6/27/2020

विकास का अर्थ और परिभाषा

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विकास का अर्थ (vikas ka arth)

हर वस्तु या प्राणी मे कुछ न कुछ मूल या गुण विशेष रूप से होते है पर आरंभ मे ये छिपे रहते है। अवसर व आयु के अनुसार इन गुणों को बाहर दिखलाई देने का अवसर मिलता है। ये धीरे-धीरे बाहर आ जाते है तथा बढने लगते है। आंतरिक गुणों का बाहरी रूप मे बढ़ना ही विकास कहलाता है। इस तरह विकास बालक तथा समाज दोनों मे ही होता है। बालक के विकास का एक निश्चित क्रम होता है और सभी स्थानों पर समान रूप से होता है किन्तु समाज को विकास का कोई भी निश्चित व सार्वभौमिक क्रम नही है और यह विकास सभी स्थानों पर सभी समाजों पर एक साथ या समान रूप से होता है।
सामाजिक उद् विकास की प्रकृति उद् विकास से मौलिक रूप से भिन्न है। इसलिए आधुनिक समाजशास्त्रीय साहित्य मे उद् विकास के स्थान पर विकास शब्द का प्रयोग अधिकांशतया किया जाता है। समाजशास्त्रीय साहित्य मे विकास शब्द की लोकप्रियता का श्रेय हाब हाउस को जाता है। हाब हाउस ने हाॅलांकी स्पेंसर के उद् विकासीय सिद्धांत के कतिपय पहलुओं की आलोचना की किन्तु उसने सामाजिक विकास के जो आधार निश्चित किए वे बहुत कुछ जैविक उद् विकास के आधारों से मिलते-जुलते है। वास्तव मे दोनो अवधारणाओं मे बहुत समानता है अन्तर मुख्यतया यह है कि उद् विकास की व्याख्या करते समय परिवर्तन के जैविक पक्ष पर जोर दिया जाता है, जबकि विकास की व्याख्या मे ऐतिहासिक पक्ष पर बल दिया जाता है। दूसरे शब्दों मे, सामाजिक विकास समाज मे ऐतिहासिक परिवर्तन को दर्शाता है।
सामाजिक दृष्टि से विकास सामाजिक संस्थाओं की वृध्दि को कहा जा सकता है। विकास एक प्रकार से ऐसी आंतरिक शक्ति है जो किसी प्राणी या समाज को उन्नति की ओर ले जाता है। विकास उस स्थिति का नाम है जिससे प्राणी मे कार्य क्षमता बढती हैं। विकास को एक तरह से अभिवृद्धि भी कहा जा सकता है।

विकास की परिभाषा (vikas ki paribhasha)

अतएव सोरेन्सर " सामाजिक अभिवृद्धि व विकास का तात्पर्य है अपनी दूसरो की उन्नति के लिए योग्यता वृद्धि है।
फ्रांसिस एफ. पावर्स " सामाजिक दाय को ध्यान मे रखकर व्यक्ति के सत् कार्यों, उत्तरोत्तर विकास और उन सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्थित चरित्र का निर्माण ही सामाजिक अभिवृद्धि है।

सामाजिक उद्विकास एवं सामाजिक विकास मे अन्तर 

सामाजिक उद् विकास व सामाजिक विकास की अवधारणाओं मे समानता व असमानता दोनों है। सामाजिक उद्विकास की भांति सामाजिक विकास भी संरचनात्मक विभेदीकरण को दर्शाने वाली प्रक्रिया है। इसकी प्रगति गुणात्मक होती है अर्थात् इसमे वस्तु मे संरचनात्मक या गुणात्मक भिन्नता का उत्पन्न होना जरूरी होता है भले ही वस्तु की मात्रा या आकार मे परिवर्तन न हो।
उक्त समानताओं के बावजूद उद्विकास और सामाजिक विकास मे अन्तर भी है। सामाजिक उद्विकास तथा सामाजिक विकास की अवधारणाओं मे पाए जाने वाले अंतर निम्नलिखित है---
1. उद्विकास जहाँ मात्र आन्तरिक कारणों से प्रेरित होता है वही विकास मे आन्तरिक कारणों के साथ-साथ बाहरी या नियोजित कारण भी प्रभावशाली हो सकते है।
2. उद्विकास की धारणा की मूल पृष्ठभूमि जैविक होने के कारण उसकी व्याख्या मे ऐतिहासिक पक्ष उल्लेखनीय नही होता, किन्तु विकास का मूल आधार समाज के कारण उसकी विवेचना मे ऐतिहासिक सन्दर्भ  अर्थपूर्ण हो जाता है।

3. सामान्यतः सामाजिक आर्थिक संस्थाओं या समाज के उद्विकास को विभिन्न स्तरों के आधार पर स्पष्ट किया जाता है, जबकि सामाजिक विकास साधारणतया दो, परम्परागत एवं आधुनिक (अथवा कृषक, औधोगिक) या तीन, परम्परात्मक, संक्रमणकालीन एवं आधुनिक स्तरों के आधार पर स्पष्ट किया जाता है।

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