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6/30/2021

शक्ति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, प्रकार

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शक्ति का अर्थ 

shakti arth paribhasha visheshta prakar;शक्ति क्या है? अत्यंत ही साधारण अर्थों में शक्ति का तात्पर्य ताकत अथवा बल से लगाया जाता है। शक्ति का तात्पर्य सत्ता अथवा प्रभाव से भी लगाया जाता है। राबर्ट डाहल तथा लासवेल ने शक्ति का प्रयोग प्रभाव के कार्यों से किया है।

मर्गेनथाऊ ने शक्ति का प्रयोग नियंत्रण के रूप में किया है। हाब्स ने शक्ति का को सामान्य प्रवृत्ति के रूप में अभिव्यक्त किया है तथा लिखा है कि," शक्ति मानव की अविच्छिन तथा अनवतर इच्छा है, जिसका अंत मृत्यु से संभव है।" 

कौटिल्य ने शक्ति शब्द का प्रयोग बल के प्रयोग के रूप में किया है। सामान्य बोलचाल में शक्ति व्यक्ति का वह प्रभाव है जिससे समाज में या राजनीति में उसकी सर्वोच्चता तथा संप्रभुता को स्वीकार किया जा सके जाता है।

आज विश्व भर में राजनीति वास्तव में शक्ति की ही राजनीति है। मानव एक विचारशील प्राणी है लेकिन सभी मानव एक ही प्रकार के विचार नहीं रखते। विचार विभिनता मानव समाज की एक विशेषता है। प्रत्येक मानव दूसरे मानव को अपने विचार पक्ष में लाने का प्रयास करता है और इसी प्रयास को सफल बनाने के लिए वह शक्ति का प्रयोग करता है। इसी संबंध में बीरस्ट्रीट ने कहा है कि," शक्ति समाज की आधारभूत सुव्यवस्था का सहारा है। जहां कहीं सुव्यवस्था है वहाँ शक्ति का अस्तित्व अवश्य पाया जाता है। शक्ति प्रत्येक संगठन के पीछे और प्रत्येक संरचना को बनाए रखती हैं। बिना शक्ति के कोई संगठन स्थाई नहीं हो सकता तथा बिना शक्ति के कोई सुव्यवस्था नहीं हो सकती।

शक्ति की परिभाषा (shakti ki paribhasha)

राबर्ट बीरस्टीड के अनुसार," शक्ति बल की योग्यता है, न कि उसका वास्तविक प्रयोग।" 

मैकाइवर के अनुसार," शक्ति व्यक्तियों तथा व्यवहार को नियंत्रित करने, विनियमित करने तथा निर्देशित करने की योग्यता है।" 

काप्लान के अनुसार," शक्ति संगठित क्रिया द्वारा किसी आयोजन को पूरा करने की एक योग्यता है।" 

माॅरगेन्थाऊ के अनुसार," राजनैतिक शक्ति से राजकीय सत्ता धारण करने वाले व्यक्तियों के पारस्परिक संबंध तथा जनता के साथ उनके संबंधों का बोध होता है।" 

हाॅब्स के अनुसार," शक्ति भविष्य मे कुछ निश्चित लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक वर्तमान साधन है।" 

राबर्ट डाहल के अनुसार," शक्ति की परिभाषा प्रभाव के एक विशेष रूप मे की जाती है। इस रूप मे शक्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति की आज्ञा का पालन न करने के कारणवश बहुत हानि उठानि पड़ती है।" 

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि " एक व्यक्ति की शक्ति वास्तव मे उसका दूसरे व्यक्तियों के संबंध मे वह प्रभाव है जो कि दूसरों पर डालने मे समर्थ होता है। अतः अपने इरादों के अनुसार एक व्यक्ति जिस सीमा तक दूसरों को प्रभावित करता है, वही उसकी शक्ति है।"

शक्ति की विशेषताएं (shakti ki visheshta)

शक्ति की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. शक्ति संबंध सूचक अवधारणा है। इसमे शासक और शासितों के बीच संबंध पाया जाता है। अर्थात शासक के लिए यह आवश्यक है कि कुछ ऐसे व्यक्ति हों जिस पर वह शासन करें।

2. शक्ति द्विपक्षीय अवधारणा है। अर्थात जब शासित होंगे तभी शासक भी होंगे। किसी एक के अभाव मे शक्ति का प्रयोग संभव नही है।

3. व्यक्तिगत स्थिति व प्रतिष्ठा शक्ति को प्रभावित करती है। अर्थात शक्ति परिस्थतिजन्य होती है। उदाहरण के लिए, एक उच्च पद में बैठा व्यक्ति यदि ढुलमोल चाल से प्रशासन करता है तो वह प्रशासन अस्त-व्यस्त रहता है और उसी पद पर यदि कोई दूसरा तेजस्वी व्यक्तितव वाला आसीन होता है तो वह अच्छा शासन करता है। दोनों व्यक्ति एक ही पद पर एक ही प्रकार के अधिकारों का प्रयोग करते है फिर भी दोनों की शक्तियों के परिणामों में अंतर होता है।

4. शक्ति मे पुरस्कार और दंड देने की शक्ति पाई जाती है। अर्थात जो व्यक्ति शक्तिधारी होते है वे जनता के आदशों का पालन करा सकते है, क्योंकि वे दंड और पुरस्कार देने की स्थिति मे होते है।

5. अनेक शक्तिधारी पर्दें के पीछे रहकर शक्ति का प्रयोग करते है। पूँजीपति और बड़े-बड़े धार्मिक नेता राजनीति से दूर रहते हुए भी राजनीति मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि शक्ति किसके पास है इस संबंध मे मार्क्सवादियों का विचार है कि उत्पादन के साधन जिन व्यक्तियों के पास होते है, उन्ही के पास शक्ति रहती है। यद्यपि यह शक्ति आर्थिक शक्ति कही जाती है। जबकि विशिष्ट वर्ग या राजनैतिक अभिजनों का मत है कि शक्ति कुछ विशिष्ट लोगों के हाथों मे केन्द्रित रहती है। ये विशिष्ट लोग प्रभावशाली नेता, पूँजीपति, उच्च प्रशासनिक अधिकारी और कुलीन परिवारों के सदस्य आदि होते है। राजनैतिक अभिजनों का कहना है कि," शासन का बाहरी रूप कुछ भी हो सकता है। उसे आप राजतन्त्र कहें या लोकतन्त्र, फासिस्ट सरकार मानें या कम्युनिस्ट शासन, परन्तु राजनैतिक शक्ति सदैव अल्पसंख्यकों के हाथों मे रही है।" 

बहुलतावादियों का विचार है कि राजनीति शक्ति किसी एक स्थान या समुदाय में केन्द्रित नही की जा सकती। प्रजातंत्र में शक्ति धारक कोई भी हो सकता है।

शक्ति के प्रकार (shakti ke prakar)

शक्ति के निम्न प्रकार है--

1. शारिरिक शक्ति 

यहां शारीरिक शक्ति का दो संदर्भों में प्रयोग किया जाता है। जब व्यक्ति के संदर्भ में शारीरिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो इसका तात्पर्य शारीरिक बल से होता है। जब सामाजिक या राष्ट्रीय संदर्भ में शारीरिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो इसका तात्पर्य सैनिक शक्ति से होता है। आज सैनिक शक्ति अनेक भागों तथा श्रेणियों में विभाजित है।

2. मनोवैज्ञानिक शक्ति 

चार्ल्स शिल्चर ने लिखा है," मनोवैज्ञानिक शक्ति एसी प्रतीकात्मक सुचकों से मिलकर बनती है जो व्यक्तियों के मस्तिष्क और भावनाओं को प्रभावित करती है। यह प्रचार माध्यमों से लोगों को नियंत्रित करने का एक तरीका है। इस शक्ति का प्रयोग अत्यंत चतुराई से किया जाता है इस शक्ति के द्वारा दूसरों को प्रभावित करना होता है।

3. आर्थिक शक्ति 

शक्ति का व्यवहारिक स्वरूप आर्थिक है। आर्थिक साधनों के द्वारा शक्ति अपने आप प्रभावित होने लगती है। आज अनेक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों पर आर्थिक रूप से निर्भर जो देश किसी भी अन्य देशों को आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं इनका उद्देश्य होता है कि वे देश उनके प्रभाव क्षेत्र में रहे। अनेक देश दूसरे देशों के आर्थिक दबाव के कारण अपने रुपयों का अवमूल्यन करते हैं व्यापार की निर्भरता भी आर्थिक दबाव का कारण है।

शक्ति के अन्य प्रकार

शक्ति के प्रकारों के संबंध में विभिन्न विचारकों केअलग-अलग मत भी है। शक्ति के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों के वर्गीकरण को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है--

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार शक्ति के प्रकार 

(अ) पाश्विक शक्ति

(ब) दैवी शक्ति।

बीअर का शक्ति का वर्गीकरण 

बीअर ने शक्ति के सात प्रकार बतलाए है--

(अ) सम्पत्ति 

(ब) भौतिक बल 

(स) सामाजिक स्तर

(द) शिक्षा 

(ई) नैतिक चरित्र 

(फ) व्यक्तित्व का आकर्षण 

(झ) प्रबंध कला।

डाहल का द्वारा शक्ति का वर्गीकरण 

डाहल ने शक्ति के दो स्वरूप बताए है--

(अ) उत्पीड़न 

जो शक्ति औचित्यपूर्ण न हो उसे दमन कहा जाता है।

(ब) सत्ता 

जो शक्ति औचित्यपूर्ण हो उसे सत्ता कहते है।

एडवर्ड मिल्स का शक्ति का वर्गीकरण

(अ) व्यवहार परिवर्तन के आधार पर शक्ति के तीन रूप है--

1. बल, 2. प्रभुत्व और 3. छल-योजना।

(ब) औचित्यपूर्ण के आधार।

मैक्स वेबर का शक्ति वर्गीकरण 

वेबर के अनुसार शक्ति के तीन प्रकार है--

(अ) कानूनी व वैधानिक 

(ब) परम्परागत

(स) करिश्माई शक्ति

बीरस्टीड का शक्ति का वर्गीकरण 

बीरस्टीड ने शक्ति का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया है--

1. दृश्य शक्ति

शक्ति का प्रयोग जब प्रकट रूप मे किया जाता है तो उसका रूप दृश्य शक्ति का होता है।

2. अदृश्य शक्ति 

शक्ति का प्रयोग जब अप्रगट रूप से किया जाता है तो उसका रूप अदृश्य अथवा प्रच्छन्न शक्ति का होता है।

3. दमनात्मक शक्ति

जब शक्ति का प्रयोग अत्याचारपूर्ण ढंग से किया जाता है तो उसका रूप दमनात्मक होता। 

4. अदमनात्मक शक्ति

शक्ति का धारक अपनी शक्ति का प्रयोग दूसरे पक्ष को औचित्य के आधार पर अपनी ओर करने के लिए करता है तो अदमनात्मक शक्ति का रूप होता है।

5. औपचारिक शक्ति

जब शक्ति का प्रयोग किसी आदेश, निर्देश अथवा अनुदेश जारी करके किया जाता है तो उसका रूप औपचारिक शक्ति होता है।

6. अनौपचारिक शक्ति

शक्ति का प्रयोग जब किसी आदेश, निर्देश व अनुदेश को जारी किए बिना किया जाता है तो उसे शक्ति का अनौपचारिक रूप कहा जाता है।

7. प्रत्यक्ष शक्ति

शक्ति के धारक द्वारा जब शक्ति का प्रयोग स्वयं किया जाता है तो उसका रूप प्रत्यक्ष शक्ति का होता है।

8. अप्रत्यक्ष शक्ति 

शक्ति का प्रयोग धारक द्वारा यदि अपने-अपने अधीनस्थों या अन्य किसी के माध्यम से किया जाता है तो शक्ति का रूप अप्रत्यक्ष शक्ति का होता है।

9. एक पक्षीय, द्विपक्षीय व बहुपक्षीय शक्ति 

शक्ति प्रवास की दिशा की दृष्टि से शक्ति एकपक्षीय व बहुपक्षीय हो सकती है।

10. केन्द्रित, विकेन्द्रित व व्याप्त शक्ति 

शक्ति के अधिवास के अनुसार उसके रूप केन्द्रीत, विकेन्द्रित व व्याप्त शक्ति के होते है। एक स्थान पर स्थित शक्ति केन्द्रित, अनेक स्थानों पर वितरित शक्ति विकेन्द्रित तथा अस्पष्ट रूप से बिखरी हुई शक्ति को व्याप्त शक्ति कहते है।

11. क्षेत्रीय, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति 

क्षेत्रीयता के आधार पर शक्ति का स्वरूप क्षेत्रीय, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय होता है।

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