8/11/2020

विचलन क्या है? विचलन के कारण एवं प्रकार अथवा दिशाएँ

By:   Last Updated: in: ,

विचलन क्या है? विचलन का अर्थ (vichalan ka arth) 

vichalan meaning in hindi;प्रमुख तौर पर मानव व्यवहार को दो भागों मे बाँटा जा सकता है--
(अ) समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार अथवा अनुरूपता,
(ब) समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहार (विचलित व्यवहार) अथवा विचलन।
वास्तव मे मनुष्य उपरोक्त दोनों प्रकार के व्यवहारों से संचालित होता है। जब व्यक्ति का व्यवहार या आचरण सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं, परम्पराओं, आदर्शों, प्रतिमानों के अनुरूप होता है तो ऐसे सामाजिक व्यवहार को समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार की श्रेणी मे रखा जाता है और इसे समाजशास्त्रीय शब्दावली मे सामाजिक अनुरूपता कहा जाता है। व्यक्ति के ऐसे व्यवहार की सर्वत्र प्रशंसा होती है और उसे समाज मे सम्मान प्राप्त होता है, दूसरे शब्दों मे यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति का ऐसा व्यवहार समाज द्वारा पुरस्कृत किया जाता है।
इसके विपरीत जब व्यक्ति का व्यवहार या आचरण सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं, परम्पराओं, आदर्शों, प्रतिमानों आदि के अनुकूल नही होता तो व्यक्ति के ऐसे व्यवहार को समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहार या विचलित व्यवहार की श्रेणी मे रखा जाता है और समाजशास्त्रीय शब्दावली मे इसे सामाजिक विचलन (विचलित व्यवहार) कहा जाता है। समाज मे ऐसे व्यवहार को करने की व्यक्ति को छूट नही दी जा सकती क्योंकि ऐसा करने से सामान्य सामाजिक संबंधों को क्षति पहुँचती है।
आगे जानेंगे विचलित व्यवहार के कारण और प्रकार या दशाएं।
सामान्य तौर पर विचलन का अभिप्राय सामान्य दिशा से हट जाना या घूम जाना होता है। शब्द-,कोश मे विचलन शब्द का प्रयोग निम्नलिखि अर्थों मे किया गया है--
(अ) व्यक्तिक्रम, दिशा-भेद, पथ से हटना, स्थान परिवर्तन, झुकाव/अंतर/फर्क/भेद;
(ब) दृष्टिकोण का स्वीकृति स्थिति से विचलन।
इस प्रकार शाब्दिक दृष्टि से विचलन व्यक्ति का ऐसा व्यवहार है जिसमे व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत मूल्यों व आदर्शों से हटकर चलता है अथवा उनकी उपेक्षा करता है। वास्तव मे विचलन अवांछित व्यवहार का ही एक रूप है और कानून से विचलन ही अपराध है।
बेकर के अनुसार " समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का किसी व्यक्ति या समूह द्वारा उल्लंघन ही विचलन है।

विचलन या विचलित व्यवहार के कारण (vichalan ke karan)

1. दोषपूर्ण समाजीकरण
विचलन का एक मुख्य कारण दोषपूर्ण समाजीकरण है। व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया से ही व्यक्ति सामाजिक आदर्शो को सीखता है। परिवार, पड़ोस, मित्रमंडली इन समूहों मे बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। यदि परिवार विघटित हो और बुरा पड़ोस एवं मित्र समूह मे आदर्श नियमों के उल्लंघन की आदत हो तब दोषपूर्ण समाजीकरम स्वाभाविक हो जाता है और ऐसी स्थिति संबंधित व्यक्ति के आचरण मे विचलन पैदा कर देती है।
2. कानून के प्रवर्तन मे कमी
कानून का पालन जब प्रभावी ढंग से नही होता तब विचलित व्यवहार मे वृद्धि होती है। विचलित व्यवहार करने वाले व्यक्ति को दण्ड दिया जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण यदि ऐसे व्यक्ति को दंड न देकर छोड़ दिया जाए तो संबंधित व्यक्तियों का कानून के प्रति डर का भाव खत्म हो जाता है और वे विचलित व्यवहार को बनाये रखते है।
3. विचलित व्यवहार का मनोवैज्ञानिक आधार
मनोवैज्ञानिक फ्राँयड ने विचलित व्यवहार का कारण इद्, अहम् और पराहम् बताया है, जो मावन व्यक्तित्व का आधार होती है, के द्वंद्व को विचलित व्यवहार का कारण माना है। "इद्" मन की अचेतन शक्ति है जो मूल प्रवृत्यात्मक इच्छाओं की तत्काल पूर्ति चाहती है। "अहम्" की अवस्था मे व्यक्ति कार्य कारण संबंध के द्वारा यह निश्चित करता है कि उसे किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। पराहम् की स्थिति आदर्शात्मक होती है। संस्कृति द्वारा निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप व्यवहार करने की प्रेरक शक्ति की प्रेरणा पराहम् देता है। भारतीय समाज की संस्कृति मे अविवाहित, परित्यक्ता, तलाकशुदा, विधवा-विधुर से यह अपेक्षा की जाती है कि वे यौनशुचिता बनाए रखें। जब कोई ऐसा पुरूष अथवा महिला सामाजिक मानदण्डों का उल्लंघन इद् के कारण करता है तो उसका व्यवहार विचलित व्यवहार कहलाएगा।
4. विचलित समूहों के प्रति निष्ठा
विचलित समूहों के प्रति निष्ठा की भावना भी विचलित व्यवहार को बढवा देती है एक बार जब कोई व्यक्ति विचलित समूह का सदस्य बन जाता है फिर उस समूह से निकल भी नही पाता।
5. विचलित व्यवहार की गोपनीयता
जब व्यक्ति के नियम विरुद्ध कार्य की गोपनीयता बनी रहती है तब ऐसा व्यक्ति विचलित व्यवहार की ओर अग्रसरित हो जाता है।
6. विसंगति 
विसंगति नियमहीन की स्थिति होती है। नियमहीनता अथवा विचलित व्यवहार को समाज की संरचना के आधार पर समझा जा सकता है। समाज मे व्यक्तियों का व्यवहार नियंत्रण के अनौपचारिक तरीकों से प्रतिबंधित होता है। ऐसे समाजों मे व्यक्ति समाज की परंपराओं द्वारा शासित होता है। आधुनिक समाज मे द्रुतगामी परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है। व्यक्ति के सामने अनेक विकल्प होते है। परंपराएं व्यवहार को शासित नही कर पा रही है। अतः बदलती हुई स्थितियों मे सांस्कृतिक द्वंद्व की स्थिति निर्मित होती है और विचलन की संभावना बढ़ जाती है।

विचलन की दिशाएँ अथवा प्रकार (vichlan ke pirkary)

पारसन्स महोदय ने विचलन की तीन दिशाओं की ओर हमारा ध्यान किया है। उनके अनुसार अनुसार ये तीन दिशायें निम्न प्रकार से है--
1. दुविधा
यह विचलन की प्रथम दिशा है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जबकि व्यक्ति आदर्श की वैधता स्वीकार करता है लेकिन किसी कारणवश अथवा किन्ही कारणों से उसका पालन नही करता। सच तो यह है कि व्यक्ति ऐसी स्थिति (जिसको दुविधा कहा जाता है) मे आर्दश को उचित मानते हुए उसे अपनी सफलता के लिए उपयोगी नही समझता, परिणामस्वरूप वह कभी अनुरूपता की ओर झुकता है तो कभी विचलन की ओर, (उदाहरण) यदि कोई व्यक्ति रेलवे स्टेशन जाता है और उसकी गाड़ी छूटने मे लगभग आधा घंटा बाकी है जबकि इस अवधि मे उसे गाड़ी तक पहुंचने मे एवं गाड़ी का टिकट भी लेना है लेकिन बुकिंग खिड़की पर काफी लम्बी लाइन लगी है; लाइन लांघकर नियमानुसार तो यह कार्य सम्भव नही है, अतः किसी जुगाड़ से लाइन के बीच मे प्रवेश पाकर टिकट प्राप्त कर लेता है तो वह विचलन की दुविधा वाली स्थिति है क्योंकि व्यक्ति निश्चित आदर्श का आदर करते हुए भी उसका पालन नही करता।
2. सक्रिय और निष्क्रिय विचलन
सक्रिय और निष्क्रिय विचलन को प्रकट करने वाले दो रूप है। निष्क्रिय विचलन वह स्थित या दशा है जबकि व्यक्ति प्रारंभ मे आर्दश की ओर झुकता है। लेकिन मजबूरी की हालत में या मजबूत होकर अपने पथ से विचलित हो जाता है। मानसिक  विकृति वाले व्यक्ति या दिमाग के कमजोर व्यक्ति या अस्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति आमतौर पर निष्क्रिय विचलन के शिकार हो जाते है। स्कूली बच्चों मे इस प्रकार का विचलन देखने को मिलता है। जब व्यक्ति इसके विपरीत विचारपूर्वक आदर्श के विपरीत चलता है तो उसे सक्रिय विचलन कहा जाता है।

3. नकारात्मक भावना से युक्त विचलन
जब व्यक्ति की आदर्श के प्रति नकारात्मक भावना होती है तो व्यक्ति आदर्श के प्रतिकूल आचरण करने मे कोई बुराई नही समझता। सम्भवतया इसीलिए ऐसे आचरण को नकारात्मक भावना से युक्त विचलन कहा गया है। कर्ता का यह दृष्टिकोण आदर्श के प्रति भी नकारात्मक हो सकता है और उन व्यक्तियों के प्रति भी हो सकता है जो उसके विरोधी है; जब कर्ता का दृष्टिकोण इस प्रकार का होता है तो वह आदर्श का उल्लंघन करते हुए अपने वि विरोधियों को आघात पहूँचा सकता है अथवा अपशब्द कह सकता है ताकि उसके विरोधी को क्षति पहुँच सके। कभी-कभी व्यवस्था के प्रति भी नकारात्मक दृष्टिकोण पनप जाता है और ऐसी स्थिति मे व्यक्ति व्यवस्था से संबधित प्रत्येक आदर्श का उल्लंघन करता है। वास्तव मे नकारात्मक भावना से युक्त विचलन आज के गतिशील समाज मे पर्याप्त मात्रा मे देखने को मिलता है।
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सात्मीकरण का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सामाजिक प्रक्रिया का अर्थ और परिभाषा
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सामंजस्य का अर्थ, परिभाषा
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; प्रतिस्पर्धा क्या है? परिभाषा एवं विशेषताएं
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; प्रतिस्पर्धा के प्रकार, महत्व या परिणाम
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; घरेलू हिंसा अधिनियम 2005
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; मानवाधिकार का अर्थ, परिभाषा और रक्षा की आवश्यकता 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सूचना का अधिकार क्या है, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के उद्देश्य
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सूचना आयोग का संगठन एवं कार्य
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सूचना की अधिकार की विशेषताएं, नियम एवं धाराएं
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; विचलन क्या है? विचलन के कारण एवं प्रकार अथवा दिशाएँ
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; युद्ध का अर्थ, परिभाषा एवं कारण
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; युद्ध के परिणाम
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; सामाजिक आंदोलन अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; औधोगिकरण का अर्थ, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; आधुनिकीकरण का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं प्रभाव 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; नगरीकरण का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं और प्रभाव 

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।