6/23/2020

समाजीकरण के सिद्धांत

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समाजीकरण के सिद्धांत (samajikaran ke siddhant)

samajikaran ka siddhant; समाजीकरण कैसे होता है? कौन-सी अभिप्रेणाएँ है जो बालक को किसी क्रिया को करने के लिए प्रेरित करती है? इन प्रश्नों के उत्तर के संदर्भ मे कई विचारकों ने सिध्दांतों का प्रतिपादन किया हैं। इनमे कूले, जाॅर्ज मीड, चालर्स हाॅर्टन, दुर्खीम, सिग्मंड फ्रायड का सिद्धांत प्रमुख हैं। समाजीकरण के द्वारा व्यक्ति के आत्म या स्व का विकास होता है। इसके विकास की प्रक्रिया को विद्वानों ने अपने-अपने सिद्धांतों द्वारा स्पष्ट किया हैं। समाजीकरण के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं---
1. दुर्खीम का सिद्धांत 
दुर्खीम ने समाजीकरण के सिद्धांत मे सामूहिक प्रतिनिधित्व की अवधारणाओं के आधार पर अपने समाजीकरण सम्बंधित विचार दिए है।
दुर्खीम ने व्यक्तिगत चेतना तथा सामूहिक चेतना, इन दो प्रकार की चेतनाओं का अस्तित्व माना है। व्यक्तिगत चेतना से ही सामूहिक चेतना का निर्माण होता है। यह सामूहिक चेतना ही सामूहिक प्रतिनिधियों को जन्म देती है। दुर्खीम के अनुसार प्रत्येक समाज मे कुछ विचार, धारणाएं एवं मान्यताएं ऐसी होती है जिन्हे समाज के सभी सदस्य मानते है। अतः ये समूह का प्रतिनिधित्व करती है। परम्पराएं, रीति-रिवाज, धर्म, मूल्य, आर्दश, प्रथाएं, आदि सामूहिक प्रतिनिधान के ही उदाहरण है। इनकी उत्पत्ति व्यक्ति विशेष से न होकार समाज के अधिकांश व्यक्तियों द्वारा होती है। अतः समूह के सभी लोग इनका पालन करते है। इनके पीछे नैतिक दबाव होता है। इनकी अवहेलना करने पर दण्ड दिया जाता हैं।
2. कूले का स्व दर्पण का सिद्धांत
कुले के अनुसार व्यक्ति का स्व अथवा आत्म वास्तव मे आत्म दर्पण है अर्थात् दूसरों का उसके प्रति दृष्टिकोण एवं मूल्याकंन है जिसमे व्यक्ति दूसरों की दृष्टि मे अपने को देखता है। स्व के विकास के प्रारंभिक स्तर पर व्यक्ति अपने को दूसरों की दृष्टि से देखता है अर्थात् दूसरों की दृष्टि से अपना मूल्यांकन करता है। अपने बारे मे कोई विचार वह इस आधार पर बनाता है कि दूसरे उसके बारे मे क्या सोचते है, धीरे-धीरे वह दूसरों के विचार एवं दृष्टिकोण को अपने मे समाविष्ट करता हैं।
3. सिग्मंड  फ्रायड का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत
समाजीकरण से संबंधित अपने विचारों को अधिक स्पष्ट करने के लिए फ्रायड ने आत्म (इड) 'अहं' (इगो) तथा परा अहं (सुपर इगो) की अवधारणाओं का प्रयोग किया है। आत्म से फ्रायड का तात्पर्य मूल प्रेरणाओं से है। यह बालक की मूल प्रवृत्ति से प्रेरित स्थिति है। बालक को जन्म से जैविक ऊर्जा प्राप्त होती है। परिवार व अन्य से सम्पर्क के माध्यम से उसमे अहं का विकास होता है। समाज मे विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए कुछ नियम बने होते है, जिन्हें व्यक्ति परिवार मे अपने माता-पिता व अन्य सदस्यों तथा पड़ोस से सीखता है। यहाँ उसका अहं विकसित होता है, परा अहं इसके आगे की अवस्था है, जिसमें बालक संस्कृति के अनुसार व्यवहार करना शुरू करता है। परा अहं के द्वारा व्यक्ति चेतना अवस्था मे निश्चित करता है कि किस प्रकार की क्रिया उसे करनी है अथवा नही करनी है। परा अहं मे व्यक्ति तार्किक दृष्टिकोण से कार्य का विश्लेषण करता है कि उसे अमुक कार्य करना चाहिए अथवा नही करना चाहिए। व्यक्ति के अहं और परा अहं मे कई बार तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे मे यदि व्यक्ति का अहं परा अहं पर हाॅबी होकर कोई कार्य करवाता है तो कई बार यह असामाजिक हो सकता है जिससे समाज की एकता मे बाधा पहुँचाती है।
4. जाॅर्ज मीड का सिद्धांत
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जार्ज मीड ने अपना समाजीकरण का सिद्धांत अपनी पुस्तक 'माइन्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी मे प्रस्तुत किया है। मीड ने अपने सिद्धांत मे व्यक्ति तथा समाज मे समाज को ज्यादा महत्वपूर्ण माना है। मीड ने समाजीकरण मे आत्म-चेतना को आधार माना है जिसका निर्माण सामाजिक अतः क्रिया के परिणामस्वरूप होता है। मीड ने व्यक्ति के दो स्वरूपों का उल्लेख किया है---
1. जैविकीय व्यक्ति 2. सामाजिक रूप मे आत्म चेतन व्यक्ति
जब बच्चा जन्म लेता है तब वह जैविकीय व्यक्ति होता है तथा वह आंतरिक प्रेरणाओं से प्रेरित क्रियाएं करता है। परिवार के सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के सम्पर्क से वह यह समझने लगता है कि लोग उससे किस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करते है। इस प्रकार बच्चे का स्व दूसरे लोगों के व्यवहार से प्रभावित होता है। मीड इसे ही सामान्यीकृत-अन्य कहते है, जिसका अर्थ है-किसी व्यक्ति की स्वयं के बारे मे वह धारणा जो कि दूसरे लोग उसके बारे मे रखते है। व्यक्ति मे आत्म का विकास किस प्रकार से होता है यह स्पष्ट करने हेतु मीड ने मैं और मुझे शब्द का प्रयोग किया हैं। इस सिद्धांत को मैं और मुझे का सिद्धांत भी कहा कहा जाता है।
मैं का अर्थ व्यक्ति द्वारा दूसरों के प्रति किए जाने वाले व्यवहारों से है और मुझे का अर्थ व्यक्ति द्वारा किए गए व्यवहारों पर अन्य व्यक्तियों की प्रतिक्रिया जिसे व्यक्ति ग्रहण करता हैं।
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