राज्य के नीति निदेशक तत्वों का महत्व एवं आलोचना

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (सिद्धांतों) का महत्व (niti nirdeshak tatva ka mahatva)

यद्यपि यह सत्य है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व-कोई संवैधानिक महत्व नही रखते। यदि यह अध्याय संविधान मे न भी होता तो इससे भारत की शासन व्यवस्था पर किसी भी प्रकार का अंतर नही पड़ता, न ही उससे शासन की नीतियां प्रभावित होती। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि संविधान का भाग-4 जिसमे कि इन सिद्धांतों का उल्लेख है, संविधान का उपयोगी और महत्वपूर्ण भाग है। नीति निदेशक सिद्धान्तों की महत्ता व उपयोगिता निम्म प्रकार से स्पष्ट कि जा सकती हैं---
1. शासन के मूल्यांकन का आधार
नीति निदेशक तत्व जनसाधारण को शासन की सफलता अथवा असफलता की जांच करने का मापदंड प्रदान करते है। शासक दल चुनावों के दौरान इन सिद्धांतों के संदर्भ मे अपनी सफलताएं गिनाता हैं।
2. आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना मे सहायक 
नीति निर्देशक सिद्धांत सरकार को राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना के साथ-साथ आर्थिक लोकतन्त्र स्थापित करने मे सहयोग देते है।
3. कर्त्तव्य बोध का आभास
राज्य के नीति निदेशक तत्व हमेशा शासको को उनके कर्त्तव्य का बोध कराते रहते है। जिसके फलस्वरूप कोई भी राजनीतिक दल अनिष्टकारी कार्यों के प्रति उन्मुख नही होता हैं।
4. संविधान की व्याख्या मे मदगार
राज्य के नीति निदेशक तत्व संविधान की व्याख्या मे सहायक सिद्ध होते है ये सिद्धांत न्यायालयों के लिए प्रकाश स्तम्भ के समान है तथा संवैधानिक व्याख्या के कार्य मे न्यायपालिका द्वारा इन्हें उचित महत्व दिया जाता है।
5. जनमत की शक्ति
हालांकि इन सिद्धांतों को न्यायालय द्वारा क्रियान्वित नही किया जा सकता लेकिन इनके पीछे जनमत की सत्ता होती है जो कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा न्यायालय है।
6. राष्ट्र कल्याण की गति मे सहायक 
इन सिद्धांतों के अस्तित्व से एक राजनीतिक दल दूसरे दल मे सत्ता का हस्तांतरण हो जाने पर भी राष्ट्र कल्याण की गति मे किसी भी प्रकार की रूकावट पैदा नही होती हैं।
7. नीति निर्देशक सिद्धांत सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के प्रतीक के रूप में
नीति निर्देशन तत्वों का इसलिए भी महत्व है कि न केवल भारत मे लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना मे सहायक है वरन् भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देते है।
8. राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों का संवैधानिक महत्व 
नीति निदेशक सिद्धान्त संवैधानिक महत्व से भी कम महत्वपूर्ण नही हैं। इन सिद्धांतों मे भारत की राजकीय नीति मे स्थिरता व समता बनी रहेगी।

नीति निदेशक तत्वों की आलोचना niti nirdeshak tatva ki aalochana

संविधान निर्माण के समय से ही निदेशक तत्व आलोचना के विषय रहे है। इनके सम्बन्ध मे पहली आलोचना यह है कि ये केवल पवित्र घोषणाएं है, उससे अधिक कुछ नही क्योंकि इन्हें कानून द्वारा नही मनवाया जा सकता। प्रो. के. टी. शाह ने संविधान सभा मे कहा था कि यह ऐसा चेक है जिसका भुगतान बैंक की इच्छा पर निर्भर है। दूसरी आलोचना यह है कि इन सिद्धांतों मे अधिकार ऐसी बाते है जो आदर्शात्मक है, जिन्हें व्यवहार मे प्राप्त करना असंभव है। तीसरी आलोचना यह है कि ये अस्पष्ट है। वास्तव मे राज्य तभी इन सिद्धांतों को कार्यरूप मे परिणित कर सकता है जबकि यह स्वयं आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो जायेगा अन्यथा यह सिद्धांत केवल स्वप्नमात्र ही रह जायेंगे।
उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद भी इनका विशिष्ट महत्व है। चूंकि ये संविधान मे उल्लिखित है, इसलिए ये सरकार को उसके कर्तव्यों की याद दिलाते है। यदि कोई सरकार उनकी उपेक्षा करती है तो विरोधी दल उनके आधार पर सरकार की आलोचना कर सरकार को इनके अनुसार कार्य करने को बाध्य कर सकते है। साथ ही यह व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका तीनों के लिए निदेशक है। अर्थात् व्यवस्थापिका विधि निर्माण मे, कार्यपालिका उनके कार्यान्वयन मे एवं न्यायपालिका न्यायालय मे उन्हे आधार बना सकती है। इनमे से कतिपय सिद्धांतों के आधार पर विधि निर्माण भी हुआ है। न्यायपालिका ने भी न्यायिक निर्णयों मे इनका उपयोग किया है। यह संविधान की प्रस्तावना/उद्देश्यिका के मूल्यों को व्यावहारिक स्वरूप देने का प्रयास है, यहि इनकी महत्ता और विशेषता है।

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