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8/07/2021

पठन/वाचन का अर्थ, परिभाषा, महत्व

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पठन अथवा वाचन का अर्थ 

सामान्यतः लिखित भाषा को बाँचने की क्रिया को पढ़ना या पठन कहा जाता है। जैसे-- पम्फलेट पढ़ना, समाचार-पत्र पढ़ना तथा पुस्तकें पढ़ना। लेकिन भाषा शिक्षण के संदर्भ मे पढ़ने अर्थ होता है किसी के द्वारा लिखित भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त भाव तथा विचारों को पढ़कर समझना। अर्थ बोध तथा भाव की प्रतीति पढ़ने की जरूरी तत्व होते है। इस तरह जब हम किसी के द्वारा लिखे किसी लेख, कहानी, निबंध, नाटक या पद्म को पढ़कर उसका अर्थ तथा भाव ग्रहण करते है तो हमारी इस क्रिया को पढ़ना अथवा पठन कहते है; यह बात दूसरी है कि हम उसक् अर्थ तथा भाव किस सीमा तक समझते एवं ग्रहण करते है। 

पठन दो तरह से किया जाता है-- मौखिक रूप से तथा मौन रूप से। मौखिक तथा मौन रूप से पठन करने के भी अनेक रूप है। 

पठन या वाचन की परिभाषा 

कैथरीन ओकानर के अनुसार," वाचन वह जटिल अधिगम (सीखने) की प्रक्रिया है जिसमें दृश्य श्रव्य एवं गतिकही सर्किटों का मस्तिष्क के अधिगम से संबंध होता है।" 

बी. एम. सक्सेना के अनुसार," शिक्षा के क्षेत्र मे वाचन से तात्पर्य सार्थक प्रतीक लिपि चिन्हों को पहचाना मात्र न होकर उनके अर्थ ग्रहण करने से है।" 

डाॅ. रामशकल पांडेय के अनुसार," वाचन वह क्रिया है जिसमें प्रतीक, ध्वनि और अर्थ साथ-साथ चलते है।"

पठन का महत्व 

पठन का वर्तमान जीवने में अत्यधिक महत्व है, क्योंकि मानव मे ज्ञानार्जन जो जिज्ञासा स्वभावतः होती है और ज्ञान वृद्धि के लिए वह निरंतर प्रयत्न करता रहता है। यानी सीखने की ललक उसमें सदैव बनी रहती है। 

ज्ञानार्जन व ज्ञान वृद्धि के उसके तीन साधन है-- 

1. प्रत्यक्ष निरीक्षण तथा स्वानुभव। 

2. विचार विनिमय एवं दूसरों से शिक्षा-ग्रहण। 

3. स्वाध्याय (नियमित) 

मानव या बालक में प्रत्यक्ष निरीक्षण तथा स्वानुभाव द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक सत्य और स्थायी होता है, लेकिन ज्ञान सागर तो असीम है, अथाह है और मानव अपने अल्प जीवन काल में इसमें अल्पांश भी प्राप्त नही कर पाता है, लेकिन विचार-विनिमय और दूसरों के अर्जित ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने मे ही अधिक लाभ होता है। इसके लिये विद्यालय ही उत्तम साधन है, क्योंकी बालक को विद्यालय छोड़ने के बाद ऐसी सुविधा नही मिल पाती है। अतः वह पूर्व व वर्तमान विद्वानों की कृतियों का स्वाध्याय करके ही नवीन ज्ञान अर्जित करना तथा उसे सम्बर्द्धक करता है। अतः कहा जा सकता है कि हमारे संपूर्ण ज्ञानार्जन की कुंजी ही पठन है। 

शिक्षा पर ले जाना ही संस्कृति के संरक्षण व अग्रसर का उत्तरदायित्व है। इस प्रकार से पठन की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। शिक्षा का मूल उद्देश्य ही बालक को राष्ट्र के लिये उत्तम नागरिक बनाना है। आज विश्व की समसायिक घटनाओं से परिचय तथा पूरे विश्व से संपर्क बनाये रखना भी पठन के महत्व को ही बताता है। 

वाचन या पठन के महत्व के लिये डाॅ. श्रीधरनाथ मुखर्जी लिखते है कि," वाचन एक कला है और यही ज्ञानार्जन की कुंजी है। वाचन शक्ति ठीक रहने पर ही मनुष्य जटिल विषय को पढ़कर समझ सकता है तथा पढ़े हुये अंश का सार बोल सकता है, लिख सकता है। वाचन कर अच्छा वक्ता बन सकता है और अच्छा लेखक भी अर्थात् स्पष्ट है कि वाचन क्रिया मृत्युपर्यन्त मानव की साथी है।"

पठन के आवश्यक तत्व तथा आधार 

लिखित भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त भाव और विचारों को मौखिक या मौन रूप से पढ़कर समझने के लिए जिन तत्वों की जरूरत होती है उन्हें पठन के तत्व तथा आधार कहते है। ये तत्व तथा आधार निम्न है-- 

1. पठनकर्ता की दृश्येन्द्रिय (आँख) कण्ठ, मुख विवर तथा नासिका (नाक)।

2. पठनकर्ता का लिपि ज्ञान और स्पष्ट अक्षरोच्चारण। 

3. पठनकर्ता का अपना जरूरी शब्द भण्डार, शुद्ध शब्दोच्चार का अध्यास करना एवं वाक्य तथा विराम चिन्हों का ज्ञान।

4. पठनकर्ता की तत्परता, पठन में उसकी रूचि तथा अवधान।

5. पठनकर्ता का धैर्य के साथ पूर्ण मनोयोग से उचित स्वर तथा उचित गति के साथ सस्वर पठन और उचित गति के साथ मौन पठन का अभ्यास।

यह भी पढ़े; पठन/वाचन की प्रकृति, प्रकार

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