राज्य के नीति निर्देशक तत्व क्या है? नीति निदेशक सिद्धान्त

राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व क्या है, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का अर्थ (niti nirdeshak tatva kiya hai)

भारतीय संविधान के भाग 4 (अनुच्छेद 36-51) मे राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन किया गया हैं। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत वे होते है जो राज्य की नीति का निर्देशन करते है अर्थात् ये सिद्धांत ही राज्य की नीति के आधार होते है।
डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार " राज्य के नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य जनता के कल्याण को प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है। इन तत्वों के स्वरूप के सम्बन्ध मे संविधान के 37 वे अनुच्छेद मे कहा गया है कि इस भाग मे दिए एग उपबन्धों को किसी भी न्यायालय द्वारा मान्यता नही दी जा सकेगी किन्तु फिर भी इनमे दिए हुए तत्व देश के शासन मे मूलभूत है और शासन के संचालन मे इन तत्वों का प्रयोग करना राज्य का कर्तव्य होगा।
इस लेख मे हम राज्य के नीति निदेशक तत्वों के सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे।
एल. जी. खेडेकर के कथानानुसार नीति निदेशक तत्व  वे आदर्श है, जिनकी पूर्ति का सरकार प्रयत्न करेगी।

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के सिद्धान्त (niti nirdeshak sidhant)

1. आर्थिक सुरक्षा सम्बंधी निर्देशक सिद्धांत
भारतीय संविधान के निर्माताओं का उद्देश्य भारत मे लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था जिससे सभी क्षेत्रों मे न्याय का संचार हो। इस हेतु राज्य इस प्रकार की नीति अपनायेगा कि जिससे---
1. राज्य अपने आर्थिक साधनों के अनुसार और विकास की सीमाओं के भीतर यह प्रयास करेगा कि सभी नागरिकों अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार पा सकें।
2. पुरूषों एवं स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाये।
3. राज्य देश के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था करेगा कि अधिक से अधिक लोगों का सार्वजनिक हित हो सके।
4. राज्य महिलाओं पुरूषों एवं बच्चों के लिए स्वास्थ्य का समुचित प्रबंध करेगा। बच्चों को आर्थिक आवश्यकताओं के चलते कोई ऐसा कार्य न करना पड़े जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो।
5. राज्य वैज्ञानिक आधार पर कृषि का संचालन कराने का प्रयत्न करेगा।
6. राज्य अपने साधनों के अनुरूप यह सुनिश्चित करेगा कि बेरोजगारी, वृध्दावस्था, अंगहीनता आदि स्थितियों मे सार्वजनिक सहायता दी जा सके।
7. राज्य ऐसा प्रबंध करेगा कि मजदूरों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक सुविधाये प्राप्त हो और वे उनका लाभ उठा सके।
8. पोषाहार और जीवन स्तर ऊँचा उठाने और लोकस्वास्थय का सुधार राज्य का दायित्व होगा। इसके अन्तर्गत हानिकर औषधियों, नशीली वस्तुओं आदि का निषेध करेगा।
2. गांधी वादी सिद्धांत
यह सिद्धांत गाँधी दर्शन से प्रभावित हैं। इसके अनुसार---
1. राज्य ग्राम पंचायतों की स्थापना तथा संगठन करेगा और उन्हे ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा जिससे वे स्वायत्त शासक की इकाई के रूप मे कार्य कर सकें।
2. राज्य कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्यों के आर्थिक एवं शैक्षणिक हितों के पोषण का प्रयत्न करेगा।
3. राज्य औषधि के उद्देश्य से प्रयोग को छोड़कर मादक द्रव्यों तथा अन्य मादक पदार्थों के सेवन पर प्रतिबंध लगाएगा।
4. राज्य ग्रामीण क्षेत्रों मे कुटीर उद्योगों की स्थापना का प्रसाय करेगा।
5. राज्य गाय, भैस आदि दुधारू पशुओं के वध रोकने हेतु विधि निर्माण करेगा।
6. पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्धन और वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण का प्रयाय राज्य करेगा।
3. अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा सम्बंधित सिद्धांत
राज्य अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र मे निम्नलिखित आदर्शों को लेकर चलने का प्रयत्न करेगा---
1. राज्य राष्टों के मध्य न्यायपूर्ण एवं सम्बन्धों को बनाये रखेगा।
2. राज्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देगा।
3. राज्य अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निबटाने के प्रयास को प्रोत्साहन देगा।
4. राज्यों तथा राष्टों के आपसी व्यवहार मे अन्तर्राष्ट्रीय कानून और संन्धियों के प्रति आदर-भाव बढ़ाने का प्रयत्न करेगा।
4. उदारवादी सिद्धांत
इस श्रेणी मे उन तत्वों को शामिल किया गया है जिनका व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा की रक्षा करना एवं उसे ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है जिसमे वह अपना विकास कर सके। इस श्रेणी से सम्बंधित मुख्य निर्देशक तत्व इस प्रकार है---
1. राज्य अपने सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता का निर्माण करेगा।
2. राज्य 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क अनिर्वाय शिक्षा का प्रावधान करेगा।
3. राज्य अपनी सेवाओं मे कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य पूथक्करण का प्रयास करेगा।
4. राज्य आवश्यकतानुसार नि:शुल्क वैधानिक सहायता उपलब्ध कराएगा।
5. राज्य औधोगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंध मे कर्मचारियों को भागीदारी प्रदान करने के लिए समुचित कदम उठाएगा।
6. राज्य ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की रक्षा करेगा।
7. राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से अगल करने का प्रयत्न करेगा।
5. पर्यावरण की सुरक्षा
42 वें संशोधन द्वारा 45 "A" अनुच्छेद को बढ़ाते हुये कहा गया कि राज्य देश के पर्यावरण की रक्षा और उसमे सुधार का प्रयास करेगा। राज्य के द्वारा वनों और वन्य जीवन की सुरक्षा का भी प्रयास किया जायेगा।

मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों में अंतर

1. मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों मे पहला और प्रमुख अंतर यह है कि मौलिक अधिकार न्याय योग्य हैं अर्थात् इन अधिकारों का उल्लंघन होने पर नागरिक न्यायालय की शरण ले सकता है, परन्तु नीति निदेशक तत्व न्याय योग्य नही हैं। यदि राज्य नीति निदेशक तत्वों का पालन ना करें तो उस पर किसी प्रकार की न्यायिक कार्यवाही नही की जा सकती।
2. मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्वों मे दूसरा अंतर यह है की मौलिक अधिकार नागरिकों के लिए है। इनके द्वारा नागरिकों को अनेक शक्तियां प्रदान की गई है। नागरिक इनकी माँग कर सकते है। नीति निदेशक तत्वों सिद्धांत राज्य को लक्षित एवं सम्बोधित करते है कि वह चौथे अध्याय मे वर्णित कर्तव्यों का पालन करे।
3. मूल अधिकार निषेधात्मक आदेश है जब कि नीति निदेशक तत्व सकारात्मक निदेश है। मूल अधिकारों और नीति निदेशक सिद्धान्तों मे तीसरा अन्तर यह है कि मूल अधिकार कतिपय निषेधाज्ञाएं है जिनके माध्यम से राज्य को आदेश दिया गया है कि वह क्या-क्या करें और क्या ना करे। इसके विपरीत नीति निदेशक सिद्धान्तों के माध्यम से राज्य को अपने नागरिकों के हित मे कुछ करने के निदेश दिए गए है।
4. निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों की अपेक्षा निम्म हैं। यदि मौलिक अधिकारों एवं नीति-निर्देशक सिद्धांतों मे संघर्ष होने की स्थिति मे निर्देशक सिद्धांतों का पद मौलिक अधिकारों से निम्न होगा।
5. मूल अधिकारों का लक्ष्य राजनीतिक है जबकि नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक है।

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