7/05/2020

राज्यसभा का गठन, शक्तियाँ व कार्य

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राज्यसभा का गठन (rajya sabha ka gathan)

भारत मे संसद का उच्च सदन राज्य सभा कहलाता है। इसमे ज्यादा से ज्यादा 250 सदस्य हो सकते है। इनमे से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है जो देश मे विज्ञान, कला, साहित्य तथा समाज सेवा के क्षेत्र मे विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए होते है। बाकि सदस्य संसद के कानून से राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों से निर्धारित संख्या मे निर्वाचित किए जाते है। प्रतिनिधियों की संख्या जनसंख्या के आधार पर होने से हर राज्य अगल-अगल संख्या मे राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होते है।
निर्वाचन
राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन हर राज्य के निर्वाचन विधायकों द्वारा 6 वर्ष हेतु आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होता है। यह अप्रत्यक्ष होता है। यह एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है। इसके हर दो वर्ष बाद 1/3 सदस्य हट जाते है। इस तरह यह एक स्थायी सदन है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व होने से सभी दलों को अपने अनुपात मे प्रतिनिधित्व मिल जाता है।
योग्यताएं
राज्यसभा की सदस्यता के लिए संविधान मे कतिपय निम्न योग्यताओं का प्रावधान है---
1. वह भारत का नागरिक हो,
2. उसकी आयु 30 वर्ष हो,
3. पागल या दिवालिया न हो,
4. वह संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएं रखता हो,
5. वह किसी लाभ पद पर न हो।
कार्यकाल
राज्यसभा स्थायी सदन है अर्थात् इसे कभी भंग नही किया जा सकता। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6  वर्ष होता है। प्रत्येक दो वर्ष पश्चात इसके 1/3 सदस्य पदनिवृत्त हो जाते है।
पदाधिकारी
राज्य सभा का पदेन अध्यक्ष भारतीय संघ का उपराष्ट्रपति होता है इसके अलावा राज्य सभा अपने लिए एक उप-सभापति भी चुन लेती है जो सभापति की अनुपस्थिति मे इसकी बैठकों की अध्यक्षता करता है।

राज्यसभा की शक्तियाँ व कार्य (rajya sabha ki shaktiya)

1. विधायी शक्तियाँ 
राज्यसभा को वे सभी विधायनी शक्तियाँ प्राप्त होती है जो लोकसभा को है लेकिन लोकसभा से किसी विधेयक पर मतभेद होने की स्थिति मे वह साधारण विधेयक को एक बार वापस कर वह केवल 6 महीने विलम्बित कर सकता है और वित्त विधेयक को मात्र 14 दिन तक। संविधान संशोधन मे उसके अधिकार लोकसभा के समान है।
2. वित्तीय शक्तियाँ
संविधान मे धन विधेयक की परिभाषा दी गई है और कहा गया है कि लोकसभा का अध्यक्ष यह निर्णय करेगा कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नही। संविधान मे यह भी लिखा है कि धन विधेयक राज्यसभा मे आरंभ नही किए जा सकते तथा उनके राज्यसभा की स्वीकृति भी आवश्यक नही है। जब लोकसभा धन विधेयक को पारित करती है तो वह राज्य सभा के पास आता है। यदि राज्यसभा उस विधेयक पर 14 दिनों तक कुछ नही करती या ऐसी सिफारिशें करती है जिन्हें लोकसभा स्वीकार नही करती तो विधेयक उसी रूप मे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा जिस रूप मे लोकसभा ने उसे पारित किया था।
3. प्रशासनिक शक्तियाँ
प्रशासनिक विषयों मे भी राज्यसभा को लोकसभा से कम शक्तियाँ दी गई है। मंत्रिपरिषद् केवल लोकसभा के प्रति ही उत्तरदायी है। यदि राज्यसभा मे मंत्रिपरिषद् का बहुमत समाप्त हो जाता है तो उसे त्यागपत्र देने की आवश्यकता नही है। राज्यसभा लोकसभा के सदस्यों की ही तरह मंत्रिपरिषद् के सदस्यों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकती है। यद्यपि मंत्रिपरिषद् राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नही है तथापि राज्यसभा के सदस्यों को उस पर अंकुश का पूरा अधिकार प्राप्त है।
4. संवैधानिक शक्तियाँ
संविधान संशोधन के सम्बन्ध मे राज्यसभा को लोकसभा के बराबर का अधिकार प्राप्त है। संविधान संशोधन विधेयक किसी भी सदन मे आरंभ किया जा सकता है और उसे दोनों सदनों मे उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत तथा कुल सदस्यों के बहुमत से पारित होना चाहिए। चूँकि किसी विधेयक को दोनों सदनों मे दो तिहाई बहुमत से पारित कराना अत्यंत कठिन है, इसलिए राज्यसभा किसी भी संविधान संशोधन को अनिश्चित काल के लिए रोक सकती है।
5. अन्य शक्तियाँ
(क) राज्यसभा के निर्वाचित सद
स्यों को राष्ट्रपति के निर्वाचन मे लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की तरह समानता का अधिकार है।
(ख) राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव जिस प्रकार लोकसभा मे रखा जा सकता है उसी प्रकार राज्यसभा मे भी रखा जा सकता है। दोनों सदनों के दो तिहाई बहुमत से उसे पारित होना आवश्यक है।
(ग) उपराष्ट्रपति का चुनाव राज्य सभा और लोकसभा दोनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मंडल द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति से एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। मतदान गुप्त होता है। राज्यसभा उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प द्वारा प्रस्ताव कर सकती है।
(घ) सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए राज्यसभा या लोकसभा दोनों मे ही कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित सदस्यों के दो- तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रण महालेखा परीक्षक और संघ लोकसेवा आयोग के सदस्यों के विरूद्ध किसी कारवाई के लिए भी राज्यसभा की सहमति आवश्यक है।
(ङ) आपातकाल की घोषणा के लिए राज्यसभा और लोकसभा दोनों की स्वीकृति आवश्यक है।
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