7/02/2020

सूचना आयोग का संगठन एवं कार्य

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सूचना आयोग का संगठन 

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत एक "केन्द्रीय सूचना आयोग" गठित गया हैं। जो कि एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 केन्द्रीय सूचना आयुक्तों से मिलकर बना है। वर्तमान मे चार सूचना आयक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था की गई है। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता मे गठित लोकसभा मे विपक्ष के नेता और मंत्रिमण्डल का मनोनीत एक मंत्री की समिति की अनुशंसा पर करेगा। आयोग स्वायत्त रूप से कार्य करेगा। कानून, विज्ञान एवं तकनीकी, समाजसेवा, प्रबंधन, मीडिया, पत्रकारिता, शासन और प्रशासन के ज्ञाता और अनुभवी, लोग इसमे आयुक्त नियुक्त किए जा सकेंगे। ये संसद, विधानसभाएँ, व्यापारी, व्यवसायी या किसी राजनीतिक दल के सदस्य नही होंगे। इनका कार्यकाल पांच वर्ष या 65 बर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होगा। इनकी पुनर्नियुक्ति नही होगी। सभी आयुक्तों के वेतन-भत्ते निर्वाचन आयोग के मुख्य आयुक्त और अन्य आयुक्तों के समान होंगे। कार्यलयीन कार्यों मे सहयोग हेतु केन्द्र सरकार आयोग को कर्मचारी उपलब्ध कराएगा।
इन्हें राष्ट्रपति द्वारा उन्ही आधारों पर पदच्युत किया जा सकता है जिन आधारों पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटया जा सकता है।
सभी राज्यों मे राज्य सूचना आयोग का गठन किया जाएगा। कार्यकाल, वेतन-भत्ते, पदत्याग आदि व्यवस्थाएं केंद्रीय आयोग की तरह ही होंगी। स्थानीय स्तरों पर सूचना अधिकारियों की व्यवस्था होगी। सभी को निर्धारित समय-सीमा मे आवेदनकर्ता को सूचना देनी होगी।
पुस्तक भारतीय शासन एवं राजनीति; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अनुसार---

सूचना आयोग के कार्य (suchna aayog ke karya)

किसी भी व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत की जाँच इसका मुख्य कार्य होगा--
(अ) जिसे समय सीमा के अन्दर या सूचना तक पहुँचने के अनुरोध का उत्तर नही दिया गया है,
(ब) जिससे अनुचित फीस की अपेक्षा की गई है,
(स) जिसे मिथ्या या भ्रमित करने वाली सूचना दिये जाने का विश्वास है।
जाँच करते समय सूचना आयुक्तों की शक्तियाँ सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 मे सिविल न्यायालयों को प्राप्त शक्तियों के समान होंगी और जाँच की प्रक्रिया भी उसी के समान होगी। सूचना पाने वाला व्यक्ति प्रदान की गई सूचना से असंतुष्ट हो तो तीस दिन के अन्दर वह वरिष्ठ सूचना आयुक्त को प्रथम अपील एवं उससे भी असंतुष्ट हो तो उससे भी वरिष्ठ सूचना आयुक्त को नब्बे दिन के अन्दर द्वितीय अपील कर सकेगा।
सम्बन्धित प्राधिकारी द्वारा गलत या भ्रमपूर्ण सूचना दिए जाने या निर्धारित समय सीमा मे सूचना न दिए जाने पर प्राधिकारी पर दण्डात्मक कार्यवाही हो सकती है। ये हैं---
1. आवेदक को हुई क्षति की पूर्ति करवाई की जाना,
2. प्राधाकारी को निर्धारित दण्ड देना या
3. आवेदन निरस्त करना हो सकती है।
दण्ड की राशि रूपये 2500 से 25000 हजार तक हो सकती है। परन्तु दण्ड आरोपित करने से पूर्व प्राधिकारी को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक होगा।
किसी न्यायालय मे केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोगों की कार्यवाही बाबत वाद प्रस्तुत नही किया जा सकता है।
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