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11/07/2021

हिंदी भाषा का विकास

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हिन्दी भाषा के विकास का वर्णन कीजिए।

अथवा

हिन्दी भाषा के विकास के संदर्भ में प्राचीनकाल (आदिकाल) पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। 

अथवा

हिंदी भाषा के विकास को विस्तारपूर्वक समझाइये। 

अथवा

हिन्दी की उत्पत्ति कब से मानी जाती हैं? इसके विकास-क्रम का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। 

अथवा 

हिन्दी भाषा के उद्गम तथा विकास का वर्णन कीजिए। 

hindi bhasha ka vikas;वेद रचना जिस भाषा में हुयी उसे मूल भाषा कह सकते हैं। जब मूल भाषा में वेद जैसे उन्नत साहित्य का सृजन होने लगा तो उसका रूप संस्कृत के रूप में परिणित होने लगा। परन्तु विचारणीय है कि हिन्दी ने एकाएक साहित्यिक रूप धारण नहीं किया होगा। पहले वह साधारण बोलचाल की भाषा रही होगी। फिर धीरे-धीरे उसका साहित्य में प्रयोग हुआ होगा। इस प्रकार वेद काल में जन-सामान्य की भाषा प्राकृत ही रही, परन्तु साहित्यिक रूप को व्याकरणों ने बांधना प्रारम्भ कर दिया। 500 ई.पू. के लगभग पाणिनी के व्याकरण नियमों में वह ऐसी आबद्ध हुयी कि उनमें परिवर्तन होना रुक गया। आर्यों की भाषा का यह साहित्यिक रूप संस्कृत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस तरह इसका प्रयोग साहित्य की रचना के क्षेत्र में होने लगा। अतः इस मूल भाषा के दो रूप- -वेदों की भाषा संस्कृत तथा लोक व्यवहार की प्राकृत भाषा हो गये, जबकि दूसरी ओर बोलचाल की भाषा लगातार विकास के मार्ग पर बढ़ती रही। साहित्यिक प्राकृत भाषाओं की तुलना में इन बोलचाल की भाषाओं के व्याकरणों से अपभ्रंश भाषा उत्पन्न हुयी। अपभ्रंश भाषाओं का समय 500 ई . से 1000 ई . तक माना जाता है। इस प्रकार विभिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली प्राकृत भाषा इन अपभ्रंश भाषाओं के विकास का स्रोत बन गयी। धीरे-धीरे ये अपभ्रंश भाषायें साहित्य का माध्यम बनने लगीं तथा हिन्दी की 1000 ई. तक आते-आते ये अपभ्रंश भाषायें पूर्णरूप से साहित्यिक बन गयीं।

हिन्दी की उत्पत्ति या उद्भव-सन् 1000 ई. के पश्चात् मध्यकालीन आर्य भाषा के अंतिम रूप अपभ्रंश भाषाओं ने शनैः शनैः बदलकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का रूप ग्रहण कर लिया था, तथा गंगा की घाटी में प्रयोग या काशी तक बोली जाने वाली शौरसेनी और अर्द्ध मागधी की अपभ्रंशों ने हिन्दी भाषा के सभी प्रधान रूपों को जन्म दिया। प्राचीनकाल में हिन्दी को बोलचाल के रूप का कोई निश्चित अथवा लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। डॉ. पीताम्बर दत्त बड़श्वाल के मतानुसार," हिन्दी सम्भवतः सन् 782 से पहले बोली जाती रही होगी।" हिन्दी साहित्य का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है अर्थात् इसका उद्भव 1000 ई. के लगभग माना जाता है। इस समय के माने जाने का प्रमुख कारण यह है कि 14 वीं सदी तक साहित्य में अपभ्रंश का प्रयोग होता रहा है, जबकि वर्तमान आर्य भाषाओं का साहित्य में प्रयोग 13 वीं सदी के से प्रारम्भ हो गया था। कुछ इतिहासकारों ने 7 वीं शताब्दी के पुष्य नामक कवि को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। 9 वीं एवं 10 वीं शताब्दी में धर्म प्रचारकों ने हिन्दी को प्राचीन अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इससे हिन्दी पनपने लगी।

आचार्य शुक्ल के शब्दों में," पश्चिम के जैन लोगों और पूरब के बज्रयानों की अपभ्रंश की रचनाओं में जहाँ-तहाँ हिन्दी बोली झलकने लगी है।" इस सम्बन्ध में डॉ . श्यामसुन्दर दास ने कहा है कि हेमचन्द्र के समय से पूर्व हिन्दी का विकास होने लगा था और हेमचन्द्र के समय तक उसका रूप कुछ स्थिर हो गया था। अतएव हिन्दी का आदिकाल हम संवत् 1050 के लगभग मान सकते हैं। हिन्दी का आरम्भ काल अब सामान्य यही मान लिया गया है। 

हिंदी भाषा का विकास

हिन्दी भाषा के विकास के क्रम को हम निम्नलिखित कालों में विभाजित कर सकते हैं-- 

1. प्राचीनकाल 

हिन्दी का विकास प्राकृत एवं अपभ्रंश के बाद हुआ है। हिन्दी के विकास का उद्घाटन चन्द बरदाई के समय से होने लगता है। हिन्दी का प्राचीनतम उपलब्ध विकास का उद्घाटन ग्रन्थ चन्दबरदाईकृत पृथ्वीराज रासो है। इस ग्रन्थ में हमको हिन्दी भाषा के सर्वप्रथम दर्शन होते हैं, इस ग्रन्थ का स्वरूप इतना मिश्रित एवं वैविध्यपूर्ण है कि उसके मूल रूप का पता लगाना कठिन हो रहा है। यह समय 12 वीं शताब्दी का अंतिम लेकिन अर्द्ध भाग था, किन्तु उस समय में भी इसकी भाषा हिन्दी से अत्यधिक भिन्न हो गयी थी। जिस समय हिन्दी भाषा का इतिहास आरम्भ होता है, उस समय हिन्दी प्रदेश तीन राज्यों में विभक्त था-- 

(अ) दिल्ली, अजमेर का चौहान वंश, 

(ब) कन्नौज का राठौर वंश, 

(स) महोबा का परमार वंश।

संस्कृत के अंतिम नैषध के रचयिता हर्ष जयचन्द्र के दरबार के राजकवि थे। महोबा के संस्कृत राजकवि जगनिक का नाम उनके रचित ग्रन्थ 'आल्हखण्ड' के कारण प्रसिद्ध है। 13 वीं शताब्दी के आरम्भ तक समस्त हिन्दी प्रदेश पर मुसलमानों का आधिपत्य स्थापित हो गया था। तीन सौ वर्षों से अधिक विदेशी शासन की कालावधि में दिल्ली के राजनीतिक केन्द्र से हिन्दी भाषा की प्रगति में कोई मदद प्राप्त नहीं हुयी। इस कालावधि में केवल अमीर खुसरो ने ही दिल्ली में मनोरंजन हेतु भाषा के प्रति रुचि दिखायी। इस युग के सम्बन्ध में निम्न बातें विशेष रूप से दिखायी देती हैं-- 

(अ) प्राचीनकाल विदेशी शासन का युग था। 

(ब) प्राचीनकाल में नाथ पंथ और वज्रयानी सिद्ध साहित्य की रचना हुयी। इसके अनेक ग्रन्थों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। 

प्राचीन हिन्दी के ऊपर मुसलमानों की भाषाओं-- अरबी, तुर्की एवं फारसी का खूब प्रभाव पड़ा। यह हिन्दी का शैशव- काल है। इस काल की हिन्दी में अपभ्रंश के काफी रूप प्राप्त होते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्राचीन काल में हिन्दी भाषा व्याकरण के कठोर नियमों में जकड़ी नहीं थी। इस काल के प्रमुख कवि हैं- शालिभद्र सूरी, विजयसेन सूरी, चक्रधर स्वामी, कबीर, शाह, मीरा, ख्वाजा, बन्दा नवाज। 

2. मध्यकाल

आदिकाल के पश्चात् हिन्दी के विकास का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ, जिसे मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। हिन्दी का मध्यकाल लगभग 525 वर्षों तक चला। मध्यकाल तक आते-आते तुर्कों का महत्व समाप्त हो गया था तथा मुगलों का साम्राज्य स्थापित होने लगा था। आदिकाल में हिन्दी का सर्वमान्य साहित्यिक रूप बन चुका था। इस काल तक आते-आते हिन्दी का स्पष्ट स्वरूप निखर आया एवं उसकी प्रमुख बोलियाँ भी विकसित हो गयीं। ब्रजभाषा एवं अवधी के प्रचार का कारण धार्मिक आन्दोलन थे। ब्रजभाषा समस्त हिन्दी प्रदेश की साहित्यिक भाषा हो गयी थी। 17 वीं, 18 वीं शताब्दी में प्रायः समस्त हिन्दी साहित्य ब्रजभाषा में लिखा गया। मध्यकाल को दो भागों में विभाजित कर सरलता से समझा जा सकता है । मध्यकाल का प्रथम भाग 1375 से लेकर 1700 तक चला। इस काल में हिन्दी की पुरानी बोलियाँ परिवर्तित होकर ब्रज, अवधी तथा खड़ी बोली के रूप में स्थापित हो गयीं। हिन्दी विकास के व्यकाल का द्वितीय भाग 1700 से लेकर 1900 तक चला। इस काल में ब्रज, अवधी और खड़ी बोलियाँ परिष्कृत होकर परिमार्जित होती हैं तथा उनमें प्रौढ़ता आती है इस प्रकार ये बोलियाँ, बोलियाँ न रहकर भाषा के रूप में परिवर्तित हो गयीं। 

अत: उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मध्यकाल के प्रथम भाग में हिन्दी की पुरानी बोलियों ने विकसित होकर ब्रज, अवधी एवं खड़ी बोली का रूप धारण कर लिया। खड़ी बोली आंशिक रूप से राजनीतिक आश्रय प्राप्त करके विकसित होती रही। तात्पर्य यह है कि मध्यकाल में ब्रजभाषा , अवधी एवं खड़ी बोली के अनेक हिन्दू मुसलमान कवि हुये। डॉ . धीरेन्द्र वर्मा के शब्दों में," वास्तव में यह काल हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जा सकता हैं।"

3. आधुनिक काल

आधुनिक काल आते-आते साहित्य की भाषा के रूप में ब्रज, अवधी का उपयोग निरन्तर कम होता गया अर्थात् इनका प्रयोग घटता गया और इसके स्थान पर खड़ी बोली का अत्यधिक प्रचार बढ़ता गया। 19 वीं शताब्दी तक कविता की भाषा ब्रज भाषा रही एवं गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। बीसवीं शताब्दी के आते-आते खड़ी बोली गद्य-पद्य दोनों की साहित्यिक भाषा बन गयी। भारतेन्दु-युगीन लेखकों में व्याकरण से सम्बन्धित बहुरूपता, कारक एवं लिंग, वचनों के प्रयोग अस्थिरता आदि जैसे दोष दृष्टिगोचर होते हैं, लेकिन इस काल में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषागत अशुद्धियों के दोषों को दूर करने का प्रशंसनीय कार्य किया। इस काल में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि जैसे समर्थ साहित्यकार हुये हैं। इस तरह साहित्य की सभी विधाओं का आधुनिक काल में पर्याप्त विकास हुआ।

निष्कर्ष 

अतः कहा जा सकता है कि हिन्दी एक प्रवाहमान और सशक्त भाषा है। वस्तुतः हिन्दी संजीवनी शक्ति से ओत-प्रोत है।

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