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11/20/2021

राजमुकुट/क्राउन क्या हैं? क्राउन की शक्तियाँ/कार्य

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राजमुकुट (क्राउन) क्या हैं? 

प्रारंभ में ब्रिटेन में निरंकुश राजतन्त्र की व्यवस्था थी। राजमुकुट राजा की शक्ति का प्रतीक था जिसे वह सिंहासनारूढ़ होते समय धारणा करता था। किन्तु वर्तमान समय में राजमुकुट ने एक संवैधानिक अर्थ भी प्राप्त कर लिया हैं। इस संवैधानिक अर्थ में राजमुकुट एक संस्था हैं, जिसमें सम्राट, केबिनेट, संसद, लोक सेवाएँ और वे सभी संस्थाएँ सम्मिलित हैं जिनके द्वारा प्रशासनिक सत्ता का उपयोग किया जाता हैं। 

प्रो. मुनरो के शब्दों में," क्राउन एक कृत्रिम या विधि व्यक्ति है जो कभी शरीर धारण करता है और न कभी मरता हैं।" 

प्रारंभिक काल में राजा और राजपद में कोई अंतर नहीं था, क्योंकि राजा ही राजमुकुट था और राजमुकुट ही राजा था। सभी शक्तियों का प्रयोग राजा द्वारा ही किया जाता था। अतः राजा और राजमुकुट में भेद (अंतर) का कोई विशेष महत्व नही था। कालांतर में प्रजातंत्रिक व्यवस्था में विकास के परिणामस्वरूप राजा और राजपद में भेद का महत्व बढ़ गया। राजा की वे सारी शक्तियाँ जो कि उसे प्राप्त थी, संस्थागत राजा को हस्तांतरित हो गई। 

प्रो. ऑग के अनुसार," राजमुकुट सर्वोच्च कार्यपालिका तथा शासन में नीति निर्माण की संस्था हैं। जिसका अर्थ है राजा, मंत्रियों और संसद का सम्मिश्रण। यह वह संस्था हैं जिसको राजा की समस्त शक्तियाँ तथा विशेषाधिकार धीरे-धीरे हस्तांतरित कर दिए गए हैं।" 

नेविलकर्क के अनुसार," संवैधानिक रूप से आज भी राजा के पास वे शक्तियाँ हैं जो किसी काल में उनके पास में थी। उनके नाम से ही उनका पालन होता हैं। हुआ यह कि राजा की शक्तियाँ व्यक्ति से निकल कर संस्था में आ गई हैं, इसे ही क्राउन कहते हैं।" 

क्राउन की शक्तियाँ तथा कार्य 

इस संबंध मे विद्वानों मे मतभेद है कि  क्राउन (ब्रिटिश सम्राट) को जो विशेषाधिकार प्राप्त हैं उनका प्रयोग राजा किस हद तक कर सकता हैं। राजा को जो विशेषाधिकार प्राप्त हैं उनके संबंध में उसकी स्थिति निम्नानुसार हैं-- 

1. संसद के विघटन का विशेषाधिकार 

राजा का एक विशेषाधिकार प्रधानमंत्री के परामर्श पर लोक सदन में विघटन का अधिकार हैं। इस विशेषाधिकार के संबंध में दो प्रकार की मान्यताएँ हैं। एक विचारधारा के अनुसार राजा का यह अधिकार वास्तविक है तथा राजा के लिए यह जरूरी नही कि वह प्रधानमंत्री के परामर्श को माने ही। कीथ और हाथ ने इस विचार का समर्थन किया हैं। दूसरी विचारधारा के अनुसार राजा प्रधानमंत्री के परामर्श को मानने के लिए बाध्य हैं। परन्तु सामान्यतः यह निष्कर्ष सही है कि राजा प्रधानमंत्री के परामर्श को मानने के लिए बाध्य हैं। 

2. मंत्रियों की बर्खास्तगी संबंधी विशेषाधिकार 

राजा को मंत्रियों को बर्खास्त करने का विशेषाधिकार हैं। वास्तविकता यह है कि कि राजा अपने इस अधिकार का मनमाना प्रयोग नहीं कर सकता। यदि राजा प्रधानमन्त्री की इच्छा के विरूद्ध मंत्रियों को बर्खास्त करने का दुस्साहस करे तो यह केवल प्रधानमंत्री से बैर मोल लेकर ही हो सकता हैं। लोक सदन में बहुमत द्वारा समर्थित प्रधानमंत्री से बैर मोल लेना राजा के अस्तित्व के लिए नुकसानदायक हो सकता हैं। 

3. प्रधानमंत्री व मंत्रिमण्डल के चयन का अधिकार  

जहाँ तक प्रधानमंत्री के चयन का प्रश्न है उसे इस संबंध में विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। उसे कामन सभा में बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए आमन्त्रित करना ही पड़ता हैं। कभी-कभार असाधारण परिस्थितियों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं। ऐसा उस समय होता हैं जबकि यह निश्चित न हो कि बहुमत दल का नेता कौन हैं? जहाँ तक अन्य मंत्रियों की नियुक्ति का प्रश्न है राजा को प्रधानमंत्री की इच्छा का आदर करना ही पड़ता हैं। 

4. पीयर बनाने का अधिकार 

राजा का दूसरा विशेषाधिकार पीयर बनाने का हैं। पीयर बनाने के अधिकार का प्रयोग भी वह प्रधानमंत्री की इच्छा से करता हैं। वर्तमान में लार्डसभा की शक्तियों के कम हो जाने से इस अधिकार का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया। 

ब्रिटिश सम्राट की वास्तविक स्थिति 

ब्रिटिश राजा के संबंध में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वह राज्य करता हैं शासन नहीं। लेकिन यह कहना कि वह स्वर्णिम शुन्य है अथवा रबर का मोहर हैं, उसकी स्थिति का सही आकलन नहीं हैं। राजा ब्रिटिश जनता के हितों का संरक्षक है तथा इस हेतु निरन्तर वह अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता हैं। बैजहाट ने इस संबंध में लिखा हैं," प्रशासन तथा नीति निर्धारिण के संबंध में सम्राट को तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं-- परामर्श के लिए पूछे जाने का अधिकार, प्रोत्साहित करने का अधिकार और चेतावनी देने का अधिकार।" एक बुद्धिमान राजा को इससे अधिक अधिकारों की आवश्यकता भी नहीं हैं। 

फिर भी यह बहुत कुछ राजा के व्यक्तित्व पर निर्भर करता हैं कि उसकी स्थिति क्या हैं? यदि राजा का व्यक्तित्व प्रभावशाली है तो वह संसद तथा मन्त्रिमण्डल को प्रभावित कर सकता हैं। यदि उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली नहीं हैं तो वह स्वर्णिम शुन्य पर रबर की मोहर से अधिक कुछ नहीं हैं। 

राजा कोई गलती नहीं कर सकता 

ब्रिटेन के राजा के संबंध में यह कहा जाता है कि वह "कोई गलती नहीं कर सकता। साहित्यिक दृष्टि से इसका अर्थ हैं कि राजा जो भी करता हैं ठीक ही करता हैं। यदि वह कोई त्रुटि भी करता है तो उसका कार्य हमेशा सही होता हैं। लेकिन संवैधानिक दृष्टि से यह विचार अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। संवैधानिक दृष्टि से इस वाक्य के अर्थ निम्नलिखित हैं-- 

1. मंत्री अपनी गलती के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं 

राजा कोई गलती नही कर सकता इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मंत्री अवैधानिक कार्य राजा की आड़ लेकर करते रहें। वे अपने कार्यों के लिये स्वयं जिम्मेदार होते हैं। मंत्री की त्रुटि के लिए मंत्री ही जिम्मेदार होते हैं राजा नहीं। 

2. राजा कानून से ऊपर हैं 

राजा कोई गलती नहीं कर सकता का अर्थ यह हैं कि राजा कानून से ऊपर होता हैं। उसे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इन विशेषाधिकारों के कारण राजा पर कोई दीवानी अथवा फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। 

डायसी के अनुसार," राजा प्रधानमंत्री को गोली मार दे तो भी ब्रिटेन में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हैं जिसके आधार पर उसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सके। 

3. राजा मंत्रियों के परामर्श पर कार्य करता हैं 

राजा को जो विशेषाधिकार प्राप्त हैं उन विशेषाधिकारों का प्रयोग वह किसी न किसी मंत्री के परामर्श से करता हैं। जब स्वविवेक से कोई कार्य ही नही करता तो उसको किसी गलती के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। कार्टर के शब्दों में," राजमुकुट की शक्तियों का उसी प्रकार से प्रयोग किया जाता हैं जिस प्रकार से संसद के समर्थन के आधार पर केबिनेट उनका प्रयोग करना चाहती हैं। 

चार्ल्स द्वितीय के शयनागार के बाहर लिखी गई पंक्तियाँ राजा की वास्तविक स्थिति का परिचय कराती हैं-- 

"यहाँ सोते हैं सम्राट हमारे अधिराज, विश्वास नहीं करता जिनकी बातों का कोई। 

कभी कम अकली की बात नहीं करते हैं, और न कहते हैं बुद्धि की बात ही कोई।" 

राजा ने इसके उत्तर में कहा," यह नितान्त सत्य हैं क्योंकि राजा की बातें तो अपनी होती हैं, उसके कार्य उसके मंत्रियों के होते हैं।"

इंग्लैंड में राजतन्त्र के जीवित रहने के कारण 

गलैंड में राजतंत्र के जीवित रहने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं--

1. सर्वाधिक प्राचीन संस्था 

इंग्लैंड में राजतन्त्र के जीवित रहने का प्रमुख कारण यह है कि यह सर्वाधिक प्राचीन संस्था है। ब्रिटेन निवासी सर्वाधिक प्राचीन होने के कारण उसे बनाये रखना चाहते हैं तथा उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। वे अतीत तथा वर्तमान के मध्य सम्बन्ध बनाये रखना चाहते हैं। अतः वे किसी भी प्राचीन संस्था को समाप्त नहीं करना चाहते। 

2. अंग्रेजों की रूढ़िवादी प्रकृति 

ब्रिटेन में राजतन्त्र की संस्था के बने रहने का दूसरा कारण यह है कि ब्रिटेन की जनता रूढ़िवादी प्रकृति की है तथा वह ऐसे परिवर्तनों के पक्ष में नहीं जो उनकी सामाजिक परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं पर आघात करें। 

3. राजतन्त्र की संस्था का प्रजातंत्र के मार्ग में बाधक न होना

ब्रिटेन में यदि राजतन्त्र लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक बनता तो शायद राजतन्त्र अधिक देर तक न टिक पाता। प्रो. लास्की के शब्दों में," राजतन्त्र को अपने प्रतीक के रूप में लोकतन्त्र के हाथों बेच दिया गया है और इस विक्रय की प्रक्रिया के साथ-साथ उसकी इतनी अधिक व्यापक प्रशंसा हुई कि मुश्किल से ही उसके विरोध में आवाज उठाई गई हो। 

4. संसदीय शासन में सहायक 

फिर जिस ढंग की संसदीय प्रणाली इंग्लैंड में चल पड़ी है उसमें एक नाममात्र के शासक की जरूरत होती है। उन देशों ने भी जिन्होंने अंग्रेजों के अनुकरण पर यह व्यवस्था चलानी चाही है, एक नाममात्र के शासन अध्यक्ष का पद रखा। 

गिलक्राइस्ट के शब्दों में," इंग्लैंड में राजपद वह कीली है जिस पर शासन यंत्र घूमता है। वास्तव में शासन के सब कार्य राजा के नाम पर किये जाते हैं और संवैधानिक व्यवहार जिनके अधिकार में राजा की वास्तविक शक्ति आ गई हैं, वास्तव में राजपद पर निर्भर करते हैं। 

5. साम्राज्य की एकता का प्रतीक 

'राजतन्त्र' ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद की बड़ी सेवा की है। प्रो. लास्की के शब्दों में," अंग्रेजी साम्राज्य ने जानबूझ कर क्राउन की प्रतिष्ठा बढ़ाई है, ताकि अपना मतलब सिद्ध हो सके। जानबूझ कर यह ढोल इसलिए पीटा जाता रहा है कि राजा साम्राज्य की स्वर्णिम श्रृंखला बन जाये। 

6. राजा राज्य मण्डल की एकता का प्रतीक 

प्रो. डायसी का मत है कि," इंग्लैंड के संविधान स्वरूप....सीमित राजतन्त्र के स्थान पर अंग्रेजी गणराज्य बनाने से ब्रिटिश उपनिवेशों की निष्ठा पर कुठाराघात हो सकता है...राजा की समता संसद भी नहीं कर सकती है। राजा साम्राज्य के प्रत्येक भाग में साम्राज्य की एकता का प्रतिनिधि है।" 

भारत के नेतृत्व में जब गणराज्यों की व्यवस्था राष्ट्र-मण्डल का अंग बनी, उस समय राजा का पद बड़ा काम आया क्योंकि इस बहाने एकता का सूत्र मिल गया। 

7. राजतन्त्र मध्यस्थ के रूप में बड़ा उपयोगी है

इंगलैंड के प्रशासन में राजतन्त्र की भूमिका सदा ही नगण्य नहीं रहती है। अनेक संकटकालीन अवसरों में राज पद ने महत्वपूर्ण सेवायें की हैं यथा 1867 और 1887 में रानी विक्टोरिया ने तथा आयरिश होमरूल के दौरान जार्ज पंचम ने। यही नहीं हिटलरी युद्ध के दौरान बकिंघम प्रासाद में ही टिके रहने का खतरा उठाकर जार्ज षष्टम ने अंग्रेजों के नैतिक साहस को अपूर्व ढंग से उभार दिया था। 

8. राजा शासन सूत्र के संचालन में सहायक होता है

राज पद पर बैठने वाले व्यक्ति के पास भले ही वास्तविक शक्ति न हो परन्तु वह चेतावनी देकर, सलाह देकर, प्रोत्साहन देकर, प्रशासन की भारी सेवा कर सकता है। जैसा पील ने कहा था," दस वर्ष तक राज सिंहासन पर बैठने के बाद कोई भी राजा शासन के बारे में इतनी जानकारी रख सकता है जितनी किसी अन्य के वश की बात नहीं। ऐसी स्थिति में उससे अधिक अच्छा सलाहकार और कौन हो सकता है। प्रथम महायुद्ध के दौरान में जार्ज पंचम का कार्य इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

निष्कर्ष 

प्रथम, ब्रिटेन में राजतन्त्र की संस्था बने रहने का प्रमुख कारण ब्रिटेन निवासियों की अपनी प्राचीन संस्थाओं के प्रति श्रद्धा हैं। यही कारण है कि लोकतन्त्र के आधुनिक युग मे ब्रिटेन में राजा का पद बना हुआ है। ब्रिटेन में राजत्व संस्था के बने रहने का दूसरा कारण यह है कि राजा का पद लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक नहीं बना। तृतीय, ब्रिटेन में राजा का पद बना रहने का कारण इसकी उपयोगिता हैं। राजा राष्ट्र की एकता तथा सामाजिक जीवन का प्रतीक हैं।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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