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11/11/2021

मूल्यांकन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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मूल्यांकन का अर्थ (mulyankan kise kahate hai)

mulyankan ka arth paribhasha visheshtayen;मूल्यांकन से अर्जित ज्ञान समझ कौशल और संशोधित व्यवहार की परख की जाती हैं। डाॅ. रामसकर पाण्डेय के अनुसार," बालक ने कितना ज्ञान अर्जित कर लिया तथा कितना अभी अर्जित करना हैं, उसके व्यवहार में कितना संशोधन हुआ हैं और अभी कितना शेष हैं? आदि बातें बालक के अर्जित ज्ञान एवं व्यवहार की जाँच करके ही ज्ञात की जा सकती हैं। इस प्रकार अर्जित ज्ञान तथा संशोधित व्यवहार की परख करने की प्रक्रिया को मूल्यांकन के नाम से संबोधित किया जाता हैं। 

यद्यपि मूल्यांकन में ज्ञानार्जन की वस्तुनिष्ठता तथा व्यवहारारिकता पर अधिक बल देने की परम्परा हैं तथापि वर्तमान शैक्षिक परिवेश में मूल्यांकन का आशय शिक्षा के लिये निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार विद्यार्थी के व्यक्तित्व के विविध पक्षों से सम्बद्ध सतत् व्यापक मूल्यांकन से हैं। परम्परागत परीक्षायें तथा परीक्षण को अनेक दृष्टियों से दोषपूर्ण माना गया और इसके दोषों से मुक्त होने के वर्तमान समय में परीक्षण के संदर्भ में प्रयुक्त 'मूल्यांकन' शब्द का प्रचलन शिक्षा-जगत् में खूब हुआ। यह मूल्यांकन क्या हैं? प्रचलित परीक्षण और उसकी विधियों से किस प्रकार भिन्न हैं? ये महत्वपूर्ण प्रश्न सहज ही उठते हैं? वास्तव में प्रचलित परीक्षायें केवल एक ही समाधान दे रही हैं कि किसी विशेष समय में परीक्षार्थी की बौद्धिक क्षमता की स्थिति क्या हैं? इस प्रकार यह एकपक्षीय और एक-उद्देश्यीय व्यवस्था है जो बालक के सर्वांगीण विकास के दायित्व से न जुड़कर शिक्षा के उद्देश्यों एवं क्षेत्रों को संकुचित कर देती हैं। मूल्यांकन में परीक्षार्थी की बौद्धिक स्थिति का आकलन करने के साथ और भी बहुत-सी बातें विचारणीय होती हैं। जैसे-- 

1. किसी क्षेत्र में परीक्षार्थी की स्थिति क्या हैं? 

2. उक्त स्थिति का कारण क्या हैं? 

3. इस स्थिति को सुधारने के लिये किस प्रकार की सहायता अपेक्षित हैं? 

इस प्रकार मूल्यांकन के निम्नलिखित प्रयोजन होते हैं-- 

(अ) मूल्यांकन द्वारा इस बात का पता चलता है कि शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति किस रूप में हो पा रही हैं। 

(ब) इसके माध्यम से बालकों की योग्यता और क्षमता की सही सीमाओं का पता लग जाता हैं। 

(स) इसके आधार पर बालकों के वर्गीकरण की सही-सही स्थिति ज्ञात हो जाती हैं। 

(द) शिक्षण विधियों की सफलता, असफलता की जानकारी प्राप्त हो जाती हैं। 

(इ) मूल्यांकन से प्राप्त सूचनाओं से पाठ्यक्रम में समुचित परिवर्तन किया जा सकता हैं। 

(ई) शैक्षिक गुणवत्ता सुधार एवं निदानात्मक कार्य हेतु अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। 

इस प्रकार मूल्यांकन और परीक्षण में व्यापक अंतर हैं। मूल्यांकन एक नई विधा हैं। इसमें विश्वसनीयता, वैधता, वस्तुनिष्ठता, व्यापकता, उपयोगिता और व्यावहारिकता के गुण विद्यमान हैं, जबकि परीक्षण में इनका अभाव हैं। मूल्यांकन शिक्षण-व्यवस्था व विधियों को सुधारने और शिक्षा में गुणात्मक सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता हैं। शिक्षण कार्य को सफल बनाने में भी इसका बड़ा योगदान रहता हैं। समस्त शिक्षण-कार्य का मूल्यांकन दो प्रकार से किया जाता हैं।

मूल्यांकन की परिभाषा (mulyankan ki paribhasha)

शिक्षण अनुसंधान विषय कोष के अनुसार," मूल्यांकन अपेक्षाकृत नवीन तकनीकी शब्द हैं, जिसका प्रयोग मापन की पारस्परिक परीक्षा व परीक्षण को अधिक विस्तृत अर्थ देने के लिए किया गया हैं।" 

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के अनुसार," मूल्यांकन एक प्रक्रिया हैं, जिसके द्वारा यह ज्ञात किया जाता हैं कि उद्देश्य किस सीमा तक प्राप्त हुए। कक्षा में दिए ये अधिगम अनुभव कहाँ तक प्रभावोत्पादक रहे हैं और कहाँ तक शिक्षा के उद्देश्य पूर्ण किए गए हैं।" 

शिक्षा आयोग (कोठारी आयोग) के अनुसार," मूल्यांकन एक अनवरत्  प्रक्रिया हैं। यह पूर्ण शिक्षा प्रणाली का एक अभिन्न अंग है और यह शिक्षा उद्देश्यों से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। यह छात्रों की अध्ययन आदतों तथा शिक्षक की शिक्षण विधियों पर अधिक प्रभाव डालता हैं, इस प्रकार यह न केवल शैक्षिक उपलब्धि के मापन में सहायता करता हैं अपितु उसमें आवश्यक सुधार भी करता हैं।" 

डाॅ. जी. पी. शेरी के शब्दों में," शिक्षा कार्यक्रम ने शिक्षा उद्देश्यों की कितनी पूर्ति की हैं, यह पता लगाना ही मूल्यांकन हैं।" 

वेस्ले और कार्टराइट के अनुसार," मूल्यांकन शिक्षा प्रक्रिया का वह अंग हैं, जिसके द्वारा इस बात की जाँच की जाती हैं कि एक निश्चित समय में शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति कहाँ तक हुई हैं? बालक के व्यवहार में कहाँ तक अंतर आया हैं और शिक्षक ने इस दिशा में कितना सहयोग दिया हैं? 

जैरोमिलके के अनुसार," मूल्यांकन वह प्रणाली हैं, जिसके द्वारा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, ध्येयों और लक्ष्यों की प्राप्ति की मात्रा को निर्धारित करते हैं।" 

माइकेलिस के अनुसार," मूल्यांकन उद्देश्यों की प्राप्ति की सीमा का निर्णय करने की प्रक्रिया हैं।" 

मुफात के अनुसार," मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है और शैक्षिक उपलब्धि से अधिक कुछ और भी हैं। इसका संबंध छात्र के विकास से अधिक हैं। यह प्रक्रिया छात्र के विकास से उसकी भावनाओं, विचारों और क्रियाओं से संबंधित वांछित व्यवहार परिवर्तनों के रूप व्यक्त करती हैं।" 

टारगरसन और एडम्स के अनुसार," मूल्यांकन करना किसी वस्तु या प्रक्रिया के महत्व को निर्धारित करना हैं। इस प्रकार शैक्षिक मूल्यांकन शिक्षण प्रक्रिया या सीखने के अनुभव के औचित्य की मात्रा पर निर्णय प्रदान करना हैं।" 

क्यूलिन और हन्ना के अनुसार," विद्यालय द्वारा बालक के व्यवहार में हुए परिवर्तन के विषय में साक्षियों का संकलन तथा उनकी व्याख्या ही मूल्यांकन हैं।

मूल्यांकन की विशेषताएं अथवा अच्छे मूल्यांकन के गुण 

मूल्यांकन की निम्नलिखित विशेषताएं हैं--

1. यथार्थता 

मूल्यांकन की एक मुख्य हैं कि यह यथार्थ पर आधारित होना चाहिए। जो कुछ शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों को सिखाया-पढ़ाया गया हैं, मूल्यांकन उसी पर आधारित होना चाहिए। मूल्यांकन के परिणाम भी यथार्थता पर आधारित होने चाहिए। विद्यार्थियों द्वारा प्रश्नों के जो उत्तर दिये जाते हैं, उन्हीं के आधार पर मूल्यांकन के माध्यम से उपलब्धि-स्तर ज्ञात किया जाता हैं। इसलिए मूल्यांकन का यथार्थवादी होना जरूरी हैं। 

2. विश्वसनीयता 

मूल्यांकन पूर्णतः विश्वसनीय होना चाहिए। कहने का आशय यह हैं कि यदि उसी शिक्षक द्वारा अथवा अन्य शिक्षक द्वारा लम्बे समय बाद किसी परीक्षर्थी का मापन एवं मूल्यांकन किया जाय तो उसे वही स्थान मिलना चाहिए जो सबसे पहले प्राप्त हुआ था। इस प्रकार अच्चे मूल्यांकन में मापन पूर्णतः विश्वास योग्य होता है और विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंकों में असमानता या असंगतियाँ संभावित नहीं होतीं तथा मूल्यांकन की विश्वसनीयता बनी रहती हैं। 

3. जाँच में सुगमता 

मूल्यांकन पद्धित ऐसी होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थियों की विभिन्न क्षमताओं, योग्यताओं, कुशलताओं और शैक्षिक उद्देश्यों की जाँच सुगमता से की जा सके, क्योंकि विद्यार्थियों को उनकी त्रुटियों, कमजोरियों, योग्यताओं और उपलब्धियों की जानकरी के विषय में अवगत कराकर उन्हें सचेत किया जा सकता हैं। इस प्रकार परीक्षा का स्वरूप निदानात्मक हो जाता हैं। साथ ही योग्य विद्यार्थियों का मूल्यांकन के आधार पर भावी कार्यक्रम व अध्ययन आदि की दिशा निर्देशित किया जाना भी संभव होता हैं। 

4. वस्तुनिष्ठता 

वस्तुनिष्ठता का आश्य व्यक्तिनिष्ठ तत्वों के अभाव से हैं। वस्तुनिष्ठता होने से मूल्यांकनकर्ता मूल्यांकन में किसी प्रकार की मनमानी नहीं कर सकता है। वस्तुनिष्ठ होने से मूल्यांकन सच्चा होता हैं। मूल्यांकनकर्ता अपनी मान्यताओं, पूर्वग्रह, रूचि तथा पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से न जुड़ा रहकर निष्पक्ष मूल्यांकन कर पाता हैं। परिणाम यह होता हैं कि मूल्यांकन में यथार्थता और वैधता का गुण भी बना रहता हैं। 

5. मूल्यांकन एक अनवरत् चलने वाली प्रक्रिया हैं

जहाँ से शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण होता है वहीं से मूल्यांकन की प्रक्रिया भी आरंभ हो जाती है तथा यह प्रक्रिया अनवरत् चलती रहती हैं। 

6. व्यावहारिकता 

मूल्यांकन व्यावहारिक होना चाहिए ताकि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके। प्रायः वस्तुनिष्ठ श्रेणी की परीक्षा सार्थक, सरल और व्यावहारिक होती हैं। इसकी वैधता बनी रहती है तथा विवादास्पद परिस्थितियाँ भी निर्मित नहीं होतीं। विद्यार्थी, शिक्षक व विद्यालय सभी की दृष्टि से मूल्यांकन में व्यावहारिकता का लक्षण होना नितान्त आवश्यक हैं, वरना आदर्श मूल्यांकन का कोई महत्व नहीं रहेगा। 

7. वैज्ञानिकता 

मूल्यांकन का मूलाधार वैज्ञानिक होना चाहिए। यह सत्यता, यथार्थता, वैधता, व्यावहारिकता और वस्तुनिष्ठता के गुण और लक्षणों के अनुकूल होने पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ओत-प्रोत हो सकता हैं। ऐसी स्थिति में इसमें कल्पना और व्यावहारिक तत्वों को कोई स्थान नहीं प्राप्त हो सकेगा। वैज्ञानिकता मूल्यांकन की वैधता और विश्वसनीयता को सुदृढ़ करने में सहायक होती हैं। प्रश्नों के निर्माण में भी वैज्ञानिकता होनी चाहिए। 

8. मूल्यांकन संपूर्ण शैक्षिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं

शिक्षा की किसी भी व्यवस्था या क्रिया से हम मूल्यांकन को नहीं हटा सकते। यह संपूर्ण शैक्षिक व्यवस्था को सुधारने में हमारी सहायता करता हैं। 

9. तार्किकता 

मूल्यांकन प्रायः व्यापक होता हैं और व्यापक पाठ्यक्रम की समस्त इकाइयों के आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इससे विद्यार्थियों में चयन-प्रवृत्ति समाप्त होती हैं तथा संपूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन करने की प्रवृत्ति विकसित होती हैं। अनेक प्रश्न तार्किक आधार पर निर्मित किये जाते हैं तथा विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता का मूल्यांकन भी किया जाता हैं। वैज्ञानिकता की विशेषता के फलस्वरूप मूल्यांकन में तार्किकता का गुण भी आ जाता हैं।

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