7/01/2020

भारत के राष्ट्रपति की शक्तियां व कार्य

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भारत का राष्ट्रपति [bharat ka rashtrapati]

भारतीय संविधान मे संघीय कार्यपालिका प्रमुख राष्ट्रपति है। वह नाममात्र का कार्यपालिका प्रधान है। कार्यपालिका संबंधी वास्तविक शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल द्वारा किया जाता है। भारत के राष्ट्रपति का नामकरण अवश्य अमेरिकी कार्यपालिका के प्रधान जैसा सै परन्तु उसकी शक्तियाँ और भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति से भिन्न है। उसकी स्थिति अमेरिकी राष्ट्रपति के समान न होकर ब्रिटिश सम्राट के समान है। भारतीय संसदीय शासन प्रणाली मे राष्ट्रीपति की भूमिका एक औपचारिक प्रधान की है।
यहाँ हम भारत के राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया, भारत के राष्ट्रपति पद की योग्यताएं और भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ एवं कार्यों का वर्णन करेंगे। राष्ट्रपति की सामान्य कालीन और आपातकालीन शक्तियाँ जानेंगे।
भारत के राष्ट्रपति के पद हेतु योग्यताएं 
(अ) वह भारत का नागरिक हो।
(ब) अपनी 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
(स) लोक सभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
(द) वह किसी शासकीय पद पर न हो। भारतीय संविधान मे लिखा है-" कोई भी व्यक्ति जो भारत सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा किसी स्थानीय अधिकारी के अधीन किसी सवेतन पर पर नियुक्त हो राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी नही हो सकता हैं।

भारत के राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया (bharat ke rashtrapati ki nirvachan prakriya)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 54 के तहत् भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन " अप्रत्यक्ष विधि" से अधिक आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा गुप्त मतदान से किया जाता है। राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इसमे संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते है।
भारत के राष्ट्रपति
राष्ट्रपति के निर्वाचित मण्डल मे विधानसभाओं के सदस्यों को इसलिए स्थान दिया गया है क्योंकि राष्ट्रपति केवल केन्द्रीय शासन का ही नही वरन् पूरे भारतीय राज्य का प्रधान होता है।
राष्ट्रपति पद के लिए मतदान गुप्त आधार पर होता है। विजयी होने वाले प्रत्याशी को मतों का न्यूनतम कोटा प्राप्त करना होता हैं। न्यूनतम कोटा निर्धारित करने कि विधि निम्नलिखित है---
                               दिए मतों संख्या+1
न्यूनतम कोटा= __________________________
निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या +1
न्यूनतम कोटा पाने वाले व्यक्ति को राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।

भारत के राष्ट्रपति का कार्यकाल
भारत के राष्ट्रपति का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष होता है। इस अविधि के पूर्व वह त्याग-पत्र दे सकता है अथवा महाभियोग द्वारा उसे अपने पद से हटाया जा सकता है। भारतवर्ष मे यह परंपरा स्थापित हो गई है कि कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नही हो सकता।
भारत के राष्ट्रपति का वेतन या तनख्वाह (bharat ke rashtrapati ki salary)
राष्ट्रपति के वेतन, भत्ते आदि के निर्धारण का अधिकार संसद को प्राप्त है। चूंकि उसके वेतन, भत्ते आदि भारत की संचित निधि पर भारित होते है, उसके कार्यकाल के दौरान इसमे किसी प्रकार की कमी नही की जा सकती है। राष्ट्रपति नि:शुल्क शासकीय आवास और अन्य उपलब्धियों एवं विशेषाधिकार जो संसद तय करे, का हकदार होगा।
नवीनतम प्रावधानों के अनुसार भारत के राष्ट्रपति का वेतन 5 लाख रूपये मासिक और सेवानिवृत्त होने के बाद 1 लाख रूपये मासिक पेंशन प्राप्त होती है। इसके साथ ही उसे सेवाकाल के दौरान और सेवानिवृत्त के बाद अनेक तरह की अन्य सुविधाएं भी दी जाती है।

भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ व कार्य (bharat ke rashtrapati ki shaktiyan)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार "संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति मे निहित होगी जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करेगा। उसकी शक्तियों को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता हैं---
1. सामान्य कालीन शक्तियां
2. संकटकालीन शक्तियां

भारत के राष्ट्रपति की सामान्य कालीन शक्तियाँ 

1. राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बंधित शक्तियाँ
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 53 मे संघीय सरकार की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियों के बारे मे लिखा है कि शक्तियों का वास राष्ट्रपति मे रहेगा एवं वह इन शक्तियों का प्रयोग स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के द्वारा करेगा। संविधान यह भी उपबंधित करता है कि राष्ट्रपति को परामर्श देने हेतु एवं उसके कार्यों मे मदद करने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व मे एक मंत्रिमंडल होगा। संविधान मे 24 वें संशोधन द्वारा यह भी जोड़ दिया गया है कि राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा तथा 44 वें संशोधन द्वारा यह भी जोड़ दिया गया है कि राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल द्वारा किये परामर्श पर मंत्रिमण्डल मे पुनर्विचार के लिए आग्रह कर सकता है, लेकिन मंत्रिमंडल अगर वही परामर्श राष्ट्रपति को दे तो राष्ट्रपति उसी परामर्श के अनुसार कार्य करेगा।
राष्ट्रपति को संविधान द्वारा सैध्दांतिक रूप से कार्यपालिका सम्बन्धी विस्तृत शक्तियाँ प्रदान की गई है। शासन के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, सेनाध्यक्षों की नियुक्ति विभिन्न देशों मे भारत के राजदूतों की नियुक्ति आदि सभी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति का कार्य राष्ट्रपति ही करता है। यहाँ तक कि सभी केन्द्रीय सेवाओं हेतु अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है।
2. राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ
राष्ट्रपति को वित्तीय क्षेत्र मे कुछ महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त है। राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ मे संसद के दोनों सदनों के समक्ष वर्ष का आय-व्यय विवरण विवरण रखवाया जाता है।
राष्ट्रपति की आज्ञा के बिना धन विधेयक, वित्त विधेयक अथवा अनुदान माँगें लोकसभा मे प्रस्तुत नही की जा सकती। भारत की आकस्मिक निधि इसके नियंत्रण मे होती है, जिसमे से व्यय के लिए वह धनराशि दे सकता है। यद्यपि इसके लिए संसद द्वारा स्वीकृत आवश्यक है। उसके द्वारा हर पाँच वर्ष पर एक वित्त आयोग की भी नियुक्त की जाती है जो संघ और राज्यों के मध्य वित्तीय संसाधनों के बँटवारे के विषय मे अपनी संस्तुति देता है।

3. राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियाँ
न्यायपालिका के सम्बन्ध मे भी राष्ट्रपति को संविधान द्वारा पर्याप्त शक्तियाँ प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय के समस्त न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है।
भारत के राष्ट्रपति को सभी राष्ट्रों के अध्यक्षों के समान न्यायिक विशेषाधिकार प्रदान किये गये है। वह न्यायालय द्वारा दण्डित किसी अपराधी को क्षमादान दे सकते है, दण्ड को स्थगित कर सकता है, रोक सकता है, या कम कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रपति को न्यायिक क्षेत्र मे क्षमादान, प्रविलम्बन, परिहरण आदि शक्तियां प्राप्त है।
4. राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ
ब्रिटिश क्राउन की तरह भारत का राष्ट्रपति भी संसद का अंग है। उसे संसद सदनों के अधिवेशन बुलाने, उनका सत्रावसान करने तथा लोकसभा को भंग करने का अधिकार है। आवश्यक होने पर वह दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन भी बुलाता है। लोकसभा निर्वाचन के बाद तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र मे राष्ट्रीपति संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करता है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दोनों सदनों मे अगल-अगल चर्चा होती है। प्रथम अधिवेशन के अतिरिक्त भी राष्ट्रपति किसी सदन या दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित कर सकता है। वह संसद के किसी भी सदन को संदेश भेज सकता है। राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधायकों को स्वीकृति भी प्रदान करता है। बिना इसके कोई भी विधेयक विधि का रूप नही ले सकता। राष्ट्रपति धन विधेयक को छोड़कर, अन्य विधायकों को संसद मे पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। पुनर्विचार को भेजे जाने की निश्चित समय सीमा नही होने से राष्ट्रपति इसे दीर्घकाल तक लम्बित रख सकता है। यह जेबी वीटो कहलाता है।

यदि विधेयक लौटाने पर संसद उसी विधेयक को पुनः पारित करती है तो उसे उस पर हस्ताक्षर करने पड़ते है। राष्ट्रपति राज्यों की विधानसभाओं द्वारा पारित उन विधायकों पर भी हस्ताक्षर करता है जो उसकी स्वीकृति के लिए संबंधित राज्यपाल द्वारा आरक्षित किए जाते है। राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति है। यह विधि समान ही होती है। राष्ट्रपति अध्यादेश तभी जारी कर सकता है, जब उस विषय पर तुरंत ही संसद द्वारा अधिनियम नही बनाया जा सकता है। अध्यादेश संसद की विधायी शक्तियों के विषयों पर ही जारी किया जा सकता है। राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद्  की सलाह पर करेगा। अध्यादेश तभी जारी किया जा सकता है जब संसद के किसी एक या दोनों सदनों का सत्रावसान हो। दोनों सदनों के सत्र मे रहने से अध्यादेश जारी नही किया जा सकता। अध्यादेश अस्थायी होता है। जब भी संसद का अधिवेशन होता है तो उसे संसद के समक्ष रखना होगा। यदि संसद उसे अनुमोदित नही करती तो अधिवेशन की तारीख से छह सप्ताह की समाप्ति पर वह अपने आप समाप्त हो जाएगा।

भारत के राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ 

भारत के राष्ट्रपति को संकटकाल का मुकाबला करने हेतु भारत का संविधान बहुत अधिक शक्तियाँ प्रदान करता हैं। संविधान के अनुच्छेद 352 से 360 तक तीन प्रकार की आपातकालीन स्थितियों की चर्चा की गई हैं।
1. युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति से संबंधित आपातकालीन स्थिति 
संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार यदि राष्ट्रपति को यह अनुभव हो कि युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह या इसकी सम्भावना के कारण भारत या इसके किसी भाग की सुरक्षा खतरे मे है तो वह इस आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है। उपर्युक्त शब्दावली " सशस्त्र विद्रोह शब्द 44 वें संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा " आंतरिक अशांति " शब्द के स्थान पर जोड़ा गया है। यह घोषणा पूरे भारत या भारत के किसी भाग के संदर्भ मे की जा सकती है। यह जरूरी नही कि ऐसी स्थिति वास्तव मे उत्पन्न हुई हो। राष्ट्रपति को इसकी सम्भावना का समाधान होने पर वह घोषणा कर सकता है।
इस प्रकार की घोषणा के लिए मंत्रिपरिषद् का लिखित परामर्श होना अनिवार्य है। इस प्रकार की घोषणा का एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के संकल्प द्वारा अनुमोदन आवश्यक है।

संकटकाल की घोषणा की समाप्ति राष्ट्रपति द्वारा ही एक अन्य घोषणा द्वारा की जा सकती है। संकटकाल की घोषणा को संसद के सामने रखा जायेगा। अगर संसद उसे अपनी स्वीकृति प्रदान नही करती, तो दो मास के बाद यह स्लयंमेव ही खत्म हो जायेगी। अगर इस बीच लोकसभा का विघटन हो चुका है, तो नई लोकसभा का अधिवेशन शुरू होने के तीस दिन के अंदर वह घोषणा उनके सामने रखी जायेगी। अगर लोकसभा इस अवधि मे संकटकाल की घोषणा को स्वीकृति प्रदान नही करती तो वह स्वयंमेव समाप्त मानी जाएगी। संकट की घोषणा की संसद द्वारा स्वीकृत के लिए जरूरी है कि संसद के दोनों सदनों मे उपस्थित सदस्यों का दो तिहाई बहुमत एवं कुल सदस्यों का स्पष्ट बहुमत उसका समर्थन करे।
संकटकालीन घोषणा के परिणाम
(क) राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 19 द्वारा सभी नागरिकों को दिये गये अधिकारों को खत्म कर सकता है।
(ख) राष्ट्रपति संसद को आदेश दे सकता है कि वह राज्यों की सूची के विषयों पर कानून बनाये।
(ग) अगर इस काल मे राज्यों के विधान-मण्डलों ने ऐसा कोई कानून बनाया है, जो संघीय कानून के विरूद्ध प्रतीत हो तो उसे रद्द किया जा सकता है।
(घ) अगर संसद का अधिवेशन नही हो रहा हो तो राष्ट्रपति संघीय सूची मे दिये गये किसी विषय पर अध्यादेश जारी कर सकता है।
(ङ) संसद संकटकाल मे शासन एवं शासनाधिकारियों को विशेष कार्य सौंप सकती है। साथ ही संसद कानून द्वारा एक बार मे एक वर्ष के लिए अपनी अवधि बढ़ा भी सकती है।
(च) संघ की कार्यपालिका, राज्यों की कार्यपालिका को आदेश तथा निर्देश दे सकती है एवं उसने कार्य ले सकती है।
(छ) राष्ट्रपति एक वित्त वर्ष के लिए संघ एवं राज्यों मे आय के वितरण मे भी परिवर्तन कर सकता है। इसके लिए भी संसद की स्वीकृति जरूरी है।
(ज) उपचारों के अधिकारों को राष्ट्रपति स्थगित कर सकता है।
2. राज्य मे संवैधानिक तंत्र की विफलता से उत्पन्न आपातकालीन स्थिति 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार यदि राष्ट्रपति को स्वयं या किसी राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर यह महसूस हो कि उस राज्य मे संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है तो राष्ट्रपति उस राज्य मे संकटकालीन स्थिति (राष्ट्रपति शासन) की घोषणा कर सकता है।
संकटकालीन घोषणा के परिणाम
जब किसी राज्य मे संकटकालीन स्थिति की घोषणा की जाती है तो इसके निन्म परिणाम सो सकते हैं---
(क) राष्ट्रपति राज्य के मंत्रिमंडल को भंग कर सकता है तथा राज्य के शासन का उत्तरदायित्व राज्यपाल या अन्य किसी अधिकारी को सौंप सकता है।
(ख) राज्य की सूचि के विषयों पर शक्ति संसद को सौंप सकता है। संसद परामर्श के लिए समिति नियुक्त कर सकती है।
(ग) जब संसद का अधिवेशन न हो रहा हो, तब राष्ट्रपति संचित निधि मे से राज्य के लिए व्यय कर सकता है।
(घ) संविधान के अनुच्छेद 19 तथा 32 के अंतर्गत नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थागित किया जा सकता है। इस तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों से नागरिकों को वंचित किया जा सकता है।
(ङ) राज्य की विधानसभा को भंग किया जा सकता है या उसे स्थगित किया जा सकता है
3. वित्तीय आपातकालीन स्थिति
संविधान के अनुच्छेद 360 (1) के अनुसार यदि राष्ट्रपति को यह आभास हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या वित्तीय साख खतरे मे है तो वह वित्तीय आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर सकता है। अभी तक भारत मे वित्तीय आपात स्थिति की घोषणा कभी नही की गई है।
इस घोषणा का परिणाम यह होगा कि संघ की कार्यपालिका राज्य को वित्तीय औचित्य सम्बन्धी निर्देश दे सकती है। इसके अन्तर्गत,
(क) राज्य के कर्मचारियों के सभी या किसी वर्ग विशेष के वेतन और भत्तों मे कमी का निर्देश, जो उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर भी लागू होगा।
(ख) राज्य के सभी धन विधेयक तथा अन्य संचित निधि पर भारित विधायकों को राज्य विधान मण्डल मे पारित होने के बाद राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखने का निर्देश दिया जा सकता है।
भारत के राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति
भारत के राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति किसी समय काफी विवाद का विषय रही है। लेकिन 42 वें संशोधन द्वारा इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। इस संशोधन मे कहा गया है कि राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा।
बैजहाट के शब्दों में;  राजा या रानी के समान, " शासक को परामर्श देने, समझाने तथा धमकी देने" की शक्ति तो प्राप्त ही है। वास्तव मे, वह ब्रिटिश राजा से थोड़ा ज्यादा शक्तिशाली है। वह किसी भी विधेयक को कम अधिकारपूर्वक वीटो कर सकता है। वह मंत्रिमंडल द्वारा आपातकाल के निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह कर सकता है। साथ ही जनता का निर्वाचन प्रतिनिधि होने के नाते तथा संविधान की रक्षा की शपथ लेने के नाते ही जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि होने के नाते तथा संविधान की रक्षा की शपथ लेने के नाते वह एक नैतिक शक्ति का स्वामी भी है, जिसका वह नाजुक परिस्थितियों मे प्रयोग भी कर सकता है।
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