन्न समूहों का सदस्‍य बनता हैं।" 
अकोलकर के अनुसार," व्यक्ति द्वारा व्यवहार के परम्परागत प्रतिमानों को ग्रहण करने की प्रक्रिया उसका समाजीकरण कहलाती हैं। क्योंकि वह उसके दूसरों पर संगठन करने पर और उसके द्वारा कार्य करने वाली संस्कृति के प्रति खुलेपन पर निर्भर करती हैं।" 
राॅस के अनुसार," सहयोग करने वाले लोगों में अंह की भावना का विकास और उनके साथ काम करने की क्षमता तथा संकल्प को समाजीकरण कहते हैं।" 
न्यूमेयर के अनुसार," एक व्यक्ति के सामाजिक प्राणी के रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया का नाम ही समाजीकरण हैं।" 
जाॅनसन के अनुसार, " समाजीकरण इस प्रकार का सीखना है, सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता हैं।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजीकरण एक सीखने की प्रक्रिया हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति अपने समाज की सांस्कृतिक व्यवस्था को ग्रहण करता है तथा अपने व्यक्तित्व का विकास करता हैं। इस प्रक्रिया द्वारा सीखे गये प्रतिमानों के अनुरूप आचरण करता हैं। इससे सामाजिक नियंत्रण बना रहता हैं।

समाजीकरण की विशेषताएं (samajikaran ki visheshta)

समाजीकरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं--
1. समाजीकरण सीखने की प्रक्रिया हैं
समाजीकरण सीखने एक सीखने की प्रक्रिया हैं। इसके द्वारा व्यक्ति समाज मे , संस्कृति, आदर्श, मूल्य और परम्परा के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है। चलना, बोलना, खाना तथा कपड़ा पहनना, पढ़ना लिखना आदि क्रियाएं व्यक्ति समाज मे सीखता है। किन्तु समाज मे सभी प्रकार की क्रियाओं को सीखना समाजीकरण नही है। झूठ बोलना, चोरी करना, शराब पीना व अन्य नशा करना, जुआ व सट्टा खेलना, मिलावट व कालाबाजारी करना आदि आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली क्रियाओं को सीखना समाजीकरण नही है। ये क्रियाएं सीखने की प्रक्रिया के नकारात्मक पक्ष हैं।
2. समाजीकरण एक निरंतर प्रक्रिया है
समाजीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त चलती रहती है। व्यक्ति जीवन पर्यन्त सीखता रहता है।
3. अनुकरण से प्रभावित 
समाजीकरण की प्रक्रिया में अनुकूलन का विशेष महत्व है। बालक अपने परिवार, पड़ोस, खेल के साथियों तथा अनेक दूसरे संगठनों से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से दूसरे लोगों के व्यवहारों का अनुकरण करते हैं। इस प्रकार वे बहुत से सामाजिक व्यवहारों एवं गुणों को सीखते हैं जो समाजीकरण की प्रक्रिया को सरल बना देते हैं। 
4. आत्मसात की प्रक्रिया 
समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति अपने समाज के सांस्कृतिक मूल्यों, प्रतिमानों तथा स्वीकृत व्यवहारों को आत्मसात करता हैं। यह सब उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं।
5. समाजीकरण की प्रक्रिया सापेक्षिक होती है
समाजीकरण की प्रक्रिया समय व स्थान के सापेक्ष होती है। प्राचीनकाल मे अभिवादन की रीति करबद्ध प्रणाम करना अथवा चरण स्पर्श करना था। किन्तु अब हाथ मिलाना, हेलो या हाय के उच्चारण से स्वागत करना आधुनिकता का सूचक है। इसी प्रकार प्राचीन भारतीय समाज मे पर्दा प्रथा का चलन नही था। विशेष रूप से मध्यकाल से उत्तर भारत मे पर्दा प्रथा का प्रचलन हुआ जो कमोवेश अभी भी विधामान है, जबकि दक्षिण भारत मे पर्दा प्रथा का प्रचलन नही हैं।
6. समाजीकरण मे सांस्कृतिक तत्वों को आत्मसात् किया जाता है
समाजीकरण के द्वारा व्यक्ति अपने समाज की भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति के विभिन्न तत्वों को आत्मसात कर लेता है। किसी समाज के आर्दश, मूल्य, व्यवहार के प्रतिमान क्या होंगे का निर्धारण संस्कृति करती है। व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा जाने-अनजाने दोनों ही रूपों मे अपनी संस्कृति को आत्मसात् कर अपना व्यक्तित्व उसके अनुरूप ढालति हैं।
7. समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा संस्कृति का हस्तांतरण होता हैं
व्यक्ति अपनी संस्कृति मुख्यतया अपने परिवार से सीखता है तथा बड़े होने पर जो उसने सीखा है परिवार के नये सदस्यों को सिखाता है। इस प्रकार संस्कृति का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को होता हैं।
8. आजीवन प्रक्रिया 
समाजीकरण की एक विशेषता मुख्य विशेषता आजीवन प्रक्रिया है। समाजीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक चलती है। व्यक्ति के जीवन मे कभी ऐसा समय नही आता जब उसको सीखने के लिये कुछ न हों। 
9. समाज का प्रकार्यात्मक सदस्य बनने की प्रक्रिया 
समाजीकरण समाज का प्रकार्यात्मक सदस्य बनने की प्रक्रिया हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा बालक समाजिक कार्यों मे भाग लेने योग्य बनता है। समाजीकरण, सामाजिक शिक्षण की प्रक्रिया है, इस प्रक्रिया में नवजात शिशु पालन-पोषण के क्रम में अपने सामाजिक वातावरण (परिवार, समुदाय, विद्यालय आदि) के व्यवहारों को नियंत्रित करता हैं तथा वांछित एवं अवांछित व्यवहार प्रतिमानों में अंतर करना सीखते हैं। इस प्रकार समाजीकरण के द्वारा ही कोई बालक समाज का सामान्य सदस्य बन पाता हैं। 
10. अनुकूलनशीलता 
समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वार ही बालक मे अनुकूलन की क्षमता का विकास होता हैं। बालक का प्रारंभिक जीवन परिवार में माता-पिता, बाई-बहनों एवं परिवार के अन्य सदस्यों के बीच बीतता हैं। जब बालक विद्यार्थी जीवन में प्रवेश करता है तो उसे एक नए संसार का आभास होता हैं। उसे उस नए संसार में समायोजन करने के लिए नवीन गुणों का अर्जन करना पड़ता हैं। इस नवीन संसार मे प्रवेश करने से उसके सामाजिक संपर्क का दायरा विस्तृत हो जाता है। उसके सभी संपर्क बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया को नई दिशा प्रदान करते हैं जिससे बालक के व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिलती हैं।
11. समय तथा स्थान सापेक्ष 
समय-सापेक्ष से अभिप्राय है कि भिन्न-भिन्न समयों पर समाजीकरण की अन्तर्वस्तु भिन्न हो जाती हैं। प्राचीन भारत में व्यक्ति को अपनी जाति का परम्परागत व्यवसाय सीखना पड़ता था। लेकिन अब वर्तमान आधुनिक समय मे ऐसा जरूरी नहीं हैं। स्थान-सापेक्ष से तात्पर्य है कि, एक समाज मे जो व्यवहार उचित होता हैं वही दूसरे समाज में वह अनुचित हो सकता हैं। जैसे ईसाई लोग प्रार्थनागृह में जूते-चप्पल पहनकर जाते हैं। हिन्दू लोग जूते-चप्पल पहनकर मंदिर या प्रार्थनागृह में नही जा सकते।

समाजीकरण के उद्देश्य (samajikaran ki uddeshy)

समाजीकरण के चार उद्देश्यों का उल्लेख ब्रूम तथा सेल्जनिक ने किया है, जो इस प्रकार हैं--
1. आधारभूत नियमबद्धता 
सामाजिक जीवन सुचारू रूप से चलता रहे इस हेतु समाज में अनुशासन एवं नियमबद्धता का होना जरूरी हैं। समाजीकरण का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति में अनुशासन एवं नियमबद्धता उत्पन्न करना हैं। 
2. इच्छाओं की पूर्ति 
समाजीकरण नियमबद्धता के अंतर्गत व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति भी करति हैं। समाजीकरण में पुरस्कार स्वयं अपने आप इच्छाओं की पूर्ति करने में सहायक होता हैं। 
3. सामाजिक भूमिका का निर्वाह 
व्यक्ति समाज में अनेक पद प्राप्त करता है तथा अनेक अन्य व्यक्तियों के संपर्क में आता हैं। प्रत्येक पद तथा व्यक्ति के संदर्भ में उसे विशिष्ट भूमिका का निर्वाह करने की अपेक्षा की जाती हैं। समाजीकरण के द्वारा वह भूमिका का निर्वाह करना सीखता हैं। 
4. क्षमताओं का विकास 
समाजीकरण व्यक्ति में ऐसी क्षमतायें भी पैदा करता हैं जिससे वह सामाजिक परिस्थितियों के साथ सरलतापूर्वक अनुकूलन कर सके। 
इस प्रकार स्पष्ट है कि समाजीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति एवं समाज दोनों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया हैं।

भूमिका और समाजीकरण 

हर शिशु किसी न किसी सामाजिक वर्ग में पैदा होता है और जन्म लेते ही वह उस सामाजिक वर्ग का सदस्य बन जाता है। और पुत्र या पुत्री, पोता या पोती की भूमिका का निर्वाह करता है। किसी व्यक्ति की भूमिका उस की सामाजिक स्थिति से तय होती है और उसकी सामाजिक स्थिति उस विशिष्ट सामाजिक वर्ग में उसकी स्थिति से तय होती है, जिससे उसका संबंध है और इसी से उसके अधिकार और कर्तव्य भी तय होते हैं। किसी भूमिका को कोई कैसे सीखता है? शुरू-शुरू में बालक अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों को भूमिकाएँ करते हुए देखता है और उन्हें स्वयं करने की कोशिश करता है। धीरे-धीरे वह अपने आपको दूसरों से अलग करना सीखता है और अपनी भूमिका का दूसरों की भूमिकाओं से अंतर समझ लेता है। ध्यान से देखने तथा सही आचरण पर पुरस्कृत तथा गलत आचरण पर दंडित होने से प्रातः दृढ़ीकरण के द्वारा प्रत्येक बालक सीखता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में कई भूमिकाओं पुत्र या पुत्री पोते या पोती की भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में हर व्यक्ति को भिन्न-भिन्न सामाजिक परिस्थितियाँ होती है जो आपस में जुड़ी होती है। व्यक्ति विशेष द्वारा किसी एक समय पर निभायी जाने वाली भूमिकाओं के समुायको भूमिका पट (role-set) कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि बालक विभिन्न समाजीकरण अभिओं की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है और पर बालक का अपने माता-पिता के साथ किया गया व्यवहार, अपनी बहन या मित्र या पड़ोसी या सहपाठी के साथ किए गए व्यवहार से अलग होता है ये भूमिकाएँ एक के बाद एक नहीं बल्कि एक साथ निभायी जाती हैं। अन्य भूमिकाएँ इनमें जोड़ी या घटाई जा सकती है। 
इसी प्रकार अपनी दादी या नानी के साथ किया गया व्यवहार अपनी मां के साथ किए गए व्यवहार से अलग होगा ही। जैसे-जैसे बालक बढ़ता है वह इन बारीकियों को पहचानता है और उन्हें आत्मसात करता जाता है। जैसे ही वह एक भूमिका को अच्छी तरह समझ लेता है वह दूसरे के साथ व्यवहार करने योग्य बन जाता है। इसे भूमिका और भूमिका जन्य समाजीकरण कहते हैं। इस प्रकार प्रतिमानों के अनुरूप व्यवहार पद्धति को भूमिका कहते हैं। फिर भी उसे एक विशिष्ट अर्थ दिया जाता है जैसे किसी समाज में लड़के लड़की की भूमिका उस समाज की संस्कृति का एक हिस्सा होती है।
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समाजशास्त्र 
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