7/04/2020

लोकसभा का गठन, लोकसभा की शक्तियाँ व कार्य

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लोकसभा
संसदीय सरकार का प्रथम तथा निचला सदन लोकसभा कहलाती है। यह नागरिकों का प्रतिनिधि सदन कहलाती है। इसकी रचना ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामन्स और अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की तरह हुई है। यह एक एक शक्तिशाली तथा प्रमुख सदन है क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री सहित मंत्रीपरिषद् इसी के प्रति उत्तरदायी रहती है हांलांकि भारत मे संसद सर्वोच्च राजनीतिक निकाय नही है लेकिन लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुसार जनता की सच्ची प्रतिनिधि होने से यह शासन के निकायों मे महत्वपूर्ण शासक निकाय है।

लोकसभा का गठन (lok sabha ka gathan)

31 वें संविधान संशोधन द्वारा इसकी सदस्य संख्या 545 हो गई है। पूरे देश को निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों मे बांट कर अधिकतम 5 वर्ष के लिये प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा लोक सभा सदस्यों का निर्वाचन किया जाता है। इसकी अवधि आपात स्थिति मे एक साल बढ़ाई जा सकती है। निर्वाचन क्षेत्र एक सदस्यी रहते है व उम्मीदवारों मे से सबसे ज्यादा मत पाने वाला उम्मीदवार लोकसभा सदस्य चुना जाता है।
लोकसभा के पदाधिकारी
लोकसभा अपने सदस्यों मे से ही 5 वर्ष हेतु एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष चुनती है। ये लोकसभा भंग होने तक अपने पद पर बने रहते है। भारत मे ब्रिटेन के स्पीकर की तरह यह अपने पद से त्यागपत्र पत्र तो नही देता लेकिन वह लोकसभा की गरिमा तथा परम्परानुसार निष्पक्ष होने का प्रयत्न करता है। यह अपनी इच्छा से त्यागपत्र दे सकता है। इसे 14 दिन का नोटिस देकर महाभियोग से हटाया भी जा सकता है।
लोकसभा सदस्य हेतु योग्यताएं
1. वह भारत का नागरिक हो,
2. उसकी आयु 25 वर्ष या उससे अधिक हो,
3. वह किसी लाभ के पद पर न हो,
4. वह पागल या दिवालिया घोषित न किया गया हो।
लोकसभा का कार्यकाल
लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। राष्ट्रीय आपात स्थिति की घोषणा के समय संसद विधि के द्वारा लोकसभा के कार्यकाल मे एक बार मे एक वर्ष की वृद्धि कर सकती है। निर्धारित अवधि के पूर्व भी मंत्रिमंडल के परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग किया जा सकता है। यदि किसी समय संसद मे सत्तासीन दल के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो लोकसभा का कार्यकाल उसी समय समाप्त माना जाता है।
लोकसभा का सत्र
संविधान के अनुसार लोकसभा के कम से कम दो सत्र प्रतिवर्ष होना जरूरी है। एक अधिवेशन की अंतिम बैठक और दूसरे अधिवेशन की प्रथम बैठक मे 6 महीने से ज्यादा अंतर नही हो सकता। इसमे बजट सत्र सबसे महत्वपूर्ण है। सरकार के अनुरोध पर राष्ट्रपति विशेष सत्र बी बुला सकता है।

लोकसभा के सदस्यों के विशेषाधिकार

1. भाषण की स्वतंत्रता
लोकसभा का हर सदस्य स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकता है। उनके दिये गये भाषण के विरूद्ध किसी भी न्यायालय मे मुकदमा कायम नही किया जा सकता।
2. भाषण व कार्यों को प्रकाशित करना
लोकसभा का सदस्य सदन मे विचार-विमर्श, भाषण अथवा रिपोर्ट को प्रकाशित को प्रकाशित कर सकता है।
3. उन्मुक्तियाँ
लोकसभा सदस्य को लोकसभा सत्र के प्रारंभ होने के 40 दिन पहले से लेकर 40 दिन बाद तक किसी दीवानी प्रकरण मे गिरफ्तार नही किया जा सकता।

लोकसभा की शक्तियाँ व कार्य (lok sabha ke karya)

1. विधायी शक्तियाँ
संघ के लिए विधि निर्माण मे लोकसभा की महत्वपूर्ण भूमिका है। यद्यपि इस कार्य मे राज्यपाल द्वारा सहभागिता की जाती है, परन्तु व्यवहार मे विधि निर्माण मे लोकसभा का वर्चस्व है। साधारण विधेयक दोनों मे से किसी भी सदन मे रखे जा सकते है। परन्तु किसी साधारण विधेयक पर मत विभिन्न होने की स्थिति मे संविधान संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान करता है। इसमे लोकसभा की स्थिति प्रभुत्वपूर्ण होती है, क्योंकि लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा की तुलना मे अधिक है।
2. वित्तीय शक्तियाँ
लोकसभा का वित्तीय क्षेत्र मे एकाधिकार है। वित्तीय विधेयक मात्र लोकसभा मे ही प्रस्तुत किए जा सकते है। राज्यसभा केवल 14 दिन तक इन्हें रोके रख सकती है।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण
मंत्रिपरिषद् अपने कार्यों के लिए लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इस प्रकार मंत्रिपरिषद् केवल उस समय तक अपने पद पर आसीन रहती है जब तक कि उसे लोकसभा का समर्थन प्राप्त हो। लोकसभा के सदस्य प्रश्न पूछकर, स्थगन और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव प्रस्तुत करके सरकार की नीतियों पर चर्चा कर सकते है। वित्तीय मामलों मे लोकसभा के सदस्यों द्वारा कटौती प्रस्ताव लाया जा सकता है। वित्तीय कटौती का प्रस्ताव पारित होना मंत्रिपरिषद् के विरूद्ध अविश्वास माना जाता है। ऐसी स्थिति मे मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना होता है या वह लोकसभा भंग करवा सकती है। इसके अतिरिक्त भी लोकसभा द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित करके सरकार को अपदस्थ किया जा सकता है।
4. संविधान संशोधन संबंधी शक्ति
इस शक्ति का प्रयोग लोकसभा राज्यसभा की सहभागिता से करती है। संविधान संशोधन सम्बन्धी विधेयक दोनों मे से किसी भी सदन मे प्रस्तुत किए जा सकते है और इनका दोनों सदनों द्वारा पृथक-पृथक पारित होना अनिवार्य है।
5. विविध शक्तियाँ
लोकसभा को कतिपय अन्य शक्तियाँ भी प्राप्त है जिनका प्रयोग यह संयुक्त रूप से राज्यसभा के साथ करती है।
1. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन।
2. उपराष्ट्रपति को हटाने हेतु राज्यसभा द्वारा पारित संकल्प को अनुमोदन।
3. सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरूद्ध एक संकल्प प्रस्ताव पारित करके महाभियोग प्रक्रिया आरम्भ करना।
4. राष्ट्रीय आपात स्थिति की घोषणा का अनुमोदन।
लोकसभा का महत्व
भारतीय शासन मे लोकसभा एक महत्वपूर्ण सदन है। लोकसभा असल मे जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। डाॅ. एम. पी. शर्मा ने इसका मूल्यांकन करते हुये कहा है कि यदि संसद राज्य का सर्वोच्च अंग है तो लोकसभा संसद का सर्वोच्च अंग है।
डाॅ.एन.के श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक राजनीति शास्त्र के मूलाधार मे कहा है। " भारत मे लोकसभा यहाँ की संसदात्मक शासन-प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण भवन है। इसे देखकर सम्पूर्ण भारत का चित्र किसी भी व्यक्ति के सामने आ जाता है इस प्रकार यह भारत राष्ट्र का दर्पण है।"
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