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7/26/2021

अनुमापन प्रणाली अर्थ, परिभाषा, प्रकार

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अनुमापन प्रणाली क्या है? (anumapan ka arth)

anumapan arth paribhasha prakar;सामाजिक अनुसंधान के संदर्भ में अनुमापन का तात्पर्य उस प्रविधि से है जिसमें गुणात्मक तथ्यों का परिमाणात्मक स्वरूप दिया जाता है।

समाजशास्त्र के अध्ययन विषय के अंतर्गत प्रमुख तौर पर सामाजिक घटानायें आती है, सामाजिक घटनायें अधिकतर गुणात्मक होती है इसलिये इनको संख्या अथवा मात्रा मे प्रकट करना पर्याप्त कठिन कार्य है। राजनीतिक घटनायें भी सामाजिक होती है जैसे भ्रष्टाचार, भाषा-विवाद, प्रान्तीयता, जातीय-दंगे, आरक्षण ये सब सामाजिक घटनायें और समस्यायें ही है। लेकिन देश, प्रेम, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता आदि ऐसी धारणायें या घटनायें है जिनका मापन संभव नही है। 

अतः वर्तमान मे इस बात की आवश्यकता है की ऐसे पैमानों का निर्माण किया जाये जिसमे मनुष्य के सामाजिक और राजनीतिक व्यवहारों को मापा जा सके। इसी मसले को सुलझाने के लिये समाजशास्त्र मे अब अनेकों नई प्रविधियाँ प्रणालियाँ या तौर तरीके विकसिक किये गये है। ये राजनीतिक अध्ययन पर भी लागू होते है।

अनुमापन प्रणाली की परिभाषा (anumapan ki paribhasha)

अनुमापन प्रणालियों से अभिप्राय उन साधनों क्षेत्रों अथवा तौर-तरिकों से होता है जिनके द्वारा किसी घटना या वस्तु को मापा जा सकता है एवं उसकी किसी विशेषता को गणनात्मक रूप से प्रकट किया जा सकता है।

गुडे एवं हाट के अनुसार," अनुमापन प्रणालियों के अंतर्गत अन्तर्निहित समस्या को इकाइयों की श्रेणियों में परिवर्तित करने की पद्धतियाँ आती है। इस दृष्टि से यह आज आवश्यक हो गया है कि राजनीतिशास्त्र व समाजशास्त्र अपने आप को इस योग्य बनायें कि गुणात्मक, सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं को भी सही-सही मापा जा सके।" 

इस प्रकार अनुमापन प्रणाली का अभिप्राय, उस तौर-तरिके या विधि से है जिसके द्वारा, सामाजिक तथ्यों या घटनाओं को गुणात्मक रूप प्रदान किया जाता है।

अनुमापन की समस्याएं 

अनुमापन की विधियों का प्रयोग गुणात्मक सामग्री को परिणात्मक स्वरूप देने के लिए किया जाता है। गुणात्मक सामग्री की यह विशेषता है, कि यह अनुभूति मूलक है जिसका प्रत्यक्ष मापन संभव नही है। अतएव इस संबंध में प्रमाप को तैयार करने के पूर्व अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है। ये प्रमुख निम्न प्रकार है-- 

1. क्रम का निश्चय 

माप या स्केल को तैयार करने के पहले यह निश्चित करना आवश्यक है कि अध्ययन के अंतर्गत सम्मिलित घटना मापन के योग्य है अथवा नही। घटना का माप के योग्य होना अथवा न होना इसके क्रम के ऊपर निर्भर रहता है। इसलिए क्रम से तात्पर्य उस तथ्य को परिभाषित करने से है जिसको जानने के लिए किसी वस्तु का मापन किया किया जाता है। उदाहरण के लिए-किसी समुदाय के अंतर्गत अपराध प्रवृति के मापन के लिए यदि किसी माप का उपयोग करें, तो पहले यह ज्ञात करना आवश्यक है कि अपराध की प्रवृत्ति का अस्तित्व उस समुदाय में है कि नही और दूसरा यह निर्धारित करना आवश्यक है कि अपराध प्रवृत्ति वस्तुतः क्या है? 

2. विश्वसनीयता 

माप के अंतर्गत एक क्रम की उपस्थित के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि क्रम विश्वसनीय हो। विश्वसनीयता से तात्पर्य है कि किसी अनुमाप का समान स्थितियों में एक ही निदर्शन के ऊपर उपयोग करें तो प्रत्येक अवसर पर वह समान परिणामों को प्रस्तुत करे।

3. माप की वैधता 

माप के उपयोगी होने के लिए क्रम एवं विश्वसनीयता के अतिरिक्त, वैधता भी अत्यंत आवश्यक है। माप के अंतर्गत वैधता से तात्पर्य यह है कि एक माप में उसके मापन की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए, जिसके लिए इसकी रचना की जाती है। अर्थात् माप को उस वस्तु का विशुद्ध रूप में मापन करना चाहिए, जिसके लिए उसे तैयार किया गया है। माप की वैधता व यथार्थता मापन के ऊपर आधारित है। 

4. भार की समस्या

श्रेणियों के भार की समस्या मूल रूप से, माप की वैधता को बढ़ाने की समस्या है। सामाजिक अनुसंधान में, प्रमाप उपयोग का उद्देश्य, गुणात्मक तथ्यों को परिमाणात्मक सामग्री में परिवर्तित करना है। इस प्रकार प्रमाप, गुणों की विभिन्न श्रंखलाओं को, जिनमें प्रत्येक का भार या महत्व समान नही है, एक विशेष प्रकार से प्रस्तुत करता है। यदि गुणों की प्रत्येक श्रेणी का भार एवं महत्व समान है, तो माप की वैधता बढ़ जाती है। इसीलिए प्रत्येक श्रेणी को समान भार या महत्व प्रदान करने का प्रश्न उठता है। 

5. श्रेणियों की मूल प्रकृति 

प्रमाप की प्रामाणिकता की समस्या माप की विभिन्न श्रेणियों की प्रकृति के साथ भी संबंधित है। अनेक अनुसंधानकर्ता इस तथ्य को स्वीकार करते है कि तथ्यों का सैद्धांतिक परीक्षण मानव व्यवहार के परीक्षण के लिए अनुपयुक्त है। अतएव यह आवश्यक है कि माप की रचना के साथ-साथ, उसमें सम्मिलित श्रेणियों की प्रकृति के ऊपर भी विचार किया जाये। इन श्रेणियों की प्रकृति यदि प्रमाप की विषय-वस्तु के अनुकूल है, तो माप की प्रामाणिकता बढ़ जाती है।

6. श्रेणियों की समानता 

अनुमापन निर्माण मे आने वाली अंतिम समस्या इकाइयों की समानता से संबंधित है। यदि इकाइयों में परस्पर असमानता है तो ठीक प्रकार से अनुमापन उपकरण नही बन सकता। यदि हम संपूर्ण मानव समाज को एक इकाई मान लेते है तो भी इसमें विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्र में अनेकानेक असमानताएं परिलक्षित होती है।

अनुमापन प्रविधियों (पैमानों) के प्रकार 

anumapan ke prakar;समाजशास्त्रीयों ने सामाजिक अनुसंधान मे मुख्यतः दो प्रकार के पैमानों (Scales) पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। एक तो सामाजिक व्यवहार एवं व्यक्तित्व से संबंधित पैमाने व दूसरे सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्य पक्षों से संबंधित पैमाने। दृष्टिकोण या मनोवृत्ति मापक पैमाने प्रथम प्रकार के पैमाने है। इसके अंतर्गत चरित्र, नैतिकता, ज्ञान, मनोबल, सहयोग आदि मापने के पैमाने आते है। दूसरे प्रकार के पैमानों मे सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मापने वाले पैमाने, समुदायों, मकानों की दशाओं एवं सामाजिक संस्थाओं के अध्ययन मे प्रयुक्त पैमाने सम्मिलित होते है। सामाजिक अनुसंधान में अनेई प्रमापों का प्रयोग किया जाता है। प्रचलन की दृष्टि ने निम्नलिखित प्रमाप प्रमुख है--

1. अंक पैमाना 

यह एक मनोवृत्ति मापक पैमाना है। यह लोगों की राय जानने के लिये प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रकार के पैमाने में लोगों की मनोवृत्तियों को जानने के लिए कुछ निश्चित एवं विशिष्ट शब्दों का चुनाव किया जाता है। प्रत्येक शब्द के लिए कुछ अंक निर्धारित कर दिये जाते है। लोग अपनी पसंदगी या नापसंदगी के आधार पर उन शब्दों के आगे (✔️) मार्क या  (✖️) मार्क का चिन्ह लगा देंगे। इस आधार पर लोगों को प्राप्त होने वाले अंकों के आधार पर उनकी मनोवृत्तियों का पता लगाया जाता है। इस विधि को अंक पैमाना कहा जाता है।

2. सामाजिक दूरी पैमाना 

यह भी एक मनोवृत्ति पैमाना ही है। इस पैमाने के द्वार लोगों के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों की दूरी का अध्ययन किया जाता है। हमारे  संबंध सभी व्यक्तियों से एक समान नही होते। किसी से निकट के कम निकट के या दूरी के संबंध होते है। इस पैमाने के द्वार यह विदित किया जाता है कि विभिन्न लोगों के बीच सामाजिक संबंधों में क्या अंतर है? कौन व्यक्ति किसके निकट है या दूर। किसी के प्रति हमारी मनोवृत्ति या दृष्टिकोण अधिक प्रतिकूल होता है तो विदित होता है कि उससे हमारे संबंध निकट के नही है। यदि हमारी मनोवृत्ति अनुकूल होती है तो विदित होता है कि उससे हमारे संबंध निकट के है। सामाजिक दूरी को मापने के इस प्रमाप को निम्न दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है-- 

(अ) बोगार्डस स्केल 

बोगार्डस ने अपने में विविधि सामाजिक संबंधो का चुनाव किया और फिर कुछ निर्णयकर्ताओं द्वार उन संबंधों का इस प्रकार व्यवस्थापन किया जिसमें द्वितीय संबंध प्रथम संबंध से अधिक सामाजिक दूरी को दर्शाता था। इस प्रकार क्रमशः न्यूनतम से अधिकतम दूरी को स्पष्ट करने वाले संबंधों को व्यवस्थित कर, लोगों का दृष्टिकोण जानने के लिए उनका वितरण किया और प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सामाजिक संबंधों की पारस्परिक दूरी का मापन किया। 

(ब) समाजमितीय माप 

सामाजिक संबंधों की दूरी के अध्ययन के लिए मोरिनो और जेनग के द्वार जिस माप का प्रयोग किया गया, उसे समाजमितीय माप कहा जाता है। सामाजिक संबंधों के मापने की यह पद्धति बोगार्डस की पद्धति से पूर्णतया भिन्न है। इस पद्धति के अंतर्गत किसी छोटे समूह में व्यक्तियों के उन समस्त संबंधों का माप किया जा सकता है जिसका निश्चित समय में उस समुदाय के भीतर अस्तित्व होता है। इस प्रकार, यह पद्धति, छोटे समूहों के बीच, संबंधों के स्वीकरण तथा अस्वीकरण के दृष्टिकोण का माप करती है।

दूसरे शब्दों में यह प्रणाली, किसी निश्चित समूह के व्यक्तियों के बीच पाये जाने वाले समस्त पारस्परिक संबंधों की संरचना की, सरल तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत करने की एक विधि है जिनका प्रयोग मुख्य रूप से, अनौपचारिक समूहों, विद्यालय की कक्षाओं, बंदीगृहों तथा औद्योगिक संस्थानों इत्यादि में किया जाता है।

3. तीव्रता मापक यंत्र 

ये भी मनोवृत्ति मापक पैमाना ही है। इसका प्रयोग लोगों की रूचियों एवं मान्यताओं की तीव्रता या गहनता को मापने के लिए किया जाता है। किसी एक मत से या घटना से वे कितने सहमत है या रूचि रखते है। इस बात की माप करने के लिये ऐसे पैमाने का प्रयोग किया जाता है। मान्यताओं की तीव्रता या गहनता को जानने के लिये कुछ शब्दों का निश्चय कर लिया जाता है तथा उन पर उत्तरदाताओं को (✔️)  चिन्ह लगाने के लिये कहा जाता है जैसे-- मत पर लोगों की मनोवृति जानने के लिए-- पूर्ण सहमत, सहमत, पूर्ण असहमत, असहमत, अनिश्चित जैसे शब्दों को उस मत के लोगों की तीव्रता एवं गहनता मापने का प्रयास किया जाता है। इसी प्रकार लोगों की किसी विषय में रूचि जानने के लिए पूर्ण रूप से  चाहता हूँ, चाहता हूँ, बिल्कुल नही चाहता, नही चाहता, कह नही सकता जैसे शब्दों का चयन करके उस विषय में लोगों की रूचि की तीव्रता या गहनता मापने का प्रयास किया जाता है। 

4. पद  सूचक पैमाना 

इसे श्रेणी सूचक पैमाना भी कहते है। यह वैसे तो तीव्रता मापक पैमाने के समान ही है। परन्तु इसमें लोगों की पसंदगी या नापसंदगी को दो वस्तुओं में तुलनात्मक रूप से जानने का प्रयास किया जाता है। एक की तुलना में किसको लोग अधिक पसंद करते है-- इस प्रकार की मनोवृत्ति को मापने के लिये पद सूचक या श्रेणी सूचक पैमानों का उपयोग किया जाता है। 

5. आंतरिक स्थिरता मापक पैमाने 

थर्सटन ने अपनी समविस्तार विधि की कमियों को दूर करने के लिये आंतरिक स्थिरता पैमाने का प्रयोग किया। इस विधि का प्रयोग विषय विशेष के प्रति लोगों की मनोवृत्तियों को मापने के लिए किया जाता है। यह पैमाना अत्यधिक भिन्न श्रेणियों में असंगति की मान्यता पर आधारित है इसलिए इसे असंगति की वैषयिक माप विधि भी कहा जाता है।

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