9/20/2020

शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

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प्रश्न; "शक्ति पृथक्करण" संबंधी सिद्धांत का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए? 

अथवा; शक्ति पृथक्करण सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।

अथवा; शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर एक लेख लिखिए।

अथवा; शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत गलत मान्यताओं पर आधारित है। विवेचना किजिए।

अथवा; शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए।

अथवा; शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। 

अथवा; शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के महत्व के वर्णन किजिए।

शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत 

शक्ति पृथक्करण का अर्थ (shakti prithakkaran kya hai)

सरकार की तीन शक्तियों व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अलग-अलग कार्य करने की स्वतंत्रता का नाम शक्ति पृथक्करण सिद्धांत है। विद्वानों का मत है कि सरकार की ये तीनों शक्तियाँ अलग-अलग हाथों मे रहने मे जनता के हितों की सूरक्षा होगी। इस प्रकार शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के अनुसार व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को एक-दूसरे के कार्यों मे हस्तक्षेप नही करना चाहिए।

शक्ति पृथक्करण की परिभाषा (shakti prithakkaran ki paribhasha)

गैटिक के अनुसार " यह सिद्धांत कि शासन के विभिन्न कार्य व्यक्तियों की विभिन्न संस्थाओं द्वारा किये जाने चाहिए, प्रत्येक विभाग दूसरे विभागों मे हस्तक्षेप किये बिना अपने कार्यक्षेत्र तक ही सीमित रहे और अपने क्षेत्र मे पूर्णतया स्वतंत्र रहे, शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत कहा जाता है। 

डाॅ. इकबाल नारायण के अनुसार " राजशक्ति की अभिव्यक्ति तथा प्रयोग तीनों रूपों मे स्वतंत्रतापूर्वक हो, व्यवस्थापन, कार्यपालन तथा न्याय। इन तीनों से संबंधित शक्तियाँ पृथक- पृथक हाथों मे रहे, इनसे संबंधित विभाग अपने-अपने क्षेत्र मे पूर्ण स्वतंत्र हो तथा कोई भी एक-दूसरे विभाग की शक्ति तथा उसके अधिकारों मे हस्तक्षेप न करे, इस सिद्धांत को राजशक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत कहते है। 

शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का समर्थन 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के समर्थकों का मत है कि कानून बनाने, कानून चलाने तथा न्याय करने के लिए अलग-अलग योग्यताओं की तथा क्षमताओं की आवश्यकता है। अतएव सरकार की ये तीनों शक्तियाँ एक ही व्यक्ति के हाथों मे न होकर अलग-अलग व्यक्तियों के हाथों मे होनी चाहिए। मांटेक्यू ने कहा था," यदि विधान परिषद् तथा  कार्यपालिका की शक्तियों को एक ही व्यक्ति अथवा निकाय मे केन्द्रित कर दिया गया तो स्वतंत्रता का अन्त हो जाएगा।" 

हैमिल्टन ने स्पष्ट रूप से कहा था," विधानपालिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका इन सब शक्तियों का एक स्थान पर केन्द्रित हो जाना अत्याचार की परिभाषा है।" 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का विकास (The theory of history of separation of power) 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से शक्ति पृथक्करण सिद्धांत 18वीं शताब्दी के फ्रांसीसी विचारक माण्टेस्क्यू के नाम के साथ जुड़ा हुआ है। परंतु माण्टेस्क्यू के पूर्व इस सिद्धांत के प्रतिपादन एवं विकास मे यूनानी विचारक प्लेटों, अरस्तु, रोमन चिंतक सिसरों, पालिवियस, 14 वीं शताब्दी मे मर्सिलियो ऑफ पेडुआ, 16 वीं शताब्दी मे फ्रांसीसी विचारक बोदां, 17 वीं शताब्दी मे जाॅन लाॅक आदि के  विचारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

माण्टेस्क्यू से पूर्व शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के प्रतिपादन का श्रेय राजनीति विज्ञान के जनक अरस्तु को जाता है। यद्यपि प्लेटों ने अपने ग्रंथ " लाॅज" द्वारा मिश्रित राज्य का विचार प्रस्तुत किया था परंतु अरस्तु की पुस्तक राजनीति मे अरस्तु ने एसेम्बली मैजिस्ट्रेसी और न्यायिक नामक तीन विभागों का उल्लेख किया है।

जाॅन लाॅक ने अपनी पुस्तक "सिविल गवर्नमेंट"  में भी इस सिद्धांत पर विचार किया है। लाॅक ने आधुनिक शासन की तीन शक्तियों मे अंतर किया है। उसने व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और विदेश-विभाग का उल्लेख किया है। लाॅक का कहना था कि तीनो शक्तियाँ यदि एक ही व्यक्ति के हाथों मे होंगी तो भ्रष्टाचार फैलाने की संभावना है।

बोदाँ, प्रथम आधुनिक विचारक है जिन्होंने शक्तियों के पृथक्करण की बात के विचार को दिया। उन्होंने न्यायिक कार्यों को पृथक संस्था को देने का समर्थन किया।

मांटेस्क्यू द्वारा पतिपादित शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत 

जिस प्रकार ऑस्टिन का " संप्रभुता का सिद्धांत " प्रसिद्ध है उसी प्रकार राजनीति विज्ञान मे माण्टेस्क्यू का शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत प्रसिद्ध है। मांटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक " दि स्पिरिट ऑफ लाॅज" मे इस सिद्धांत की विशद व्याख्या की है। मांटेस्क्यू के समत राजाओं का निरंकुश और स्वेच्छाकारी राज्य था और व्यक्तियों की स्वतंत्रता सुरक्षित नही थी। वह वैयक्तिक स्वतंत्रता की सूरक्षा का प्रबल समर्थक था। सन् 1726 ई. मे उसने इंग्लैंड की यात्रा की और वहां की प्रचलित स्वतंत्रता की भावना से बहुत प्रभावित हुआ। इंग्लैंड की शासन-व्यवस्था के बाहरी ढांचे के अध्ययन से उसने स्वतंत्रता के इस रहस्य का पता लगाया। उसने देखा कि इंग्लैंड मे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायिक कार्य पृथक-पृथक विभागों द्वारा सम्पादित होते है, जबकि फ्रांस मे ये सभी एक ही निरंकुश सम्राट के अधीन है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण के परिणामस्वरूप ही फ्रांस मे जनता की स्वतंत्रता खतरे मे है और शक्तियों के पृथक्करण के कारण ही इंग्लैंड मे वैयक्तिक स्वतंत्रता की सूरक्षा हुई है। इससे मांटेस्क्यू इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वैयक्तिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए शासन की समस्त शक्तियां एक ही व्यक्ति मे केन्द्रित न रहकर विभिन्न व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों मे विभाजित हो जानी चाहिए। 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत की व्याख्या करते हुए माण्टेस्क्यू ने लिखा है," यदि कानून और उन पर अमल करवाने की शक्तियाँ किसी एक ही व्यक्ति या व्यक्ति समूह के हाथ मे एकत्रित हो तो स्वतंत्रता असंभव है....। इनमे प्रत्येक अपने क्षेत्र मे स्वतंत्र होना चाहिए, उसे अपने कार्यक्षेत्र तक ही सीमित रहना चाहिए और उसके द्वारा दूसरे अंग के कार्य को प्रभावित करने या उन पर नियंत्रण स्थापित करने की चेष्टा नही की जानी चाहिये। " यदि व्यवस्थापिक और कार्यपालिका की शक्तियाँ एक ही हाथों मे केन्द्रीत हो जांए, तो कोई स्वतंत्रता नही रह सकती! इसी तरह यदि न्याय संबंधी शक्ति को व्यवस्थापिका और कार्यपालिका शक्ति से पृथक नही रह सकती! इसी तरह यदि न्याय संबंधी शक्ति को व्यवस्थापिका और कार्यपालिका शक्ति से पृथक नही किया जाता, तो भी स्वतंत्रता सम्भव नही हो सकती है! यदि एक ही व्यक्ति या समुदाय तीनों काम करने लगे, तो स्वतंत्रता बिल्कुल नष्ट हो जायेगी और राज्य अपनी मनमानी करने लगेगा। 

ब्रिटिश विचारक ब्लैकस्टोन और अन्य विचारकों ने माण्टेस्क्यू के विचारों का समर्थन किया है। ब्लैकस्टोन का कहना था," जहाँ कहीं कानून बनाने उन्हें लागू करने का अधिकार एक ही व्यक्ति या व्यक्ति समूह मे निहित रहता है। वहाँ सार्वजनिक स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है क्योंकि शासक अत्याचारपूर्ण कानून बनाकर उन्हें मनमानें ढंग से लागू कर सकता है। यदि न्यायिक अधिकारों को व्यवस्थापिका के साथ संयुक्त कर दिया जाता है तो प्रजा के जीवन, स्वतंत्रता और सम्पत्ति के अधिकार स्वेच्छाचारी न्यायाधीशों के हाथ मे आ जाते है और वे सभी फैसले अपने मतानुसार देते है न कि आधारभूत कानूनों के अनुसार। यदि न्यायपालिका को कार्यपालिका के साथ संयुक्त कर दिया जाता है तो व्यवस्थापिका का स्थान गौण हो जाता है। मैडिसन ने भी शक्तियों के विभाजन को व्यक्ति स्वातन्त्र्य के लिए आवश्यक माना था।

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का मूल्यांकन 

माण्टेस्क्यू का उद्देश्य स्पष्ट था। वह शासन की निरंकुशता का और सरकार की शक्तियों के एक व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा अनियंत्रित और असीम उपयोग का विरोधी था। इस हेतु उसने सरकार के प्रत्येक अंग के मर्यादित रूप से कार्य करने का समर्थन किया। वह नही चाहता था कि सरकार का एक अंग दूसरे अंग के कार्यों मे हस्तक्षेप करे। इसके लिए उसने " एक शक्ति दूसरी शक्ति नियंत्रण करे (Power should be a check to power) की नीति का समर्थन किया। लास्की का कथन है कि स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए न्यायपालिका का कार्यपालिका से स्वतंत्र होना आवश्यक है। इस अर्थ मे शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत मे एक स्थायी सत्य निहित है, क्योंकि यह स्पष्ट है कि यदि कार्यपालिका अपनी इच्छानुसार न्यायिक निर्णयों को रूपांतरित कर सके तो यह राज्य की अनियंत्रित स्वामी होगी।" 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का महत्व या गुण 

1. व्यक्ति स्वातंत्र्य की रक्षा 

कहा जाता है कि शक्ति मनुष्य को बुरा बनाती है और अधिकतम शक्ति अधिकतम बुरा बनाती है। जब राज्य की सम्पूर्ण शक्ति एक ही व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह मे केन्द्रित हो जाती है तो शासन अत्याचारी तथा निरंकुश हो जाता है किन्तु जब शासन शक्ति विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका मे बंटी होती है तो व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों की रक्षा होती है। अतः व्यक्ति स्वातन्त्र्य के लिये शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. निष्पक्ष की गारन्टी 

शासन की शक्ति पृथक-पृथक बंट जाने और अपने-अपने क्षेत्र मे पूर्ण स्वतंत्र होने से व्यवस्थापिका और कार्यपालिका, न्यायपालिका के क्षेत्र मे हस्तक्षेप नही कर पाती। वे किसी भी प्रकार से न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करने मे असफल होती है। इस प्रकार समाज के गरीब और शक्तहीन व्यक्ति को भी निष्पक्ष न्याय के मिलने की गारण्टी हो जाती है। न्यायाधीश भी निर्भीक और निष्पक्ष होकर अभियोगों का निपटारा करते है।

3. कानूनों का निर्माण लोक-कल्याण के आधार पर 

जब व्यवस्थापिका द्वारा नियंत्रित होती है तो राजा अथवा केन्द्रीय शासन अपने स्वार्थी और निजी हितों के अनुकूल निर्णय पारित कराता है और निरंकुश बनने कि चेष्टा करता है। इसके विपरीत जब व्यवस्थापिका कार्यपालिका के चंगुल से मुक्त होती है, तो अपने क्षेत्र मे स्वतंत्र होने कारण सदैव ऐसे कानूनों का निर्माण करती है जो लोक-कल्याणकारी होते है। अतः सार्वजनिक हित के लिये व्यवस्थापिका का अपने क्षेत्र मे स्वतंत्र होना नितांत आवश्यक है। 

4. प्रशासनिक कुशलता मे वृद्धि 

जब शासन की तीनों शक्तियाँ पृथक-पृथक और स्वतंत्र होती है तो कार्यपालिका को प्रशासन की देखरेख का अधिक अवसर मिलता है। यह उन कानूनों को लागू करती है जो व्यक्तिगत हित मे न बनाये जाकर सार्वजनिक हित मे निर्मित होते है। अतः लोक-कल्याणकारी कानूनों को लागू करने मे जनता का अपार हित होता है और प्रशासन भी अधिक सूक्ष्म, कुशल एवं दक्ष हो जाता है। 

5. शासन का प्रत्येक अंग अधिक उत्तरदायी होता है

शक्ति पृथक्करण के आधार पर शासन के तीनों अंगों कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका का विभाजन कर दिया जाता है अतः प्रत्येक विभाग अपने विशिष्ट कार्यों को विशिष्ट योग्यता, मनोयोग और अधिक उत्तरदायित्व की भावना से करता है। दोषी पाये जाने पर कोई भी विभाग अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर नही डाल सकता। अतः वे अधिक उत्तरदायित्व की भावना से कार्य करते है।

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के दोष 

1. कार्यपालिका के उत्तरदायित्व मे कमी

यदि कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका एक दूसरे से स्वतंत्र हो जाये तो कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नही होगी और मनमाने ढंग से कार्य करेगी। उस समय कार्यपालिका के उत्तरदायित्व मे भी कमी आ जायेगी।

2. अंगों के पारस्परिक सहयोग मे कमी 

शक्तियों का पृथक्करण हो जाने से सरकार के तीनों अंग स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगे और वे एक-दूसरे को सहयोग नही देंगे। इससे सरकार का कार्य बिल्कुल रूक जायेगा। 

3. शासन तंत्र की दुर्बलता

अंगो के पारस्परिक सहयोग मे कमी आने से शासन दुर्बल होने लगता है। इसी प्रकार सरकार के अंगो मे संतुलन बिगड़ जाने से शरीर का तंत्र निर्बल पड़ जाता है और सरकार कार्यों मे शिथिलता आ जाती है। 

4. शक्ति विभाजन की अव्यवहारिकता 

सरकार के कार्यों की कोई निश्चित रेखा नही खींची जा सकती है। सरकार के द्वारा किये गये कार्य एक दूसरे के इतने निकट होते है कि उनका विभाजन नही हो पाता। अतः शक्ति विभाजन सिद्धांत एक अव्यावहारिक सिद्धांत है। 

5. नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी नही

शासन-शक्ति की पृथक पृथक भागों मे बांट देने मात्र से नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी नही हो जाती। 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत की आलोचना 

सैद्धांतिक दृष्टि से शक्ति पृथक्करण सिद्धांत आदर्श शासन की स्थापना का आधार प्रस्तुत करता है पर व्यावहारिक रूप से इस सिद्धांत को अपने मूल रूप मे लागू किया जाना संभव नही है। इस कारण इस सिद्धांत की आलोचना भी की गई है। आलोचना के मुख्य आधार इस प्रकार से है--

1. पूर्ण पृथक्करण सम्भव नही 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत शासन के तीनों अंगों को पूर्णतः पृथक करने का समर्थन करता है पर संभव नही है। राज्य एक आंगिक संगठन है। इससें विभिन्न अंग अन्तः संबंधित होते है। तीनों अंगों की पारस्परिक निर्भरता होती है तीनों ही एक-दूसरे से शक्ति प्राप्त करते है और सहयोग करते है, सम्पूर्ण शासन एक इकाई है, जिसमे विभिन्न विभाग मिलकर कार्य करते है। गैटिल का कहना है," शासन विभिन्न कार्य करने वाले कई अंगों से बनता है परन्तु इसका एक सामान्य कार्य व उद्देश्य होता है, जिसकी सहायता के लिए उनके बीच सामंजस्यपूर्ण सहयोग अत्यंत आवश्यक होता है। विभिन्न विभागों के बीच पृथकता की एक दृढ़ रेखा खींची जा सकती।" 

2. गतिरोध का डर 

शक्ति पृथक्करण मे शासन के तीनों अंगों के कार्य व्यवहार मे गतिरोध का डर रहता है। ऐसा गतिरोध उस समय तो प्रायः उत्पन्न हो ही सकता है जबकि कार्य पालिका किसी दूसरे विचारों (दल) की हो और विधायिका किसी दूसरे की। 

3. यह सिद्धांत लोक-कल्याणकारी राज्य के लिये अनुपयोगी होता है

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोक-कल्याणकारी राज्य मे योजनाबद्ध तरीके से काम होता है। यह तभी सम्भव है जब कार्य पालिका शक्तिशाली हो। 

4. गलत उदाहरणों से प्ररित सिद्धांत 

वास्तव मे यह सिद्धांत माण्टेस्क्यू के इस भ्रम पर आधारित है कि ब्रिटेन मे अधिक स्वतंत्रता है, क्योंकि वहां शक्ति पृथक्करण है जबकि व्यवहार मे वहां शक्ति पृथक्करण नही है अपितु वहाँ जो व्यक्ति को अधिक अधिकार मिलते है उसका कारण विधि का कानून है। 

5. स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शक्ति पृथक्करण आवश्यक नही 

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के प्रतिपादकों ने इस बात पर जोर दिया है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए शासन के तीनों अंगों मे पृथक्करण आवश्यक है। पर व्यवहार मे शक्ति पृथक्करण नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी नही है। यह आशंका कम महत्व की नही है कि शक्ति पृथक्करण के परिणामस्वरूप एक के स्थान पर तीन सत्ता केन्द्र विकसित हो सकते है और पृथक्करण के परिणामस्वरूप एक के स्थान पर तीन सत्ता केन्द्र विकसित हो सकते है और नागरिक इन सत्ता केन्द्रों के बीच पिस सकता है। नागरिक स्वतंत्रता के लिए विधि का शासन, मौलिक अधिकारों की व्यवस्था, "सूचना के अधिकार" की स्थापना आदि व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण है।

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