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11/11/2021

मौन वाचन/पठन का महत्व

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मौन वाचन/पठन का महत्व 

मौन वाचन का महत्व बताते हुए जड़ महोदय ने कहा हैं," कि जब बालक पैरों से चलना सीख जाता है तो घुटनों के बल सिसकना छोड़ देता हैं।" इसी प्रकार भाषा के क्षेत्र में बालक जब मौन वाचन की कुशलता प्राप्त कर लेता है तो सस्वर वाचन का अधिक प्रयोग करना छोड़ा देता है। मौन वाचन में निपुणता का आना व्यक्ति के विचारों की प्रौढ़ता का द्योतक है तथा भाषायी दक्षता पर अधिकार का सूचक हैं। 

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इस परिभाषा के आधार पर मौन वाचन के महत्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता हैं-- 

1. मौन वाचन में समय की भी बचत होती है। श्रीमती ग्रे रीस के एक परीक्षण से यह पता चलता है कि कक्षा छः के बालक एक मिनट में सस्वर वाचन में 170 शब्द बोलते हैं और मौन वाचन में इतने ही समय में 210 शब्द बोलते हैं।  

2. मौन वाचन द्वारा एक छात्र दूसरे छात्र के वाचन में बाधा नहीं उपस्थित करता हैं। सामूहिक वाचन के लिए मौन वाचन सर्वोत्तम हैं। 

3. मौन वाचन के समय छात्र चिंतन भी करता चलता हैं। उसका ध्यान केंद्रित होता हैं। यह क्रिया सोद्देश्य होती हैं। सस्वर वाचन में छात्र का ध्यान उच्चारण पर अधिक रहता हैं। अतः कभी-कभी वह बिना अर्थ समझे ही पढ़ता जाता हैं। 

4. मौन वाचन द्वारा स्वाध्याय की आदत पड़ती हैं। स्वाध्याय में रूचि उत्पन्न होती हैं और छात्र वाचन द्वारा आनंद प्राप्त करने का प्रयास करता हैं। आनंद प्राप्त करने के लिए पढ़ना प्रायः मौन रूप में होता हैं। 

5. मौन वाचन में मितव्ययिता होने के कारण दैनिक जीवन में व्यक्ति इसी का अधिकाधिक प्रयोग करते हैं, जबकि सस्वर वाचन अधिकतर शालेय (पाठशाला) जीवन तक ही सीमित होता हैं। 

6. मौन वाचन में होंठ हिलना चाहिए तथा मुँह से किसी प्रकार की ध्वनि नहीं निकलनी चाहिए। केवल मस्तिष्क और नेत्रों द्वारा ही संपूर्ण क्रिया हो जानी चाहिए। कक्षा के मौन वाचन के अवसर पर अध्यापक को छात्रों के पठन का निरीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि छात्र मौन वाचन के स्थान पर फुसफुसा कर तो नहीं पढ़ रहे हैं, पंक्तियों पर उंगलियाँ तो नहीं फेर रहे हैं। 

7. प्रारंभिक कक्षाओं में सस्वर वाचन जितना लाभकारी हैं, उच्च कक्षाओं में उससे कहीं लाभप्रद मौन वाचन हैं। हम शीघ्रतापूर्वक बिना किसी को असुविधा दिए कम समय में किसी वस्तु का भाव ग्रहण मौन वाचन से ही कर सकते हैं।

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