2/23/2022

अधिनायकवाद/तानाशाही का अर्थ, विशेषताएं/लक्षण

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अधिनायकवाद या तानाशाही का अर्थ (adhinayak tantra kise kahate hain)

adhinayak tantra arth paribhasha visheshta;अधिनाकतंत्र को तानाशाही, अधिनायकवाद या अन्य शासन भी कहा जाता हैं। अधिनायकवाद को परिभाषित करते हुए फोर्ड ने लिखा हैं," अधिनायकतंत्र राज्य के अध्यक्ष द्वारा गैर-कानूनी शक्ति प्राप्त करना हैं।" अधिनायकवा अपनी शक्ति का प्रयोग स्वच्छन्दतापूर्वक या मनमाने ढंग से करता हैं। यह एक प्राचीन शासन प्रणाली हैं। मध्यकाल में संसार के कई राज्यों में, अधिनायकों की निरंकुश शासन व्यवस्था थी। वर्तमान युग में प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद अधिनायकवाद तेजी से बढ़ा। इटली में मुसोलिनी और जर्मनी में हिटलर भयंकर तानाशाह बना। सोवियत संघ में भी तानाशाही चली। लेनिन, स्टालिन तानाशाह हुए। अधिनायकतंत्र भी कई प्रकार का होता हैं। प्रथम, एक व्यक्ति सेना के बल पर संपूर्ण देश में शासन करता हैं। द्वितीय, वह जिसमें एक व्यक्ति एक पार्टी के बल पर संपूर्ण शासन पर अधिकार रखता हैं। तृतीय, अधिनायकतंत्र वह है जिसमें एक व्यक्ति अपने चमत्कारिक लक्षणों के कारण संपूर्ण शासन-तंत्र का स्वामी बन जाता हैं। 

अधिनायकवाद सरकार का कोई नया रूप नही हैं। प्रजातांत्रिक रोम में अधिनायकतंत्र स्वीकृत व्यवस्था थी जहाँ सरकार की शक्ति सामान्यतः दो प्रधानों में निहित थी, जिन्हें कौंसल (Counsul) कहा जाता था। आवश्यकता के समय रोम-निवासी कौंसलों के ऊपर अधिनायक को नियत किया करते थे और उसे संकट का सामना करने के लिए सर्वोच्च शक्तियाँ सौंप दिया करते थे। लेकिन यह रोमन अधिनायकतंत्र केवल एक अस्थाई प्रयोग था। संकटकालीन अवस्था समाप्त हो जाने पर इसे त्याग दिया जाता था। साथ ही अधिनायकवा का इस दायित्व के साथ कानूनी विधि से चुनाव होता था कि,"वह अपनी शक्ति के प्रयोग को स्थाई अधिकार शक्ति की जाँच के प्रस्तुत करेगा।" 

जो भी हो, अधिनायकतंत्र का यह रूप आधुनिक अधिनायकवाद जैसा नही था और यह रूस, इटली, जर्मनी आदि देशों के आधुनिक अधिनायकों पर लागू नही होता। आधुनिक अधिनायकों को राष्ट्रीय संकट के समय शासन संचालन के लिए सीमित अवधि के लिए किसी कानूनी विधि द्वारा नहीं चुना जाता, वरन् वे तो प्रायः आस्कस्मिक क्रान्ति के फलस्वरूप शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। उनकी राजनीतिक शक्ति का आधार बल प्रयोग होता हैं। वे उसी समय तक शक्ति में रहते है जब तक बल प्रयोग उन्हें अधिनायक बनाने में सहायक होता हैं। अधिनायक अपने सिवाय अन्य किसी शक्ति के प्रति उत्तरदायी नही होते। वे प्रजातंत्र के घोर विरोधी होते हैं। अधिनायकतंत्र में सरकार की शक्तियाँ असीमित होती हैं जिन पर कोई वैधानिक नियंत्रण नहीं होता। सैनिक तानाशाही में तो संविधान स्थगित कर दिया जाता है और एक क्रान्तिकारी परिषद् बनाई जाती हैं, जिसमें सेना के उच्च अधिकारी शामिल होते हैं और वे राजाज्ञाओं अथवा आदेशों द्वारा देश का शासन चलाते हैं। अधिनायकवाद अपने अलावा अन्य किसी शक्ति के प्रति अपना उत्तरदायित्व अनुभव नही करते। 

प्रायः कहा जाता हैं कि अधिनायकवाद में राज्य की संपूर्ण शक्ति एक ही व्यक्ति में निहित होती हैं जो स्वयं मूर्तिमान राज्य होता हैं। यह कहा जाता हैं कि जर्मनी और इटली में हिटलर और मुसोलिनी की इसी प्रकार की स्थिति थी। 

किन्तु इस संबंध में मैकाईवर का यह कथन निश्चित ही ठीक हैं कि," वस्तुतः कोई भी सरकार कभी एक व्यक्ति के हाथ में नही रही।" 

यदि हमें कहीं एकाकी सर्वोच्च शासक या अधिनायक दिखाई देता है जो प्रत्यक्ष रूप से उसकी शक्ति एक संयुक्तवर्ग के सक्रिय समर्थन पर निर्भर करती हैं। अधिनायक अर्थात् सर्वोच्च शासक अपने समर्थक वर्ग के हित में शासन करता हैं और उनके सहयोग का आकाँक्षी रहता हैं।

इस तरह के शासन तंत्र में सम्प्रभुता एक ही व्यक्ति के हाथों में केन्द्रित होती है। यही व्यक्ति वास्तविक सम्प्रभु होता है। अपनी स्वेच्छाचारी शक्ति के अनुसार आदेश प्रसारित करना, उन्हें लागू करना, उनकी पालना करना ही अधिनायकवादी तंत्र का मुख्य कार्य होता है। जनसाधारण की भावनाओं इच्छाओं को कुचलना ही परम कर्त्तव्य शासक का होता है। ऐसे तंत्र में शासक का पद योग्यता के आधार पर नहीं वरन् शक्ति एवं बल के माध्यम से हिंसा के सहारे पाने का प्रयास किया जाता है। 

अतः कार्यपालिका व्यवस्थापिका, न्यायपालिका सम्बन्धी शक्तियों को एक ही व्यक्ति वहन करता है। यही सर्वाधिकारवादी शक्तियों को प्रयोग भी करता है।

अधिनायकवाद की परिभाषा (adhinayak tantra ki paribhasha)

प्रमुख राजनीतिक विचारकों ने अधिनायकतन्त्र को निम्न प्रकार परिभाषित किया है-- 

फोर्ड के अनुसार," राज्याध्यक्ष द्वारा गैर-कानूनी शक्ति प्राप्त करना ही अधिनायकतन्त्र है।" 

जैक्सन ने अधिनायक तन्त्र के गुणों के बारे में कहा है कि," स्पेन के इतिहास में यह पहला अवसर है जब रेले समय पर चल रही हैं। अधिनायकवादी व्यवस्था के अधीन व्यापार और उद्योग समृद्ध हुये हैं, कृषि भी उन्नतिशील हुई है तथा श्रम संकट दूर हो गेय हैं।"

प्रो. एस. एन. दुबे के अनुसार," अधिनायकतन्त्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासक वर्ग जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होता है। अधिनायक तन्त्र लोकतन्त्र का विलोम है।" 

एफ. न्यूमैन के अनुसार," अधिनायकतन्त्र से हमारा आशय एक या कुछ लोगों के एक समूह के शासन से है जो स्वयं को अन्यायपूर्वक राज्य सत्ता में स्थापित करता है और बिना किसी प्रकार के नियन्त्रण को स्वीकारते हुये सत्ता का एकाधिकारपूर्ण ढंग से प्रयोग करता है।" 

सोल्टाऊ के शब्दों में," अधिनायकतन्त्र एक व्यक्ति का शासन होता है जिसने अपने पद को सामान्य तौर पर वंशानुगत रूप में प्राप्त नहीं किया होता है वरन् शक्ति अथवा सहमति या दोनों के सहयोग से प्राप्त किया होता है। वह निरपेक्ष प्रभुसत्ता प्राप्त करता है और इसका प्रयोग वह कानून के स्थान पर अपनी इच्छा से आदेशों को लागू करके करता है।" 

अफ्रेड कोबां के अनुसार," अधिनायकतन्त्र एक ऐसे व्यक्ति का शासन है जिसमें शासक का पद छल, कपट, हिंसा आदि के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।" 

मैकाइवर के अनुसार," विभिन्न शासन प्रणालियाँ इस रूप में संवैधानिक मानी जाती है कि उनके सत्ता में आने का एक तय कानूनी आधार होता है जिसे शासन सत्ता में आने आली सरकार नहीं बनाती है और न ही तोड़ती है। इस रूप में अन्य समस्त शासन प्रणालियाँ वैध मानी जाती हैं। केवल अधिनायकतन्त्र ही मात्र अपनी इच्छा को सत्ता का एक मात्र औचित्य मानता है। समाज की सभी अवस्थाओं में लोगों की सत्ता के स्रोत को जानने में रुचि रही है, इसे कभी समुदाय में, ईश्वर या पवित्र रूढ़ियों में देखा है लेकिन अधिनायकतन्त्र इनकी उपेक्षा करता है और अपने अस्तित्व को ही एकमात्र स्वीकारणीय मानता है।"

अधिनायकवाद या अधिनायकतंत्र की विशेषताएं अथवा लक्षण (adhinayak tantra ki visheshta)

अधिनायकवाद या तानाशाही की निम्नलिखित विशेषताएं या लक्षण हैं-- 

1. हिंसा और शक्ति में विश्वास 

अधिनायकवादियों के अनुसार राज्य का मूर्त रूप है और शांति कायरों की देन हैं। युद्ध मानवता के मस्तिष्क पर कुलीनता का टीका लगा देता हैं। अधिनायकवादी देशों ने सैन्य शक्ति पर भोजन से अधिक बल दिया। उनके अनुसार राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए महत्वाकांक्षी तथा कठोर व्यक्तियों का नेतृत्व चाहिए। युद्ध काल में ही संस्कृति का उदय होता हैं। 

2. उग्र राष्ट्रीयता

अधिनायकवाद राज्य को साध्य एवं व्यक्तियों को साधन मानते हैं। उनका विचार है कि व्यक्ति को राज्य के लिए बलिदान कर देना चाहिए, इनका राष्ट्रवाद दूसरे देशों के अधिकारों की अवहेलना करता हैं। राज्य की पूजा करनी चाहिए। 

3. संसदीय शासन के विरूद्ध 

संसदीय सरकार के विरूद्ध अधिनायकतंत्र एक या कुछ व्यक्तियों द्वारा शासन हैं इसलिए तानाशाही आवश्यक हैं। यह संसद को केवल बात करने वाली सभा मानते हैं। 

4. प्रेस ओर रिडियों पर नियंत्रण 

तानाशाही समाचार-पत्रों को विरोधी विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता नही देती, अपितु वे प्रेस तथा रेडियों पर अपना पूर्ण नियंत्रण रखते हैं और जनता को अपने पक्ष में शिक्षित करने के लिए उसका हर प्रकार से प्रयोग करते हैं। 

5. राज्य की सर्वोपरिता

तानाशाही लोकतंत्र के विरूद्धी होती हैं। इसमें सारी शक्तियाँ राज्य को देते हैं। मुसोलिनी का कहना था कि," सब वस्तुएं राज्य के अंतर्गत हैं राज्य के बाहर कुछ भी नहीं हैं।" इस तरह तानाशाही में सरकार की शक्तियाँ असीमित होती हैं और उन पर कोई वैधानिक नियंत्रण नहीं होता। 

6. मौलिक अधिकार और स्वतंत्रताओं का अंत 

तानाशाही में जनता को प्रायः मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं से वंचित कर दिया जाता हैं। अधिकार जनता के हक नहीं समझे जाते बल्कि राज्य की कृपा समझी जाती हैं।

7. एक व्यक्ति का शासन 

अधिनायकतंत्र में शासन एक व्यक्ति द्वारा ही किया जाता हैं। जैसे-- रूस या चीन में दल के नेता में ही शासन की शक्तियाँ निहित रहती हैं। इटली में मुसोलिनी का फासिस्टवाद या जर्मन में हिटलर का नाजीवाद अधिनायकतंत्र शासन थे। फासिस्टवाद की व्याख्या करते हुए मैक्सी ने कहा हैं," फासिस्टवाद सिद्धान्तविदों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि समस्त शक्तियों का वास एक ही व्यक्ति में होना चाहिए, परन्तु जिस व्यक्ति को उन्होंने ये शक्तियाँ दी हैं, उसे एक तानाशाह न कहकर उसे देवता के सिंहासन पर बिठा दिया। ऐसा देवता जो सभी की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है और जो स्वयं राज्य का मूर्तिमान स्वरूप हैं।" 

8. निरंकुशत

यह पद्धित राज्य की सर्वोच्चता और निरंकुशता में विश्वास करती हैं। 'राज्य ईश्वरी का प्रतिरूप हैं', हीगल के इस कथन को अधिनायकवादी स्वीकार करते हैं। इसमें राज्य को सर्वश्रेष्ठ संस्था माना जाता हैं। उस पर कोई नियंत्रण नहीं होता तथा उसकी शक्तियाँ असीमित होती हैं। मुसोलिनी के अनुसार," सब राज्य के भीतर हैं, राज्य के बाहर कुछ भी नहीं हैं और राज्य के विरूद्ध भी कुछ नहीं हैं।" 

9. स्वतंत्रता पर प्रतिबंध 

अधिनायकतंत्र में व्यक्तियों की स्वतंत्रता प्रतिबंधित कर दी जाती हैं। उन्हें न तो अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता रहती है और न ही शासन का विरोध करने की। समाचार-पत्रों पर भी शासन का नियंत्रण रहता हैं।

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