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9/11/2021

बाल्यावस्था क्या हैं? विशेषताएं, शिक्षा स्वरूप

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बाल्यावस्था का अर्थ (balyavastha kise kahte hai)

balyavastha ka arth paribhasha visheshta shiksha ka svarup;विद्वानों ने बाल्यावस्था को 6 से 12 वर्ष तक माना है। इस प्रकार से शैशवावस्था एवं किशोरावस्था के मध्य की अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है। शैशवास्था पूरी करने के बाद बालक बाल्यावस्था में प्रवेश करता है। 

इस अवस्था मे बालक मे कुछ ऐसे परिवर्तन होते हैं। जिन्हें अभिभावक और अध्यापक आसानी से समझ नही पाते है। शैशावस्था मे बालक का शरीर और मन दोनों अविकसित दशा मे होते हैं, वह प्रत्येक बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, परन्तु बाल्यावस्था मे प्रवेश करने के बाद बालक आत्म-निर्भर होने लगता है। उसका बाहरी परिवेश से संपर्क बढ़ता हैं तथा जिज्ञासाओं मे तेजी से वृद्धि होती है। इसलिए वह अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित करता है। इस अवस्था में जहाँ वह बच्चा होता है वही बड़े होने का भी अनुभव करने लगता है। उसकी गतिविधियों का दायरा बढ़ जाता है। वह ऐसे-ऐसे कार्य भी करना पसंद करता है जिसमें उसे आत्मगौरव की अनुभूति हो। वह आनन्दमयी व सृजनात्मक कार्यों की ओर तेजी से अग्रसर होने लगता है। 

किलपैट्रिक ने बाल्यावस्था को प्रतिद्वंदिता का काल माना है।" 

कुप्पूस्वामी के अनुसार," बाल्यावस्था में अनेक अनोखे परिवर्तन देखे जा सकते हैं।" 

बाल्यावस्था की विशेषताएं (balyavastha ki visheshta)

बाल्यावस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं--

1. शारीरिक तथा मानसिक विकास में स्थिरता 

इस काल में शैशवावस्था की अपेक्षा मानसिक एवं शारीरिक विकास की गति मे स्थिरता आ जाती है। इस अवस्था में बालक के शरीर और मस्तिष्क में दृढ़ता आ जाती है। बालक की मानसिक शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है। अब वह पर्याप्त काल तक अपना ध्यान किसी वस्तु पर केन्द्रित कर सकता है तथा उसकी समझ मे भी वृद्धि हो जाती है। यद्यपि शारीरिक विकास की गति मंद हो जाती है तथापि उसमें स्थायित्व आ जाता हैं। 

2. मानसिक योग्यताओं का विकास 

इस अवस्था में बालकों मे सभी आवश्यक मानसिक योग्यताएँ विकसित होने लगती है। वह मूर्त तथा प्रत्यक्ष वस्तुओं के लिए सरलता से चिंतन कर लेता हैं। समझने, स्मरण करने, तर्क करने आदि की योग्यताएँ विकसित हो जाती हैं। 

3. प्रबल जिज्ञासा की प्रकृति 

बाल्यावस्था की एक मुख्य विशेषता बालक में प्रबल जिज्ञासा की प्रकृति का होना है। वह जिन वस्तुओं के संपर्क में आता है, उनके बारे में प्रश्न पूछकर हर प्रकार की जानकारी प्राप्त करना चाहता है। वह अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए माता-पिता व घर के अन्य सदस्यों से प्रश्न पूछता है। बालावस्था मे बालक 'क्यों' और 'कैसे' भी जानना चाहता हैं। 

4. वास्तविक जगत से संबंध 

बाल्यावस्था मे बालक काल्पनिक जगत से निकल कर वास्तविक जगत मे विचरण करने लगता है। वह वास्तविक जगत की प्रत्येक वस्तु से आकर्षित होता है तथा इसके बारे मे अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। 

5. सामूहिक खेल-कूदों मे भाग लेने की प्रवृत्ति 

बाल्यावस्था में बालकों मे सामूहिक खेल-कूदों मे भाग लेने की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है और बालक-बालिकायें अपने समूह वर्ग के सामूहिक खेल-कूदों में भाग लेते हैं। प्रायः बालक-बालिकायें अपनी-अपनी टोली बनाकर खेलना पसंद करते है। इसलिए प्रत्येक बालक किसी न किसी टोली का सदस्य होता है। 

6. रचनात्मक कार्यों में रूचि 

बालावस्था की एक विशेषता यह है कि इस अवस्था मे बालक में रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास हो जाता है। लड़के-लड़कियाँ अपनी रूचि के अनुसार विविध कार्यों को करने मे रूचि दिखाते है। इस उम्र मे लड़के खिलौने जोड़ने लग जाते है और लड़कियां गुडिया बनाना प्रारंभ कर देती है। 

7. आत्मनिर्भरता 

बाल्यावस्था मे बालक मे आत्मनिर्भरता का विकास होने लगता है। शैशावस्था की तरह बालक शारीरिक एवं दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर आश्रत नही रहता है। वह अपने 'दैनिक कार्य (नहाना, कपड़े पहनना, भोजन करना, स्कूल जाने की तैयारी इत्यादि) स्वयं करने लगता है। 

8. सामाजिकता की भावना का विकास 

इस अवस्था में अब उसमें सामाजिकता की भावना का विकास होने लगता है। वह विभिन्न व्यक्तियों, हमउम्र बालक-बालिकाओं से मिलना पंसद करता है तथा उनके संपर्क मे आकर आनन्द का अनुभव करने लगता है। विद्यालय का वातावरण विशेष रूप से प्रभावित करता है। बालक अपने साथियों से अनेक बातें सीखने मे रूचि लेता है। विभिन्न विषयों पर वार्तालाप भी करता है। वह अपने आसपास विद्यालय और समाज के वातावरण के प्रति जागरूक होने लगता है। 

9. नैतिक गुणों का विकास 

बाल्यावस्था मे बालक मे नैतिक गुणों का विकास होने लगता हैं। स्ट्रैंग के अनुसार," छः सात तथा आठ वर्ष के बालकों मे अच्छे-बूरे के ज्ञान का और न्यायपूर्ण व्यवहार, ईमानदारी तथा सामाजिक मूल्यों की भावना का विकास होने लगता हैं।" 

10. बर्हिमुखी व्यक्तित्व का विकास 

इस अवस्था में बालकों में बर्हिमुखी प्रकृति विकसित होने लगती है। वे बाहर घुमने, बाहर की वस्तुओं को देखने, दूसरों के प्रति जानने आदि में रूचि प्रदर्शित करने लगते है।

11. संवेगों पर नियंत्रण 

इस अवस्था में बालक उचित-अनुचित मे अंतर करने लगता है। बाल्यावस्था मे बालक सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवहार के लिए अपनी भावनाओं पर दमन और संवेगों पर नियंत्रण स्थापित करना सीख जाता है।

12. संग्रह करने की प्रवृत्ति 

बाल्यावस्था की एक विशेषता संग्रह करने की प्रवृत्ति भी है। बाल्यावस्था में बालकों तथा बालिकाओं में संग्रह करने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र हो जाती है। बालक विशेष रूप से काँच के कंचे, पत्थर के टुकड़े, टिकटों तथा मशीनों के भागों संचय करते हैं। बालिकाओं में चित्रों, खिलौनों, गुड़ियों तथा कपड़ों के टुकड़ो का संग्रह करने की प्रवृत्ति देखी जाती हैं।  

13. औपचारिक शिक्षा का प्रारंभ 

इस अवस्था मे बालक की भाषा विकास के साथ-साथ औपचारिक शिक्षा प्रारंभ हो जाती है और वह स्कूल जाना शुरू कर देता है। इसके साथ बालक में निरूद्देश्य भ्रमण करने की आदत पड़ जाती हैं। 

14. स्मरण शक्ति में सुदृढता 

बाल्यावस्था में स्मरण शक्ति शैशवकाल की अपेक्षा पर्याप्त विकसित हो जाती है। कई विद्वानों के अनुसार आमतौर पर 6 से 12 वर्ष के बीच बालक पूर्व अनुभवों को याद करने योग्य हो जाते हैं और भाषा भी अनुभव द्वारा ज्ञानार्जन के लिये सहायता देता है। 

15. काम-प्रवृत्ति की न्यूनता 

बालक में काम-प्रवृत्ति की न्यूनता होती है। वह अपना अधिकांश समय मिलने-जुलने, खेलने-कूदने तथा पढ़ने-लिखने में व्यतीत करता हैं। अतः वह बहुत ही कम अवसरों पर अपनी काम-प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर पाता है। 

16. यथार्थवादी दृष्टिकोण 

बाल्यावस्था में बालक का दृष्टिकोण यथार्थवादी होता हैं। अब बालक कल्पना जगत से वास्तविक संसार में प्रवेश करने लगता हैं। 

17. प्रतिस्पर्धा की भावना 

बाल्यावस्था में प्रतिस्पर्धा की भावना आ जाती है। बालक अपने भाई-बहन से भी झगड़ा करने लग जाता है।

बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप (balyavastha me shiksha ka svarup)

बालक की औपचारिक शिक्षा का श्रीगणेश बालावस्था के प्रारंभ के साथ होता हैं। यह अवस्था किशोरावस्था के लिए आधार तैयार करती है। अतएव बाल्यावस्था की शिक्षा पर अध्यापकों को विशेष ध्यान देना चाहिए। यहाँ कुछ बिन्दुओं पर चर्चा की जा रही है जो शिक्षा  का स्वरूप निश्चित करने में मददगार हो सकते हैं-- 

1. जिज्ञासा की संतुष्टि 

बालकों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति प्रबल होती है। इस प्रवृत्ति का लाभ उठाकर अध्यापक को उनका ध्यान अध्यापन तथा पाठ की तरफ केन्द्रित करने का प्रयास करना चाहिए। पाठन-सामग्री तथा क्रियाओं का चयन बालकों की जिज्ञासाओं को संतुष्ट करने की दृष्टि से करना चाहिए। 

2. रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था 

बालकों में विधायकता की प्रवृत्ति ज्यादा तीव्र होती है। अतएव विद्यालय में रचनात्मक कार्य करने की व्यवस्था पर अध्यापकों को ध्यान देना चाहिए। रचनात्मक कार्य द्वारा बालकों में हस्तकौशल के प्रति रूचि पैदा की जा सकती हैं एवं इस तरह कुशलता का विकास किया जा सकता है। 

3. पर्यटन की व्यवस्था 

इस आयु के बालकों में घूमने की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। बालक निरूद्देश्य घूमते-फिरते हैं। इसका लाभ शिक्षकों को उठाना चाहिए। विद्यालय में समय-समय पर भ्रमण का आयोजन निकटवर्ती क्षेत्र में करना चाहिए। भ्रमण का आयोजन ऐतिहासिक स्थलों या प्राकृतिक स्थानों का निरीक्षण करने के लिए होना चाहिए। भ्रमण के समय बालकों की निरीक्षण-शक्ति के विकास पर अध्यापक को ध्यान देना चाहिए। 

4. सामूहिक क्रियाओं का आयोजन 

बाल्यावस्था में बालक समूह में रहना अधिक पसंद करता है। अतएव विद्यालय में सामूहिक क्रियाओं तथा सामूहिक खेलों का आयोजन करना चाहिए। इन सामूहिक कार्यों मे भाग लेते समय बालक में उदारता, सहकारिता, नेतृत्व आदि गुणों के विकास पर अध्यापक को ध्यान देना चाहिए। 

5. संग्रह प्रवृत्ति को प्रोत्साहन 

बालकों मे संग्रह प्रवृत्ति का अवदमन न करके उसको प्रोत्साहित करना चाहिए। बालकों को शिक्षाप्रद वस्तुओं के संग्रह हेतु मार्ग-निदर्शेन देना चाहिए। डाक-टिकट, सिक्के, चित्र आदि का संग्रह करने हेतु बालकों को प्रोत्साहित करना चाहिए। 

6. सामाजिक गुणों का विकास 

विद्यालय में खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम शिक्षण-विधियों के द्वारा बालकों मे सामाजिक गुणों के विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। बालकों को एक-दूसरे का सम्मान करने का पाठ सिखाना चाहिए। सामाजिक गुणों के विकास में अध्यापक के व्यवहार का ज्यादा प्रभाव पड़ता हैं। 

7. अध्यापकों का स्नेहयुक्त व्यवहार 

बालक अनुकरण द्वारा बहुत सीखता है। इस अवस्था में दमनात्मक अनुशासन उसकी स्वच्छन्दता में बाधा पैदा करता है। वह शारीरिक दण्ड को पसंद नहीं करता है। अतएव अध्यापक को प्रेम तथा सहानु‍भूतिपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करके छात्रों को विद्यालय के कार्य पूर्ण करने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। 

8. नैतिकता विकास 

बालक के शिष्ट आचरण की प्रसंशा करनी चाहिए। उसके द्वारा संपन्न बुरे कामों की निंदा करके ऐसे कार्यों की पुनरावृत्ति को निरूत्साहित करना चाहिए। इस स्तर पर कहानी-विधि द्वारा बालकों में नैतिक गुण विकसित किये जा सकते हैं। उनके पाठ्यक्रमों में धार्मिक एवं राष्ट्रीय नेताओं की जीवनी भी शामिल करनी चाहिए। 

9. शारीरिक विकास 

शारीरिक विकास पर भी विद्यालय मे ध्यान देना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि विद्यालय में शारीरिक व्यायाम की व्यवस्था हो। समय-समय पर विद्यालय मे योग्य चिकित्सक द्वारा बालकों के स्वास्थ्य-परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। 

10. करके खीखने कि विधि पर बल 

बाल्यावस्था में बालक ज्यादा क्रियाशील रहता है। अध्यापक को शिक्षण में करके सीखने की विधि को प्रयोग में लाना चाहिए।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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