11/21/2021

ब्रिटिश संसद, शक्तियाँ, रचना और संप्रभुता

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ब्रिटिश संसद (british sansad)

लन्दन शहर मे वेस्ट मिनिस्टर महल की जो शानदार गोल इमारत हैं वह ब्रिटेन की संसद हैं। ब्रिटेन मे संसद ही सम्प्रभु है। संवैधानिक दृष्टि से वह सर्वोच्च है। ब्रिटिश संसद विधि निर्माण की सामान्य प्रक्रिया द्वारा ही किसी भी विषय पर कानून बना सकती है और उसके द्वारा निर्मित कानूनों को किसी के भी द्वारा कोई चुनौती नही दी जा सकती। आज हम ब्रिटिश संसद की शक्तियों, ब्रिटिश संसद की रचना और संप्रभुता के बारे मे चर्चा करेंगे।
ब्रिटिश संसद
ब्रिटिश संसद को ब्लैकस्टोन ने सर्वशक्तिशाली संस्था बताते हुए लिखा हैं "यह प्रेत्यक सम्भव कार्य को कर सकती हैं जो प्रकृति से अशक्य न हो।" ब्रिटिश संसद के बारे में एडवर्ड कोक ने कहा "संसद की शक्ति और अधिकार क्षेत्र इतना महान श्रेष्ठ एवं अनियंत्रित है कि उस पर किसी व्यक्ति का, कीन्हीं कारणों का और किसी भी रूकावट का बन्धन नहीं है।" डी. लोम महोदय ने ब्रिटिश संसद पर चुटकी लेते हुए कहा हैं " ब्रिटिश संसद स्त्री को पुरूष और पुरूष को स्त्री बनाने के अतिरिक्त और सब कुछ कर सकती हैं।

ब्रिटिश संसद की शक्तियाँ (british sansad ki shaktiya)

ब्रिटेन मे न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था नही होने के कारण संसद की विधि निर्माण शक्ति को "संप्रभुता" कहा जा सकता हैं। संवैधानिक दृष्टि से ब्रिटिश संसद सर्वोच्च हैं। ब्रिटिश संसद कोई भी कानून बना सकती हैं और किसी भी कानून को भंग कर सकती है। संसद एक ही प्रक्रिया द्वारा  साधारण व संवैधानिक दोनों भांति के कानूनो का निर्माण कर सकती हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था को इस बात का अधिकार नही है कि वह संसद द्वारा निर्मित कानूनों की अवहेलना अथवा उनका उल्लंघन कर सके न ही इनकी वैधता को चुनौती दी जा सकती है। विश्व में ब्रिटिश संसद की शक्तियाँ सर्वोपरि है, संसद की शक्तियाँ इतनी प्रबल है कि यह माना जाता है कि ब्रिटेन मे सम्प्रभुता का वास संसद मे ही हैं। मेरियट का दावा है कि "इसका अधिकार- क्षेत्र सबसे अधिक विस्तृत और इसकी शक्ति असीम हैं। 

ब्रिटिश संसद की रचना (संरचना)

ब्रिटेन में द्धिसदात्मक व्यवस्थापिका है। द्विसदनीय प्रणाली की स्थापना करने वाला ब्रिटेन दुनिया का पहला राज्य है। वर्तमान में अमेरिका, फ्रांस, रूस, स्विट्जरलैंड, नार्वे, डेनमार्क, न्यूजीलैंड व भारत आदि राज्यों में ही यह पद्धति लागू हो गई है। ब्रिटिश संसद दो सदनों से मिलकर बनी हैं-- 1. लार्ड सभा (उच्च सदन) 2. लोकसदन (निचला सदन) ब्रिटिश राजा भी संसद का ही अंग हैं।

ब्रिटिश संसद की संप्रभुता के कारण 

ब्रिटिश संसद की संप्रभुता के निम्नलिखित कारण हैं--
1. लिखित संविधान का अभाव 
ब्रिटेन का संविधान अलिखित हैं। अन्य देशो का लिखित संविधान संसद की शक्तियाँ सीमित कर देता है,  परन्तु ब्रिटेन मे कोई संविधान न होने के कारण न तो संसद की शक्तियाँ परिभाषित की गई है न ही उनकी सीमाएं निर्धारित की गई है। अतः ब्रिटिश संसद संप्रभु हैं। 
2. संविधान मे संशोधन की असीमित शक्ति 
संसद को साधारण कानून बनाने की सर्वोच्च शक्ति ही प्राप्त नही हैं बल्कि वह संवैधानिक कानूनों के निर्माण मे भी उसकी शक्तियाँ असीमित हैं। वह संविधान मे भी साधारण विधियों के समान ही परिवर्तन व संशोधन कर सकती है।
3. कानून बनाने की असीमित शक्ति 
ब्रिटिश संसद को कानून बनाने की असीमित शक्तियाँ प्राप्त है। वह किसी भी विषय पर कानून बना सकती हैं। उसके द्वारा निर्मित कानूनों को किसी के भी द्वारा कोई चुनौती नही दी जा सकती है।
4. न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार नही
ब्रिटेन मे न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था नही होने के कारण संसद की विधि निर्माण शक्ति को संप्रभुता कहा जाता है। ब्रिटेन मे न्यायपालिका को संसद के कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार नही हैं।
5. संसद की शक्तियाँ ऐतिहासिक विकास का परिणाम 
ब्रिटेन का संविधान एक विकासशील संविधान हैं। संसद ने जो शक्तियाँ अर्जित की हैं वह ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। धीरे-धीरे राजा की शक्तियाँ छिनती चली गई और संसद मे उनका वास होता गया। संसद को यह संप्रभुता इतिहास से विरासत मे मिली है।
6. संसद मे जनभावनाओ का सही प्रतिनिधित्व 
लोकसदन जनता ही प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता हैं। शासन की अन्य किसी भी संस्था की तुलना मे केवल संसद ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो समूचे राष्ट्र की जनभावनाओ का प्रतिनिधित्व करती हैं।

ब्रिटिश संसदीय सम्प्रभुता की सीमाएं 

ब्रिटिश संसद सम्प्रभुता है लेकिन संवैधानिक दृष्टि से व्यावहारिक दृष्टि से उस पर राजनैतिक व नैतिक प्रतिबंध अधिरोपित हैं। जो निम्नलिखित हैं-- 
1. जनमत 
यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिबंध हैं। लोकसदन जनता द्वारा ही प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता हैं। इसलिए जनमत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। न ही लोकसदन ऐसा कोई कानून-निर्माण कर सकता है जो जन भावनाओं के विरूद्ध हो। इसके अलावा समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियों तथा टेलीविजन आदि भी संसद के कार्यों की समीक्षा करते रहते हैं। इसी कारण इनका लोकसदन पर दबाव बना रहता हैं। 
2. परम्पराएँ 
ब्रिटिश राज-व्यवस्था में परम्पराओं को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। संसद के द्वारा ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जा सकता जो सुस्थापित परम्पराओं के प्रतिकूल हो। यदि ऐसा किया गया तो जनता संसद के विरूद्ध हो जाएगी। यदि किसी परम्परा की उपयोगिता समाप्त हो जाती है तभी संसदीय कानून उसमें रद्दोबदल कर सकता हैं। 
3. नैतिकता 
संवैधानिक दृष्टि से प्रभुतावान होते हुए भी कानून-निर्माण के समय संसद को जनता की भौतिक धारणाओं का ध्यान रखना पड़ता हैं। संसद नैतिक मान्यताओं के विरूद्ध कानून नहीं बना सकती हैं। 
4. विधि का शासन 
ब्रिटेन में विधि के शासन का विशेष महत्व हैं। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान हैं, विधि के शासन के इस सिद्धांत का उल्लंघन संसद नहीं कर सकती। यदि संसद विधि के शासन को समाप्त करना चाहे तो उसके विरूद्ध वैसी प्रतिक्रिया होगी जैसी कि संसद द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में होती हैं।
5. मंत्रिमंडल का संसद पर नियंत्रण 
ब्रिटिश शासन व्यवस्था में सिद्धांतों और व्यवहार में जो भेद है वह संसद तथा मन्त्रिमण्डल के पारस्परिक संबंधों में विशेष रूप से देखा जा सकता हैं। वर्तमान में संसद मंत्रिमंडल पर नियंत्रण नहीं रखता हैं। सैद्धान्तिक दृष्टि से केबिनेट दास हैं, परन्तु व्यावहारिक रूप से वह स्वामी हैं। मंत्रिमंडल लोक सदन का विघटन करवा सकता हैं। मंत्रिमंडल ऐसी सन्तान है जो अपनी जननी को भी भंग कर सकती हैं। 
6. प्रदत्त व्यवस्थापन 
वर्तमान में संसद के पास कार्यभार की अधिकता हैं। कार्यभार की इस अधिकता के कारण संसद कानूनों की केवल मोटी रूपरेखा निर्धारित कर देती है तथा इस संबंध में नियम तथा उपनियम बनाने का अधिकार कार्यपालिका को प्रदान कर दिया जाता हैं। कार्यपालिका द्वारा पारित ऐसे कानूनों को प्रदत्त व्यवस्थापन कहा जाता हैं। प्रदत्त व्यवस्थापन की इस प्रक्रिया के कारण कानून निर्माण की अधिकांश शक्तियाँ कार्यपालिका के पास आ जाती हैं जिन पर व्यवस्थापिका का कोई नियंत्रण नहीं होता।
7. अन्तर्राष्ट्रीय कानून व संगठन 
अन्तर्राष्ट्रीय कानून व संगठन से भी ब्रिटिश संसद की प्रभुता सीमित हो जाती हैं। ब्रिटेन में "वेस्ट रैन्ड गोल्ड माइनिंग कम्पनी बनाम सम्राट" नामक विवाद में यह अधिनिर्णय हो चुका है कि ब्रिटिश संसद सामान्यतया अन्तर्राष्ट्रीय कानून के विरूद्ध कोई नियम नहीं बनायेगी। 
इस प्रकार से स्पष्ट है कि संसद की सम्प्रभुता का तात्पर्य मनमानी नहीं है। वैधानिक दृष्टि से भले ही संसद की सत्ता सर्वोपरि, असीमित व निरंकुश हो लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से उस पर अनेक प्रतिबंध हैं। ताकि वह जनहितार्थ कार्य करें।
यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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