6/22/2020

समाजीकरण का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

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समाजीकरण किसे कहते हैं, समाजीकरण का अर्थ (samajikaran ka arth)

समाजीकरण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक जैविक प्राणी मे सामाजिक गुणों का विकास होता है और वह सामाजिक प्राणी बनता है। इस प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति समाज और संस्कृति के बीच रहकर विभिन्न साधनों के माध्यम से सामाजिक गुणों को सीखता हैं, अतः इसे सीखने की प्रक्रिया भी कहते हैं। समाजीकरण द्वारा संस्कृति, सभ्यता तथा अन्य अनगिनत विशेषताएं पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती है और जीवित रहती है।
समाजीकरण
समाज से बाहर व्यक्ति व्यक्ति नही हैं। समाज से पृथक वह असहाय है। समाज से दूर होकर वह चल-फिर नही सकता, बोल-चाल नही सकता। समाज के अभाव मे व्यक्ति का जीवन यदि असम्भव नही तो कठिन एवं दूभर अवश्य है, किन्तु समाज कोई ऐसा जादुई करिश्मा नही कर देता कि जन्म लेते ही बच्चा चलने-फिरने लगे, बोलने-चालने लगे, समझने-समझाने लगे। ऐसा तो सामूहिक जीवन के दौरान जीवन पर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रिया के द्वारा सम्भव होता है। इस प्रक्रिया को समाजीकरण कहते है।
इस लेख मे हम समाजीकरण की परिभाषा और समाजीकरण की विशेषताएं जानेगें।

समाजीकरण की परिभाषा (samajikaran ki paribhasha)

ग्रीन के अनुसार समाजीकरण की परिभाषा " समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्म एवं व्यक्तित्व को प्राप्त करता हैं।
फिचर के शब्दों में "समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को स्वीकार करता है और उसके साथ अनुकूलन करता हैं।
गिलिन व गिलिन के अनुसार " समाजीकरण से आश्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा एक व्यक्ति समाज के एक क्रियाशील सदस्य के रूप मे विकसित होता हैं, समूह की कार्यप्रणालियों से समन्वय करता है, उसकी परम्पराओं का ध्यान रखता है और सामाजिक स्थितियों मे व्यवस्थापन करके अपने साथियों के प्रति सहनशक्ति की भावना विकसित करता है।
जाॅनसन के अनुसार समाजीकरण की परिभाषा " समाजीकरण इस प्रकार का सीखना है, सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता हैं।

समाजीकरण की विशेषताएं (samajikaran ki visheshta)

1. समाजीकरण सीखने की प्रक्रिया हैं
समाजीकरण सीखने एक सीखने की प्रक्रिया हैं। इसके द्वारा व्यक्ति समाज मे , संस्कृति, आदर्श, मूल्य और परम्परा के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है। चलना, बोलना, खाना तथा कपड़ा पहनना, पढ़ना लिखना आदि क्रियाएं व्यक्ति समाज मे सीखता है। किन्तु समाज मे सभी प्रकार की क्रियाओं को सीखना समाजीकरण नही है। झूठ बोलना, चोरी करना, शराब पीना व अन्य नशा करना, जुआ व सट्टा खेलना, मिलावट व कालाबाजारी करना आदि आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली क्रियाओं को सीखना समाजीकरण नही है। ये क्रियाएं सीखने की प्रक्रिया के नकारात्मक पक्ष हैं।
3. समाजीकरण एक निरंतर प्रक्रिया है
समाजीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त चलती रहती है। व्यक्ति जीवन पर्यन्त सीखता रहता है।
4. समाजीकरण की प्रक्रिया सापेक्षिक होती है
समाजीकरण की प्रक्रिया समय व स्थान के सापेक्ष होती है। प्राचीनकाल मे अभिवादन की रीति करबद्ध प्रणाम करना अथवा चरण स्पर्श करना था। किन्तु अब हाथ मिलाना, हेलो या हाय के उच्चारण से स्वागत करना आधुनिकता का सूचक है। इसी प्रकार प्राचीन भारतीय समाज मे पर्दा प्रथा का चलन नही था। विशेष रूप से मध्यकाल से उत्तर भारत मे पर्दा प्रथा का प्रचलन हुआ जो कमोवेश अभी भी विधामान है, जबकि दक्षिण भारत मे पर्दा प्रथा का प्रचलन नही हैं।
5. समाजीकरण मे सांस्कृतिक तत्वों को आत्मसात् किया जाता है
समाजीकरण के द्वारा व्यक्ति अपने समाज की भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति के विभिन्न तत्वों को आत्मसात कर लेता है। किसी समाज के आर्दश, मूल्य, व्यवहार के प्रतिमान क्या होंगे का निर्धारण संस्कृति करती है। व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा जाने-अनजाने दोनों ही रूपों मे अपनी संस्कृति को आत्मसात् कर अपना व्यक्तित्व उसके अनुरूप ढालति हैं।
6. समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा संस्कृति का हस्तांतरण होता हैं
व्यक्ति अपनी संस्कृति मुख्यतया अपने परिवार से सीखता है तथा बड़े होने पर जो उसने सीखा है परिवार के नये सदस्यों को सिखाता है। इस प्रकार संस्कृति का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को होता हैं।
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