9/21/2020

कर्त्तव्य का अर्थ, परिभाषा, प्रकार

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कर्त्तव्य का अर्थ (kartavya kya hai)

kartavya meaning in hindi;कर्तव्य एक दायित्व है। कर्तव्य की अवधारणा अधिकार की अवधारणा की पूरक है। किसी विशेष कार्य को करने या न करने के संबंध मे व्यक्ति के उत्तरदायित्वों को कर्तव्य कहा जा सकता है। अर्थात् समाज और राज्य द्वारा व्यक्ति से जिन कार्यों को करने की अपेक्षा की जाती है वे ही उसके कर्तव्य कहलाते है। 

दूसरे शब्दों में " एक राज्य या समाज जिन उत्तदायित्वपूर्ण कार्यों को अपने नागरिकों द्वारा अनिवार्य रूप से किये जाने की आशा करते है और उनकी यह अपेक्षा होती है कि अच्छे नागरिक उपरोक्त कार्य समाज या राज्य मे करेंगे ही या उन्हें करना ही चाहिये, कर्तव्य कहलाते है। ये कर्तव्य प्रायः ऐच्छिक होते है। इन्हे संविधान द्वारा बाध्यकारी बनाया जा सकता है। परन्तु प्रायः इनकी अवहेलना करने पर दण्ड के प्रावधान बहुत कम राज्यों मे है। 

कर्तव्य की परिभाषा (kartavya ki paribhasha)

बैनी प्रसाद के अनुसार " अधिकार और कर्तव्य को हम सही रूप मे देख सकते है। ये एक ही सिक्के के दो पहलू है। यदि कोई उनको अपनी दृष्टि से देखता है तो उसका अधिकार है और यदि कोई उन्हें दूसरी दृष्टि से देखे तो उसके कर्तव्य है।

हाॅबहाउस के अनुसार " अधिकार व कर्तव्य सामाजिक कल्याण की दशाएँ है। समाज के प्रत्येक सदस्य का इस कल्याण के प्रति दोहरा दायित्व है। अधिकार एक माँग है तो कर्तव्य दूसरी। मेरे अधिकार समाज के अन्य सदस्यों का कर्तव्य निर्धारित करते है और अन्य सदस्यों के अधिकार मेरे कर्तव्य को निर्धारित करते है। 

कर्तव्यों को दो भागों मे बाँटा जा सकता है--

कर्तव्यों के प्रकार (kartavya ke prakar)

1. नैतिक कर्तव्य 

नैतिक कर्तव्यों का आधार व्यक्ति की नैतिक चेतना है। इन कर्तव्यों का पालन व्यक्ति स्वतः करता है। यदि व्यक्ति इन कर्तव्यों का पालन ना करें तो राज्य ऐसा करने के लिए उसे बाध्य नही कर सकता और ना दण्डित कर सकता है।

2. वैधानिक कर्तव्य 

ये वे कर्तव्य है, जिन्हें राज्य कानून बनाकर व्यक्ति को (जो राज्य मे रहते है) इनका पालन करने के लिये बाध्य कर सकता है। इनका पालन करना या न करना व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर नही करता है। इनका पालन न करने पर राज्य व्यक्ति को दण्डित भी कर सकता है। इनके निम्न उदाहरण है--

1. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा।

2. राज्य के संचालन के लिये टैक्स चुकाना।

3. पर्यावरण का संरक्षण।

4. राष्ट्र के प्रति द्रोह ना करना।

5. अनिवार्य सैन्य-सेवा।

6. सरकारी कानूनों को मानना।

7. सरकारी कर्मचारियों को उनके कर्तव्यों के पालन मे सहयोग।

8. राज्य मे शांति और व्यवस्था बनाये रखना। 

अधिकार और कर्तव्यों का संबंध 

अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक है। एक का अधिकार दूसरे का कर्तव्य है और दूसरे का अधिकार पहले का कर्तव्य है। 

महात्मा गांधी ने कहा था, अधिकार का सच्चा स्त्रोंत है कर्तव्य। अगर हम सब अपने कर्तव्यों का पालन करे, तो अधिकारों को खोजने की जरूरत नही पड़ेगी। अगर कर्तव्यों की उपेक्षा करके हम अधिकारों के पीछे पड़े, तो हमारी खोज मृगतृष्णा की तरह व्यर्थ होगी। जितना हम अधिकारों का पीछा करेंगे, उतना ही वे हमसे दूर होगे।" अधिकार तथा कर्तव्य दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है, दोनों परस्पर आश्रित है। अधिकार कर्तव्य के बगैर नही रह सकते एवं कर्तव्य अधिकारों के बगैर। एक व्यक्ति हेतु जो अधिकार है, वही दूसरे के कर्तव्य होते है। 

अधिकार तथा कर्तव्य दोनों का ही सम्बन्ध समाज से है। जब व्यक्ति समाज से स्वयं उनके अधिकारों के उपयोग मे मदद पहुंचाता है, तो वे कर्तव्य होते है। 

डाॅ. बेनीप्रसाद ने अधिकार और व्याख्या करते हुए कहा है, " अधिकार शुद्ध व्यक्तिगत वस्तु नही है, उनकी प्रकृति ही सहकारी है। सहकारिता के प्रभाव से ही उनका जन्म होता है और सहकारिता के प्रभाव से ही वे जीवित रहते हैं, इस प्रकार अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे पर आश्रित है। वे एक ही वस्तु के दो पहलू है।

लास्की अधिकार और कर्तव्यों मे चार प्रकार से संबंध बतलाते है--

1. मेरा अधिकार तुम्हारा कर्तव्य है।

2. मेरे अधिकार मे यह कर्तव्य निहित है कि मै तुम्हारे समान अधिकार को स्वीकार करूँ।

3. मुझे अपने अधिकारों का प्रयोग सामाजिक हित मे वृद्धि करने की दृष्टि से करना चाहिए।

4. क्योंकि राज्य मेरे अधिकारों को सुरक्षित रखता है तथा उनकी व्याख्या करता है, अतः राज्य की सहायता करना मेरा कर्तव्य है।

इस तरह अधिकार तथा कर्तव्य एक दूसरे पर आश्रित, परस्पर पूरक है। इन्हे विभाजित नही किया जा सकता है, " क्योकि वे एक ही वस्तु के दो पहलू है तथा आजकल इसीलिए प्रजातांत्रिक देशों मे अधिकार के साथ-साथ कर्तव्यों को भी संविधान मे स्थान दिया जा रहा है।

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