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8/08/2021

व्याकरण का अर्थ, परिभाषा, व्याकरण शिक्षण के उद्देश्य, महत्व

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व्याकरण शिक्षण का अर्थ (vyakaran kise kahate hai)

प्राचीन समय मे हर विद्यार्थी को व्याकरण की शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य था। जो व्यक्ति व्याकरण में बहुत निपुण होता था, उसे विद्वान माना जाता था तथा समाज भी उसका सम्मान करता था। महोजी, पाणिन एवं पतंजलि जैस महान व्याकरण के विद्वान हुये है। संस्कृत साहित्य में व्याकरण के कई ग्रंथ मिलते है। वास्तव मे भाषा पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के लिये व्याकरण का ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है।

व्याकरण की परिभाषा (vyakaran ki paribhasha)

व्याकरण की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से दी है जो निम्न है-- 

महर्षि पाणिनी के अनुसार," व्याकरण शब्दानुशासन है। इससे भाषा का रूप व्यवस्थित होता है।" 

महर्षि पतंजलि ने भी अपने महाभाष्य मे इसे 'शब्दानुशासन' कहा है।

हेमचन्द के अनुसार," व्याकरण का काम है भाषा पर अनुशासन रखना। इस तरह हेमचन्द के मतानुसार व्याकरण शब्दानुशासन ही है। 

डाॅ. स्वीट के अनुसार," व्याकरण भाषा का व्यावहारिक विश्लेषण या उसका शरीर विज्ञान है।" 

व्याकरण शब्द, वि+आ-कृ घातु+ल्युट् प्रत्यय के योग का योगफल है। जिसका अभिप्राय है, व्याक्रियन्ते, अर्थात् जिसके द्वारा अर्थस्वरूप के माध्यम से शब्दों की व्याख्या होती है। 

जैगर के अनुसार," प्रचलित भाषा संबंधी नियमों की व्याख्या ही व्याकरण है।" 

यह मत जैगर ने विद्यालयों में व्याकरण की शिक्षा को ध्यान मे रखते हुए व्यक्त किया था।

भावों की स्पष्टता भाषा पर निर्भर है तथा भाषा की शुद्धता व्याकरण पर। व्याकरण भाषा का संगठन करता है। व्याकरण की जानकारी बिना भाषा शुद्ध नही हो सकती है। इसी कारण व्याकरण का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है। 

श्री योगेन्द्र जीत के शब्दों मे," सार रूप में प्रचलित भाषा संबंधित नियमों का कथन करना ही व्याकरण है।" 

व्याकरण शिक्षण के उद्देश्य (vyakaran shikshan ke uddeshya)

व्याकरण शिक्षण के निम्न उद्देश्य है-- 

1. विद्यार्थियों को विविध ध्वनियों का ज्ञान देना।

2. व्याकरण के द्वारा विद्यार्थियों में रचना एवं सृजनात्मक प्रवृत्ति का विकास करना।

3. विद्यार्थियों को शुद्ध भाषा का प्रयोग सिखाना।

4. विद्यार्थियों में ऐसी क्षमता पैदा करना जिससे कि वे कम से कम शब्दों में शुद्धतापूर्वक अपने भावों को व्यक्त कर सकें। साथ ही उनमें ऐसी योग्यता पैदा करना जिससे वे भाषा की अशुद्धता को भी समझ सकें एवं उनमें भाषा को परखने की शक्ति का विकास हो सके।

5. विद्यार्थियों को शुद्ध बोलने, लिखने एवं पढ़ने की प्रेरणा देना।

6. विद्यार्थियों में ऐसी योग्यता पैदा करना जिससे कि वे भाषा की अशुद्धता को समझ सकें एवं उनमें भाषा को परखने की शक्ति विकसित हो सके।

7. विद्यार्थियों को भाषा से संबंधित नियमों का ज्ञान प्रदान करना।

8. विद्यार्थियों को शुद्ध उच्चारण की शिक्षा प्रदान करना।

9. व्याकरण की शिक्षा का उद्देश्य बालक को भाषा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने में प्रवीण बनाना होना चाहिए।

10. भाषा का शुद्ध रूप पहचानने में छात्रों को सक्षम तथा समर्थ बनाना ही व्याकरण का उद्देश्य है। इस तरह व्याकरण से शुद्ध बोलना और लिखना आ जाता है।

11. व्याकरण के नियमों का ज्ञान, छात्रों में मौलिक वाक्य बनाने की योग्यता पैदा करता है। मितव्ययिता के आधार के लिए व्याकरण का ज्ञान जरूरी है। यह छात्रों मे शुद्ध रूप से बोलने तथा लिखने की क्षमता पैदा करता है।

व्याकरण की शिक्षा, भाषा की शिक्षा का आवश्यक अंग है। यह भाषा रूपी रथ का सारथी है। यह भाषा का स्वरूप बनाता है एवं उस पर नियंत्रण रखता है। यह भाषा का मित्र भी है। यह उसे सच्चे रास्ते पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।

व्याकरण शिक्षण का महत्व (vyakaran shikshan ka mahatva)

व्याकरण शिक्षण के महत्व तथा उपयोगिता के विषय में विद्वानों में प्ररस्पर मतभेद है। कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा शिक्षण में व्याकरण का बहुत महत्व है। बगैर व्याकरण के जाने भाषा पर कोई व्यक्ति पूर्ण अधिकार प्राप्त नही कर सकता। भाषा के रहस्य को समझने हेतु यह अति जरूरी है कि व्याकरण के नियमों को भी समझा जायें। भाषा में बोलने तथा लिखने की शुद्धता बगैर व्याकरण-ज्ञान के नही आ सकती।

एन. पोकाॅक का मत है कि," व्याकरण की शिक्षा का उद्देश्य बालक की भाषा को वैज्ञानिक रूप से देखने में प्रवीण बनना होना चाहिए।" 

सीताराम चतुर्वेंदी के अनुसार," व्याकरण की शिक्षा, भाषा की शिक्षा का एक आवश्यक तथा अपरिहार्य अंग है। भाषा को शुद्ध बनाये रखने का काम व्याकरण का नही है।" 

करूणापति त्रिपाठी के अनुसार," भाषा शिक्षण का कार्य व्याकरण की शिक्षा के बगैर नही हो सकता। व्याकरण के माध्यम से ही भाषा रूपी माध्यमिक नौक का संचालन हो सकता है। व्याकरण ज्ञान की अवहेलना से भाषा में उच्छृंखलता आ जाती है तथा वह संस्कृति का विनाश कर देती है। भाषा प्रयोग का उचित रहस्य समझने हेतु व्याकरण ज्ञान अत्यन्त जरूरी है।"

उपर्युक्त मत के विपरीत कुछ विद्वानों का कथन है कि भाषा शिक्षण में अथवा भाषा सीखने के लिए व्याकरण के नियमों के ज्ञान की कोई जरूरत नही। इस मत के समर्थकों के अनुसार भाषा बोलकर एवं अनुकरण से सीखी जाती है, न की व्याकरण के नियमों को रटकर। अतः व्याकरण की शिक्षा प्रदान करना व्यर्थ समय नष्ट करना है। 

व्याकरण के विषय में तीसरा मत और है। इस मत के अनुसार व्याकरण शिक्षण जरूरी अवश्य है, लेकिन उस पर अत्यधिक बल देना अनुचित है। छात्रों हेतु व्याकरण का ज्ञान उतना ही पर्याप्त है, जितना कि उन्हें पाठ्य-पुस्तक समझने हेतु जरूरी है।

अध्यापक को चाहिए कि वह उपयुक्त मतभेदों के चक्कर में न पड़कर व्यावहारिक मार्ग अपनाये। उसे सबसे पहले यह ध्यान में रखना चाहिए कि व्याकरण साधन है, साध्य नही। साध्य तो भाषा का ज्ञान है जिसकी प्राप्ति हेतु विभिन्न साधनों का प्रयोग किया जाता है, जिसमे से एक व्याकरण भी है। व्याकरण पर अत्यधिक बल देना भी अनुचित है तथा साथ ही व्याकरण के नियमों की पूर्ण रूप से उपेक्षा करना भी ठीक नहि है। 

दूसरे शब्दों मे, हम यह कह सकते है कि भाषा को व्याकरण के नियमों में जकड़ना भी हानिप्रद है तथा साथ ही उसे व्याकरण विहीन बनाना भी। इस विषय में एक विद्वान का कथन है कि," अगर हम व्याकरण को साधन के स्थान पर साध्य मानकर उसके नियम आदि रटाना ही अपना कर्तव्य समझते है, तो उसका नीरस होना स्वाभाविक है...... दूसरी तरफ अगर भाषा-व्यवस्था संबंधी कुछ नियम ही न बनाये गए तथा न उनका पालन किया गया, तो भाषा का कोई रूप न होगा। न शब्दों में साम्य होगा, न वाक्य-रचना में, तब अर्थ और भाव समझना भी दूभर हो जायेगा।" इस तरह अध्यापक को अपने विवेक के अनुसार व्याकरण का प्रयोग करना चाहिए।

व्याकरण शिक्षण की उपयोगिता 

व्याकरण शिक्षण की उपयोगिता निम्न प्रकार से है-- 

1. व्याकरण का अनुशासन जीवन को प्रभावित करता है।

2. व्याकरण द्वारा शब्द संरचना एवं वाक्य विन्यास की जानकारी प्राप्त होती है।

3. व्याकरण भाषा के स्वरूप की रक्षा करके उचित प्रयोग की प्रक्रिया की जानकारी देने में समर्थ हैं।

4. व्याकरण के द्वारा विद्यार्थियों में आलोचना प्रवृत्ति विकसित होती है।

5. व्याकरण के द्वारा भाषा में शुद्धता आती है।

व्याकरण शिक्षण को रोचक एवं सरल बनाने के उपाय 

1. व्याकरण शिक्षण का प्रारंभ व्यावहारिक व्याकरण से किया जाये एवं व्यावहारिक व्याकरण की शिक्षा भाषा-संसर्ग विधि द्वारा ही प्रदान की जायें।

2. पाठ्य-पुस्तकों में गद्य पाठ व्याकरण के नियमों के अनुकूल हो, जिससे कि व्याकरण को समन्वित करके पढ़ाया जा सके।

3. यथासंभव व्याकरण का आरम्भ तब तक नही किया जायें, जब तक की छात्र भाषा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त न कर लें। व्याकरण का प्रारंभ छोटी कक्षा मे किया जायें।

4. व्याकरण का शिक्षण यथासंभव आगमन विधि से आरंभ करके निगमन विधि से खत्म किया जायें।

5. छात्रों को व्याकरण के नियम रटाये न जाकर समझाये जायँ अथवा निकलवाये जायें।

6. व्याकरण का पाठ्यक्रम ज्यादा जटिल तथा विस्तृत न हो। पाठ्यक्रम छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल बनाया जायें।

7. सुविधानुसार श्रवण तथा दृश्य सामग्री का प्रयोग किया जायें।

8. व्याकरण शिक्षण क्रमबद्ध रूप में किया जायें।

9. जिन छात्रों की मातृभाषा कोई और हो, तो तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग किया जायें।

10. छात्रों से व्याकरण के रोचक अभ्यास कराये जायँ जैसे-रिक्त स्थानों की पूर्ति वाक्य रचना, लिंग-परिवर्तन, संज्ञाओं का परिवर्तन करना आदि आदि।

यह भी पढ़े; व्याकरण शिक्षण की विधियां/प्रणालियाँ

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