मौलिक कर्त्तव्य क्या है? मूल कर्तव्य कितने है, जानिए

मौलिक कर्तव्य क्या है (mul kartavya ka arth)

संविधान बनाते सयम संविधान निर्माताओं ने मौलिक कर्तव्यों को अनावश्यक माना। अतः संविधान मे नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नही था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया तथा संविधान समय की कसौटी पर कसा जाने लगा, यह अनुभव किया जाने लगा कि संविधान मे कर्तव्यों का समावेश होना चाहिए था।
संसार के कई देशों के संविधान मे कर्तव्यों का उल्लेख है। उदाहरण के रूप मे सोवियत रूस, जापान, एवं आस्ट्रेलिया के संविधान मे कर्तव्यों का उल्लेख है। इन देशों के संविधान मे नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लेख किया गया है।
1975 मे संविधान मे संशोधन सुझाने हेतु गठित स्वर्णसिंह समिति ने कहा था कि संविधान मे कर्तव्यों की एक सूची भी जोड़ी जाए। अतः संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम द्वारा मूल कर्तव्यों का समावेश भारतीय संविधान मे किया गया। इनका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 51- क मे किया गया है। मूल कर्तव्यों की संख्या 10 हैं।

मौलिक अधिकार कितने है (maulik kartavya kitne hai)

भारत के हर नागरिक के लिए 10 मौलिक कर्तव्यों होगे जो कि इस प्रकार से हैं---
1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्रीध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को ह्रदय मे सँजोए रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाए रखे।
4. देश की रक्षा करे और आह्रान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
5. भारत के सभी लोगों मे समरसत्ता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं।
6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उनका परिरक्षण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव है, रक्षा करे, उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।
9. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों मे उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरन्तर बढने का प्रयत्न करे और उपलब्धि की नई ऊँचाईयों को छू ले।
उल्लेखनीय है कि मूल कर्तव्यों का उल्लेख संविधान के भाग 4 मे किया गया है, जिसमे राज्य के नीति निदेशक तत्व दिए गए है। अतः वैधिक दृष्टि से ये उसी श्रेणी मे आते है, जिसमे राज्य के नीति निदेशक तत्व। किसी न्यायालय द्वारा इन्हें मनवाया नही जा सकता। इस कारण इन्हें संविधान मे शामिल करने की आलोचना भी की गई है कि ये अनावश्यक है। परन्तु अधिकांश कर्तव्य सुस्पष्ट है और वे नागरिकों मे राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना भरने मे पर्याप्त सक्षम हैं।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां