6/28/2020

मौलिक अधिकार क्या है? मूल अधिकारों का महत्व एवं उनकी संख्या

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मौलिक अधिकार क्या है (molik adhikar ka arth)

अधिकार वे बाहरी परिस्थितियां है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। अतः प्रत्येक सभ्य राज्य अपने नागरिकों को कुछ अधिकार देता है। आधुनिक राज्यों मे जो अधिकार नागरिकों को प्राप्त होते है उन्हें मोटे तौर पर दो भागों मे रखा जा सकता है--- नागरिक अधिकार और राजनीतिक अधिकार। नागरिक अधिकार वे हैं जो सभ्य जीवन के लिए आवश्यक है, जैसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार। राजनीतिक अधिकारों से व्यक्ति को राज्य शासन मे भाग लेने का अवसर मिलता है जैसे मत देने का अधिकार, प्रतिनिधित्व करने का अधिकार आदि।
इस लेख मे मौलिक (मूल) अधिकार कितने है, मौलिक (मूल) अधिकारों का महत्व और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया हैं।
अधिकार सामाजिक जीवन की उन दशाओं को कहा जाता है जिनके बिना मनुष्य प्रायः अपना विकास नही कर सकता। अतः व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए जो अधिकार नितान्त आवश्यक होते हैं उनको ही मौलिक अधिकार कहते है।

मौलिक अधिकारों का महत्व (molik adhikar ka mahtva)

आधुनिक युग मे प्रायः सभी लिखित संविधानों मे मौलिक अधिकारों का उल्लेख मिलता है। ये अधिकार संविधान द्वारा प्रत्याभूत होते है, कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के अतिक्रमण से उन्हें सुरक्षित रखा जाता है तथा न्यायपालिका उनके संरक्षरक के रूप मे कार्य करती है।
मौलिक अधिकारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए भारत के भूतपूर्व न्यायाधीश श्री के सुब्बाराव ने कहा है " मौलिक अधिकार परस्पर प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम है।" जैसा कि एक लेखक ने कहा, वे नैतिक अधिकार है, जिन्हें हर हाल मे, हर जगह, हर मनुष्य को प्राप्त होना चाहिये क्योंकि अन्य प्राणियों के विपरीत वह चेतन तथा नैतिक प्राणी है। मानव व्यक्तित्व के विकास के लिये वे आद्द अधिकार है। वे ऐसे अधिकार है जो मनुष्य को स्वेच्छानुसार जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान करते है।

संविधान मे वर्णित मूल अधिकारों का महत्व निम्म प्रकार बताया जाता हैं---

1. मूल अधिकार व्यक्ति के आत्मविश्वास के लिए आवश्यक परिस्थितियों उत्पन्न करते हैं।
2. मूल अधिकार सरकार की निरंकुशता पर प्रतिबंध लगाते है।
3. मूल अधिकार " विधि के शासन " की स्थापना करते है।
4. मूल अधिकार सामाजिक समानता की स्थापना के आधार है।
5. मूल अधिकार पंथ निरपेक्ष राज्य के आधार हैं।
6. मूल अधिकार कमजोर वर्ग को सुरक्षा
लाॅस्की के शब्दों मे " अधिकार राज्य की आधारशिला होते है। ये वे गूण है जो राज्य द्वारा शक्ति के उपयोग को नैतिक रूप देते है। वे प्राकृतिक अधिकार इस तरह है कि अच्छे जीवन के लिए उनका रहना जरूरी है। इसी कारण वर्तमान प्रजातंत्रत्मक राज्य मे नागरिकों के अधिकारो का होना जरूरी है। अधिकार नागरिक के संपूर्ण नैतिक, भौतिक और आध्यात्मिक विकास हेतु जरूरी माने जाते है। अतः इन्हें मौलिक अधिकार कहते है।
मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार 

संविधान निर्माण के कार्य आरंभ करते हुए संविधान सभा द्वारा सर्व प्रथम एक अधिकार पत्र बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया। इसमे भारत की विविधता, सांस्कृतिक परंपरा और मूल्यों के साथ सन् 1948 मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत मानव अधिकारों के सार्वभौम-घोषणा-पत्र मे उल्लिखित अधिकारों का समन्वय किया गया।

मौलिक अधिकार कितने है? (molik adhikar kitne hai)

मूलतः भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को 7 मूल अधिकार प्रदान किए गए थे। 44 वें संशोधन अधिनियम द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के रूप मे समाप्त कर दिया गया। अब संपत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार है। अतः वर्तमान मे नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों का वर्णन निम्न प्रकार से है---
1. समानता का अधिकार
समानता का अधिकार भारतीय संविधान के 14 वे अनुच्छेद से 18 वें अनुच्छेद मे निहित है। भारतीय संविधान के अनुसार राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, वर्ण, जन्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर किसी भी प्रकार से भेदभाव नही करेगा। सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार हैं।
2. स्वतंत्रता का अधिकार
स्वंतंत्रता के अधिकार 4 अनुच्छेद 19 से 22 मे निहित है। अनुच्छेद 19 द्वारा 6 मौलिक स्वतंत्रताएं दी गई हैं---
1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
2. अश्त्र-शस्त्र रहित तथा शान्तिपूर्वक सम्मेलन की स्वतंत्रता।
3. समुदाय और संघ निर्माण की स्वतंत्रता
4. अबाध भ्रमण की स्वतंत्रता
5. कोई वृति, उपजिविका, व्यापार या व्यवसाय की स्वतंत्रता।
6. भारत के किसी भाग मे निवास एवं बस जाने की स्वतंत्रता।
ये सभी स्वतंत्रताएं किसी भी नागरिक के लिए सामान्य जीवन की मौलिक आवश्यकताएं है किन्तु संविधान निर्माता मानते थे कि ये भी अनियंत्रित नही हो सकती इसलिए, उन्होंने संविधान मे उन सीमाओ का भी उल्लेख किया है जिनके अन्दर ही इनका उपयोग हो सकता है। ये सीमायें हैं--- भारत की प्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था शिष्टाचार आदि। न्यायालय की अवमानना, मानहानाहि या अपराध के लिए प्रोत्साहन रोकने हेतु तर्कसंगत/युक्तियुक्त बंधन राज्य आरोपित कर सकता हैं। आदिवासी क्षेत्रों मे बाहरी व्यक्तियों को बेरोकटोक आने-जाने का नियंत्रण इनकी संस्कृति के संरक्षण हेतु युक्तियुक्त प्रतिबंध माना गया है। इसी तरह वैश्याओं पर विशिष्ट क्षेत्र मे धंधा/निवास का प्रतिबंध और अपराधियों पर लगाए गए निवास के प्रतिबंध न्यायालय द्वारा युक्तियुक्त ठहराए गए हैं।
वृति, व्यापार, करोबार आदि की स्वतंत्रता पर भी जनहित मे अंकुश लगाया जा सकता है, जैसे नशीली दवाओं या शराब, मिलावटी खाद्य पदार्थ, जोखिम भरी खतरनाक वस्तुओं का व्यापार आदि की स्वतंत्रता नागरिकों को नही दी जा सकती। समुदाय और संघ निर्माण की स्वतंत्रता पर भी कुछ प्रतिबन्ध लगाये गये है, ऐसे समुदाय के निर्माण की स्वतंत्रता नही दी जाती, जिनसे शान्ति और व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो जाए या राष्ट्र विरोधी हो।
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
अनुच्छेद 23 और 24 द्वारा शोषण के विरुद्ध अधिकार प्रदान किया गया। अनुच्छेद 23 के द्वारा बेगार को गैर-कानूनी और दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया। अब हरिजनों, स्त्रियों और भूमिहिन कृषको का शोषण नही किया जा सकता। इस अधिकार का एक महत्वपूर्ण अपवाद यह है कि राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिर्वाय श्रम की योजना लागू कर सकता है लेकिन यह योजना बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों पर लागू होगी।
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
भारतीय संविधान की उद्देश्यिका भारत को "पंथ निरपेक्ष" गणराज्य घोषित करती है। यह अवधारणा नकारात्मक नही है। इसका अर्थ धर्मविहीन या धर्मविरोधी नही वरन् गांधी जी के "सर्वधर्म समभाव" की धारणा की पोषक है। इसका अर्थ है कि भारत का कोई राज्य धर्म नही है, परंतु सभी धर्मों को समान आदर प्राप्त है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी श्रद्धानुसार किसी भी धर्म के पालन की स्वतंत्रता है, साथ ही धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नही किया जाएगा। भारत मे कोई भी धर्म का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं।
5. सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
अनुच्छेद 29 और 30 मे संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकारी दिए गए है। भारत के सभी नागरिकों को संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार प्रदान किये गये है। नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी भाषा लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है। राज्य द्वारा संचालित, मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाएं सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के खुली रहेंगी।
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अधिकारों का महत्व इसी मे है कि वे व्यावहारिक हों। अनुच्छेद 32 द्वारा संवैधानिक उपचारों का अधिकार दिया गया है। संविधान द्वारा प्रदत्त अन्य सभी मौलिक अधिकार संवैधानिक उचार के अधीन लागू कराये जा सकते है। संवैधानिक अधिकारों का उपचार का अर्थ है कि नागरिक अपने अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों की शरण ले सकता है। न्यायालयों के द्वारा व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित उन सभी कानूनों और कार्यपालिका के आदेशों व कार्यों को अवैधानिक घोषित कर दिया जायेगा, जो इन अधिकारों के विरुद्ध होगें।
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