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2/15/2020

उपकल्पना या परिकल्पना का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं

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उपकल्पना या परिकल्पना का अर्थ (parikalpana kiya hai) 

वह चिंतन जो अनुसंधान के पूर्व किया जाता है, परिकल्पना या उपकल्पना कहा जाता है। वैज्ञानिक पद्धति के विभिन्न चरणों मे उपकल्पना का प्रथम स्थान आता हैं। यह वैज्ञानिक मान्यता है कि परिकल्पना (उपकल्पना) से ही अध्ययन शुरू होता है। तथा उपकल्पना के ही साथ इसका समापन होता है। इस प्रकार सामाजिक अनुसंधान मे उपकल्पना का अत्यधिक महत्व होता हैं।
उपकल्पना की सहायता से हम जीवन के अपरिचित क्षेत्र मे प्रवेश करते है और उस क्षेत्र से सम्बंधित वास्तविक तथ्यों को प्रकाश मे लाते है। उपकल्पना के द्वारा हमे समस्या की प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त होती है। जिसकी सहायता से हम अपने अनुसंधान कार्यक्रम की रूपरेखा का निर्धारण करते है। अनुसंधान एक लम्बी यात्रा होती हैं। जिस बिन्दु से हम इस यात्रा को प्रारंभ कहते है, उसी बिन्दु को उपकल्पना के नाम से सम्बोधित करते है।

उपकल्पना या परिकल्पना की परिभाषा (parikalpana ki paribhasha) 

एडवर्ड के अनुसार "उपकल्पना दो या दो से अधिक चरों के सम्भाव्य सम्बन्ध के विषय मे कथन होता है, यह एक प्रश्न का ऐसा प्रयोग उत्तर होता है कि जिससे चरों के सम्बन्ध का पता लगता है।
लुण्डबर्ग, "एक उपकल्पना एक सामयिक या कामचलाऊ सामान्यीकरण है, जिसके वैधता की जाँच शेष रहती है।"
करलिंगर, "उपकल्पना दो या अधिक चल राशियों अथवा चरों के सम्बंधों का कथन है।"
गुडे तथा स्केट्स "उपकल्पना एक अनुमान है कि जिसे अन्तिम अथवा अस्थायी रूप से किसी अवलोकित तथ्य अथवा दशाओं की व्याख्या हेतु स्वीकार किया गया हो एवं अन्वेषण को आगे पथ-प्रदर्शन प्राप्त होता है।"
पी. वी. यंग के अनुसार," एक अच्छे कार्यवाहक केन्द्रीय विचार है जो उपयोगी खोज का आधार बनता है कार्यवाहक उपकल्पना माना जाता है।"
बनार्ड फिलिप्स के अनुसार," उपकल्पना किसी घटना मे विद्यमान संबंधों के विषय मे अस्थायी कथन है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि उपकल्पना एक प्रारंभिक अथवा प्राथमिक कल्पना विचार या आधार है जो सामाजिक तथ्यों एवं घटनाओं की खोज करने तथा उसके विषय मे ज्ञान प्राप्ति हेतु प्रेरणा प्रदान करता है। इस उपकल्पना मे परिवर्तन की क्षमता या गुन्जाइश रखी या मानी जाती है। इसीलिए इसे "काम चलाऊ" उपकल्पना" या कार्यवाहक उपकल्पना भी कहते है।
संक्षेप मे, उपकल्पना एक संबंधित समस्या का ऐसा सम्भाव्य तथा परीक्षण योग्य प्रस्ताव होता है कि जिसके आधार पर संबंधित चरों अथवा घटनाओं का अध्ययन आनुभाविक रूप से किया जा सके और समस्या के पर्याप्त उपयुक्त तथा वैध उत्तर उपलब्ध हो सकें।

परिकल्पना या उपकल्पना के प्रकार  या वर्गीकरण (parikalpana ke prakar)

विद्वानों ने अलग-अलग आधारों पर उपकल्पना को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया है। उपकल्पना का सबसे सरल वर्गीकरण उसकी प्रकृति के आधार पर किया जाता है। इस दृष्टि से उप कल्पनाओं को दो वर्गों में रखा जा सकता है--
(अ) सरल उपकल्पना
सरल उपकल्पना ऐसी उपकल्पना होती है जो किसी वस्तु या संबंध में परिवर्तन जो अधिक जटिल नहीं हो के अनुक्रम या दिशा को दर्शाती है। अथवा दो चरों के मध्य सहसंबंध की कल्पना करती है
(ब) जटिल उपकल्पना
इस वर्ग में तथ्य या चारों में जटिल संबंधों या परिवर्तनों को दर्शाने से संबंधित उपकल्पनाओं को रखा जाता है।
गुडे एवं हाट, के आधार पर उपकल्पनाओं को तीन वर्गों मे वर्गीकृत किया जा सकता है--
1. आनुभविक एकरूपता संबंधी उपकल्पनाएं
मोटे तौर पर इस वर्ग मैं ऐसी उपकल्पना आती हैं, जो किसी तथ्य के बारे में पूर्व ज्ञान या अनुभव के आधार पर निष्क्षेपित कर आनुभविक अध्ययन के माध्यम से परीक्षित की जाती है।
2. जटिल आदर्श प्रारूप संबंधी उपकल्पनाएं
इस वर्ग मे आदर्श प्रारूप पर आधारित अध्ययनों मे प्रयुक्त उपकल्पनायें आती है।
3. विश्लेषणात्मक चरों से संबंधी उपकल्पनाएं
इस वर्ग मे ऐसी उपकल्पनाओं को रखा जा सकता है, जो चरों के बीच कार्यकारण संबंधो के सांख्यकीय विश्लेषण पर आधारित होती है।
मैकगुइगन ने अनुभवाश्रित उपकल्पनाओं को दो भागों मे विभाजित किया है---
1. सार्वभौमिक उपकल्पनाएँ (परिकल्पनाएं)
सार्वभौमिक उपकल्पनाएँ वे है, जिनका अध्ययन किया जाने वाला चर सभी समय और सभी स्थान पर उपस्थित रहता है।
2. अस्तित्ववादी उपकल्पनाएँ 
ऐसी उपकल्पनाएँ वे है, जो एक मामले में चरों के अस्तित्व का निर्धारण कर सके।
हेज ने दो प्रकार की उपकल्पनाएँ बतलाई है---
1. सरल उपकल्पना 
इसमे सामान्य उपकल्पना आती है तथा किन्ही चरों के बीच सह-सम्बन्ध की स्थापना की जाती है।
2. मिश्रित उपकल्पना 
मिश्रित उपकल्पना वह है, जिसमे चरो की संख्या एक से अधिक हो। इनमे सह-सम्बन्ध सांख्यिकी की सहायता से ज्ञात किए जाते हैं।
सामान्यतौर पर उपकल्पनाओं को निन्म तीन श्रेणियों मे विभाजित किया जा सकता है--
1. परीक्षणात्मक एकरूपता वाली उपकल्पनाएं
इस श्रेणी मे जो उपकल्पनाएं आती है, उनमे निम्न विशेषताओं का समावेश होता है--
(अ) इस प्रकार की उपकल्पनाएं सामूहिक जीवन मे प्रचलित मान्यताओं पर आधारित होती है।
(ब) ऐसी उपकल्पनाओं का परीक्षण समान तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
उदाहरण, अक्सर कहा जाता है कि भूरी आंखो वाला व्यक्ति चालाक होता है। इस उपकल्पना की सत्यता के लिए भूरी आंखो वाले व्यक्तियों की खोज करनी पड़ेगी।
2. जटिल आदर्शात्मक उपकल्पनाएं
इनमें निम्न विशेषताएं पाई जाती है--
(अ) कुछ कारक अनेक कारणों से संबंधित होते है।
(ब) इन अनेक कारकों के अंतःसंबंधों को स्थापित करने वाली उपकल्पनाएं जटिल आदर्शात्मक कहलाती है।
(स) इन संबंधों को आदर्श माना जाता है।
3. विवेचनात्मक उपकल्पनाएं
ऐसी उपकल्पनाओं की निम्न विशेषताएं होती है--
(अ) अनेक कारक सामाजिक घटनाओं से संबंधित होते है।
(ब) प्रत्येक कारक सामाजिक घटनाओं से संबंधित होते है।
(स) परिवर्तित परिस्थितियों मे कारकों के बीच अंतःसंबंध ज्ञात करने के लिए इस प्रकार की उपकल्पनाओं की सहायता ली जाती है।
उदाहरण, बाल अपराध। यह अनेक कारकों का परिणाम हो सकता है। तर्क पर आधारित इन कारकों मे अंतःसंबंध स्थापित करने के लिए इस प्रकार की उपकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है।

परिकल्पना या उपकल्पना की विशेषताएं (parikalpana ki visheshta) 

अनुसंधान की सफलता का आधार प्रायः यह होता है कि उसकी उपकल्पना का कितनी सावधानीपूर्वक किया गया है। एक अच्छी उपकल्पना मे निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए----
1. समस्या का पर्याप्त उत्तर
अच्छी उपकल्पना से समस्याओं के उत्तर प्राप्त करने मे सुविधा और सरलता होती है। उपकल्पना इस प्रकार होनी चाहिए, जो समस्या के समाधान मे पर्याप्त उपयोग हो।
2. मूल समस्या से संबद्ध
कई बार अध्ययनकर्ता उपकल्पनाओं के निर्माण मे मूल समस्या से गौण महत्व वाले पक्षों को उपकल्पना के साथ संयुक्त करता है। ऐसा करना अध्ययन की दुष्टि से अनुचित है। चुने गए विषय के मुख्य-मुख्य पक्षों से ही उपकल्पनाओं का संबंध होना चाहिए ताकि अध्ययन मे विशिष्टता आ सके।
3. विशिष्टता
उपकल्पना को अपने मे विशिष्टता लिए हुए होना चाहिए। उसे अत्यंत विस्तृत नही होना चाहिए। विशिष्टता के आधार पर ही समस्या का स्पष्ट और गहन अध्ययन किया जा सकता है।
4. यंत्रों की प्राप्तता
ऐसी उपकल्पना का चुनाव करना चाहिए जिसके परीक्षण के लिए यंत्र उपलब्ध हो। यदि यंत्र प्राप्त नही होगे, तो उपकल्पना को संचालित करने और निष्कर्ष निकालने मे कठिनाई होगी।
5. संक्षिप्तता
चूंकि उपकल्पना समस्या का सारांश होती है, अतः उसे संक्षिप्त होना चाहिए। उसकी भाषा वैज्ञानिक होनी चाहिए अन्यथा उसके शब्दों के अर्थों मे परिवर्तन की संभावना रहती है।
6. किसी सिद्धांत से सम्बंधित
उपकल्पना का चुनाव करते समय ऐसी उपकल्पना को लेना चाहिए, जिसका किसी सिद्धांत के द्वारा समर्थन किया जा चुका है। सामाजिक जीवन के सिद्धांतों के विकास के लिए उपकल्पना का अत्यंत महत्व है।
7. मार्गदर्शन मे उपयोगी
शोध कार्य प्रारंभ करने से पूर्व जिस उपकल्पना का हमने चयन किया है वह ऐसी होनी चाहिए जो वास्तव मे शोधार्य का एक निश्चित मार्ग प्रशस्त कर सके।
8. आँकड़े प्राप्त हो सके
ऐसी उपकल्पना का चुनाव करना चाहिए, जिसके प्रमाणीकरण के लिए आँकड़े पर्याप्त रूप से उपलब्ध हो। अगर उपलब्ध नही होगे, तो किसी भी सिद्धांत को प्रमाणित करना अत्यन्त ही कठिन कार्य होगा।
9. सिद्धांत समूह के संबंद्ध
एक अच्छी उपकल्पना के लिये यह जरूरी है कि वह संबंद्ध क्षेत्र मे किसी पूर्व स्थापित सिद्धांत के क्रम मे हो क्योंकि असंबंद्ध उपकल्पनाओं की परीक्षा विस्तृत सिद्धांतों के संदर्भ मे नही की जा सकती।
10. सरलता
पी. वी. यंग के अनुसार उपकल्पना जितनी ज्यादा सरल होगी उतनी ही ज्यादा अध्ययन मे वैज्ञानिकता आएगी। इस सरलता से अनुसंधानकर्ता को विषयगत तथ्यों के बारे मे सही जानकारी प्राप्त हो सकेगी। अनेक बार अनेक तकनीकी शब्दों के बाहुल्य के कारण अध्ययन दिशाहीन हो जाता है। इस प्रकार भाषा भावगत सभी तरह से उपकल्पनाओं को यथाप्रयास सरल रूप दिया जाना चाहिए।
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