9/20/2020

राजनीति विज्ञान की प्रकृति

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राजनीति विज्ञान की प्रकृति (rajniti vigyan ki prakriti)

राजनीति विज्ञान को हम विज्ञान और कला दोनों मान सकते है अथवा नही। इस बात पर विद्वानों मे निरन्तर विवाद रहा है। जहां अरस्तु ने इस शास्त्र को सर्वोच्च विज्ञान की संज्ञा दी है, वहीं बकल, काम्टे, मैटलैण्ड आदि ने इसे विज्ञान मानने से इनकार किया है। बकल ने यहां तक कहा है कि "ज्ञान की वर्तमान अवस्था मे राजनीति को विज्ञान मानना तो दूर रहा, यह कलाओं मे भी पिछड़ी कला है।" इसी प्रकार मैटलैण्ड ने लिखा है कि " जब मैं राजनीति विज्ञान के शीर्षक के अधीन एक अच्छे परीक्षा प्रश्नों के समूह को देखता हूं, तो मुझे प्रश्नों पर नही शीर्षक पर खेद होता है।'" 

राजनीति शास्त्र विज्ञान है

राजनीति विज्ञान के स्वरूप का निर्धारण करने मे कुछ लेखकों ने यह दावा किया है कि यह एक विज्ञान है। प्राचीन काल से ही विद्वानों ने राजनीति विज्ञान को विज्ञान के रूप मे स्वीकार किया है। अरस्तु ने राजनीति को विज्ञान कहा है। आधुनिक समय के अनेक विद्वान, जैसे बोदां, हाॅब्स, ब्राइस, गार्नर आदि ने राजनीतिशास्त्र को विज्ञान माना है। होल्टजन डार्क ने राजनीति विज्ञान का दावा करते हुए कहा है कि " ज्ञान भण्डार मे जो महान वृद्धि हो चुकी है, उसे देखते हुए यह अस्वीकार करना असम्भव है कि राज्य से सम्बद्ध समस्त अनुभवों, अवस्थाओं एवं ज्ञान को राज्य, विज्ञान के अन्तर्गत लाया जा सकता है।" 

राजनीतिशास्त्र को विज्ञान मानने के पक्ष मे तर्क 

1. राजनीति विज्ञान मे भी प्रयोग और परीक्षण सम्भव है

इस मत को मानने वाले विद्वानों का मत है कि सम्पूर्ण समाज ही राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला है। राजनीति समस्याओं के सम्बन्ध मे सभ्यता के आदिकाल से आज तक निरन्तर प्रयोग होते चले आ रहे है। इनका परिणाम अनुभवों के रूप मे इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर है।

2. राजनीति विज्ञान मे भी भविष्यवाणियां की जा सकती है

विज्ञान मानने वाले विद्वानों का मत है कि राजनीति विज्ञान मे भी अन्य प्राकृतिक विज्ञानों की तरह भविष्यवाणियाँ करना सम्भव है, बशर्ते राजनीति विज्ञान मे जो तथ्य और आंकड़े एकत्रित किये जायें वे सत्य व विश्वसनीय हों।

3. राजनीति विज्ञान एक क्रमबद्ध ज्ञान है

इसे विज्ञान मानने वालों का तीसरा तर्क यह है कि राजनीति विज्ञान का ज्ञान भी क्रमबद्ध ज्ञान है। इसका क्षेत्र निश्चित है। इसके अधिकांश नियम सुस्थापित है। आज भी अरस्तु और कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत कसौटी पर खरे उतरते है।

4. राजनीति विज्ञान मे कार्यकारण सम्बन्ध सम्भव है

यद्यपि यह सत्य है कि प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान मे कार्यकारण सम्बन्ध प्रदर्शित नही किए जा सकते, परन्तु राजनीति विज्ञान मे भी काफी सीमा तक कार्यकारण सम्बन्ध देखे जा सकते है। उदाहरण के लिए, कई देशों की क्रांतियों का अध्ययन करने के पश्चात यह इंगित किया जा सकता है कि क्रांति का मूलभूत कारण असमानता होती है। इसी प्रकार यह कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण तथा जनता की राजनीतिक सहभागिता राजनीतिक चेतना मे वृद्धि करती है। इसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि जिन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं मे विपक्ष जितना अनुत्तरदायी होता है, वहां सरकार उतनी ही स्वेच्छाचारी होती जाती है। लार्ड ब्राइस का यह मत यथोचित है, मानव प्रकृति की प्रवृत्तियों मे एकरूपता तथा समानता पाई जाती है। 

राजनीति विज्ञान को विज्ञान न मानने के पक्ष मे तर्क 

1. राजनीति विज्ञान मे परीक्षण सम्भव नही है- विद्वानों का मत है कि राजनीति विज्ञान मे भौतिक और प्राकृतिक विज्ञानों की तरह परीक्षण और प्रयोग सम्भव नही है।

2. राजनीति विज्ञान के सिद्धांत निश्चित नही होते। वे सभी परिस्थितियों मे सभी स्थानों पर लागू नही किये जा सकते।

3. राजनीति विज्ञान मे परिणामों की स्पष्ट भविष्यवाणी भी की जाना सम्भव नही है। 

4. राजनीति विज्ञान मे सर्वमान्यता का अभाव है, इसके तथ्यों के विषय मे सभी विद्वान एक मत नही है। उदाहरण के लिए कुछ विद्वान संसदीय शासन को उत्तम मानते है और कुछ अध्यक्षात्मक पद्धति को, कुछ कुलीनतन्त्र को।

5. राजनीति विज्ञान मे नियमों मे कारण-कार्य सम्बन्ध स्थापित नही किया जा सकता। राजनीतिक घटनाओं के पीछे अनेक उलझे हुए कारण होते है, अतः एक घटना किन कारणों से हुई इसका सही पता लगाना असम्भव है।

राजनीति विज्ञान कला के रूप मे 

कुछ विद्वान राजनीति को कला मानते है। गेटिल और ब्लंश्ली इस श्रेणी के प्रमुख विद्वान है। गेटिल ने लिखा है", राजनीति की कला का उद्देश्य मनुष्य के क्रिया-कलापों से सम्बंधित उन सिद्धांतों एवं नियमों का निर्धारण करना है जिन पर चलना राजनीतिक संस्थाओं के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है। ब्लंश्ली का मत है," राजनीति, विज्ञान की अपेक्षा कला अधिक है। राज्य के संचालन व उसकी क्रियात्मकता के संबंध मे इसी के द्वारा नेतृत्व किया जाता है।" 

कला वह विद्या है जो हमे सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार मे प्रयोग करने की क्षमता प्रदान करती है तथा जीवन को अधिक से अधिक सुन्दर बनाती है। इस रूप मे विद्वानों का मत है कि चूँकि राजनीति का संबंध व्यावहारिक प्रश्नों से है अतः इसे कला माना जाना चाहिए। व्यावहारिक राजनीति को स्पष्ट रूप से कला की श्रेणी मे रखा जा सकता है। अतः राजनीति विज्ञान का उतना भाग जिसका संबंध राजनीतिक संस्थाओं, धारणाओं एवं सिद्धांतों को कार्यरूप प्रदान करने के विवेचन से सम्बंधित है कला की श्रेणी मे रखा जा सकता है। इसके अन्तर्गत सरकार की नीतियों का संचालन, प्रशासन का नियमन, निर्देश कार्यान्वयन, दलों का संगठन एवं नियंत्रण, दबाव तथा हित समूहों का संचालन, निर्वाचन आदि आते है। अतएव यह माना जा सकता है कि व्यावहारिक राजनीति एक कला है।

क्या राजनीति एक दर्शन है? 

कतिपय विद्वान राजनीतिक को दर्शन मानते है। उन्होंने इसका प्राचीन नाम " राजदर्शन" दिया था। अब हमे यह देखना है कि राजनीति को दर्शन कहना कहाँ तक उपयुक्त है? इस प्रश्न के उत्तर के लिये दर्शन की परिभाषा करना आवश्यक है। वास्तव मे दर्शन उस ज्ञान को कहते है जिसका आधार तर्क होता है। राज्य-दर्शन इसे इसलिए कहा जाता है, क्योंकि कुछ विद्वान इसके अध्ययन के लिये प्रारंभ से ही दार्शनिक अध्ययन-पद्धति पर बल देते रहे है। वास्तव मे राजनीतिक विज्ञान के कुछ गूढ़ प्रश्न है जिनके उत्तर मे न तो वैज्ञानिक तथ्य संकलित हो सकते, न इसे सीखा जा सकता है, जैसे कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई? इसका आर्दश स्वरूप क्या है? इसकी प्रकृति कैसी है? इसका भविष्य क्या है? इन प्रश्नों का जवाब कोई भी राजनीतिशास्त्री केवल चिन्तन या तर्क के आधार पर ही दे सकता है। इस प्रकार इसका एक पक्ष सैद्धांतिक है। इसकी विवेचना दार्शनिक आधार पर ही की जा सकती है। इस प्रकार राजनीति का सैद्धांतिक पक्ष दार्शनिक है। अतः राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष को राजनीतिक दर्शन कहा जाता है। प्लेटो, अरस्तु तथा माक्र्स दर्शनशास्त्री थे।

राजनीतिक विज्ञान के नामकरण का प्रश्न 

राजनीति विज्ञान हेतु व्यवहार मे कई नामों का प्रयोग होता है, कुछ विद्वान इसे राजनीति कहते है, कुछ राजनीतिक दर्शन, वहीं कुछ विद्वान इसे राजनीति विज्ञान कहकर पुकारते है। मुद्दा यह है कि इसमे से सही नाम कौन सा है? यह विवाद असल मे इसकी प्रकृति के सम्बन्ध मे मतभेदों के कारण पैदा हुआ।

यह बात निर्विवाद है कि आज के आधुनिक युग मे इसके अध्ययन हेतु वैज्ञानिक अध्ययन पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। नई-नई वैज्ञानिक पद्धतियां आविष्कृत हो रही हैं, जिन्होंने राजनीति का अर्थ ही बदल दिया है। इसका अध्ययन मनोविज्ञान, समाजशास्त्र पर आधारित हो गया है। व्यवहारवाद तथा उत्तर व्यवहारवाद ने इसे विशुद्ध विज्ञान बनाने की दिशा मे काफी योगदान दिया है।

अतः इस विषय के अध्ययन को आज के युग मे राजनीति विज्ञान नाम दिया गया है। राजनीति विज्ञान का " राजनीति विज्ञान" नाम सबसे आधुनिक तथा व्यापक है। इसमे इसके प्राचीन सिद्धांत, सैद्धांतिक स्वरूप, व्यवहारिक स्वरूप और प्रयोगात्मक स्वरूप सभी कुछ आ जाते है इसीलिए यह इसका सबसे उपयुक्त नाम है।

निष्कर्ष 

उपरोक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि राजनीति विज्ञान एक विज्ञान भी है, कला भी है और दर्शन भी है। इसकी विषय-वस्तु दर्शन है इसकी अध्ययन पद्धति विज्ञान है तथा इसका व्यावहारिक स्वरूप कला है।


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