2/04/2022

व्यवस्थापिका/विधायिका का अर्थ, संगठन

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व्यवस्थापिका या विधायिका का अर्थ (vyavasthapika kya hai)

व्यवस्थापिका को 'विधायिका' या 'विधानपालिका' के नाम से भी जाना जाता हैं। सरकार के मुख्य तीन अंग हैं-- कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका। सरकार के तीनों अंग अलग-अलग कार्य करते हैं। व्यवस्थापिका देश के लिए कानून बनाने का कार्य करती हैं, कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका यह देखती हैं कि लोकतन्त्रीय व्यवहार नियमों और सीमाओं के अनुसार हो रहा हैं अथवा नहीं। 

दूसरे शब्दों में," व्यवस्थापिका राज्य के संकल्पों को व्यक्त करती हैं, कार्यपालिका इन्हें साकर रूप देती हैं और न्यायपालिका इनकी व्याख्या करती हैं तथा इनके अनुसार अपने निर्णय देती हैं। 

सरकार के तीनों अंगों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यवस्थापिका हैं। यह सरकार का वह अंग है जो राज्य की इच्छा को कानून का रूप देता हैं। प्रजातंत्र शासन की स्थापना से पूर्व राजा ही यह काम करता था, लेकिन आधुनिक प्रजातांत्रिक युग में लगभग सभी गतिशील देशों में यह काम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं। 

ऐतिहासिक दृष्टि से विधायिकाओं का जन्म इसलिए हुआ की कार्यपालिका को सलाह और परामर्श की आवश्यकता थी। ब्रिटेन की पार्लियामेण्ट ने कार्यपालिका के कार्यों को सीमित करने के लिए इस आवश्यकता से लाभ उठाया। विधि-निर्माण का कार्य विधायिकाओं के जन्म से पहले भी होता था-- मनुष्य ने कानून उस समय बना लिये थे जब उसने विधायिका की कल्पना भी नही की थी। उदाहरण के लिए, रूढ़िगत विधि का लम्बा इतिहास हैं, और उसका आरंभ उस काल में हुआ था जब विधायिका नाम की कोई चीज थी ही नहीं। 

फिर भी हम विधायिका की परिभाषा विधि-निर्माण की पदावली को छोड़कर अन्य किन्हीं शब्दों में नहीं कर सकते। वह शासन का वह अंग है जो समाज के लिए कानूनों का निर्माण, संशोधन तथा निरसन करती हैं। उसके विधि-निर्माण के अधिकार को वैध इसलिए माना जाता हैं कि जहाँ कहीं भी उसका अस्तित्व है वहाँ वह जनता का प्रतिनिधित्व करती हैं, अथवा उससे जनता का प्रतिनिधित्व करने की आशा की जाती हैं। इसलिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में उसका निर्वाचन जनता द्वारा किया जाता हैं। कुछ राजनीतिक व्यवस्थाओं में उसकी नियुक्ति भी हो सकती हैं, वहाँ उसका प्रयोग कार्यपालिका के आदेशों को क्रियान्वित करने के लिए कठपुतली के रूप में किया जा सकता हैं। 

दूसरे शब्दों में, उन व्यवस्थाओं में उसकी आवश्यकता उसके प्रतीकात्मक महत्व के कारण होती हैं। स्मरण रखने की बात यह हैं कि विधायिका कानूनों को तथा बजट को पारित करके राजनीतिक व्यवस्था को वैधता प्रदान करती हैं, और इस वैधता का आधार उसका प्रतिनिधि स्वरूप हैं।

व्यस्थापिका या विधायिका का संगठन (vyavasthapika ka sangathan)

प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था के प्रारम्भ में अधिकांश देशों में एक सदनीय व्यवस्थापिका थी किन्तु धीरे-धीरे यह अनुभव किया गया कि प्रथम सदन की शक्ति पर अंकुश रखने तथा प्रथम सदन द्वारा किए गये कार्यों पर पुनर्विचार करने के लिए विधायिका का द्विसदनीय होना आवश्यक है।

संगठन की दृष्टि से हम व्यवस्थापिका को दो भागों में बाँट सकते हैं-- 

1. एक सदनात्मक व्यवस्थापिका 

जिस राज्य मे व्यवस्थापिका का एक ही सदन होता है उसे एक सदनात्मक व्यवस्थापिका कहते हैं। अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं के प्रारंभ में में अनेक देशों ने एक सदनात्मक प्रणाली को अपनाया हैं। वर्तमान में यूरोप के कुछ देशों उदाहरणार्थ, बल्गारिया आदि, में एक सदनीय विधान मंडल है। एक सदनीय विधायिका के समर्थकों, का मुख्य तर्क यह है कि कानून जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति या उसका प्रतिनिधित्व करते है। यह कार्य एक सदन द्वारा किया जा सकता हैं, एक से अधिक द्वारा नहीं, क्योंकि इच्छा एक होती हैं, अनेक नहीं। दूसरे सदन को अनुपयोगी और खर्चीला माना जाता हैं इसलिए भी एक सदनात्मक व्यवस्थापिका को पसंद किया जाता हैं। 

2. द्वि सदनात्मक व्यवस्थापिका 

जिस राज्य की व्यवस्थापिका में दो सदन होते हैं, उस व्यवस्थापिका को द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका कहा जाता हैं। संसार के अधिकांश देशों में द्वि-सदात्मक व्यवस्थापिका ही हैं। जैसे, इंग्लैंड, भारत, अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देशों मे द्वि सदनात्मक व्यवस्थापिका ही हैं। भारत में लोक सभा और राज्य सभा, इंग्लैंड में लार्ड सभा और काॅमन सभा, अमेरिका में सीनेट और प्रतिनिधि सभा, आदि द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका हैं। 

द्वि-सदनात्मक प्रणाली ऐतिहासिक विकास तथा संयोग का परिणाम हैं। यह व्यवस्था ब्रिटिश संवैधानिक विकास का ही परिणाम हैं। इंग्लैंड की संसद, जो सबसे प्राचीन संसद है, संयोग से द्वि-सदनात्मक हो गई। अन्य प्रजातांत्रिक देशों में ब्रिटिश परम्परा का अनुसरण किया गया। 

प्रो. लास्की के शब्दों में," यह केवल ऐतिहासिक संयोग की बात हैं कि इंग्लैंड की व्यवस्थापिका द्वि-सदनात्मक थी और उसी का अनुसरण अन्य देशों ने किया।" 

विलोबी ने कहा कि," यदि ब्रिटिश संसद द्वि-सदनात्मक न होती तो शायद संसार के अन्य विधानमण्डल भी द्वि-सदनात्मक नहीं होते।" 

वर्तमान में बड़े लोकतांत्रिक राज्यों में व्यवस्थापिका के दो सदन होते हैं। एक सदन को उच्च या द्वितीय सदन (Upper or Second Chamber) और दूसरे सदन को निम्न या प्रथम सदन (Lower or First Chamber) कहते हैं। निन्म सदन सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व करता हैं। उसका निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होता हैं। द्वितीय सदन विशिष्ट वर्गों, स्वार्थी तथा संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता हैं। इसकी रचना का कोई निश्चित संवैधानिक आधार नहीं हैं। विभिन्न देशों में इसके संगठन का स्वरूप अलग हैं। इंग्लैंड की लार्ड सभा के संगठन का आधार वंश परम्परा हैं। इटली, जापान और कनाडा में द्वितीय सदन के सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते है। भारत की राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एवं मनोनीत किये जाते हैं। अमेरिका में सीनेट के सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता हैं।

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व्यवस्थापिका द्वि-सदनात्मक हो या एक सदनात्मक हो यह प्रश्न आधुनिक विचारकों मे विवाद का विषय बना हुआ हैं। प्रजातन्त्रीय विचारों से पूर्व अधिकांश देशों में एक सदनात्मक व्यवस्थापिका का ही रिवाज था। प्रजातांत्रीय विचारों के प्रसार एवं प्रचार से लोगों में यह भाव पैदा हुए कि प्रथम सदन पर अंकुश रखने के लिए तथा प्रथम सदन के द्वारा किये गये कार्यों पर पुनर्विचार करने के लिए दूसरे सदन की आवश्यकता है। इस विचार ने जोर पकड़ा और कुछ छोटे-छोटे देशों को छोड़कर शेष सभी बड़े एवं महत्वपूर्ण देशों में द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिकायें विद्यमान हुई। 

व्यवस्थानिका एक सदन वाली हो या दो सदनों वाली हो अभी यह प्रश्न हल नहीं हुआ हैं। एक सदन के पक्ष वाले कहते हैं कि आमतौर से द्वितीय सदन शक्ति शून्य होता हैं, अतः उसका होना न होना बराबर है। वह तो केवल खर्चा बढ़ाने लिए तो कुछ समय तक जन भावना की प्रगति में रोड़ा अटकाने के लिए होता हैं अतः उसे समाप्त करना की श्रेयष्यकर है। दूसरे लोगों का कहना है कि प्रथम सदन में आमतौर से नयी उम्र के लोग होते है और अतः अतः कुछ अनुभवी, योग्य तथा अधिक आयु के गंभीर लोगों का भी एक सदन होना चाहिए जो उग्रवादी विचारों पर अंकुश रखने का कार्य कर सके। इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन करना अच्छा रहेगा। 

द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में तर्क 

द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में अनेक तर्क दिये जाते हैं, वास्तव में यह पक्ष बहुत कम प्रबल है। द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-- 

1. प्रथम सदन की निरंकुशता पर रोक 

सबसे बड़ा और प्रमुख तर्क यही है कि शासन पर एक सदन का एकाधिकार उसे स्वेच्छाचारी एवं उद्दण्ड बना देता है और वह मनमानी कर जनता की स्वतंत्रता को हड़प लेता है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि शक्ति भ्रष्ट करती हैं और बिना प्रतिबन्ध के दी गई शक्ति मनुष्यों को नितान्त भ्रष्ट कर देती है। द्वितीय सदन प्रथम सदन की मनमानी पर अंकुश रखता है तथा उसे भ्रष्ट होने से रोकता है। पहला सदन या निम्न सदन मे जोशीले, उग्रवादी और समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले लोगों का बहुमत रहता हैं, क्योंकि निम्न सदन के सदस्य जनसंख्या के आधार पर चुने जाते है जिन्हे वयस्क मताधिकार होता हैं। निम्न सदन में यह उग्र स्वभाव वाला बहुमत अल्पमत की चिन्ता किये बिना अपनी इच्छानुसार कानून पास करने का प्रयत्न करता है। यदि इस बहुमत पर सत्तारूढ़ दल की कृपा दृष्टि रहे तो फिर "करेला तो कड़वा होता है फिर नीम चढ़ा।" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती हैं अर्थात् वह तानाशाही की ओर मुड़ जाता है। 

2. जल्दबाजी एवं कुविचार पूर्ण कानून के निर्माण पर रोक 

जनप्रतिनिधि भावुक, जल्दबाज, क्रान्तिकारी एवं अव्यवहारिक होते है। उनके मस्तिष्क में जो आ जाता है उस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का माद्ददा उनमें होता ही नही। बस जो कुछ करना है जल्द करो भविष्य की चिन्ता न करो, यही उनके विचार होते है और इन्हीं के आधार पर वे क्रान्तिकारी इन्हीं कानून पास कर डालते है भले ही उनसे लाभ के स्थान पर हानि ही क्यों न उठानी पड़े। द्वितीय सदन ऐसे ही जल्दबाज लोगों के सदन पर अंकुश का कार्य करता है। वह अविचारपूर्ण कानूनों को पास होने से रोकता है। लेकी महोदय ने इस विषय पर कहा है कि," नियन्त्रक, संशोधक एवं बाधक प्रभाव के रूप में द्वितीय सदन की आवश्यकता ने प्रायः एक सर्वमान्य तथ्य का स्थान ले लिया हैं।" 

3. विशेष हितों और वर्गों के प्रतिनिधित्व देने के लिए 

आमतौर से अधिक बुद्धिमान या विद्वान लोग दलगत राजनीति में नही पड़ना चाहते, फिर उनके विषय में सामान्य जनता भी अधिक जानकारी नही रखती। अतः जनता द्वारा इनका चुनाव होना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त अनेक वर्ग ऐसे होते है जिनके हित बहुसंख्यक जनता से भिन्न होते हैं। अतः अनेक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए द्वितीय सदन की आवश्यकता पड़ती है। एक विद्वान के मतानुसार," द्वि-सदनात्मक प्रणाली का आधार अल्पसंख्यकों को आश्वस्त करने की इच्छा और प्रजातंत्र में विश्वास की न्यूनता हैं।" 

4. कार्य विभाजन के लाभ 

आधुनिक समय में व्यवस्थापिका के कार्यों में बड़ी वृद्धि हो गई है। यदि व्यवस्थापिका में दो सदन रहे तो कार्य विभाजन किया जा सकता है और इस प्रकार व्यवस्थापिका की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। वे विधेयक जिन पर विशेष मतभेद नहीं होता सर्वप्रथम द्वितीय सदन में प्रस्तुत किये जा सकते हैं और प्रथम सदन अपना ध्यान अधिक महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर केन्द्रित कर सकता है। 

5. संघात्मक शासन के लिए अति आवश्यक 

एक संघ में अनेक इकाइयाँ होती हैं। उनमें साधारणतया क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से पर्याप्त अंतर होता हैं। ऐसी स्थिति में संघ की सभी इकाइयों को सन्तुष्ट करने के लिए द्वितीय सदन की बड़ी उपयोगिता रहती हैं। प्रथम सदन में जनसंख्या के आधार पर और द्वितीय सदन में इकाइयों की समानता के आधार पर प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जा सकती हैं। 

6. जनमत निर्माण में सहायक 

द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका होने पर एक सदन में विधेयक पास होने पर दूसरे सदन मे भेजा जाता है। इसी बीच प्रैस के माध्यम से निर्वाचक मण्डल को आवश्यक जानकारी प्राप्त हो जाती है। विधेयक के पास होने में देरी के कारण निर्वाचक मण्डल को भी अपनी सम्मति प्रकट करने का अवसर मिल जाता हैं। इन विचारों से अवगत होकर द्वितीय सदन प्रथम सदन द्वारा पारित विधेयक में अनेक संशोधन कर उसे पुनः विचारार्थ प्रथम सदन को लौटा देता है और इस प्रकार जल्दबाजी में हो जाने वाली भूल को सुधारा जा सकता हैं। 

व्यवहार में द्वितीय सदनों की स्थिति 

1. व्यवहार में देखा गया है कि द्वितीय सदन प्रथम सदन की निरंकुशता को रोकने में असमर्थ रहता हैं। इंग्लैंड की लार्डस सभा और भारत की राज्यसभा नाममात्र के द्वितीय सदन हैं। इनके पास कोई शक्ति नही सिवाय विलम्ब लगाने के। प्रथम सदन जनता द्वारा निर्वाचित होता है अतः द्वितीय सदन द्वारा प्रथम सदन पर नियंत्रण रखना बड़ा कठिन कार्य हैं। 

2. व्यवहार में कानूनों पर पुनर्विचार औपचारिकता मात्र है। भारत इंग्लैंड और जापान के द्वितीय सदन कानूनों पर पुनर्विचार कर उनमें आमूल-चूल परिवर्तन नहीं कर सकते। लार्डसभा और राज्यसभा को प्रथम सभा की बात माननी पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त यह कहना कि प्रथम सदन में विधेयक जल्दबाजी में पास होते हैं, गलत हैं। कानून निर्माण प्रक्रिया बड़ी लम्बी और जटिल होती हैं। उसमे विधेयक के एक-एक शब्द पर विचार होता हैं, उसके भिन्न अर्थों पर विचार होता हैं, अच्छी खोजबीन कर तब कहीं वह कानून बन पाता हैं। लास्की का मत इस विषय में उल्लेखनीय हैं। वह लिखता है कि," आधुनिक युग में व्यवस्थापन यकायक कानून की पुस्तक पर नहीं आ जाता हैं। प्रायः प्रत्येक विधेयक विचार और विश्लेषण की लम्बी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप कानून बनता हैं। अतः जल्दबाजी के व्यवस्थापन को रोकने की दृष्टि से राजनीति की वर्तमान दशा में दूसरे सदन का महत्व अत्यंत कम हो गया हैं। 

3. व्यवहार में यह देखा गया है कि विश्व के द्वितीय सदन में अल्पमतों एवं विशेष हितों को प्रतिनिधित्व नही दिया गया है। सीनेट जनता द्वारा निर्वाचित होती हैं, लार्डसभा वंशानुगत हैं, राज्यसभा में भी भारत के अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व न देकर वहाँ राजनीतिक दलों को प्रथम सदन के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाता हैं। विधानमण्डल भी अपने अनुपात से प्रतिनिधि भेजते हैं। इस प्रकार जिस उद्देश्य से द्वितीय सदन रखा गया था वह पूरा नहीं हुआ। 

4. व्यवहार में यह देखा जाता है कि द्वितीय सदन के सदस्य अपनी इकाइयों के हितों की चिन्ता नही करते बल्कि वे अपने-अपने दलों की चिन्ता करते है जो उन्हें वहाँ भेजता हैं। अतः संघ राज्य में भी द्वितीय सदन की कोई उपयोगिता दिखाई नही देती। भारत का द्वितीय सदन इसका उदाहरण हैं। अतएव लास्की ने साफ कहा हैं कि," यह गलत है कि संघ की रक्षा के लिए दूसरा सदन कोई प्रभावशाली गारन्टी हैं।"

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