har din kuch naya sikhe

हर दिन कुछ नया सीखें।

6/18/2021

उपकल्पना/परिकल्पना का महत्व, सीमाएं/दोष

By:   Last Updated: in: ,

उपकल्पना या परिकल्पना का महत्व 

upkalpana ka mahatva;सामाजिक अनुसंधान में उपकल्पना अत्यधिक महत्व रखती है। अनुसंधान कार्य में यह बहुमुखी भूमिका को निभाती है। वस्तुतः अनुसंधान कार्य उपकल्पना से शुरू होता है और उपकल्पना पर ही उसकी पुष्टि या पुष्टि के साथ समाप्त हो जाता है। उपकल्पना एक और अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करती है और दूसरी ओर सिद्धांत के निरूपण सिद्धांत की पुष्टि या पुष्टि के माध्यम से यह समाज वैज्ञानिक ज्ञान का विकास करती है। समाज वैज्ञानिक ज्ञान से आशय समाज के बारे में यथार्थ वैषयिक ज्ञान से होता है जिसकी प्राप्ति विशेष रुप से सामाजिक विज्ञानों में कठिन होती है।

यह भी पढ़ें; उपकल्पना या परिकल्पना का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं

उपकल्पनाओं के माध्यम से प्राप्त ज्ञान आनुभविक अध्ययन एवं परीक्षण पर आधारित होता है। इसलिए यह अध्ययनकर्ता की एक या पूर्वाग्रह से मुक्त व यथार्थ होता है। साथ ही सत्यापनशील होने से यह विश्वसनीय व वैध भी होता है। संक्षेपे, उपकल्पना के महत्व को निम्न रूप मे प्रस्तुत किया जा सकता है--

1. यह अध्ययन को स्पष्ट व निश्चित स्वरूप प्रदान करती है

अस्पष्टता व अनिश्चितता शोध अध्ययन में भटकाव लाते हैं।  उपकल्पना के होने से शोधकर्ता के सामने शोध का वास्तविक व निश्चित खाका उपस्थित हो जाता है जिससे उसमें किसी प्रकार के संदेह व भटकाव की संभावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार वह अपना पूरा ध्यान अनुसंधान पर केंद्रित कर पाता है।

2. उपकल्पना अध्ययन क्षेत्र को परिसीमित कर अध्ययन मे धन व शक्ति के अपव्यय को रोकती है

उपकल्पना चरों के बीच संबंधों की व्याख्या कर अनुसंधान का क्षेत्र परीसीमित करती है। जिससे अनुसंधानकर्ता को अनावश्यक साक्ष्यों को एकत्र करने की जगह केवल साक्ष्यों को एकत्र करना पड़ता है। जो चरों के बीच संबंधों की व्याख्या करने के लिए जरूरी होते हैं। इससे अनुसंधान कार्य में श्रम शक्ति समय व धन की बचत होती है।

3. उपकल्पना अनुसंधान कार्य को निश्चित दिशा प्रदान करती है

शोध कार्य को व्यवस्थित करने में उपकल्पना कि यह भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उपकल्पना के अभाव में शोधकर्ता के सामने बहुत कुछ अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है। उसे यह ही स्पष्ट नहीं हो पाता कि क्या करना है? और क्या नहीं करना है? चरों के बीच अनुमानित संबंधों को दर्शाकर उपकल्पना अनुसंधानकर्ता को बताती है कि उसे क्या करना है अथवा किस बात की परीक्षा करनी है।

4. उपकल्पना निष्कर्षों के निरूपण मे सहायता करती है

शोध कार्य में अनुसंधानकर्ता क्षेत्र में जाकर सामग्री का संकलन करता है। फिर संकलित सामग्री का विश्लेषण कर उससे निष्कर्ष निकालता है, अगर वे मनमाने ढंग से सामग्री संकलित करता है तो उसके सामने कठिनाइयां आती हैं। कि वह किस प्रकार उसे विश्लेषित करें और क्या निष्कर्ष निकाले? उपकल्पना के होने पर उसे पता होता है कि क्या सामग्री एकत्रित करनी है? और किस बात की परीक्षा करनी है? जिससे उसे ना केवल सामग्री के संकलन में आसानी होती है। अपितु उसके विश्लेषण और उससे निष्कर्षों के निरूपण मे भी आसानी होती है।

5. उपकल्पना शोध को सैद्धांतिक आधार प्रदान करती है

उपकल्पना सिद्धांत की रचना में सहायक होती है। किसी तथ्य के बारे में परस्पर संबंधित छोटी-छोटी उपकल्पनाओं को जिनकी सत्यता की परीक्षा हुई हो के माध्यम से किसी सामान्य सिद्धांत का निरूपण आसान होता है। इसके अलावा उपकल्पना सिद्धांत के परीक्षण में भी उपयोगी होती है। सामान्यता किसी सिद्धांत की जांच उस से छोटी छोटी उपकल्पनायें निष्क्षेपित कर उनकी परीक्षा के माध्यम से की जाती है।

उपकल्पना या परिकल्पना की सीमाएं (upkalpana ki simaye)

यदि उपकल्पना का निर्माण सावधानी पूर्वक किया गया है तो यह निश्चित रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान में पथ प्रदर्शन का कार्य करती है। लेकिन अगर इसका निर्माण ठीक प्रकार से नहीं किया गया तो यह घातक सिद्ध भी हो सकती है एवं इसके पूरे निष्कर्ष भ्रामक हो सकते हैं। उपकल्पनाओं की मुख्य सीमाएं इस प्रकार है--

1. उपकल्पना पर अधिक विश्वास करना सही नही 

उपकल्पना अनुसंधानकर्ता के अपने स्वयं के अनुभव पर आश्रित होती है एवं कई बार उसे प्रारंभ में ही उपकल्पना में अटूट विश्वास हो जाता है। अतः वे सभी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर उपकल्पना को सत्य साबित करने का प्रयत्न करता है जो कि हो सकता है की वास्तविकता में विपरीत हो।

2. अध्ययनकर्ता का प्रतिष्ठा बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित होना

कई बार अनुसंधानकर्ता किसी सामाजिक तथ्य पर इतना ज्यादा जोर देता है कि वह उसका संबंध अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के साथ जोड़ लेता है। चाहे वह अनुसंधान के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण क्यों ना हो? दूसरे शब्दों में कई बार तो सामाजिक अनुसंधानकर्ता या तो उपकल्पना की विचारधारा समझ में ना आने पर भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उसे क्रियान्वित करने का सभी तरह का प्रयास करता है। ऐसा करने पर गलत-गलत तरह से सामाजिक तथ्यों का एकीकरण संभव होगा।

3. तथ्य संकलन की सीमित प्रकृति

यदि अनुभवहीनता के कारण उपकल्पना का निर्माण ठीक तरह से नहीं किया गया तो हो सकता है की घटना की वास्तविकता का कभी भी पता ना चले। क्योंकि उपकल्पना तो अनुसंधानकर्ता के सिर्फ सीमित (अर्थात उपकल्पना से संबंधित) तथ्यों के संकलन पर ही बल देती है

4. उपकल्पना पर आधारित तथ्यों के संग्रहण मे व्यक्तिनिष्ठ पक्षों की संभावनाएं अधिक रहती है

पी. वी. यंग का कहना है की सामान्यतः यह देखा जाता है की क्षेत्रीय कार्यकर्ता अज्ञानता तथा अनुभवहीनता के कारण तथ्यों को प्राप्त करने में असफल रहता है। वह उपकल्पना के आधार पर एक-एक कदम आगे बढ़ाता है। इस कारण वह सामाजिक तथ्यों के चित्रण के समय अपनी तरफ से व्यक्तिगत बातों को जोड़ना उचित समझता है।

संबंधित पोस्ट 

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।