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9/12/2021

किशोरावस्था का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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kishoravastha ka arth paribhasha visheshta;मानव विकास की सबसे विचित्र तथा जटिल अवस्था किशोरावस्था है। इसका काल 12 वर्ष से 18 वर्ष तक रहता हैं। इसमें होने वाले परिवर्तन बालक के व्यक्तित्व के गठन में महत्वपूर्ण योग प्रदान करते हैं। 

अतः शिक्षा के क्षेत्र में इस अवस्था का विशेष महत्व है। ई. ए. किलपैट्रिक ने लिखा है," इस बात पर कोई मतभेद नही हो सकता है कि किशोरावस्था जीवन का सबसे कठिन काल हैं।" स्टेनले हाल के अनुसार," किशोरावस्था बड़े संघर्ष, तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।" 

किशोरावस्था का अर्थ (kishoravastha kise kahte hai)

किशोरावस्था शब्द अंग्रेजी के 'एडोलसेंस' का हिंदी रूपांतर हैं। 'एडोलसेंस' शब्द लैटिन भाषा के 'एडोलसियर' से बना हैं, जिसका अर्थ है परिपक्वता की तरफ बढ़ना। अतः शाब्दिक अर्थ के रूप में हम कह सकते हैं कि किशोरावस्था वह काल है, जो परिपक्वता की तरफ संक्रमण करता हैं। 

12 से 18 वर्ष की आयु को विद्वानों ने किशोरावस्था का काल माना हैं। किशोरावसाथा जन्म के समय 'शैशावस्था' और बाल्यावस्था के बाद मानव विकास की तीसरी अवस्था है। जो कि बाल्यावस्था की समाप्ति के बाद शुरू होती हैं और प्रौढ़ावस्था के पहले समाप्त हो जाती हैं। 

 किशोरावस्था को जीवन का 'बसंत काल' भी कहा जाता है। यह अवस्था तूफान और झंझावत की अवस्था होती है। इसलिए इस अवस्था को जीवन का सबसे कठिन काल के नाम से भी जाना जाता है। 

किशोवस्था मे बालक और बालिकाओं का बहुत ही तेजी से विकास होता है। इस अवस्था मे विभिन्न अंगों का विकास होता है। जैसे-- मस्तिष्क का विकास, हड्डियों का विकास, लंबाई का विकास, मोटाई का विकास, आवाज मे परिवर्तन, आंतरिक अंगो का विकास एवं अन्य अंगों का विकास इत्यादि इस अवस्था मे होता हैं।

किशोरावस्था की परिभाषा (kishoravastha ki paribhasha)

कुल्हन के अनुसार," किशोरावस्था बाल्यकाल तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य अत्यधिक परिवर्तन का संक्रमण काल हैं।" 

जार्सिल्ड के अनुसार," किशोरावस्था वह अवस्था है जिससे मनुष्य बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर बढ़ता है।" 

स्टेनले हाॅल के अनुसार," किशोरोवस्था बड़े संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था है।" 

ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन के अनुसार," किशोरावस्था प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में वह काल है, जो बाल्यावस्था के अंत में प्रारंभ होता है और प्रौढ़ावास्था के प्रारंभ में समाप्त होता हैं।" 

क्रो एवं क्रो के अनुसार," किशोर ही वर्तमान की शक्ति व भावी आशा को प्रस्तुत करता हैं।" 

एस. ए. कोर्टिस के अनुसार," किशोरावस्था औसतन 12 वर्ष से 18 वर्ष की आयु तक ही है, जिसके अंतर्गत कामांगों का विकास शारीरिक काम विशेषताओं का प्रकटीकरण लाता हैं।" 

हैडो कमेटी रिपोर्ट इंग्लैंड के अनुसार," ग्यारह अथवा बारह वर्ष की आयु में बालकों की नसों में ज्वार उठना शुरू होता है, इसे किशोरावस्था के नाम से जाना जाता है। अगर इस ज्वार का चढ़ाव के समय ही उपयोग कर लिया जाये तथा इसकी शक्ति एवं धारा के साथ-साथ नई यात्रा शुरू कर दी जाये, तो सफलता प्राप्त की जा सकती हैं। 

किशोरावस्था की विशेषताएं (kishoravastha ki visheshta)

किशोरावस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-- 

1. शारीरिक विकास 

किशोरावस्था मे तीव्र शारीरिक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। किशोरों के भार व लम्बाई में वृद्धि होती है तथा कंधे चौड़े एवं शरीर पर बाल उग आते है। किशोरों और किशोरियों में क्रमशः पुरूषत्व और नारीत्व के गुण दिखाई देने लगते हैं। 

2. मानसिक तथा बौद्धिक विकास 

इस अवस्था में मानसिक विकास भी तीव्रगति से होता है तथा मस्तिष्क के लगभग प्रत्येक क्षेत्र का पूर्ण विकास होता है। किशोरावस्था में व्यक्ति तर्क-वितर्क, चितंन एवं समस्या के समाधान हेतु गहरी सोच प्रकट करना शुरू कर देता है। 

3. कल्पना की बहुलता 

किशोरावस्था की एक विशेषता यह है कि किशोरावस्था में कल्पना की बहुलता देखने को मिलती हैं। किशोर कल्पना प्रधान होता है। उसका अधिकांश समय दिवा-स्वप्न देखने में ही व्यतीत होता है। दिवा स्वप्न किशोरों को प्रेरणा देते हैं तथा इस आधार पर वे रचनात्मक कार्य करते हैं। किशोरोवस्था मे उसकी कल्पना-शक्ति काफी विकसित हो जाती है। इन कल्पना-शक्तियों के आधार पर ही वह अपनी आंतरिक शक्तियों का विकास करता है।

4. आत्मकेन्द्रित होना 

इस अवस्था में किशोर दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है और उनके सोचने का तरिका आत्मकेन्द्रित होता है। उनको इस बात की परवाह होती है कि लोग उनको कैसे देख रहे हैं, उनके बारें में क्या सोच रहे हैं। 

5. विद्रोह की प्रवृत्ति 

इस उम्र के बालकों में विचारों मे मतभेद, मानसिक स्वतंत्रता एवं विद्रोह की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। इस अवस्था में किशोर समाज में प्रचलित परम्पराओं, अंधविश्वासों के जाल में न फँस कर स्वछंद जीवन जीना पसंद करते है। 

6. संवेगात्मक विकास 

इस अवस्था में किशोर अत्यधिक भावुक होता है, सुखात्मक संवेग से शक्ति का स्त्रोत फूट पड़ता है तथा उत्साह मे वृद्धि होती है। आत्म सम्मान और आत्म चेतन की भावना अधिक प्रबल होती है। 

7. अस्थिरता 

अस्थिरता शब्द का विकास के रूप में अर्थ होता है--'निर्णय में चंचलता।' किशोरावस्था मे लिये गये निर्णय अस्थिरता से भरे होते हैं। वह शारीरिक शक्ति के वशीभूत होकर निर्णय ले लेता है जो उसके लिए लाभदायक कम तथा हानिकारक ज्यादा होते हैं। वे अपने कार्यों में रूचियों में, आदतों में, संवेगों में तथा सीखने आदि में 'लापरवाह' की तरह से संलग्न होते हैं। वे जल्दबाजी में अपनी विशिष्टता को भी खो बैठते हैं। उनको यथार्थ बनावटी लगता हैं। अतः वे विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अस्थिरता को प्रकट करते रहते हैं। इसी बात की पुष्टि ई.बे. स्ट्रांग के अध्ययनों से भी होती हैं। 

8. अपराध वृत्ति 

किशोरावस्था में अस्थिरता से मानसिक झुकाव नाजुक स्थिति से होकर गुजरता है। इस अवस्था के लड़के तथा लड़कियों को भौतिक जगत का बनावटी आकर्षण दिखाकर चतुर अपराधी अपराध वृत्ति की तरफ आकर्षित कर लेते हैं। बाद में धीरे-धीरे इनका जीवन अपराध करने के अतिरिक्त और कुछ नही रह पाता है तथा समाज और राष्ट्र में अपमान सहते रहते हैं। ये कभी भी अच्छे नागरिक नहीं बन पाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के मनोविश्लेषण से स्पष्ट हो गया है कि ये सामाजिक बनने के लिए छटपटाते रहते हैं, पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी करने में असफल रहते हैं। 

9. रूचि एवं अभिरूचियों का विकास 

किशोरावस्था में रूचि का विकास तेजी से होता है और उनकी रूचि विशिष्ट रूचियों की ओर विकसित हो जाती है। ये रूचियां अनेक प्रकार की हो सकती हैं। इस अवस्था में लड़के तथा लड़कियों के खेल की रूचि भिन्न हो जाती है। लड़के सामूहिक खेल-खेलने में रूचि रखते हैं जबकि लड़कियां नाचने, गाने, ड्रामा व संगीत आदि में अधिक रूचि लेती हैं। 

10. काम भावना 

किशोरावस्था में लड़के-लड़कियों में यौन परिपक्वता आने लगती है एवं प्रजनन अंगों में भी परिपक्वता आने लगती है। शरीर में कई बदलाव होते हैं। कर्मेन्द्रियों का पूर्ण रूप से विकास हो जाता है तथा काम भावना का विकास होता है तथा किशोर-किशोरियाँ अपने विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होते हैं। 

11. वीर पूजा की प्रवृत्ति 

इस अवस्वा में किशोरों में वीर पूजा की प्रवृत्ति का विकास होता है। किशोर-किशोरियाँ इस उम्र में एक आदर्श का चयन कर उसका अनुसरण करने लगते हैं। जैसे-- कोई राजनेता, खिलाड़ी, अभिनेता इत्यादि। 

12. व्यवहार में भिन्नता 

किशोरावस्था में बालकों के व्यवहार में भिन्नता पाई जाती है और वे भिन्न-भिन्न अवसरों पर अलग-अलग तरह का व्यवहार करते है। इस अवस्था मे संवेग तीव्र गति से बदलते हैं और किशोर उनका पूर्ण रूप से प्रदर्शन करते हैं। स्टेनले हाॅल के अनुसार," किशोरावस्था में शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन अचानक से उभरकर आते हैं।" 

13. सामाजिक भावना 

किशोरावस्था में किशोर समाज में अपने अस्तित्व को ढूंढने लगता है। उसके अंदर आदर, स्नेह, प्रेम आदि की भावना का विकास होता है। वह समाज में कुछ अच्छा और अलग करने की लालसा रखता है। राॅस के अनुसार," किशोर समाज के निर्माण व पोषण कार्य के लिए सबसे आगे रहते हैं।"  

14. मानसिक स्वतंत्रता की भावना 

किशोर रूढ़िवादी न होकर प्रगतिशील होते हैं। वे मानसिक स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं तथा उनमें रूढ़ियों के प्रति एक विद्रोह की भावना पाई जाती है। 

15. जिज्ञासा-प्रवृत्ति में वृद्धि 

इस अवस्था में किशोर जिज्ञासा की ओर बड़ी तेजी से बढ़ता है। वह प्रत्येक बात को विश्लेषण के बाद ही स्वीकार करता है। उसका मस्तिष्क अनेक विचारों की खोज की ओर बढ़ता हैं। जिज्ञासा दार्शनिकता के भाव उत्पन्न करती हैं। 

16. स्वाभिमान की भावना 

किशोरावस्था में आत्म-सम्मान की भावना का पूरी तरह उदय होने लगता है। किशोर स्वाभिमानी होते हैं। वे किसी भी कीमत पर अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा करने का प्रयास करते हैं। 

17. धार्मिक भावना 

पारिवारिक, धार्मिक वातावरण में रहने वाले किशोर इस अवस्था में धर्म को समझने का प्रयास करते हैं। उनके अंदर धार्मिक भाव उत्पन्न होते हैं। इस समय आवश्यकता होती हैं कि उनको सही मार्गदर्शन दिया जाए। उनकी धार्मिक भावनओं का गलत फायदा न उठाया जाए।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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