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8/07/2021

मौन वाचन/पठन का अर्थ, उद्देश्य, प्रकार

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मौन वाचन/पठन का अर्थ 

लिपि (लिखित पाठ) को बिना ओठ हिलाए मन में मनन करते हुए पठन करने को मौन वाचन या मौन पठन कहते है। यह सस्वर वाचन से अलग है जिसमें उच्चारण करते हुए घोष (मुखर) रूप में वाचन किया जाता है। मौन वाचन का अभ्यास शालाओं में प्रायः कक्षा 8 से कराया जाता है। जब छात्रों मे पठन हेतु आवश्यक एकाग्रता आ जाती है। डाॅ. रामशकल पांडेय लिखते है," मौन वाचन में निपुणता का आना व्यक्ति के विचारों में प्रौढ़ता का घोतक है और भाषायी दक्षता पर अधिकार का सूचक है।" 

अधिकांशतः हमे देखने को मिलता है कि समाज में प्रौढ़ व्यक्ति समाचार पत्र, पुस्तक आदि को मौन होकर ही पढ़ते है। इससे आपपास बैठे लोगों में बाधा या विग्न उत्पन्न नही होता और पाठक स्वयं पढ़कर आनंद और अर्थग्रहण प्राप्त करना चलता है। 

मौन वाचन में सस्वर वाचन की अपेक्षा कम थकान होती है और समय अपेक्षाकृत कम लगता है। मिसेज ग्रे व रीस के एक परीक्षण द्वारा यह पाया गया है कि कक्षा 6 के बालक ने एक मिनट में सस्वर वाचन में 170 शब्दों का पठन किया जबकि इतने ही समय मे 210 शब्द मौन पठन के द्वारा उसने पढ़े। दैनिक-जीवन मे व्यक्ति मौन वाचन का ही अधिक प्रयोग करते है। 

मौन वाचन अथवा पठन के उद्देश्य 

मौन वाचन के निम्न उद्देश्य है-- 

1. द्रुत गति से पठन का अभ्यास करना।

2. छात्रों की बोध शक्ति विकसित करना। 

3. छात्रों में स्वाध्याय की आदत विकसित करना। 

4. छात्रों मे सोच, मनन, तर्क करने की शक्ति बढ़ाना। 

5. भाषा लिपि संबंधी नियमों का ज्ञान कराना। 

6. शब्द भंडार, भाषा भंडार, मुहावरे-लोकोक्तियाँ, लक्ष्यार्थ व व्यंग्यार्थ शब्द शक्तियाँ छात्र में विकसित करना। 

7. स्वयं संदर्भ स्त्रोतों से शब्दार्थ आदि ज्ञात करने की क्षमता छात्र में उत्पन्न करना। 

8. साहित्य की विभिन्न विधाओं तथा लेखन शैलियों से छात्रों को परिचित कराना।

9. अध्ययन में आत्मनिर्भरता का गुण छात्रों में उत्पन्न करना। 

10. ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता छात्रों में उत्पन्न करना। 

मौन वाचन या पठन के प्रकार 

कुछ विद्वान मौखिक पठन की तरह ही मौन वाचन के भी दो भेद करते है-- व्यक्तिगत पठन और सामूहिक पठन। परन्तु मौन पठन के इस प्रकार भेद करने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही इसका कोई औचित्य है। मौन पठन के उद्देश्य और उसकी गति के आधार पर उसके दो भेद किये जा सकते है-- गहन पठन और द्रुत पठन।

1. गहन पठन 

सामान्यतः गूढ़ भाव एवं विचारों को उच्चस्तरीय भाषा एवं शैली में अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसी लिखित सामग्री का अर्थ एवं भाव समझने के लिए पाठक को पूर्ण मनोयोग से, बड़े धैर्य के साथ, एक-एक शब्द का अर्थ एवं भाव समझने का प्रयास करते हुये पठन करना होता है। किसी पाठ्य-सामग्री को मौन रूप से, पूर्ण मनोयोग से, बड़े धैर्य के साथ, उसके प्रत्येक अंश का अर्थ एवं भाव समझने का प्रयास करते हुये पढ़ने की क्रिया को गहन पठन कहते है। 

उच्च साहित्य एवं दर्शन आदि विषयों के अध्ययन हेतु गहन पठन की ही आवश्यकता होंती है। गहन पठन के लिये यह जरूरी है कि पठनकर्ता का अपना शब्द-भण्डार हो और उसमें कल्पना, चिन्तन-मनन और विश्लेषण करने की क्षमता हो। 

2. द्रुत पठन 

सामान्यतः सामान्य वस्तुओं, क्रियाओं और घटनाओं का वर्णन सामान्य भाषा-शैली में किया जाता है। कहनियाँ और जीवनियाँ भी प्रायः सामान्य भाषा-शैली में लिखी जाती है। मनोरंजन साहित्य-रचना भी प्रायः सामान्य भाषा में ही की जाती है। ऐसी लिखित सामग्री को पढ़कर समझने में पाठक को कोई विशेष प्रयत्न नही करना पड़ता, वह उसे तीव्र गति से पढ़कर उसका अर्थ एवं भाव समझ सकता है। किसी पाठ्य-सामग्री को मौन रूप में, तीव्र गति से पढ़कर उसके अर्थ एवं भाव को ग्रहण करने की क्रिया को द्रुत पठन कहते है।

मौन पठन में अकुशल बालकों में पाई जाने वाली कमियां 

मौन पठन में कुशलता रहित बालकों के पठन में निम्न प्रकार की कमियां पाई जाती है-- 

1. बालक मन्द गति से पठन करते है। 

2. ऐसे बालक देरे से समझते है।

3. अकुशल बालक शब्दों को बार-बार पढ़ते है तथा वाक्य की आवृत्ति करते रहते है। 

4. ऐसी स्थिति में बालक एक-एक शब्द को पढ़ता है। 

5. ऐसे बालक पढ़ते समय सिर व आँख की पुतलियों का घुमाव करते रहते है।

6. मंद पठन में बालक आँख, सिर, जीव्ह, कण्ठ और वाक् ज्ञानेन्द्रियों का भी प्रयोग करते है। 

मौन पठन के बाधक तत्व 

मौन पठन में बालकों के लिये कई बाधक तत्व आते है-- 

1. बालक में पठन कला का अभाव।

2. बालकों में दृष्टि परिधि एवं विस्तार का अभाव।

3. बालकों में पठन में रूचि की कमी भी एक कारण है। 

4. बालकों में मन की एकाग्रता का अभाव होता है। 

5. बालकों में चिन्तन का अभाव होता है। 

6. बालकों में कई शारीरिक दोष भी बाधक होते हैं। 

मौन पठन के अभ्यास हेतु अनुकरणीय कार्य 

बालक मे मौन पठन के अभ्यास के लिये निम्न प्रकार के कार्य होने चाहिए-- 

1. विद्यालय तथा कक्षाकक्ष का वातावरण पूर्णतः शांत बनाया जायें।

बालकों में ध्यान केंद्रित करने की आदत डाली जायें।

2. बालकों में ध्यान केंद्रित करने की आदत डाली जायें। 

3. बालकों को नियमित विषय-वस्तुओं का मौन पठन का अभ्यास कराया जायें।

4. बालकों के लिये पाठ्य-सामग्री रोचक, प्रेरक, नवीन ज्ञान वाली, सामाजिक, सांस्कृतिक से संबंधित तथा सरल और बोधगम्य होनी चाहिए।

5. मौन पठन से पहले बालकों को बता देना चाहिए कि उसे कहाँ तक पठन करना है तथा कितने समय तक करना है और किन-किन बिन्दुओं पर अधिक ध्यान देना है। 

6. बालक का मौन पठन के समय अध्यापक केवल चुपचाप ही निरीक्षण करता रहे।

7. मौन पठन से पहले उस गद्यांश का कक्षा में एक बार सस्वर पठन अवश्य करायें।

8. विषय-वस्तु के कठिन शब्दों का, सूक्तियों का पहले ही सरलीकरण कर दिया जाये तथा वाक्यों का अर्थ, लक्ष्यार्थ का पहले ही बोध करा दिया जायें।

9. बालकों के लिए पठन से पूर्व दो-तीन प्रश्न लिख दिये जायें ताकि पठनोपरान्त बालक उनके उत्तरों की खोज करेंगे।

मौन पठन का मूल्यांकन 

अध्यापक को समय-समय पर बालकों द्वारा किये जा रहे मौन पठन का मूल्यांकन निम्न प्रकार से करना चाहिए-- 

1. मौन पठन के दौरान ही कुछ बालकों से प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

2. बालकों को दिये जाने वाले प्रश्न वस्तुनिष्ठ हों, जैसे-- रिक्त स्थानों की पूर्ति, सत्य-असत्य, हाँ/ना, मिलाना पद या बहुविकल्पात्मक आदि।

3. बालकों से पठित अंश का सार लिखाया जायें।

4. बालकों से पठित अंश से संबंधित प्रश्नों के उत्तर लिखवाये जायें।

5. बालकों को न पठित अंश में से कुछ शब्द देकर उन पर विचार प्रकट करने को कहा जायें।

6. कठिन शब्दों के अर्थ बालकों से पूछे जायें।

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