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9/13/2021

वातावरण का अर्थ, परिभाषा, महत्व

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वातावरण का अर्थ (vatavaran kise kahte hai)

vatavaran arth paribhasha mahatva;वातावरण शब्द के स्थान पर पर्यावरण को प्रयुक्त किया जाने लगा है, अगर हम वातावरण शब्द की संधि के आधार पर व्याख्या करें तो इसका अर्थ परि+आवरण यानी चारों तरफ से घेरने वाला अथवा ढँकने वाला होगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि वातावरण वह वस्तु है जो व्यक्ति को चारों तरफ से ढककर आकर्षण पैदा करती है। अगर व्यक्ति के व्यक्तित्व में आकर्षण पैदा नही होता हैं, तो उसे हम वातावरण नही कहते हैं। अतः बालक के विकास हेतु वातावरण की जरूरत पर विशेष बल दिया गया हैं। 

वातावरण की परिभाषा (vatavaran ki paribhasha)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने वातावरण का अध्ययन किया एवं उसे निम्न रूप से परिभाषित किया हैं-- 

पी. जिसबर्ट के अनुसार," वातावरण वे सभी वस्तुएँ है जो किसी एक वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए हैं तथा उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। 

टी. डी. इलिएट के अनुसार," किसी भी चेतन पदार्थ की इकाई के प्रभावशाली उद्दीपन एवं अन्त:क्रिया के क्षेत्र को वातावरण कहते हैं। 

बोरिंग, लैंगफील्ड एवं वील्ड के अनुसार," व्यक्ति के वातावरण के अंतर्गत उन सभी उत्तेजनाओं का योग आता है जिन्हें वह जन्म से मृत्यु तक ग्रहण करता हैं।" 

राॅस के अनुसार," वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती हैं।" 

एनास्टासी के अनुसार," वातावरण वह प्रत्येक वस्तु है, जो व्यक्ति जीन्स के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करती हैं।" 

वुडवर्थ के अनुसार," अनुवंशिकता में भिन्न व्यक्ति समान नही होते हैं किन्तु समान वातावरण उन्हें समान बना देता हैं।" 

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि मानव के चारों ओर का वातावरण अत्यधिक विस्तृत होता है जो उसे गर्भाधान के बाद से जीवनपर्यन्त प्रभावित करता है। वातावरणीय तत्वों से प्रभावित होकर ही मानव विकास होता हैं। 

वातावरण का महत्व (vatavaran ka mahatva)

वातावरण का मानव जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। शिक्षा में वातावरण का विशेष महत्व है क्योंकि इससे बालक के भावी जीवन का बहुमुखी विकास एवं निर्माण करना संभव होता है। वातावरण के महत्व का बालक पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। इसलिए वातावरण का महत्व जानने के लिये अनेक अध्ययन किये गये और उनके निष्कर्षों से यह निर्धारित किया गया कि बालक के विकास में वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। कुछ विद्वानों के अध्ययन और उनसे निकाले गये निष्कर्षों के आधार पर वातावरण के महत्व का उल्लेख निम्नलिखित हैं-- 

1. व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टि से 

कूले के अनुसार," व्यक्तित्व निर्माण में वातावरण की भूमिका प्रमुख रहती है। उन्होंने अपने अध्ययन से यह सिद्ध कर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति उचित वातावरण पाकर महान् बन सकता है, भले ही वह निर्धन या पिछड़े हुये परिवार में क्यों न जन्मा हो! कूले ने बनयन और बरन्स नामक दो व्यक्तियों का अध्ययन किया जिनका कि जन्म निर्धन परिवार में हुआ था और यह निष्कर्ष निकाला कि व्यक्ति उचित वातावरण मिलने के फलस्वरूप महान् व्यक्ति बने। इस प्रकार कूले ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि व्यक्तित्व निर्माण में वंशानुक्रम की तूलना मे वातावरण का ज्यादा प्रभाव पड़ता हैं। 

2. मानसिक विकास की दृष्टि से 

अनेक मनोवैज्ञानिकों का विश्वास है कि यदि किसी व्यक्ति को उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण मिले तो उसका मानसिक विकास भली-भाँति होता है। गोरडन का विश्वास है कि यदि किसी व्यक्ति को उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण न मिले तो उसका मानसिक विकास रूक जाता है। उसने अनेक बालकों का अध्ययन किया। इनमें से कुछ नदियों के किनारे और पिछ़ड़े क्षेत्रों में रहते थे। गोरडन ने यह पाया कि ऐसे बालकों का समुचित मानसिक विकास नही हो पाया क्योंकि उन्हें उचित वातावरण नहीं मिल सका था। 

3. बुद्धि की दृष्टि से महत्व

स्ट्राउट, फिल्मोर वाल्डविन ने ग्रामीण और नगरीय क्षेत्र में पलने वाले बालकों की बुद्धि परीक्षण कर इसका तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने पाया की शैशवकाल में इन बच्चों की बुद्धिलब्धि में कोई अधिक अंतर नही था, किन्तु बाद में उनकी बुद्धिलब्धि में अंतर आ गया। इसका कारण यह है कि नगरों में वातावरण उन्नत होने की वजह से बौद्धिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार का एक अध्ययन आयोवा ने किया और यह निष्कर्ष निकाला कि ग्रामीण बच्चों की बुद्धिलब्धि नगरीय बच्चों की बुद्धिलब्धि से प्रारंभ में कम नहीं थी, किन्तु पाँच-छह वर्ष की आयु के ग्रामीण बच्चों में नगरीय बच्चों की अपेक्षा हीनता आने लगी थी। कैण्डोल का भी कहना है कि," व्यक्ति के विकास पर वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है और उचित वातावरण में बुद्धि का विकास अधिक होता हैं।" 

4. शारीरिक विकास की दृष्टि से 

वैसे शारीरिक विकास पर वंशानुक्रम का ही प्रभाव माना गया है किन्तु भौगोलिक परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण वातावरण का व्यक्ति के शारिरिक विकास पर प्रभाव पड़ता हैं। तुलनात्मक अध्ययन यह सिद्ध करते हैं कि सामान्यतया जापानी और यहूदी छोटे कद के होते हैं, किन्तु बहुत से जापानी और यहूदी जो अमेरिका मे अनेक वर्षों से निवास कर रहे हैं, भौगोलिक पर्यावरण के कारण, कद में लम्बे होने लगे हैं। इसका कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है। 

5. जातीय आधार की दृष्टि से 

कुछ अध्ययनों द्वारा यह पाया गया है कि असभ्य और पिछड़ी जातियां प्रशिक्षण और सभ्यता के प्रभाव मे आकर परिवर्तित हुई और सभ्य बनीं। इस संबंध में क्लार्क का कहना है कि कुछ प्रजातियों और जातियों की श्रेष्ठता का कारण उनका वातावरण है नाकि वंशानुक्रम। उन्होंने अमेरिका के कुछ श्वेत और अश्वेत परिवारों का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि वहां के अश्वेत नीग्रो प्रजाति के बच्चों में सामान्य बुद्धिलब्धि थी। फिर भी उनकी बुद्धि का स्तर इस कारण निम्न हैं क्योंकि उनको समुचित शैक्षिक, आर्थिक, व सांस्कृतिक वातावरण नहीं मिल सका है और ज्यों ही उन्हें समुचित वातावरण मिला इनकी बुद्धिलब्धि बढ़ गई। 

6. अनाथ बच्चों की दृष्टि से 

अनाथ बच्चों के अध्ययन हेतु आयोवा विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों ने इन बच्चों को दो वर्गों में रखा। एक वर्ग को अच्छी शिक्षा दी गई तथा खाने-पीने, खेल-कूद आदि की सभी समुचित सुविधायें दी गई, जबकि दूसरे वर्ग को इन सबसे वंचित रखा गया। कुछ समय बाद परीक्षण लेने से ज्ञात हुआ कि पहले वर्ग के बालकों का समुचित मानसिक और शारीरिक विकास हुआ है और उनकी बुद्धिलब्धि अधिक थी। स्पष्ट है कि अनाथालय में जिन बच्चों का लालन-पालन होता हैं, ये प्रायः उपेक्षित और निम्न परिवारों से संबंधित होते हैं, किन्तु यदि उन्हें अपने परिवारों की अपेक्षा अच्छा वातावरण मिलता है और उनके साथ सहानु‍भूतिपूर्ण अच्छा व्यवहार किया जाता है तो उनका विकास सही दिशा में होता है और वे अच्छे व्यक्ति बन जाते हैं। 

7. जुड़वाँ बच्चों की दृष्टि से 

जुड़वां बच्चों पर कई अध्ययन किये गये और यह पाया गया कि उनके शारीरिक लक्षणों, मानसिक शक्तियों और शैक्षणिक योग्यताओं में अत्यधिक समानता होती है पर जब उन्हें अलग-अलग वातावरण में रखकर उनका लालन-पालन किया गया तो यह पाया गया कि उनमें विकास एवं बुद्धिलब्धि की दृष्टि से बहुत अंतर आ गया। न्यूमैन और अन्य मनोवैज्ञानिकों ने कुछ जुड़वां बच्चों को अलग-अलग वातावरण में रखकर उनका अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि नगर में पलने वाला बच्चा शिष्ट, बुद्धिमान और चिन्तामुक्त था, जबकि गाँव में पलने वाला बच्चा अशिष्ट, मंदबुद्धि और चिन्ताग्रस्त था। इस प्रकार स्पष्ट है कि दोनों बच्चों पर वातावरण का व्यापक प्रभाव पड़ा।

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यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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