7/04/2020

लोकसभा स्पीकर के कार्य व शक्तियाँ

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लोकसभा का स्पीकर कौन होता है?

भारत मे लोकसभा के अध्यक्ष को स्पीकर करते है। अपने पद, कार्य तथा महत्व की दृष्टि से भारत का स्पीकर, वास्तव मे ब्रिटिश कामन्स सभा के स्पीकर के ही समान है।
लोकसभा द्वारा अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन स्वतः किया जाता है। अध्यक्ष का पद रिक्त होने या उसकी अनुपस्थिति मे सदन की अध्यक्षता उपाध्यक्ष द्वारा की जाती है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तभी तक अपने पद पर रह सकते है जब तक लोकसभा के सदस्य है। लोकसभा के सदस्यों मे से ही एक सदस्य को स्वीकार चुना जाता है। लोकसभा बहुमत से प्रस्ताव पारित कर उन्हें पद से हटा सकती है। वे अपने पद से त्यागपत्र देकर भी पदत्याग कर सकते है। लोकसभा के भंग होने की स्थिति मे उनके पद रिक्त नही होते, जबकि  लोकसभा के गठन तथा उसकी प्रथम बैठक में नए स्पीकर के निर्वाचन तक वह पद पर रहता है।

लोकसभा के (अध्यक्ष) स्पीकर के कार्य व शक्तियाँ (speaker ke karya)

1. लोकसभा की अध्यक्षता
स्पीकर लोकसभा की सभी बैठकों की अध्यक्षता करता है। जब तक सदन मे वह अपना स्थान ग्रहण नही कर लेता, सदन की कार्यवाही शुरू नही हो सकती। स्पीकर की अनुपस्थिति मे उसके स्थान पर डिप्टी स्पीकर (उपाध्यक्ष) सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है। बगैर अध्यक्ष के सदन की कार्यवाही हो ही नही सकती।
2. नियमों की व्याख्या
संसद की कार्यवाही के सम्बन्ध मे कई नियम बनाये जाते है एवं उनके अनुसार ही सदन का संचालन होता है। लेकिन उन नियमों के सम्बन्ध मे मतभेद की अवस्था मे स्पीकर द्वारा दी गई व्याख्या अन्तिम मानी जाती है।
3. वाद-विवाद का संचालन
स्पीकर ही सदन मे वाद-विवाद का संचालन करता है। कब, कौन व्यक्ति, कितने समय तक बोलेगा, इसका निर्णय स्पीकर द्वारा ही किया जाता है। सदन के प्रत्येक सदस्य को अपना भाषण शुरू करने से पूर्व स्पीकर को सम्बोधित करना पड़ता है। सदन मे सदस्यों के भाषण के सम्बन्ध मे स्पीकर यह देखता है कि किसी दल अथवा व्यक्ति के साथ अन्याय न हो। जैसा कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जार्ज ने कहा था " स्पीकर छोटे से छोटे अल्पमत की स्वतंत्रताओं तथा विशेषाधिकारों का संरक्षक है। इस क्षेत्र मे स्पीकर का कार्यभार कुछ कम इसलिए हो जाता है कि विभिन्न दलों के सचेतक इस कार्य मे उसकी सहायता करते है।
4. सदन मे व्यवस्था तथा अनुशासन बनाये रखना
सदन मे व्यवस्था एवं अनुशासन का उत्तरदायित्व स्पीकर पर है। व्यवस्था या अनुशासन भंग होने की स्थिति मे वह संबंधित व्यक्ति का नाम लेकर, उसे चुप रहने या सदन से बाहर निकलने का आदेश दे सकता है।
5. वित्त विधेयक को प्रमाणित करना
वित्त विधेयक के सम्बन्ध मे संविधान यह व्यवस्था करता है कि सिर्फ लोकसभा मे ही शुरू किए जा सकते है। लेकिन कोई विधेयक वित्त विधेयक है अथवा नही, इसका निर्णय करना स्वीकार का ही कार्य है।
6. निर्णायक मत देना
अगर लोकसभा मे किसी विषय पर मत लेने पर उसके पक्ष एवं विपक्ष मे एक समान मत आए तो स्पीकर निर्णायक मत दे सकता है।
7. व्यवस्था सम्बन्धी निर्णय
सदन मे विभिन्न अवसरों पर वाद-विवाद के दौरान ध्यानाकर्षण प्रस्ताव या काम रोको प्रस्ताव पेश किये जाते है। इस बात का निर्णय करना कि वह चल रही बहस को वहीं रोककर, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर बहस चलाए अथवा नही, उसी का कार्य है।
8. लोकसभा सम्बन्धी प्रशासन
लोकसभा की कार्यवाही के सम्बन्ध मे स्पीकर का अपना एक प्रशासनिक विभाग रहता है। स्पीकर ही इस विभाग का प्रधान रहता है। लोकसभा के विभिन्न कर्मचारी उसके निर्देशन पर कार्य करते हैं।
लोकसभा के स्पीकर (अध्यक्ष) की स्थिति
लोकसभा का अध्यक्ष प्रतिष्ठा और गौरव का प्रतीक है। चूंकि लोकसभा प्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व करती है इसलिए अध्यक्ष पद पूरे राष्ट्र के गौरव का प्रतीक माना जाता है। सामान्यतया लोकसभा के अध्यक्ष ने इस गौरवशाली परंपरा का निर्वाह ईमानदारी से किया है। साधारणतया अध्यक्ष केवल अध्यक्षता करता है, निगरानी रखता है और चर्चाओं को नियंत्रित करता है परन्तु उसकी स्थिति समग्र रूप से इतनी महत्वपूर्ण होती है कि किसी भी संकट मे उसकी शक्तियाँ राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिध्द हो सकती है।
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