भारतीय संविधान का निर्माण

भारतीय संविधान के बारें में संक्षिप्त जानकारी  
भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है। इसका निर्माण कैबिनेट मिशन योजना योजना 1946 के तहत् गठित एक संविधान सभा द्वारा किया गया। दिसंबर, 1947 से 1949 के मध्य अथक परिश्रम से संविधान सभा ने भारत के संविधान का निर्माण किया। इस अविधि मे इसके 11 सत्र आयोजित हुए और सभा ने लगभग 3 वर्षों मे इस कार्य को सम्पन्न किया। तीन वर्षों के विचार-विमर्श के उपरांत यह 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा पारित किया गया। संविधान के प्रारूप मे 315 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थी जब कि अंतिम रूप से पारित संविधान मे 365 अनुच्छेद और 10 अनुसूचियां थी। इससे स्पष्ट है कि प्रारूप मे अनेक परिवर्तन किए गए। सभा की पूरी कार्यवाही लोकतांत्रिक तरीके से सम्पन्न की गई। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। 

भारतीय संविधान का निर्माण (bhartiya samvidhan ka nirmaan kaise hua)

ऐसा नही है कि जब स्वतंत्रता भारत का द्वारा खटखटाने लगी, उसी समय भारत की जनता को संविधान सभा का ध्यान आया हो, वरन् संविधान सभा का विचार तो आजादी की मांग तथा स्वराज के लिए आंदोलन के साथ ही साथ विकसित होता गया। 1906 मे कांग्रेस के अधिवेशन मे अस्पष्ट शब्दों मे ही सही, लेकिन यह मांग की गई थी कि भारत के शासन का स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार भारतीयों को ही होना चाहिए।
संविधान सभा के विचार का सर्वप्रथम सन् 1895 के स्वराज विधेयक मे किया गया था जिसका निर्माण बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन मे हुआ था। 20 वीं शताब्दी मे इस विचार का सबसे पहले प्रतिपादन सन्  1922 मे महात्मा गांधी जी ने यह कहते हुए किया " भारतीयों का संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा। सन् 1925  मे गांधी जी ने स्वराज की अवधारणा भारत के विशेष सन्दर्भ मे प्रतिपादित की। उनकी मान्यता थी, लोकशक्ति पर आधारित शासन ही वास्तविक प्रजातंत्र हो सकता है, अर्थात् जहाँ राजनीतिक सत्ता का एकमात्र स्त्रोत "लोग" स्वयं हो और वे स्वयं अपना शासन संचालित करे। वर्तमान संविधान की प्रस्तावना मे "हम भारत के लोग" की अवधारणा इसी से प्रेरित है।
भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया
1933 मे लंदन के एक समाचार-पत्र हेली हेराल्ड मे एक लेख मे जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट शब्दों मे लिखा कि भारत की आजादी की समस्या के समाधान हेतु जनता द्वारा निर्वाचित संविधान सभा का गठन होना चाहिए, जो कि स्वतंत्र भारत हेतु संविधान का निर्माण करे।
1934 मे संविधान सभा की मांग ने बल पकड़ा। स्वराज पार्टी ने कुछ कड़े शब्दों मे आत्म-निर्णय की भावना पर बल दिया तथा मांग की कि इस सिद्धांत को लागू करने का एकमात्र उपाय भारत के सभी वर्गों की प्रतिनिधि संविधान सभा बुलाना है, जो कि एक सर्वमान्य संविधान का निर्माण करेगी।
1939 मे यह आवाज और भी बुलंद हुई। कांग्रेस ने घोषित किया " एक स्वतंत्र देश के संविधान के निर्माण का एकमात्र तरीका संविधान सभा है। सिर्फ प्रजातंत्र तथा स्वतंत्रता मे विश्वास न रखने वाले ही इसका विरोध कर सकते है।
शायद कांग्रेस के यह प्रस्ताव रद्दी की टोकरी मे ही पड़े रह जाते, लेकिन इसी वर्ष अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक मे एक एक तेज भूकंप आया। द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया तथा परिस्थितियां बदल गई।
एटली की घोषणा 
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटेन की नई श्रमिक सरकार के सामने यह स्पष्ट हो गया कि भारत को स्वतंत्र करने के अलावा कोई उपाय नही है। 15 मार्च, 1946 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एलटी हाऊस ऑप काॅमन्स मे घोषणा की कि ब्रिटेन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करना चाहता है एवं अब भारत की जनता खुद अपना संविधान बनाएगी। उन्होंने कहा " हमने यह निर्णय किया है कि भारतीयों द्वारा भविष्य हेतु संविधान बनाने की तुरंत व्यवस्था की जाएगी।
माउण्टबेटन योजना
मार्च 1947 मे लाॅर्ड लुई माउंटबेटन को सत्ता के सुचारू हस्तांतरण हेतु नए वाइसराय के रूप मे भेजा गया। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के लिए अंतरिम सरकार और संविधान सभा मे एक साथ काम करना संभव नही होगा। अतः माउण्टबेटन ने विभाजन की योजना बनाई और 3 जून, 1947 को भारत का विभाजन भारत और पाकिस्तान मे किए जाने की घोषणा कर दी।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
माउण्टबेटन योजनानुसार भारत का विभाजन 14-15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और भारत दो प्रभुसत्ता संपन्न निकायों मे हो गया। 15 अगस्त 1947 तक अधिकांश भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि इसमे शामिल हो गए।
इस प्रकार संविधान सभा भारत मे सभी रियासतों एवं प्रांतों की प्रतिनिधि तथा बाहरी शक्ति के आधिपत्य से मुक्त पूर्ण प्रभुत्व संपन्न निकाय बन गई। 
जुलाई 1947 मे संविधान सभा के लिए निर्वाचन हुए। संविधान सभा का पहला सत्र 9-23 दिसम्बर, 1946 को आयोजित हुआ। मुस्लिम लीग इसमे सम्मिलित नही हुई। तदर्थ रूप से इसकी अध्यक्षता डाॅ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की। 11 दिसम्बर को डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष चुने गए। 13 दिसम्बर, 1946 को पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इस संविधान सभा के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि संविधान निर्माण मे सहयोग हेतु विभिन्न समितियों का निर्माण किया जाए। परिणामस्वरूप 13 महत्वपूर्ण मुख्य समितियों का गठन किया गया। इसमे से कुछ समितियों के अध्यक्ष नेहरू या पटेल थे, जिन्होंने संविधान का मूल आधार तैयार किया। 
विभिन्न समितियों द्वारा सम्पन्न कार्यों के आधार पर संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार वी.एन. राऊ ने संविधान का प्रथम प्रारूप अक्टूबर 1947 मे तैयार किया। इस प्रारूप मे 240 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थी। इस प्रारूप के विस्तृत परीक्षण हेतु प्रारूप समिति गठित की गई। इसके अध्यक्ष श्री भीमराव अम्बेडकर थे। प्रारूप समिति के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य थे सर पी. कृष्णास्वामी आयंगार, के एम. मूंशी, सैयद मोहम्मद सादुल्ला, गोपाल स्वामी आयंगार, डी. पी. खेतान और सर बी. एल. मित्तल। प्रारूप समिति द्वारा तैयार किया गया प्रथम प्रारूप 240 अनुच्छेद एवं 13 अनुसूचियों का था। इसे न्यायविदों, कानूनविदों, न्यायाधीशों एवं जन नेताओं के विचारों हेतु प्रस्तुत किया गया। इनके विश्लेषणों के आधार पर द्वितीय प्रारूप 315 अनुच्छेद एवं 9 अनुसूचियों को तैयार किया गया। सह संशोधित प्रारूप 26 अक्तूबर, 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष को प्रस्तुत किया गया।
संविधान सभा द्वारा प्रारूप संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद पर विस्तृत एवं क्रमवार चर्चा की गई। विचार-विमर्श के दौरान कुछ मिलाकर 7635 संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए जिनमे से 2473 पारित हुए। संशोधनों सहित प्रारूप को पुनः प्रारूप समिति को प्रेषित किया गया। प्रारूप समित द्वारा पुनः संयोजित संविधान मे 395 अनुच्छेद और 10 अनुसूचियां थी। प्रस्तावना सबसे बाद मे स्वीकार की गई। अन्ततः दो वाचनों के पश्चात इसी संशोधन प्ररूप को अन्तिम रूप से 26 नवम्बर 1949 को पारित कर दिया गया।
भारती के संविधान निर्माण मे कुल 2 बर्ष 11 महा और 18 दिन का समय लगा। इस कार्य पर लगभग 64 लाख रूपये व्यय हुए। 26 जनवरी 1949 से नागरिकता, निर्वाचन और अन्तरिम संसद से सम्बंधित उपबंध तथा अस्थायी एवं संक्रमणकालीन उपबंध लागू किए गए। शेष संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इस तिथि को संविधान के लागू होने की तिथि मानी गॢई। इसके पश्चात संविधान मे अनेक संशोधन से इसका विस्तार हुआ है और इसके निर्माण की प्रक्रिया सतत् गतिशील है।


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