9/19/2020

राज्य अर्थ, परिभाषा, आवश्यक तत्व

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राज्य का अर्थ (rajya ka arth)

Rajya meaning in hindi;राजनीति विज्ञान के अध्ययन का केंद्र-बिन्दु राज्य है। इस विषये मे राज्य के बारे मे सब कुछ जानने का प्रयास किया जाता है। राज्य आधुनिक युग की सर्वोच्च राजनीतिक इकाई है। प्रश्न यह है कि राज्य क्या है? राज्य कहते किसे है? राज्य का अर्थ क्या है? यानि राज्य की परिभाषा क्या है? 

राज्य को विद्वानों ने अनेक तरह से परिभाषित किया है पर इसकी कोई सार्वदेशीय या सार्वकालिक परिभाषा नही है। राज्य के स्वरूप निर्धारण के कई आधार है जैसे शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर, तत्वों के आधार पर, कानूनी दृष्टिकोण के आधार पर, उद्देश्य एवं कार्य के आधार पर, शक्ति की धारणा के आधार पर, बहु समुदायवाद के आधार पर, तथा उत्पत्ति के आधार पर। 

राजनीति विज्ञान मे मुख्य रूप से राज्य और उसकी उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है। " राज्य " शब्द का प्रयोग कई अर्थों मे किया जाता है। परन्तु राजनीति शास्त्र मे "राज्य" शब्द का सही प्रयोग चार तत्वों भू-भाग, जनसंख्या, सरकार, सार्वभौमिकता के आधार पर किया जाता है, जैसे भारत, चीन, सोवियत संघ, अमेरिका, इंग्लैंड इत्यादि राज्य की संज्ञा मे आते है। 

राज्य की परिभाषा (rajya ki paribhasha)

अरस्तु के अनुसार " राज्य परिवारों तथा ग्रामों का एक ऐसा संघ है जिसका उद्देश्य एक पूर्ण, एक आत्म-निर्भर जीवन की प्राप्ति करना है, जिसका महत्व एक सुखी सम्मानित मानव जीवन से है। 

हाॅलैंड के शब्दों मे " राज्य मनुष्यों के उस समूह अथवा समुदाय को कहते है जो साधारणतः किसी प्रदेश पर बसा हुआ हो और जिसमे किसी एक श्रेणी अथवा बहुसंख्या की इच्छा अन्य सबकी तुलना मे क्रिया मे परिणत होती है।" 

सिसरो के अनुसार " राज्य एक ऐसा समाज है जिसमे मनुष्य पारस्परिक लाभ के लिए और अच्छाई की एक सामान्य भावना के आधार बंधे हुए है।

प्रो. लाक्सी के मतानुसार " राज्य एक ऐसा क्षेत्रीय समाज है जो शासक तथा शासित मे विभाजित है और अपने निश्चित भौगोलिक क्षेत्र मे दुसरी संस्थाओं के ऊपर प्रभुता का दावा रखता हो।" 

फिलिमोर के अनुसार " राज्य वह जनसमाज है जिसका एक निश्चित भू-भाग पर स्थायी अधिकार हो, जो एक से कानूनों, आदतों व रिवाजों द्वारा बँधा हुआ हो, जो एक संगठित सरकार के माध्यम द्वारा अपनी सीमा के अंतर्गत सब व्यक्तियों तथा वस्तुओं पर स्वतंत्र प्रभुसत्ता का प्रयोग एवं नियंत्रण करता हो तथा जिसे भू-मण्डल के राष्ट्रों के साथ युद्ध एवं संधि करने तथा अन्तराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने का अधिकार हो। 

गार्नर के अनुसार " राज्य संख्या मे कम या अधिक व्यक्तियों का ऐसा संगठन है, जो किसी प्रदेश के एक निश्चित भू-भाग मे स्थायी रूप से निवास करता हो, जो बाहरी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्र अथवा लगभग स्वतंत्र हो, जिसका एक संगठित शासन हो जिसके आदर्शों का पालन नागरिकों का विशाल समुदाय स्वाभावतः करता हो। "

राज्य के आवश्यक तत्व (rajya ke aavshyak tatva)

राज्य के आवश्यक तत्वों के संबंध मे विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार किया है, परन्तु इस संबंध मे गार्नर के विचारों को सर्वाधिक मान्यता प्रदान की जाती है। गार्नर के अनुसार राज्य के निम्म आवश्यक तत्व है-- 

1. जनसंख्या 

राज्य मे जनसंख्या का होना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे किसी राज्य की कल्पना नही की जा सकती जिसमे कोई व्यक्ति नही रहता हो। इसलिए एक राज्य को राज्य तभी कहा जा सकता है जब उसमे एक निश्चित मात्रा मे जनसंख्या हो। 

जनसंख्या या आबादी के संबंध मे कोई निरश्चित नियम नही बनाया जा सकता आबादी कम या अधिक होना राज्य के अन्य तत्वों जैसे आकार, देश की परिस्थिति आदि पर निर्भर करता है। लेकिन एक आदर्श राज्य मे जनसंख्या कितनी हो यह विचारणीय है। प्लेटो ने " रिपब्लिकक " में आदर्श राज्य की जनसंख्या 5040 बतलाई है। इसी तरह अरस्तु ने भी कहा है कि जनसंख्या न बहुत अधिक हो और न कम। जनसंख्या इतनी हो कि उसका भरण-पोषण सरलता से हो सके और साथ ही राज्य की रक्षा भी उससे हो सके।

2. निश्चित भू-भाग 

राज्य के लिए एक निश्चित भू-भाग होना आवश्यक है। निश्चित भू-भाग राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व है, जनसंख्या की तरह ही निश्चित भू-भाग के बिना भी राज्य की कल्पना नही की जा सकती। ब्लुन्शली के शब्दों मे " राज्य की शक्ति का आधार जनसंख्या है, इसका भौतिक आधार भूमि है। जनता तब तक है जब तक निश्चित भू-भाग या क्षेत्र हो। गिलक्राइस्ट के अनुसार " बिना निश्चित भूखंड के कोई भी राज्य सम्भव नही हो सकता। " अतः राज्य के अस्तित्व के लिए एक निश्चित भू-भाग आवश्यक है। कोई घुमक्कड़ कबीलों का (बंजरों का) अपना नेता सरदार होने पर भी उसे राज्य नही कहा जा सकता। इस सम्बन्ध मे विवाद है और यह दावे के साथ नही कहा जा सकता कि यह भू-भाग कितना होना चाहियें? राज्य के भू-भाग के संबंध मे निम्नलिखित तथ्य विचारणीय है राज्य की सीमाएँ निश्चित होनी चाहिए। राज्य के लिए भूमि का महत्व सिर्फ भौतिक दृष्टिकोण से ही नही बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी है। निश्चित भू-भाग के बिना लोगों मे राष्ट्रप्रेम, एकता, बन्धुत्व आदि की भावनाएं नही आ सकती। 

3. सुसंगठित सरकार या शासन 

राज्य का तीसरा महत्वपूर्ण आवश्यक तत्व राज्य मे सरकार या शासन का होना है। सरकार को राज्य की आत्मा कहा जाता है। किसी निश्चित भू-भाग पर रहने वाले लोगों को तब तक राज्य नही कहा जा सकता, जब तक वहां कोई शासन न हो। ऐसी संस्था का होना आवश्यक है जिसका आदेश मानना हर व्यक्ति के लिए आवश्यक हो।  राज्य की इच्छाओं और भावनाओं का पालन सरकार के द्वारा ही होता है। राज्य की शक्तियों का क्रियात्मक प्रयोग भी सरकार ही करती है। सरकार के अंदर प्राधिकरण आते है, जो सरकार के कार्यों को संचालित करते है, जैसे-- कानून का निर्माण करना और पालन करवाना तथा उल्लंघन करने वाले को दंड देना आदि। 

गैटिल का मत है कि, संगठित सरकार के अभाव मे जनसंख्या पूर्णतः असंयमित, अराजक जनसमूह हो जायेगी और किसी भी सामूहिक कार्य का करना असम्भव हो जायेगा।

4. सम्प्रभुता 

संप्रभुता राज्य होने की पहचान है। किसी समाज मे अन्य तीन तत्वो के होने पर भी जब तक उसमें संप्रभुता न हो वह राज्य नही बन सकता राज्य मे। नियमों को लागू करने वाली एजेन्सी हो सकती है परन्तु संप्रभुता नही हो सकती। संप्रभुता केवल राज्य की ही विशिष्टता है और यह राज्य का आवश्यक अंग भी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भारतवर्ष के पास अपनी जनसंख्या थी, उसका निश्चित भू-भाग तथा सरकार थी, किंतु सम्प्रभुता के अभाव मे उसे राज्य नही कहा जाता था। 

सम्प्रभुता से आश्य " राज्य का आंतरिक दृष्टि से पूर्णतः संप्रभु होना संप्रभुता है। राज्य के अंदर कोई भी व्यक्ति अथवा समुदाय ऐसा नही होता जो कि उसकी आज्ञाओं का पालन न करता हो। बाहरी दृष्टि से सम्प्रभुता का अर्थ है, राज्य विदेशी संबंधों के निर्धारण मे पुर्णतः स्वतंत्र होता है, परन्तु यदि राज्य स्वेच्छा से अपने ऊपर कोई बंधन स्वीकारता है तो इससे राज्य की सम्प्रभुता पर कोई प्रतिबंध नही होता। 

हाॅब्स, बैन्थम, आस्टिन, हीगल तथा अनेक विद्वानों ने राज्य की संप्रभुता को अत्यधिक महत्वपूर्ण बताया है और उसे राज्य रूपी शरीर का प्राण माना है, परन्तु दूसरी ओर लास्की तथा कोल ने, जो मूलतः बहुलवादी विचारक है, राज्य की संप्रभुता पर प्रहार भी किया है। लास्की ने कहा है, " राज्य न कभी सही अर्थों मे संप्रभु था, न है और न रहेगा।" उन्होंने यह भी कहा कि राज्य भी अन्य संस्थाओं के समान एक संस्था है- अतः वह सर्वोच्च कैसे हो सकती है?

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