6/24/2020

सामाजिक नियंत्रण अर्थ, परिभाषा, प्रकार या स्वरूप, महत्व

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सामाजिक नियन्त्रण का अर्थ (samajik niyantran ka arth)

सामाजिक नियंत्रण प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज व्यक्ति व समूह के संबंधों, व्यवहारों एवं आचरणों को नियंत्रित, निर्देशित व व्यवस्थित करता है तथा व्यक्तियों को समाज के स्थापित मूल्यों, नियमों एवं कार्यप्रणालियों के अनुरूप अपने को ढालने के लिए प्रेरित या बाध्य करता है। वस्तुतः सामाजिक नियन्त्रण सामाजिक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण भाग है। समाज की विभिन्न इकाइयों जैसे--- व्यक्ति, समूह, संस्था, तथा समित, आदि को यदि अपनी स्वेच्छा के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता दे दी जावे तो समाज का संगठन समाप्त हो जावेगा तथा समाज मे अव्यवस्था फैल जाएंगी। इस स्थिति को टालने हेतु ही प्रत्येक समाज अपने सदस्यों, समितियों संस्थाओं के व्यवहारों पर प्रतिबंध लगाता है। समाज द्वारा लगाया गया यह नियंत्रण सामाजिक नियन्त्रण कहलाता हैं।
सामाजिक नियन्त्रण
इस लेख मे हम सामाजिक नियन्त्रण क्या हैं? सामाजिक नियन्त्रण किसे कहते हैं? सामाजिक की परिभाषा, सामाजिक नियन्त्रण के स्वरूप या प्रकार और सामाजिक नियन्त्रण की आवश्यकता या महत्व को जानेंगे। 

सामाजिक नियंत्रण की परिभाषा (samajik niyantran ki paribhasha)

बोगार्ड के अनुसार " सामाजिक नियंत्रण वह पद्धति है, जिसमे एक समूह अपने सदस्य के व्यवहारों को नियंत्रित करता हैं।
टी. बी. वोटोमोर  " सामाजिक नियंत्रण शब्द का अभिप्राय मूल्यों और आदर्शों के उस समूह से है जिसके द्वारा व्यक्तियों और समूहों के बीच संघर्ष को दूर अथवा कम किया जाता है जिससे किसी अधिक समावेशी समूह की सुदृढ़ता बनायी रखी जा सके। 
मैकाइवर एवं पेज " सामाजिक नियंत्रण से आशय उस तरीके से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था अपने को संगठित बनाए रखती है-- एक परिवर्तनशील सन्तुलन की भाँति अपने को क्रियाशील रखती हैं।

सामाजिक नियंत्रण के स्वरूप या प्रकार (samajik niyantran ke pirakary)

सामाजिक नियंत्रण सभी तरह के समाजों मे मिलता है। प्रत्येक समाज की सामाजिक दशाओं एवं व्यक्तिगत व्यवहारों मे भिन्नता होती है। इन विभिन्नताओं के आधार पर सामाजिक नियन्त्रण के स्वरूपों मे भी भिन्नता देखने की मिलती हैं। सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख स्वरूप या प्रकार इस प्रकार हैं--
1. औपचारिक एवं अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण 
औपचारिक सामाजिक नियन्त्रण से आशय ऐसे नियंत्रण से है जो स्पष्ट रूप से परिभाषित हो, सोच-समझर बनाया गया हो। यह अधिकांशतः लिखित होता है। यह नियंत्रण सामान्यतः व्यक्ति के बाहरी आचरण को नियंत्रित करता है। इसके अन्तर्गत संस्थागत सामाजिक नियमों जैसे पंचायत, म्युनिसपैलिटी, महाविद्यालय, क्लब या अन्य ऐसी समितियों के नियमों तथा प्रांतीय एवं राष्ट्रीय कानूनों को रखा जा सकता है। 
इसके विपरीत अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण आदिम समाजों की विशेषता है, किन्तु इसका तात्पर्य यह नही है कि अनौपचारिक नियंत्रणों का सभ्य व जटिल समाजों मे उपयोग नही है। जटिल समाजों मे भी सामाजिक नियन्त्रण प्रधान रूप से नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों के माध्यम से ही होता है, किन्तु ऐसे समाजों मे नियंत्रण कायम करने के लिए ये साधन पर्याप्त नही हैं। प्रथाएं जनरीतियां, लोकाचार, धर्म, परिवार, नैतिकता आदि सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन है।
2. चेतन और अचेतन सामाजिक नियन्त्रण 
चेतन सामाजिक नियन्त्रण को समाज व्यक्ति पर जानबूझकर लगाता है जैसे-- कानून, प्रथा, शिक्षा आदि।
अचेतन नियंत्रण सामाजिक अंतःक्रिया के फलस्वरूप स्वयं विकसित होता है, जैसे--- धर्म, रूढ़ियाँ, लोक रीतियां इत्यादि।
3. सकारात्मक एवं नकारात्मक सामाजिक नियन्त्रण 
ऐसे नियंत्रण जिन्हे पुरस्कारों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाता है सकारात्मक सामाजिक नियन्त्रण कहलाते है। ऐसे नियंत्रण को समाज मे प्रशंसा, अनुमोदन, स्वीकृति तथा पुस्तकों से प्रोत्साहित किया जाता है। जैसे ऐसे लड़के जो अच्छे ढंग से रहते है, समाजोचित व्यवहार करते है, घर, परिवार, पड़ोस, गाँव, स्कूल आदि मे सर्वत्र उनकी प्रशंसा की जाती है और उनके कार्य व्यवहार की सराहना की जाती है। इस तरह उसे व्यक्तिगत पुरस्कार, प्रशंसा, उत्साहवर्धन के द्वारा आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करने हेतु प्रेरित किया जाता है।
नकारात्मक सामाजिक नियन्त्रण के अन्तर्गत व्यक्ति को भयभीत करके सामाजिक नियमों का करने हेतु बाध्य करते है।
4. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सामाजिक नियन्त्रण
प्रत्यक्ष नियंत्रण समीप रहने वाले व्यक्तियों रहने वाले व्यक्तियों, समूहों जैसे-- परिवार, क्रीड़ा समूह, पड़ोसी इत्यादि द्वारा लगाया जाता हैं।
अप्रत्यक्ष नियंत्रण विभिन्न संस्थाओं और समूहों द्वारा लगया जाता है।
5. आग्रह एवं प्रतिरोधी सामाजिक नियंत्रण 
आग्रह एवं प्रतिरोधी नियंत्रण के रूप मे सामाजिक नियंत्रण का वर्गीकरण सकारात्मक और नकारात्मक वर्गीकरण से काफी मिलता-जुलता है। आग्रह मूलक नियंत्रण मे ऐसे नियंत्रणों को शामिल किया जा सकता है जो शिक्षा, अनुकरण या सुझाव के माध्यमों से क्रियाशील होते है। इसमें किसी प्रकार का जोर-दबाव का इस्तेमाल नही किया जाता। ऐसे नियंत्रण के प्रभावशील होने मे अनुकूल परिस्थितियों जैसे समाज मे सदस्यों का शिक्षित, ईमादार व कर्तव्य परायण होना बहुत अधिक सहायक होती है। इसके विपरीत प्रतिरोधी सामाजिक नियंत्रण वह है जो किसी जोर-दबाव के माध्यम से क्रियाशील होता है। जैसे--- पुलिस, जेल व दण्ड विधान के द्वारा क्रियाशील नियंत्रण। 
6. संगठित, असंगठित और सहज सामाजिक नियन्त्रण 
संगठित नियंत्रण नियमबध्द तथा सुपरिभाषित होता है, जैसे-- स्कूल, विवाह, परिवार इत्यादि द्वारा लगया गया नियन्त्रण।
असंगठित नियंत्रण के अंतर्गत संस्कार, परंपराएं, रूढ़ियां और सामाजिक मापदंड इत्यादि आते है। सहज सामाजिक नियन्त्रण का आधार व्यक्ति का अनुभव तथा आवश्यकताएं है, जो व्यक्ति को किसी विशेष कार्य करने की प्रेरणा देती है।

सामाजिक नियंत्रण का महत्व या आवश्यकता (samajik niyantran ka Mahtva aavshyakta)

व्यक्तियों एवं समूहों के व्यवहारों को नियंत्रित करने के लिए सभी समाजों (आदिम से लेकर आधुनिक तक) मे सामाजिक नियंत्रण की आवश्यकता किसी न किसी रूप मे महसूस की गई हैं। प्लेटो, अरस्तू, मनु तथा कौटिल्य जैसे प्राचीन दार्शनिक से लेकर वर्तमान सामाजिक विचारकों तक प्रायः सभी ने समाज के अस्तित्व के लिए समाज मे किसी न किसी मात्रा तक संगठन व व्यवस्था बनाए रखने को आवश्यक कहा है। वास्तव मे सामाजिक कार्यों के सुचारू से संचालन तथा समाज मे एकता व संगठन को बनाए रखने की दृष्टि से समाज मे किसी न किसी प्रकार के नियंत्रण की आवश्यकता पड़ती है। समाज में सामाजिक नियन्त्रण की आवश्यकता एवं महत्व इस प्रकार है---
1. सामाजिक स्वीकृति 
समाज मे अनेक प्रथायें, परंपराएं, रीता-रिवाज़ होते है जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है। समाज मे इन सभी का पालन कराने का कार्य सामाजिक नियन्त्रण के साधनों का है। इस प्रकार सामाजिक नियन्त्रण के साधनों से ही व्यक्ति को समाज के रीति-रिवाज़ को स्वीकार करने पर विवश किया जाता है।
2. सहयोग 
समाज के अस्तित्व और निरंतरता को बनाये रखने हेतु जरूरी है कि उसके सदस्यों मे परस्पर सहयोग हो। नियंत्रण द्वारा व्यक्ति को पारस्परिक सहयोग से अपने लक्ष्यों की पूर्ति करने पर जोर दिया जाता है। सहयोग के बिना समाज मे संघर्ष, अनियंत्रित जीवन तथा सामाजिक विघटन पैदा होगा।
3. परंपराओं की रक्षा 
प्रत्येक समाज की कुछ परंपराएं होती है। यह परंपरायें समाज के लिए उपयोगी होती है। सामाजिक नियन्त्रण ही ऐसी विधि है, जिससे इन परंपराओं को उपयोगी बना सकते हैं।
4. संस्कृति की रक्षा 
प्रत्येक समाज के व्यक्ति अपनी संस्कृति के अनुरूप व्यवहार करते है, इससे उनके व्यवहारों मे एकरूपता रहती है तथा साथ ही संस्कृति की न केवल रक्षा ही होती है वरन् निरंतरता भी बनी रहती हैं।
5. व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण 
सामाजिक नियन्त्रण के साधनों से व्यक्ति का व्यवहार समाज के अनुकूल बनाया जा सकता है। नियंत्रण के बिना मानव, मानव न होकर पशु के समान हो जायेगा। सामाजिक नियन्त्रण से व्यक्ति के स्वच्छंद व्यवहार एवं मनमानी करने पर रोक लगाई जाती हैं।
6. समूह मे एकता
सामाजिक नियंत्रण समूह के सदस्यों को एक-सा व्यवहार करने हेतु प्रेरित तथा विवश करता है। समान नियमों के अंतर्गत रहकर कार्य करने से समान दृष्टिकोण का विकास होता है और समाज मे एकरूपता पैदा होती है।
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