7/06/2020

विधानसभा का गठन, शक्तियाँ व कार्य

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विधानसभा का गठन

राज्य विधानमंडल का निम्न सदन विधानसभा कहलाता है। विधानसभा जनता का सदन है। विधानसभा के सदस्यों का मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन होता है। निर्वाचन के लिए प्रत्येक चुनाव क्षेत्र भौगोलिक आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों मे इस प्रकार विभाजित किया जाता है कि विधानसभा का प्रत्येक सदस्य कम से कम 75 हजार जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे। राज्य की विधानसभा मे कितने सदस्य होंगे, यह उस राज्य की जनसंख्या पर निर्भर है। संविधान के अनुसार राज्य की विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 और न्यूनतम संख्या 60 होगी। प्रत्येक जनगणना के उपरांत राज्य की विधानसभा की सदस्य संख्या का निर्धारण तथा विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्रों मे राज्य का विभाजन इस प्रकार किया जाता है कि राज्य की जनसंख्या और उसकी विधान-सभा की सदस्य संख्या का अनुपात राज्य मे समान रहे। प्रत्येक राज्य की विधानसभा मे अनुसूचित एवं आदिम जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुपात मे स्थान सुरक्षित रखे गये है।
कार्यकाल
विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु इस अवधि से पूर्व भी कतिपय परिस्थितियों मे राज्यपाल द्वारा इसे भंग किया जा सकता है। यदि आपातकाल की घोषणा प्रभाव मे हो तो विधानसभा का कार्यकाल एक बार मे एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है, परन्तु आपातकाल की घोषणा समाप्त होने के पश्चात संघ की संसद इसका कार्यकाल 6 माह से कम समय तक के लिए बढ़ा सकती है।
विधान सभा के सदस्यों की योग्यताएं
1. वह भारत का नागरिक हो।
2. वह 25 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
3. ऐसी अन्य योग्यताएं रखता हो जो संसद के किसी कानून द्वारा निश्चित की जाए।

विधानसभा की शक्तियाँ व कार्य (vidhan sabha ki shaktiya)

1. विधायी शक्तियाँ
राज्य की विधानसभा और विधान परिषद् मे कोई साधारण विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता है परन्तु धन विधेयक हमेशा विधानसभा मे ही प्रस्तुत किए जा सकते है और विधानपरिषद् केवल 14 दिनों तक उसे रोककर रख सकती है जब साधारण विधायकों को दो बार मे चार माह तक लंबित रख सकती है। धन विधायकों के अतिरिक्त कोई भी विधेयक विधानपरिषद् वाले राज्यों मे किसी भी सदन मे आरंभ हो सकते है। जहां तक धन विधायकों से भिन्न विधेयकों का प्रश्न है, वे यद्यपि विधानसभा या विधानपरिषद् किसी मे आरंभ हो सकते है, तथापि उनके संबंध मे भी विधान परिषद् की शक्तियाँ सीमित है। यदि विधेयक विधानपरिषद् से आरंभ होता है और वहां पारित होने के बाद विधानसभा को भेजा जाता है और वह उसे स्वीकार नही करती तो वह वहीं समाप्त माना जाएगा। यदि विधेयक विधानसभा मे आरंभ होता है और पारित होने पर विधानपरिषद् मे भेजा जाता है और विधानपरिषद् उसे अस्वीकार कर देती है या तीन माह तक उस पर कुछ नही करती या इस अवधि मे विधेयक मे संशोधन करती है तो विधेयक पुनः विधानसभा मे भेजा जाता है। विधानसभा संशोधन स्वीकार नही करती और विधेयक दुबार उसी रूप मे पुनः पारित करती है तो विधानपरिषद् की अस्वीकृति या उसका पुनः एक माह तक लंबित रखना या ऐसे संशोधन करना जो विधानसभा को मान्य नही हो, तो विधेयक उसी रूप मे पारित माना जाता है, जिस रूप मे विधानसभा मे उसे पारित किया है।

2. कार्यपालिका शक्ति
विधानसभा लोकप्रतिनिधि है। मंत्रिपरिषद् अपने कार्यों के लिए सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी भी विभाग की नीति या विधि, विधानसभा मे पारित न होने की स्थिति मे संपूर्ण मंत्रिपरिषद् उत्तरदायी है। एक मंत्री के विरूद्ध अविश्वास संपूर्ण मंत्रिपरिषद् के विरूद्ध अविश्वास माना जाता है। विधानसभा के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते है, आलोचना कर सकते है और अविश्वास का प्रस्ताव पास कर सकते है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की स्थिति मे सरकार को पदत्याग करना होता है।
3. वित्तीय शक्तियाँ
विधानसभा जनता का प्रतिनिधि सदन है इसलिए इसे वित्तीय मामलों मे पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त है। वित्त विधेयक पहले विधानसभा मे पस्तुत किए जाते है, इसके बाद ये विधानपरिषद् को प्रेषित किए जाते है। विधानपरिषद् के लिए आवश्यक है कि वह 14 दिनों के भीतर उस विधेयक को अपनी संस्कृतियों सहित विधानसभा को वापस कर दे। उन संस्तुतियों को स्वीकार करना या न करना विधानसभा की इच्छा पर निर्भर है और विधानसभा द्वारा जिस रूप मे भी विधेयक को पूनः पारित कर दिया जाता है उसी रूप मे विधेयक अंतिम रूप मे पारित समझा जाता है। इस प्रकार विधानसभा ही वित्तीय क्षेत्र मे शक्तिशाली है।
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