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11/11/2021

नाटक शिक्षण की विधियाँ

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नाटक शिक्षण की विधियाँ 

अनुकरण मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति हैं। अतः प्राथमिक-स्तर पर कक्षा-1, 2 व 3 में बालकों को परस्पर वार्तालाप करने और अभिनय करने के अवसर दिये जाने चाहिए। कक्षा- 4, 5 व 6 में कथाओं का ही नाट्य रूपांतरण करके बालकों को अलग-अलग पात्रों के रूप में अभिनय करने के लिये प्रेरित करना चाहिए। बड़ी कक्षाओं में नाटक-शिक्षण के लिये निम्नलिखित विधियां को अपनाया जा सकता हैं-- 

1. अर्थ कथन विधि 

इस विधि में शिक्षक नाटक का मौखिक पठन करता है और इसके साथ ही वह उसका अर्थ बताता चलता है। इस विधि में यह भी ध्यान रखा जाता है कि भाव के अनुसार ही पठन का कार्य किया जावे, इससे छात्रों को आनंद भी आता है। विद्यार्थायों को अनुकरण वाचन के लिये प्रेरित किया जाना चाहिए, लेकिन इस विधि को ठीक नहीं माना जाता हैं, क्योंकि इन बालकों में नाट्य कौशलों का विकास नहीं होता हैं। 

2. प्रयोग-विधि 

इस विधि में विद्यार्थी शिक्षकों के मार्गदर्शन में रंगमंच तैयार करके नाटक के मंचन का पूर्वाभ्यास करते हैं। इसके बाद एक निश्चित तिथि पर विद्यार्थियों द्वारा रंगमंच पर मंचीय गतिविधियों के रूप में नाटक प्रस्तुत किया जाता हैं। इस विधि में धन और समय अधिक लगता हैं। यही कारण हैं कि धन तथा साधनों के अभाव में शालाओं में इस विधि का उपयोग संभव नहीं हो पाता हैं। 

3. कक्षाभिनय-विधि 

इस विधि का उपयोग कक्षा-शिक्षण में किया जाता हैं। इसमें विद्यार्थियों को पात्रों की भूमिका दी जाती है और वे खड़े होकर अपने संवादों को भावानुसार पढ़ते हैं। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार शिक्षक उनके उच्चारण तथा संवाद बोलने के ढंग को सुधारता जाता हैं। इस प्रकार बार-बार अभ्यास करने से उनमें नाट्य कौशलों का विकास होने लगता है। यद्यपि यह विधि मंचीय प्रणाली (प्रयोग-विधि) के समान प्रभावशाली तो नही हैं, लेकिन इस विधि में भी छात्रों का पर्याप्त मनोरंजन होता है और वे नाट्य कौशलों से परिचित भी होते हैं। 

4. आदर्श नाट्य पठन-विधि एवं समीक्षा विधि 

इस विधि में अध्यापक संपूर्ण नाटक को उचित भाव-भंगिमा के साथ पढ़ता है। वह कठिन स्थलों की व्याख्या करता है और नाटक के उद्देश्यों की विवेचना करता हुआ नाटक के तत्वों की व्याख्या करता है। इसके साथ ही वह भाषा-शैली कथावस्तु एवं गुण-दोषों की समीक्षा भी करता है। यह विधि शिक्षक-प्रधान होने के कारण छात्रों के लिये विशेष रूप से प्रभावशाली नहीं होती हैं। 

उपर्युक्त विधियों में प्राथमिक स्तर एवं पूर्व-माध्यमिक स्तर के लिये कक्षाभिनय विधि एवं प्रयोग-विधि (मंचीय प्रणाली) विशेष रूप से उपयोगी हैं। कक्षाभिनय-विधि सस्ती और सरल हैं। इसलिए इसका उपयोग शिक्षकों द्वारा सरलता-पूर्वक किया जा सकता हैं। वर्ष में एक या दो बार प्रयोग-विधि के द्वारा महत्वपूर्ण नाटकों, नाट्यांशों, एकांकी आदि का मंचन कराकर छात्रों को नाटकीय तत्वों से परिचित कराया जा सकता हैं और उनमें नाट्य कौशल का विकास किया जा सकता हैं।

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